राजभवन बनाम लोकभवन की संस्कृति

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दिल्ली । केंद्र सरकार ने भारत के सभी राजभवनों को लोकभवन कहे जाने का निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अवसरों पर गुलामी के प्रतीकों को समाप्त करने का संदेश दे चुके हैं, स्वाभाविक है इससे गहन रूप से घर कर गई वैचारिक गुलामी की मानसिकता भी धीरे- धीरे समाप्त हो जाएगी। श्रीराम जन्मभूमि पर नव निर्मित दिव्य – भव्य मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि आगामी 10वर्षों तक गुलामी की मानसिकता को समाप्त रकने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाएगा। इसी श्रृंखला में देश में शासन के प्रतीकों में शांत कितु गहन व व्यापक प्रभाव डालने वाले परिवर्तन किए जा रहे हैं । सनातन हिंदू सभ्यता में नामों का विशेष महत्व है । माना जाता है कि व्यक्ति का जैसा नाम होगा उसका प्रभाव व व्यक्तित्व भी उसी प्रकार होगा। उपनिवेशकालीन शाही ठिकानों की छवि लिए राजभवनों को अब लोकभवन नाम दिया गया है। राजभवन का नामकरण लोकभवन करने का तात्पर्य है उसे लोकहितकारी बनाना। इस परिवर्तन का उद्देश्य यह भी है कि इन भवनों में निवास करने वालों को स्मरण रहे कि उनका काम शक्ति प्रदर्शन नहीं अपितु जनसेवा है।

मोदी सरकार ने इसके पूर्व भी कई स्थानों के नाम बदले हैं जैसे राजपथ अब कर्तव्यपथ है। राजपथ का अर्थ है “राजा का मार्ग” जो शक्ति का प्रतीक है, वहीं कर्तव्य पथ, कर्तव्य का स्मरण कराता है। वर्ष 2016 में रेस कोर्स का नाम परिवर्तित करके इसको लोक कल्याण मार्ग किया गया। अब प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर को सेवातीर्थ नाम दिया गया है । यह नाम बताता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सेवा और समर्पण की भावना का केंद्र है न कि मात्र प्रशासनिक केंद्र। इसी प्रकार केंद्रीय सचिवालय का नाम भी बदला गया है और उसे अब कर्तव्य भवन कहा जाता है।

नाम परिवर्तन का उददेश्य है विचारों में परिवर्तन लाना। सभी सरकारी संस्थाएं अब सेवा और कर्तव्य की भाषा बोल रही हैं। गुजरात लोकभवन ने सोशल मीडिया में अपने चित्र साझा करते हुए लिखा है, “ यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं अपितु जनसेवा की भावना को और गहराई से आत्मसात करने का संकल्प है।“ अब यह भवन केवल राज्यपाल का निवास नहीं नागरिकों, विद्यार्थियों , किसानों, शोधकर्ताओं तथा सामाजिक संगठनों का भवन है।
कई राज्यों के राज्यपालों ने राजभवन का नामकरण लोकभवन करने की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से नागरिकों को दी है। एक समय था जब राजभवनों का उपयोग केंद्र सरकार द्वारा राज्यों की सत्ता में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए किया जाता था। नेहरू काल से लेकर वर्ष 2014 के पूर्व तक 94 बार राज्यपालों की शक्तियों का दुररुपयोग करके राज्य सरकारें गिराई गयीं और राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे के पतन के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के साथ साथ अन्य सभी भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को तत्काल प्रभाव से गिराकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था । तमिलनाडु में आज जो द्रमुक सरकार कांग्रेस के साथ सत्ता का सुख भोग रही है, कांग्रेस पार्टी पूर्व में उनकी सरकारों को भी गिरा चुकी है। कांग्रेस के एक राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी राजभवन में अशोभनीय स्थिति में रहने के कारण वहां से बेदखल किए गए थे ।

यद्यपि अब समय बदल रहा है, राजभवन लोक भवन बन रहे हैं तथापि पंजाब, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में घोर भाजपा विरोधी सरकारें हैं जिनका अपने राज्यपालों के साथ विवाद चलता रहता है ।अभी हाल ही में इन राज्यों में राज्यपालों के साथ लंबित विधेयकों का प्रकरण उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया था।

