चार श्रम संहिताओं को लागू करने के बाद, भारत में रोजगार के लाखों अवसर निर्मित होंगे

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ग्वालियर : दिनांक 21 नवम्बर 2025 से भारत में चार श्रम संहिताओं (वेतन संहिता 2019, औद्योगिक सम्बंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 एवं व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता, 2020) को लागू कर दिया गया है। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत में पूर्व में लागू 29 श्रम कानूनों को आसान और कारगर बनाए जाने का प्रशंसनीय प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किया गया है। उक्त चार श्रम संहिताओं का लागू किया जाना भारत के श्रमबल के लिए उचित वेतन, श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, उनकी रक्षा एवं उनके बेहतर कल्याण के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की शुरुआत भी माना जा रहा है। इससे भारत में मजबूत उद्योग की नींव रखी जाकर रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित किए जा सकेंगे। इन चार श्रम संहिताओं के माध्यम से भारत के श्रमिकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयास भी किया जाएगा एवं उनके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा जो अंततः भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायक होगा।

भारत में अभी तक लागू 29 श्रम कानूनों में से कुछ तो देश की आजादी से पूर्व एवं आजादी के तुरंत बाद के खंडकाल (वर्ष 1930 से 1950 के बीच) में बनाए गए थे। विश्व के अन्य देशों में पुराने श्रम कानूनों में पर्याप्त बदलाव कर वैश्विक स्तर पर हुए आर्थिक बदलावों के अनुरूप बनाकर नए श्रम कानूनों को लागू किए हुए एक अरसा हो चुका है परंतु भारत में अभी भी 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का अनुपालन किया जा रहा था, जो अपने आप में बिखरे हुए हैं, पेचीदा हैं, एवं अति पुराने नियमों के अंतर्गत चलायमान रहे हैं, इससे अंततः भारत में इतने लम्बे समय तक, आजादी के 75 वर्षों के बाद भी, श्रमिकों के साथ अन्याय किया जाता रहा है। इससे भारत में औद्योगिक प्रगति भी एक तरह से बाधित ही होती रही है और आर्थिक प्रगति को भी कहीं न कहीं विपरीत रूप से प्रभावित करती रही है। उक्त चार श्रम सहिताओं को लागू करने के बाद औपनिवेशिक सोच को पीछे छोड़कर नए भारत की नींव रखने का प्रयास किय जा रहा है। साथ ही, आधुनिक वैश्विक प्रवाह के साथ तालमेल बिठाने की लंबे समय से चली आ रही जरूरत को पूरा किया जा रहा है। उक्त चार संहिताएं मिलकर मजदूरों और कंपनियों दोनों को मजबूत बनाएंगे एवं एक ऐसा श्रमबल तैयार करेंगे जो सुरक्षित, उत्पादक और काम की बदलती हुई दुनिया के साथ तालमेल बिठाएंगे, इससे भारत को अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता साफ होगा।

भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी एक अनुसंधान प्रतिवेदन में बताया गया है कि भारत में उक्त चार श्रम सहिताओं को लागू करने के बाद बेरोजगारी की दर में कमी होगी, रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे, बढ़ी संख्या में अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहा श्रमबल औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित होगा और इससे उनकी मजदूरी की दर में वृद्धि होगी, श्रमिकों की बचत की क्षमता में वृद्धि होगी एवं उनकी खर्च करने की क्षमता भी बढ़ेगी। इससे कुल मिलाकर देश में विभिन्न उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होगी। उक्त अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, वर्तमान में, भारत में लगभग 44 करोड़ श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, इनमें से 31 करोड़ श्रमिक भारत के ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्टर्ड हैं। उक्त श्रमिकों में से यदि केवल 20 प्रतिशत श्रमिक ही अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित हो जाएं तो लगभग 10 करोड़ श्रमिक औपचारिक क्षेत्र में बढ़ जाएंगे, जिससे उन्हें बढ़ी हुई दर से मजदूरी एवं सेवा निवृत्ति के समस्त लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाएंगे। इससे अंततः भारत में कुल कार्यरत श्रमिकों में से 80-85 प्रतिशत श्रमिक भारत की सामाजिक सुरक्षा योजना में शामिल हो जाएंगे। एक अन्य अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, आज भारत में कुल श्रमिकों का लगभग 60.4 प्रतिशत भाग औपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहा है, उक्त वर्णित चार श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद अनौपचारिक क्षेत्र में से लगभग 15.1 प्रतिशत भाग औपचारिक क्षेत्र में शामिल हो जाने वाला है। इस प्रकार, औपचारिक क्षेत्र में कार्य करने वाले श्रमबल की संख्या बढ़कर 75.5 प्रतिशत हो जाएगी।

