सोशल मीडिया पर मिली अभूतपूर्व सफलता के बाद कांग्रेस का नेतृत्व संभाल सकते हैं राठी?

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दिल्ली। कांग्रेस पार्टी अब जमीन पर कम, सोशल मीडिया पर ज्यादा दौड़ रही है-यह बात तो सही है, लेकिन इसका समाधान अगर ध्रुव राठी को अध्यक्ष बना देना हो, तो वाह! क्या कमाल का आइडिया है। राहुल गांधी के इंस्टाग्राम पर करीब 13 मिलियन फॉलोअर्स हैं, जबकि ध्रुव राठी के 16.5 मिलियन-देखिए, संख्या में तो ध्रुव जी आगे निकल गए। यूट्यूब पर तो बात ही मत पूछिए-31 मिलियन से ऊपर सब्सक्राइबर्स, राहुल भैया के पास तो इतने व्यूज पूरे राजनीतिक करियर में भी नहीं आए होंगे। ट्विटर (अब X) पर भी ध्रुव के 3.2 मिलियन फॉलोअर्स राहुल के पुराने 20 मिलियन के मुकाबले कम हैं, लेकिन क्वालिटी में तो ध्रुव का एक वीडियो पूरे कांग्रेस के प्रेस कॉन्फ्रेंस से ज्यादा ट्रेंड करता है।

तो क्यों न पार्टी का सारा ढांचा उलट-पलट कर दिया जाए? राहुल गांधी को “लाइव फील्ड विजिट” के लिए भेजा जाए, और ध्रुव राठी को कमान सौंपी जाए। कल्पना कीजिए-अगला चुनावी घोषणा-पत्र यूट्यूब वीडियो में आएगा, जिसमें ध्रुव जी बैकग्राउंड में ग्राफिक्स के साथ “फैक्ट्स” दिखाएंगे: “दोस्तों, BJP ने जो झूठ बोला, वो देखिए…” और नीचे कमेंट्स में “Jai Hind” और “Modi Out” की बाढ़। प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह लाइव स्ट्रीम, जहां सवालों के जवाब देने की बजाय “लाइक और सब्सक्राइब” का नारा लगेगा। पार्टी का नया स्लोगन-“कांग्रेस: जहां हर मुद्दा एक्सप्लेनेशन वीडियो बनता है”।

फिर क्या होगा? युवा वोटर तो फंस जाएगा, क्योंकि ध्रुव जी की आवाज में ‘चीन की घुसपैठ’ सुनकर लगेगा कि अब असली लड़ाई शुरू हो गई। पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता सोचेंगे-अब तो हमें भी एडिटिंग सीखनी पड़ेगी। और राहुल गांधी? वो शायद खुश होंगे, क्योंकि अब उन्हें सिर्फ ‘कमेंट पढ़कर जवाब देना’ होगा, स्पीच देने की जरूरत नहीं।

लेकिन एक छोटी-सी दिक्कत है-कांग्रेस को वोटर चाहिए, फॉलोअर्स नहीं। सोशल मीडिया पर लाखों लाइक्स मिल सकते हैं, लेकिन बूथ पर वोट डालने वाला आदमी अभी भी जमीन पर ही मिलता है। ध्रुव राठी को अध्यक्ष बनाने से पार्टी ‘वायरल’ तो हो जाएगी, लेकिन ‘विजयी’ होना थोड़ा मुश्किल लगता है। वैसे भी, इन्फ्लूएंसर राजनीति में उतरें तो मजा आएगा-क्योंकि तब कम से कम एक्सप्लेनेशन वीडियो में पार्टी की हार का कारण भी साफ-साफ बता देंगे: ‘दोस्तों, ये सब एडिटिंग की कमी से हुआ!’

तेहरान में सत्ता का संकट और अंतरिम व्यवस्था

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दिल्ली। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त मिसाइल हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत हो गई। यह हमला न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरे इस्लामी दुनिया के लिए एक गहरा आघात है। खामेनेई की मौत के साथ उनके परिवार के कई सदस्य, शीर्ष सलाहकार अली शमखानी और आईआरजीसी कमांडर मोहम्मद पाकपुर भी शहीद हो गए। तेहरान में शोक की लहर है, जहां लोग सड़कों पर काले परिधान में इकट्ठा होकर अमेरिका-इज़राइल की निंदा कर रहे हैं। ईरान ने 40 दिनों का शोक घोषित किया है, और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इसे “मुस्लिमों के खिलाफ खुली जंग” करार दिया है।