वर्ष 2014 के पूर्व तक राजभवनों मे निवास करने वाले राज्यपाल की पहुंच जनता तक नहीं होती थी किंतु अब यह संभव हो गया है। बंगाल के हालात बहुत दयनीय हैं और कई बार वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की गई हैं, केरल और तमिलनाडु की स्थिति भी अच्छी नहीं है किंतु राज्यपालों ने अत्यंत संयमित रूप से कार्य किया है। राज्यपालों ने जनता के मध्य जाकर परिस्थितियों पर नियंत्रण प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। बंगाल के पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ हों या फिर वर्तमान राज्यपाल सी.वी. बोस दोनों ही आवश्यकता के समय नागरिकों के बीच पहुंचे हैं । उतर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की सक्रियता भी अद्भुत है राज्य सरकार और केंद्र सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाने का कोई भी अवसर उनसे नहीं चूकता ।
“नाम में क्या रखा है”, कहने वाले लोग इस प्रयास का उपहास कर सकते हैं, राजभवन बनाम लोकभवन पर व्यापक वाद विवाद भी संभव हो सकता है किंतु जो परिवर्तन लोकभवन बने राजभवन में दिख रहा है उसकी प्रशंसा तो करनी ही होगी ।

शादी का दिखावा : वो आग जो घर को जला देती है

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दिल्ली। आज जो लोग 50 लाख रुपये एक रात में उड़ा रहे हैं, कल वही लोग अस्पताल में 5 लाख का इंतजाम नहीं कर पाते।
मुसीबत के वक्त न रिश्तेदार आते हैं, न डीजे वाला, न इवेंट मैनेजर। सिर्फ बैंक बैलेंस साथ देता है।मैंने पिछले पाँच-सात साल में दर्जनों घर ऐसे देखे हैं जो बेटी की शादी के बाद भी खड़े तो हैं, लेकिन उनमें “घरवाले” नहीं रह गए। ज़मीन गई, माँ के गहने गिरवी पड़ गए, नौकरी की सारी तनख्वाह EMI में चली गई, रात की नींद दवाइयों में और सम्मान पर “कर्जदार” का ठप्पा लग गया। एक शादी ने पूरा परिवार 15-20 साल पीछे धकेल दिया।पहले था सादगी का दौरगाँवों में सिर्फ तीन मौके सार्वजनिक होते थे – तिलक, हल्दी और बारात। बाकी सारी रस्में घर की चारदीवारी में, 10-15 अपने लोगों के बीच।

मंदिर में सुबह 11 बजे तक फेरे हो जाते थे, घर आकर 50-60 लोग खाना खाकर चले जाते थे। कुल खर्च? 50-70 हजार रुपये।
शादी हो जाती थी – खुशी से, शांति से, बिना किसी कर्ज के।अब शादी नहीं, “इवेंट” बन गई हैआज वही शादी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी का प्रोजेक्ट बन चुकी है।

2025 के हिसाब से एक “साधारण” मध्यमवर्गीय शादी का ब्रेकअप कुछ यूं है:

सगाई (रेस्टोरेंट + 50 लोग) → ₹1.2–1.5 लाख
रिंग सेरेमनी (अलग से!) → ₹80 हजार–1 लाख
छेका/गोड़भराई → ₹50-80 हजार
तिलक (पूरे गाँव को खिलाना + टेंट + DJ) → ₹4–6 लाख
हल्दी (फिल्मी थीम + ड्रोन + फोटोग्राफर) → ₹2–3 लाख
मेहंदी + महिला संगीत (दो अलग फंक्शन) → ₹2.5–4 लाख
शादी का दिन
हॉल/फार्महाउस → ₹3–5 लाख
30-40 गाड़ियों का कन्वॉय → ₹1.5–2 लाख
बैंड-बाजा-घोड़ी-DJ-लाइट-पटाखे → ₹2–3 लाख
खाना (1000+ लोग) → ₹4–6 लाख
कपड़े-गहने-मेकअप → ₹5–8 लाख
रिसेप्शन (फिर वही सब दोहराओ) → ₹5–7 लाख
कुल: एक पक्ष का “साधारण” खर्च → ₹30-45 लाख
दोनों पक्ष मिलाकर → ₹60-90 लाख
ऊपर से दहेज → ₹10-20 लाख अतिरिक्तअब आम आदमी का हिसाब देखिए:
महीने की कमाई: ₹50-70 हजार
यानी 10-12 साल की पूरी सैलरी एक रात में उड़ा दो।नतीजा क्या हुआ?