भारतीय स्टेट बैंक के उक्त वर्णित अनुसंधान प्रतिवेदन के अनुसार, भारत में चार श्रम संहिताओं को लागू करने के बाद आगे आने वाले समय में बेरोजगारी की दर में भी लगभग 1.3 प्रतिशत तक की कमी दर्ज हो सकती है क्योंकि देश में रोजगार के लगभग 77 लाख नए अवसर निर्मित होने की सम्भावना व्यक्त की गई है। इससे, कार्य कर सकने वाली उम्र के श्रमिकों की संख्या भी 60.1 प्रतिशत से बढ़कर 70.7 प्रतिशत तक पहुंचने की सम्भावना है। श्रमिकों के अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में हस्तांतरित होने के कारण श्रमिकों की उपभोग क्षमता में भी वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की गई है। इस संदर्भ किए गए अनुसंधान के अनुसार, प्रत्येक श्रमिक की प्रतिदिन लगभग 66 रुपए की अतिरिक्त खर्च करने की क्षमता में वृद्धि दर्ज होगी और इससे कुल मिलाकर पूरे देश में लगभग 75,000 करोड़ रुपए की विभिन्न उत्पादों की अतिरिक्त मांग निर्मित होगी।

भारत में लागू की गई चार श्रम संहिताओं के बाद समस्त कामगारों को नियुक्ति पत्र प्रदान करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र में मिलने वाले समस्त लाभ मिल सकें। साथ ही, रोजगार के सम्बंध में लिखित में सबूत उत्पन्न होने से पारदर्शिता तथा श्रमिकों को रोजगार की गारंटी एवं पक्का रोजगार उपलब्ध होगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अंतर्गत गिग एवं प्लेटफार्म श्रमिकों सहित समस्त कामगारों को सामाजिक सुरक्षा के लाभ उपलब्ध होंगे। सभी कामगारों को पीएफ, ईएसआईसी, बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलने प्रारम्भ होंगे। वर्तमान में श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग न्यूनतम मजदूरी की सीमा से बाहर रखा जा रहा था क्योंकि न्यूनतम मजदूरी केवल अधिसूचित उद्योगों/रोजगार पर ही लागू थी। परंतु, अब वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत, समस्त कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन भुगतान पाने का कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया गया है। न्यूनतम मजदूरी एवं समय पर वेतन के भुगतान से श्रमिकों की वित्तीय सुरक्षा को बेहतर किया जा सकेगा। साथ ही, अब नियोक्ताओं के लिए 40 वर्ष से अधिक की आयु के समस्त कर्मचारियों की मुफ्त स्वास्थ्य जांच कराना आवश्यक कर दिया गया है। समय पर निवारक स्वास्थ्य सेवा संस्कृति को विकसित किया जाना ही चाहिए। महिला कार्यबल को सभी स्थानों पर समस्त प्रकार के काम करने की इजाजत दे दी गई है, लेकिन इसके लिए सबंधित मातृशक्ति की सहमति होना अनिवार्य किया गया है एवं मातृशक्ति के आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किए जाना आवश्यक होगा। साथ ही, कई प्रकार के आर्थिक लाभ भी औपचारिक क्षेत्र में शामिल होने वाले श्रमिकों को प्रदान किए गए हैं।

आज भारतीय अर्थव्यवस्था, पूरे विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच, सबसे तेज गति से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गई है और भारत आज प्रयासरत है कि देश में बड़े आकार के उद्योगों का जाल फैले ताकि भारत के विकास में उद्योग क्षेत्र का योगदान भी बढ़े। उद्योग क्षेत्र में सामान्यतः श्रमिकों का शोषण किए जाने की कई घटनाएं सामने आती रही हैं। अतः श्रमिकों के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से एवं देश में उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उक्त चार श्रम संहिताओं को लागू किया गया है। भारत के श्रमिकों को आज वैश्विक स्तर पर इस संदर्भ में लागू मानदंडो पर अपने आप को खरा उतारना होगा। इसके बाद ही भारत में निर्मित उत्पाद विश्व के अन्य देशों में निर्मित उत्पादों से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। कुल मिलाकर भारतीय उद्योग को वैश्विक स्तर पर ले जाने में श्रमिकों की अहम भूमिका रहने वाली है अतः उनके हितों की देखरेख भी उचित तरीके से किया जाना आवश्यक है। चार श्रम संहिताएं इस दृष्टि से अपनी सार्थक भूमिका निभाएंगी, ऐसी उम्मीद की जा रही है।