संक्रमण काल की कमान अब अंतरिम नेतृत्व परिषद के हाथ में है। ईरान के संविधान के अनुसार, इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, मुख्य न्यायाधीश घोलाम-होसैन मोहसिनी-एजेई और गार्जियन काउंसिल के विधि विशेषज्ञ सदस्य अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी शामिल हैं। अयातुल्लाह अराफी को विशेष रूप से इस परिषद में शामिल किया गया है, जो नए सर्वोच्च नेता के चयन तक देश की कमान संभालेंगे। यह व्यवस्था ईरान की स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन युद्ध की स्थिति में अमेरिका-इज़राइल यदि परिषद के किसी सदस्य को निशाना बनाते हैं, तो स्थिति और जटिल हो सकती है। फिर भी, ईरान की क्रांतिकारी सेनाएं और जनता का संकल्प अटल है-खामेनेई की शहादत से ईरान कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत होगा।

भारत में शिया समुदाय का गहरा शोक और विरोध

भारत में, खासकर शिया समुदाय में, खामेनेई की शहादत पर गहरा दुख व्याप्त है। लखनऊ, जो शिया संस्कृति का केंद्र है, में सआदतगंज और अन्य इलाकों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। वे अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, काले झंडे लहरा रहे हैं। प्रसिद्ध शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने तीन दिनों का शोक घोषित किया है। उन्होंने अपील की है कि लोग काले कपड़े पहनें, घरों पर काले परचम लगाएं, और दुकानें बंद रखें। उन्होंने कहा, “खामेनेई को मारकर दुनिया सोचती है कि ईरान खत्म हो जाएगा, लेकिन अमेरिका-इज़राइल को करारा जवाब मिलेगा।” आज रात 8 बजे छोटे इमामबाड़े में शोक सभा और कैंडल मार्च निकाला जाएगा।

ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इसी तरह का आह्वान किया है। मौलाना यासूब अब्बास ने इसे “सदी की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना” बताया और ईरान के मजबूत प्रतिकार की भविष्यवाणी की। श्रीनगर में भी लाल चौक पर शिया समुदाय ने प्रदर्शन किया, काले झंडे और कपड़ों में विरोध जताया।

एक नए संघर्ष की शुरुआत

यह विरोध भारत की विविधता और एकता का प्रतीक है। भारत ने हमेशा ईरान के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं-ऊर्जा, व्यापार और सांस्कृतिक स्तर पर। खामेनेई की शहादत पर भारत सरकार को सतर्क रहना होगा, ताकि घरेलू शांति बनी रहे। पिछले वर्ष लेबनान की घटनाओं की तरह, यहां भी शिया-सुन्नी मतभेद भुलाकर एकजुटता दिखी है।भारत की नजर में संदेश

खामेनेई की शहादत से साफ है कि अमेरिका-इज़राइल की आक्रामकता क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रही है। भारत, जो बहुपक्षीयता और शांति का समर्थक है, इस संकट में संतुलित रुख अपनाएगा। लेकिन भारतीय मुस्लिम समुदाय, खासकर शिया भाई-बहन, की भावनाएं स्पष्ट हैं-वे उत्पीड़न के खिलाफ खड़े हैं। ईरान मजबूत रहेगा, और भारत जैसे देशों की एकजुटता से इस्लामी दुनिया नई ताकत हासिल करेगी। यह शहादत अंत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष की शुरुआत है।

एक्स-मुस्लिम मूवमेंट को कोई  सहायता या संरक्षण नहीं

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दिल्ली। पिछले दस वर्षों में भाजपा शासित केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने एक्स-मुस्लिम मूवमेंट को कोई वास्तविक सहायता या संरक्षण नहीं दिया। कमलेश तिवारी, कन्हैयालाल और उमेश कोल्हे जैसे उन लोगों की हत्याओं के बाद न्याय की प्रक्रिया धीमी और अपर्याप्त रही, जबकि हत्यारों को सजा देने में गंभीरता की कमी दिखी।

कमलेश तिवारी की 2019 में हुई निर्मम हत्या में मुख्य साजिशकर्ता सैयद असिम अली को 2024 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई, जबकि कई आरोपी अभी भी लंबित मुकदमों में फंसे हैं। कन्हैयालाल तेली की 2022 में उदयपुर में हुई सिर काटकर हत्या के मामले में कुछ आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, और मुख्य हत्यारों के खिलाफ प्रक्रिया अभी भी न्यायिक जांच के दौर में है।

उमेश कोल्हे की 2022 में अमरावती में हत्या के मामले में NIA जांच के बावजूद कई आरोपियों को बेल मिलने की खबरें आई हैं, और पूर्ण सजा का इंतजार लंबा खिंच रहा है। इन हत्याओं के पीछे ब्लासफेमी या नुपुर शर्मा समर्थन जैसे मुद्दे थे, जो एक्स-मुस्लिम या हिंदू अधिकारों से जुड़े थे, लेकिन सरकार ने इन मामलों को प्राथमिकता नहीं दी।