ज़मीन बिक गई
माँ के गहने गिरवी पड़ गए
बाप रात-रात भर नींद की गोलियाँ खाता है
बेटी की विदाई के बाद माँ खुशी से नहीं, कर्ज के डर से रोती है
टीवी सीरियल और इंस्टाग्राम रील्स ने हमें यही सिखाया है कि “शादी बड़ी नहीं, इवेंट बड़ा होना चाहिए”। और हम बेवकूफ बनकर वही कर रहे हैं।सच तो ये है…

शादी का असली गवाह मंदिर का शिवलिंग होता है, इंस्टाग्राम की रील नहीं।
असली आशीर्वाद माँ-बाप का हाथ सिर पर होता है, ड्रोन शॉट नहीं।
शादी के बाद का सबसे बड़ा सुकून कर्जमुक्त नींद होती है, 5-सितारा रिसेप्शन नहीं।
मेरा प्रस्ताव – वापस उसी पुरानी सादगी की ओर

सगाई घर पर, 15-20 सबसे करीबी लोग
शादी मंदिर में, सुबह 11 बजे तक फेरे
सिर्फ 10-15 अपने लोग
शाम को मोहल्ले/सोसायटी/गाँव में सामूहिक भोज – सबको बुलाओ, दिल खोलकर खिलाओ
कुल खर्च? ₹2-3 लाख।
सम्मान बचेगा, ज़मीन बचेगी, नींद बचेगी, बेटी का भविष्य बचेगा।जो लोग आज 50 लाख उड़ा रहे हैं, कल वही लोग अस्पताल में 5 लाख का इंतजाम नहीं कर पाते।

मुसीबत में न डीजे वाला आता है, न रिश्तेदार। सिर्फ बैंक बैलेंस काम आता है।अगर आप भी इस दिखावे से थक चुके हैं, तो आज से ठान लीजिए –
अगली पीढ़ी की शादी मंदिर में होगी,

10 अपने लोगों के बीच होगी,
और बचा हुआ सारा पैसा बेटी के नाम RD या म्यूचुअल फंड में डाल देंगे।इस लेख को उस हर पिता तक पहुँचाइए
जो आज रात सोते वक्त छत की ओर देखकर सोच रहा है –
“बेटी की शादी कैसे होगी…?”आज का सबसे बड़ा पुण्य यही है –
किसी एक पिता को कर्ज के बोझ से बचा दो।

IndiGo Crisis : भारत को नीचा दिखाने की है यह नापाक साजिश

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आशीष कुमार ‘अंशु’

नई दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु सहित देश के कई बड़े एयरपोर्टों पर पिछले कुछ दिनों से जो अव्यवस्था का तांडव दिख रहा है, वह कोई तकनीकी खराबी या मौसमी कोहरे का परिणाम मात्र नहीं है। इंडिगो जैसी निजी एयरलाइन की मनमानी, उड़ानों का घंटों विलंब, यात्रियों का अपमानजनक व्यवहार और सोशल मीडिया पर वायरल होती शर्मनाक तस्वीरें—यह सब उसी समय शुरू हुआ जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर भारत पहुँचे हैं। संयोग? बिल्कुल नहीं। यह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, तब-तब देश की छवि को धूमिल करने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। फरवरी 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दिल्ली यात्रा के ठीक दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सुनियोजित दंगे भड़काए गए थे। दुनिया भर के मीडिया ने भारत को “असहिष्णु” और “अस्थिर” दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नतीजा? उस समय चल रहे CAA-NRC विरोध के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की जमकर किरकिरी हुई। आज भी वही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है, बस मैदान बदल गया है-दिल्ली की सड़कें नहीं, देश के एयरपोर्ट।

पुतिन की इस यात्रा का महत्व असाधारण है। ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात, कुडनकुलम परमाणु प्लांट की नई यूनिट्स, डॉलर-रुपया-रूबल त्रिपक्षीय भुगतान तंत्र, आर्कटिक क्षेत्र में ऊर्जा सहयोग और रक्षा उत्पादन में गहरा सहयोग—ये वे मुद्दे हैं जो पश्चिमी देशों की नींद उड़ा रहे हैं। भारत आज न केवल रूस का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है, बल्कि वह देश है जो अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को मज़बूती से आगे बढ़ा रहा है। यह बात कुछ ताकतों को रास नहीं आ रही।