हालांकि पिछले दशक में, भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज का व्‍यापक विस्तार किया गया है, इससे सामाजिक सुरक्षा योजना में शामिल कार्यबल की संख्या वर्ष 2015 के लगभग 19 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 64 प्रतिशत से अधिक हो गई है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया है कि देश भर के श्रमिकों को सुरक्षा और सम्मान मिले और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में प्राप्त की गई उक्त बड़ी उपलब्धि के लिए भारत ने वैश्विक स्तर पर मान्यता भी अर्जित की है। चार श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन इस व्‍यापक बदलाव में अगला बड़ा कदम है, जो सामाजिक सुरक्षा की प्रणाली को और सशक्‍त करता है और राज्यों तथा सेक्‍टरों तक विभिन्‍न लाभों को पहुंचाता है। विस्तारित सामाजिक सुरक्षा, मजबूत सुरक्षा और अधिकारों की राष्ट्रव्यापी पोर्टेबिलिटी के साथ, संहिता श्रमिकों, विशेष रूप से महिलाओं, युवाओं, असंगठित, गिग और प्रवासी श्रमिकों को श्रम शासन के केंद्र में मजबूती से रखती है। अनुपालन के बोझ को कम करके और लचीली, आधुनिक कार्य प्रणाली को सक्षम करके, यह संहिता रोजगार, कौशल और उद्योग विकास को बढ़ावा देती है और एक श्रमिक समर्थक, महिला समर्थक, युवा समर्थक और रोजगार समर्थक श्रम-इकोसिस्‍टम की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

भारत की श्रीलंका के प्रति मानवीय सहायता: एक संवेदनशील और रणनीतिक कदम

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29 नवंबर 2025 को चक्रवात ‘दित्वाह’ ने श्रीलंका को तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया। अब तक 123 से अधिक लोगों की मौत, 130 से ज्यादा लापता, ढाई लाख से अधिक लोग बेघर और 35 प्रतिशत इलाकों में बिजली गुल – यह श्रीलंका का पिछले कई दशकों का सबसे भयावह प्राकृतिक संकट है। ऐसे में भारत ने जिस तेजी और जिस पैमाने पर मदद भेजी, वह केवल मानवीय सहायता नहीं, बल्कि ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति की जीवंत मिसाल है।

‘ऑपरेशन सागर बंधु’ के तहत भारत ने 28-29 नवंबर की दरम्यानी रात से ही कार्रवाई शुरू कर दी। सबसे पहले भारतीय नौसेना के विमानवाहक पोत INS विक्रांत और फ्रिगेट INS उदयगिरी ने समुद्री रास्ते से 6.5 टन सूखा व ताजा राशन, दवाइयाँ और अन्य जरूरी सामान श्रीलंका पहुंचाया। इसके तुरंत बाद वायुसेना ने हिंदन एयरबेस से एक साथ दो भारी परिवहन विमान – C-130J और IL-76 – रवाना किए। इन विमानों ने 21 टन राहत सामग्री, 80 से अधिक NDRF कर्मी और 8 टन विशेष उपकरण कोलंबो पहुंचाए। रात 1:30 बजे कोलंबो एयरपोर्ट पर उतरते ही भारतीय उच्चायोग के अधिकारी और श्रीलंकाई वायुसेना ने सामग्री ग्रहण की – यह तस्वीरें अपने आप में भारत-श्रीलंका की गहरी मित्रता की गवाह हैं।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्वयं लिखा, “ऑपरेशन सागर बंधु शुरू हो गया है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि भारत जरूरत पड़ने पर और भी मदद देने को तत्पर है। यह केवल कूटनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि पिछले दस साल की नीति का निरंतरता है – चाहे 2019 का ईस्टर बम धमाका हो, 2022 का आर्थिक संकट हो या अब यह प्राकृतिक आपदा – हर बार भारत सबसे पहले और सबसे बड़े पैमाने पर आगे आया है।

इस सहायता के तात्कालिक प्रभाव तो स्पष्ट हैं। NDRF की 80+ सदस्यीय टीम खोज-बचाव और चिकित्सा सहायता में श्रीलंकाई सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। टेंट, कंबल, हाइजीन किट और रेडी-टू-ईट भोजन से हजारों विस्थापित परिवारों को तुरंत राहत मिली। केंद्रीय पहाड़ी जिलों कैंडी और बदुल्ला में भूस्खलन से फंसे लोगों को निकालने में भारतीय उपकरण और विशेषज्ञता काम आ रही है।