इन हत्याओं के बाद एक्स-मुस्लिम चेहरों, जैसे सलीम वास्तिक, को कोई विशेष सुरक्षा प्रदान नहीं की गई। सलीम वास्तिक जैसे लोग खुले तौर पर इस्लाम की आलोचना करते हैं और एक्स-मुस्लिम आंदोलन का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें सरकारी स्तर पर कोई Y या Z कैटेगरी सुरक्षा नहीं मिली। वहीं, चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ जैसे नेताओं को केंद्र सरकार ने 2024 में Y+ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की, जो CRPF कमांडोज के साथ आती है। यह विडंबना स्पष्ट करती है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताएं राजनीतिक गठजोड़, चुनावी गणित और मुख्यधारा के मुद्दों पर ज्यादा केंद्रित हैं, न कि एक्स-मुस्लिम जैसे हाशिए पर मौजूद आंदोलनों पर।

अब जब सलीम वास्तिक पर हाल ही में जानलेवा हमला हुआ और वे अस्पताल में गंभीर हालत में हैं, तो भाजपा आईटी सेल और पेड हैंडल अचानक भावुक होकर रोने-धोने का नाटक शुरू कर देंगे। वे ट्रोल आर्मी के जरिए सहानुभूति जुटाएंगे, लेकिन अतीत में कभी एक्स-मुस्लिम कंटेंट को प्रमोट नहीं किया, न ही इन आवाजों को प्लेटफॉर्म दिया। यह सब दिखावा मात्र है-जब खतरा टल जाता है या वायरल हो जाता है, तब याद आती है। असल में, एक्स-मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा और न्याय की मांग को सरकार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। यह दोहरा चेहरा एक्स-मुस्लिमों के लिए संदेश है कि उनकी लड़ाई अकेले की लड़ाई है, और सत्ता की प्राथमिकताओं में वे कहीं नहीं हैं।

स्थानीय सर्वे में लोगों की नाराजगी, कांग्रेस की राजनीति उल्टी पड़ रही है

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कोटद्वार, उत्तराखंड। उत्तराखंड के कोटद्वार कस्बे में हाल ही में एक छोटी-सी घटना ने पूरे राज्य और देश में तूल पकड़ लिया। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के दिन एक मुस्लिम दुकानदार की दुकान ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ के नाम में ‘बाबा’ शब्द को लेकर बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई और नाम बदलने का दबाव बनाया। इसी दौरान स्थानीय जिम ट्रेनर दीपक कुमार ने दुकानदार का साथ देते हुए हस्तक्षेप किया और खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताकर खड़ा हो गए। यह वीडियो वायरल होने के बाद दीपक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए, जहां उन्हें ‘नफरत के खिलाफ आवाज’ बताया गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी उन्हें ‘भारत का हीरो’ करार दिया और मुलाकात कर समर्थन जताया।

लेकिन कोटद्वार की सड़कों पर दो दिवसीय ग्राउंड रिपोर्टिंग और बिना कैमरे के स्थानीय लोगों से बातचीत से एक अलग ही तस्वीर उभरती है। आम लोग दीपक से बेहद नाराज दिखे। कई लोगों ने कहा, “पहले से ही नाम कम हैं, अब एक और दीपक मुसलमान बनने में गर्व महसूस कर रहा है। अगर वह सच्चा हिंदू बनकर बजरंग दल वालों को लताड़ता तो अच्छा लगता। ऊपर से गाय, गोबर और गोमूत्र का अपमान भी कर रहा है। यह पक्का कांग्रेसी एजेंट लगता है।” कुछ ने आरोप लगाया कि दीपक को करोड़ों का चंदा और कैश मिल रहा है, जिससे उनकी हिम्मत बढ़ी है।

लोगों की शिकायत है कि मीडिया ने मामले को एकतरफा दिखाया। उन्होंने दावा किया कि पहले दिन बजरंग दल ने कोई झगड़ा नहीं किया, बल्कि दीपक ने ही हाथापाई शुरू की। दीपक के दावे कि सैकड़ों लोग नाम बदलवाने आए थे और वह अकेले भिड़ गए, को भी झूठ बताया गया। एक व्यक्ति ने व्यंग्य किया, “विधायक का चुनाव लड़ेगा तो? पहले पार्षद का लड़ ले, हैसियत पता चल जाएगी।”

राहुल गांधी की एंट्री से लोगों को लग रहा है कि पूरा मामला पूर्वनियोजित था, हालांकि स्थानीय स्तर पर यह अचानक हुआ प्रतीत होता है।

कोटद्वार में कांग्रेस भी इस मामले में लपेटे में आई है। यहां की जनता मानती है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया दीपक को हीरो मान रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर वह खलनायक से कम नहीं। इस विवाद के उछलने से भाजपा से नाराज वोटर भी अब पार्टी की ओर लौट रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में कोटद्वार सीट भाजपा की झोली में जा सकती है। दीपक का यह ‘मोहम्मद दीपक’ वाला स्टैंड भाजपा के लिए अनजाने में संजीवनी बन गया है, जबकि कांग्रेस की राजनीतिकरण की कोशिश उल्टी पड़ रही है।

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