पीयूष; तुम्हारी इस सफाई का क्या औचित्य! भारत में जब भारतीय संस्कृति ही नहीं रहेगी तब फिर कैसा भारत ?
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । भारत कोई साधारण राष्ट्र नहीं है, यह एक ऐसी सनातन सभ्यता है, जिसने समय के हर प्रहार को सहते हुए भी अपनी आत्मचेतना को जागृत और अक्षुण्ण बनाए रखा है। यह वही भूमि है जहाँ मनुष्य चेतन्य आत्मा माना गया; जहाँ जीवन का उद्देश्य लोकमंगल है। यहाँ की संस्कृति ने “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” के माध्यम से विविधता में एकता का अद्भुत दर्शन किया है। किंतु आज जब आधुनिकता के नाम पर वैश्विक कॉरपोरेट कल्चर भारत में अपनी जड़ें जमाता हुआ दिखता है, तब बहुत दुख होता है।
आश्चर्य तो यह है कि दुनिया में इस्लामवादी जहां पर भी हैं, वहां विकसित एवं विकासशील दोनों ही देशों में हिजाब, बुर्का, दाड़ी से लेकर अपने मजहबी नियमों को आग्रह और दबाव दोनों तरीके से स्वीकार करने के लिए उद्यत रहते हैं और इसी का परिणाम है जो लेंसकार्ट जैसी पीयूष गोयल की भारतीय कंपनी अपने ड्रेस कोड में इस्लाम के सामने तो झुकती है, पर जहां इस मिट्टी की मूल संस्कृति को स्वीकारने के स्थान पर तमाम नियम उसके विरोध में लागू कर देती है!
ऐसे में स्वभाविक है, एक गंभीर प्रश्न उठ खड़ा होता है, क्या हम आधुनिकता के नाम पर विकास की दौड़ में अपनी पहचान खो दें? या फिर हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति के मान बिन्दुओं पर भरोसा ही नहीं अथवा हम इनके बारे में कुछ जानते नहीं और न ही भविष्य में अपनी पीढ़ियों को इसके बारे में ज्ञान देना चाहते हैं!
वस्तुत: हाल ही में इससे जुड़ा विवाद इसी प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा करता है। एक कथित ‘ग्रूमिंग पॉलिसी’ के वायरल दस्तावेज में यह दावा किया गया कि बिंदी, तिलक और कलावा जैसे हिंदू आस्था के प्रतीकों पर रोक है जबकि हिजाब और पगड़ी को शर्तों के साथ अनुमति दी गई है। देखा जाए तो यह मामला उस मानसिकता का दर्पण बन गया है, जिसमें अपनी ही जड़ों को लेकर असहजता और बाहरी प्रतीकों के प्रति अति-संवेदनशीलता दिखाई देती है।
अब जब इस विषय पर प्रश्न उठे, तो कंपनी के सह-संस्थापक पीयूष बंसल ने इसे पुराना और भ्रामक दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि कंपनी सभी धर्मों का सम्मान करती है। यह स्पष्टीकरण आवश्यक था, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? तुम्हारी बात कौन मानेंगा कि सच बोल रहे हो? और क्यों मानें? हो सकता है, “नासिक कार्पोरेट जिहाद” के सामने आने के बाद और तुम्हारी कंपनी से जुड़ा ये सच, इसके बाहर आने पर जो तुम ट्रोल हुए हो, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ये तुम्हारा वक्तव्य हो। क्योंकि प्रश्न कंपनी के दस्तावेज की सत्यता का अब नहीं रह गया, यह तो उस विचारधारा का है जोकि इस प्रकार की नीतियों को जन्म देती है।
यह सच है कि कॉरपोरेट जगत अक्सर ‘प्रोफेशनल लुक’ और ‘ब्रांड इमेज’ का हवाला देकर ड्रेस कोड निर्धारित करता है, किंतु क्या प्रोफेशनलिज्म का अर्थ अपनी सांस्कृतिक पहचान को त्याग देना है? क्या एक महिला के माथे की बिंदी उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है? क्या एक व्यक्ति की कलाई पर बंधा कलावा उसकी पेशेवर योग्यता को कम कर देता है? यदि उत्तर “नहीं” है और निश्चित रूप से नहीं है तब फिर इन प्रतीकों पर आपत्ति क्यों?