परंतु इस सहायता का प्रभाव केवल राहत सामग्री तक सीमित नहीं है। इसके चार बड़े दीर्घकालिक प्रभाव हैं:

कूटनीतिक विश्वसनीयता में अभूतपूर्व वृद्धि
2022 के आर्थिक संकट के दौरान जब चीन और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भी देर की थी, भारत ने 4 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता देकर श्रीलंका को दिवालियेपन से बचाया था। अब यह आपदा राहत उस विश्वास को और पुख्ता करती है। श्रीलंका की जनता और राजनीतिक वर्ग में भारत के प्रति जो सद्भावना बढ़ी है, वह आने वाले दशकों तक भारत के हितों की रक्षा करेगी।

हिंद महासागर में भारत की ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ छवि मजबूत
मालदीव हो, मॉरीशस हो या अब श्रीलंका – हर बार भारत सबसे तेज और सबसे प्रभावी HADR (Humanitarian Assistance and Disaster Relief) क्षमता दिखाता है। इससे न केवल क्षेत्रीय देश भारत पर भरोसा करते हैं, बल्कि चीन की ‘डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी’ को भी करारा जवाब मिलता है। हैमबनटोटा बंदरगाह और कोलंबो पोर्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट में चीन की बढ़ती पकड़ के बावजूद श्रीलंका की जनमानस भारत को सच्चा मित्र मानता है।
सॉफ्ट पावर और पीपल-टू-पीपल संपर्क में वृद्धि

श्रीलंका में 25 लाख से अधिक तमिल मूल के लोग हैं। भारत की यह मदद सीधी सहायता उनके मन में भी गहरी छाप छोड़ती है। साथ ही, सोशल मीडिया पर #SagarBandhu और #IndiaWithSriLanka ट्रेंड कर रहे हैं – यह भारत की सॉफ्ट पावर का नया आयाम है।

स्वयं भारत की आपदा प्रबंधन क्षमता का प्रदर्शन

एक साथ नौसेना के विमानवाहक पोत और वायुसेना के दो भारी परिवहन विमान तैनात करना आसान नहीं होता। यह भारतीय सशस्त्र बलों की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता (Rapid Reaction Capability) को दुनिया के सामने रखता है।
‘ऑपरेशन सागर बंधु’ केवल 30-40 टन राहत सामग्री नहीं है यह भारत की उसकी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति, उसकी मानवीय संवेदना और उसकी सामरिक दूरदर्शिता का जीवंत प्रमाण है। जब श्रीलंका संकट से उबरेगा, तो उसके पुनर्निर्माण में भी भारत सबसे बड़ा साझेदार बनेगा – जैसा 2004 की सुनामी के बाद बना था। यही कारण है कि श्रीलंका के लोग आज कह रहे हैं – “दुख की इस घड़ी में भारत सचमुच सागर का बंधु साबित हुआ।”

देश में जो अभूतपूर्व घटा, उसे आम जन के लिए समझना किया है सुलभ

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आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी

लखनऊ। काशी ने एक बार पुनः अपना वैशिष्ट्य प्रमाणित किया है। एक प्रतिभाशाली वैदिक छात्र ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनीय शाखा के चालीस अध्यायों का दण्ड क्रम पारायण पूरा किया है।

यह पारायण वेद के विकृति-पाठ के अन्तर्गत किया जाता है। यहाँ यह जानने योग्य है कि वेद मन्त्र और अर्थ के विशिष्ट विज्ञान में नियोजित हैं। इस कारण वेदों को छः अंगों में प्रबन्धित किया हुआ है, वे छः अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष हैं। ये अंग वेद के शुद्ध उच्चारण, उसकी लयात्मकता एवं उसमें निहित प्रयोग विधि का निर्दोष व्यवहार सुनिश्चित करते हैं। वेदार्थ के अनुसन्धान की ही भाँति वेदों का समुचित पाठ भी विशिष्ट ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है।

वेदपाठ की दो मुख्य पद्धतियाँ हैं, पहली पद्धति है प्रकृति और दूसरी पद्धति है विकृति। प्रकृति-पाठ के तीन भेद हैं – संहिता, पद तथा क्रम । विकृति-पाठ के आठ भेद हैं – जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ एवं घन।

जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः।

अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः॥

मन्त्रद्रष्टा ऋषियोँ की भाँति इन पाठभेदों के भी भिन्न-भिन्न ऋषि बताये गये हैं। वेदपाठ के माहात्म्य को भी इन पाठ-पद्धतियों के आधार पर निरूपित किया गया है। दण्डक्रम का परिचय देते हुए कहा गया है-

क्रममुक्ता विपर्यस्य पुनश्च क्रममुत्तमम्।
अर्द्धर्चादेव मुक्तोयं क्रमदण्डोऽभिधीयते॥

अर्थात् अनुक्रम से दो पदों के पाठ के बाद व्युत्क्रम से क्रमशः एक-एक पद का पाठ बढ़ाते हुए आधी ऋचा तक यह पाठ चलता है। क्रम के पश्चात् व्युत्क्रम, पुनः क्रम तत्पश्चात् उत्तर पद क्रम। यह आधे-आधे मन्त्र का किया जाता है । उदाहरण के लिए देखें-
ओषधयः सम्। समोषधयः।

ओषधयः सम् । सं वदन्ते । वदन्ते समोषधयः।
ओषधयः सम्। सं वदन्ते। वदन्ते सोमेन। सोमेन वदन्ते समोषधयः।
ओषधयः सम्। सं वदन्ते। वदन्ते सोमेन। सोमेन सह। सह सोमेन वदन्ते समोषधयः।
ओषधयः सम्। सं वदन्ते। वदन्ते सोमेन। सोमेन सह। सह राज्ञा। राज्ञा सह सोमेन वदन्ते समोषधयः।
ओषधयः सम्। सं वदन्ते। वदन्ते सोमेन। सोमेन सह। सह राज्ञा। राज्ञेति राज्ञा।

उत्तरपद क्रम –
यस्मै कृणोति। कृणोति यस्मै।
यस्मै कृणोति। कृणोति ब्राह्मणः। ब्राह्मणः कृणोति यस्मै।
यस्मै कृणोति। कृणोति ब्राह्मणः। ब्राह्मणस्तम्। तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै।
यस्मै कृणोति। कृणोति ब्राह्मणः। ब्राह्मणस्तम्। तं राजन्। राजंस्तं ब्राह्मणः कृणोति यस्मै।
यस्मै कृणोति कृणोति ब्राह्मणः। ब्राह्मणस्तम्। तं राजन्। राजन् पारयामसि। पारयामसि राजंस्तं ब्रह्मणः कृणोति यस्मै।
यस्मै कृणोति। कृणोति ब्रह्मणः। ब्राह्मणस्तम्। तं राजन्। राजन् पारयामसि। पारयामसोति पारयामसि॥
पचास दिनों में इस संहिता की 1975 कण्डिकाओं के 3988 मन्त्रों का कण्ठस्थ पाठ सम्पन्न करने वाले ब्रह्मचारी हैं श्री देवव्रत महेश रेखे। संस्कारशील वेदाध्यायी पिता के पुत्र श्री रेखे काशी में वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय के छात्र हैं। उनका यह कार्य वैदिक शिक्षा एवं उसमें निहित अनुशासन का प्रमाण बना है। इस पारायण ने उन्हें प्रभूत यश दिया है। वे इसके पात्र हैं। माननीय प्रधानमन्त्री ने उनके इस कार्य की सराहना की है। मुख्यमन्त्री जी ने उन्हें सम्मानित किया है। एक अच्छे विद्यार्थी का रूप समाज के सम्मुख आया है। कुल मिलाकर यह आनन्द और आशा का संचार करने वाला प्रसंग है।

तथापि, इस अहोरूपमहोध्वनिः के बाद यह सोचना बाकी रह जाता है कि वेद क्या केवल पाठ है ? लक्षात्मक वेद के कुछ हज़ार मन्त्रों का व्यवस्थित अध्ययन हो जाने पर भी यह एक व्यक्ति की उपलब्धि से अधिक कैसे चरितार्थ होगा। हमारा संविधान, हमारी सरकारें और हमारा समाज वेद को एक कुतूहल से अधिक कितना समझ पा रहा है। जागरूक लेखक Sarvesh जी ने इस सन्दर्भ की सराहना करते हुए बड़ी सच्चाई से लिखा है कि “उन्नीस साल के उस किशोर ने क्या उपलब्धि प्राप्त की है, यह स्पष्ट नहीं समझ पाया हूँ।” धर्मप्राण भारत देश अपना मूल वेदों में कहता है – ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ फिर भी यहाँ बहुसंख्य जन वेदों से अपरिचित ही हैं।