ऐसे में एयरपोर्टों पर अचानक पैदा हुई यह अफरा-तफरी कोई संयोग नहीं है। विदेशी मेहमान के सामने भारत को “तीसरी दुनिया का अव्यवस्थित देश” दिखाने की पुरानी चाल है। विदेशी मीडिया में पहले से ही हेडलाइंस तैयार हैं—“Chaos at Indian airports as Putin visits”, “India’s aviation crisis exposes crumbling infrastructure”। सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे वीडियो और तस्वीरें इसी नैरेटिव को बल दे रहे हैं।

यह सिर्फ़ DGCA की नाकामी नहीं है। यह एक बड़ा राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र है, जिसका मकसद भारत की बढ़ती हुई वैश्विक साख पर कीचड़ उछालना है। जब देश नई ऊँचाइयों को छूने की दहलीज पर खड़ा हो, ठीक उसी समय उसे अस्थिर, अक्षम और अविश्वसनीय दिखाने की यह सुनियोजित कोशिश है।

देशवासियों, सतर्क रहिए। यह कोहरे का खेल नहीं, देश की छवि पर हमला है। यह कोई सामान्य अव्यवस्था नहीं, भारत को नीचा दिखाने की नापाक साजिश का नया अध्याय है।

हीरेन जोशी को लेकर, झूठी खबरों से रहें सावधान

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उमेंद्र दत्त

चंडीगढ़ । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को जो लोग वर्षों से नज़दीक से जानते और उनके साथ काम करते आए हैं, वे भली-भांति जानते हैं कि वे विश्वास, सत्यनिष्ठा और कार्यकुशलता के मामले में कोई समझौता नहीं करते।

35 वर्षों का संगठनात्मक जीवन और 25 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव किसी साधारण व्यक्ति का नहीं होता। ऐसे नेता को यह पूरी समझ होती है कि उसके आसपास कौन है, किस उद्देश्य से है और किस योग्यता के आधार पर है।

हिरेन जोशी जैसे लोग यदि 18 वर्षों से लगातार उनके विश्वासपात्र बने हुए हैं, तो यह किसी व्यक्तिगत निकटता का नहीं बल्कि योग्यता, निष्कलंक चरित्र और कर्मठता का प्रमाण है।
2014 के बाद सरकार और जनता के बीच जो सीधा, निरंतर और प्रभावी संवाद स्थापित हुआ है, वह एक मजबूत, पारदर्शी और पेशेवर संचार तंत्र की देन है—और यही बात कुछ लोगों को सबसे अधिक अखरती है।

आज जब प्रधानमंत्री मोदी जी की राष्ट्रहित आधारित नीतियाँ, निर्णायक नेतृत्व और भ्रष्टाचार-विरोधी रुख देश को सुदृढ़ कर रहा है, तब कुछ राजनीतिक दल और वैचारिक समूह असहज हो जाते हैं। चुनावी या वैचारिक पराजय की हताशा में नीति पर बहस करने के बजाय व्यक्ति पर आक्रमण और दुष्प्रचार का सहारा लिया जाता है।

इसी क्रम में कभी पीएम के आसपास के लोगों को निशाना बनाकर अप्रत्यक्ष हमला किया जाता है।

तथ्यों के अभाव में आरोप लगाना, अटकलों के सहारे नैरेटिव गढ़ना और बार-बार “हिट एंड रन” की रणनीति अपनाना—यह सब अब जनता भली-भाँति पहचान चुकी है।
देश आज यह फर्क समझता है कि
आरोप क्या है और प्रमाण क्या है,
प्रचार क्या है और प्रदर्शन क्या है।

समय ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि
नरेंद्र मोदी न केवल व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं, बल्कि अपने निकटतम सहयोगियों की सत्यनिष्ठा से भी कभी समझौता नहीं करते।

यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है—और यही कारण है कि तमाम दुष्प्रचार अभियानों के बावजूद उनका जनविश्वास लगातार और अधिक मजबूत होता गया है।

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