दरअसल, पीयूष; ये समस्या नियमों की नहीं, दृष्टिकोण की है। जब अपनी ही संस्कृति के प्रतीकों को ‘अनप्रोफेशनल’ माना जाने लगे और अन्य प्रतीकों को ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर स्वीकार किया जाए, तब यह संतुलन के स्थान पर सीधे तौर पर असंतुलन का स्पष्ट संकेत है। काश; पीयूष तुम एक हिन्दू घर में जन्म लेने के बाद इस बात को अंदर से महसूस करते! शार्क टैंक इंडिया में तो बहुत ज्ञान देते थे, कुछ ज्ञान सनातन प्रतीकों के अर्थ को गहराई से जानने के लिए भी प्राप्त कर लेते! यकीन मानों, तुम्हें पता चल जाता कि हमारी परंपराओं में चेतना से जुड़ा हुआ अपार ज्ञान निहित है।
हिंदू सनातन संस्कृति में प्रतीकों का अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। वस्तुत: बिंदी केवल सौंदर्य का चिह्न होने के साथ ही चेतना और एकाग्रता का प्रतीक है। माथे का तिलक धर्म, विजय और आत्मसम्मान का संकेत है। कलावा व्यक्ति को उसके संस्कारों और दायित्वों से जोड़ने वाला पवित्र सूत्र है। यह संकल्प भी है, इसके भाव बहुत गहरे हैं, राजा बली को संकल्प सूत्र से ही तो बांधा गया था। फिर इसके लिए स्वयं भगवान विष्णु, वामन देव के रूप में अवतरित हुए हों या फिर मां लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा गया हो। देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को अपना भाई बनाकर उनके हाथ में रक्षासूत्र जब बांधा था, तब उन्होंने इसी भाव से उनकी सुरक्षा और वचन की कामना की थी।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
आज भी ब्राह्मण अपने यजमानों को और बहनें अपने भाइयों को राखी बांधते समय इसी मंत्र का उच्चारण करती हैं ताकि वे सुरक्षित और धर्म के मार्ग पर रहें। इन प्रतीकों को नकारना, दरअसल उस सांस्कृतिक विरासत को नकारना है जिसने इस देश को हजारों वर्षों तक जोड़े रखा। जिनके कारण से ही भारत, आज भी भारत है। अन्यथा उन 57 देशों की तरह जोकि पूरी तरह से मुस्लिम हैं और वे 158 देश जोकि ईसाई बहुसंख्यक हैं, उनमें और भारत में क्या फर्क रह जाएगा?
यह सच है कि आज भारत का कॉरपोरेट सेक्टर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना चाहता है, यह स्वाभाविक और आवश्यक भी है, किंतु क्या अपनी प्रगति अपनी जड़ों से कटकर हो, वह क्या समग्र प्रगति होगी? लेंसकार्ट के पदाधिकारियों मत भूलो! भारत कोई पश्चिमी समाज नहीं है, जहाँ सांस्कृतिक पहचान को निजी दायरे तक सीमित कर दिया गया हो। इसके उलट भारत में तो आस्था जीवन का अभिन्न अंग है; वह हमारे पहनावे, व्यवहार और सोच में स्वाभाविक रूप से झलकती है। ऐसे में यदि कंपनियाँ इस वास्तविकता को नजरअंदाज करती हैं, तब कहना यही होगा कि वे न सिर्फ कर्मचारियों की भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि अपने ही समाज से दूरी भी बना लेती हैं।
इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण पहलू उभरकर सामने आया, वह है जनभावना की तीव्र प्रतिक्रिया। जैसे ही यह मुद्दा उठा, लोगों ने खुलकर अपनी नाराजगी लेंसकार्ट से व्यक्त की। यह सिर्फ ‘ट्रोलिंग’ नहीं थी, एक गहरी असहजता का संकेत था; एक ऐसा एहसास कि कहीं न कहीं अपनी ही संस्कृति को हाशिए पर डाला जा रहा है जोकि अनुचित है।
अत: इस प्रकरण के बाद यह एक स्पष्ट संदेश भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज ने कंपनियों को दे दिया है, भारत में व्यापार करना है तो उत्पाद बेचने के साथ ही समाज के बीच संवेदनशील संवाद और परंपराओं का सम्मान बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। जिसमें भारत की सभ्यता और संस्कृति अंतर्निहित है। वस्तुत: भारत की पहचान उसकी संस्कृति से ही है। यदि वही धीरे-धीरे कमजोर होने लगे, तब फिर भारत राष्ट्र रहा ही कहां? वह तो एक आर्थिक इकाई बनकर रह जाएगा!
अब इससे बात नहीं बननेवाली कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा। क्योंकि जिसने ये लिखा, वह अल्लामा इकबाल तो ‘पाकिस्तान का वैचारिक जनक’ (Spiritual Father of Pakistan) है। क्योंकि उसने ही 1930 के इलाहाबाद अधिवेशन में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए एक अलग राजनीतिक ढांचे का विचार रखा था। वह हिन्दुओं को भ्रम में रखा रहा, हिन्दू इसी में फूले नहीं समा रहे और विभाजन का दंश करोड़ों लोगों के झेलने के बाद आज भी उनकी आंखें नहीं खुल रही हैं, मजे से अब भी गाए जा रहे हैं; “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…!
हां, भले ही यह सत्य है कि भारत की संस्कृति कमजोर नहीं, वह सहनशील है, लचीली है और आत्मसुधार की क्षमता रखती है, किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है, वह भी उतना ही सच है, जहां भारत की संस्कृति कमजोर पड़ी, वहीं विदेशी सभ्यता और संस्कृति हावी हो गई। विभाजन सिर्फ पाकिस्तान का नहीं हुआ था, गहराई से देखें ओर पीछे जाएं तो स्पष्ट हो जाएगा कि आज जो भारत उपमहाद्वीप है, वह महाद्वीप था, पिछले 2500 वर्षों में भारत के लगभग 24 विभाजन हुए हैं।
भारत की मूल हिन्दू संस्कृति का ह्रास हुआ और भारत टुकड़ों-टुकड़ों में बंटता चला गया, अरे! पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, तिब्बत और मालदीव, मलेशिया, इंडोनेशिया, और थाईलैंड तो हमारे सामने-सामने के विभाजन हैं। इसलिए पीयूष बंसल एवं लेंसकार्ट वालों वर्तमान में जो भी जैसा भी भारत है, उसकी मूल संस्कृति का संरक्षण आवश्यक है, उसकी परंपराओं का निर्वाहन आवश्यक है। समझें; भारत की शक्ति उसकी संस्कृति में है और यह संस्कृति मंदिरों, ग्रंथों में होने के साथ ही हमारे दैनिक जीवन में जीवित रहती है।