सोशल प्लेटफार्म पर इस अवसर का उत्सव दिखाई दे रहा है, bro और guys वाली लॉबी भी मगन है। यह सब प्रतीकात्मक रूप से तो अच्छा है, पर क्या हम वास्तव में किसी वैदिक युग में प्रवेश कर रहे हैं। श्रुति-स्मृति-पुराणेतिहास का अध्ययन-अध्यापन क्या हमारी सरकार अंगीकार करने जा रही है। स्वातन्त्र्य-पूर्व से कुल-परम्परा को नष्ट करने हेतु प्रतिबद्ध हमारी सामाजिक चेतना क्या गुरुकुलों को पुनर्जीवित करने को प्रस्तुत है। इस दण्डक्रम पारायण से जगे हुए उत्साह को देखकर यह झाग बैठ जाने की ओर भी ध्यान जाने लगता है।

दोयम दर्जे के नागरिक हुए संस्कृत छात्र, गाली की भाँति अपने कुलीन आस्पद ढोते ब्राह्मण, पीढ़ियों से कपट और गैरबराबरी के षडयन्त्र का अपमान सहते पण्डित क्या किसी स्वर्णयुग में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस समय प्रचलित दावे के अनुसार जो पारायण सौ-दो सौ सालों में एक बार सम्भव हुआ है, उससे वैदिक युग पुनः आने वाला है क्या।

मुझे लगता है, यह विद्यार्थी की मेधा का उत्सव है। यह एक पुण्यशील माता-पिता की सिद्धि है। यह एक योग्य आचार्य का आशीर्वाद है। यह आश्वस्ति है कि बीज का नाश नहीं होता, पर बीज के दाने से भण्डारा नहीं होता। उसके लिये खेती और अच्छी उपज की अपेक्षा होती है और अनुकूल ऋतु की भी।
इण्टरनेट की हाइप और सोशल मीडिया अल्गोरिदम के छलावे के बाद, मुकुट और माला की चित्रावलियों के बाद इस प्रसंग की फलश्रुति क्या होगी। यह अप्रतिम छात्र जब अपने रटे हुए मन्त्रों के अर्थ समाज-जीवन में खोजने निकलेगा तो उसे क्या मिलेगा। जातीय जनगणना कराती सरकारें, जातिवाद मिटाने को संकल्पित संविधान, जन्मगत श्रेष्ठता को अमान्य करता समाजशास्त्र तथा कुल-गोत्र को निरस्त करते लोगों के बीच इस उत्साह की कोई वास्तविक भूमि भी है क्या।

सोचना चाहिए।
बधाई हो आयुष्मान् देवव्रत महेश रेखे, हमें इस पारायण में उपस्थित होने का आग्रह था, इच्छा भी थी पर सम्भव नहीं हुआ। पुनः बधाई..धर्मशील माता-पिता और यशस्वी गुरु भी वन्दनीय हैं।

इस उल्लास की अर्थवत्ता का विचार हो सके इसकी शुभकामना। प्रतीकात्मक स्वागत से आगे बढ़कर इस परम्परा की प्रतिष्ठा हो सके ऐसी आशा। (सोशल मीडिया से साभार)

समूचा विद्वत समाज उन्नीस साल के किशोर के आगे हुआ नतमस्तक

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सर्वेश तिवारी श्रीमुख

काशी। उन्नीस साल के उस किशोर ने क्या उपलब्धि प्राप्त की है, यह स्पष्ट नहीं समझ पाया हूँ। दण्डक्रम क्या है, क्यों विशेष है, यह जानकारी हम सामान्य गृहस्थों को नहीं ही है। हममें तो अधिकांश यह भी नहीं जानते कि किसी वेद की अलग अलग शाखाओं में क्या भेद है। लेकिन पिछले दो दिनों से जिस तरह देश का प्रबुद्ध वर्ग इस किशोर की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहा है, वह सिद्ध करता है कि यह मिट्टी अब भी विद्वता का आदर करती है, पूजती है।
सोचिये न! देश के सबसे चर्चित मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि मुझे गर्व है कि देवव्रत महेश रेखे ने हमारे राज्य में यह उपलब्धि हासिल की है। देश के प्रधानमंत्री इस बात के लिए गौरवांवित हो रहे हैं कि इस किशोर ने यह उपलब्धि उनके संसदीय क्षेत्र में प्राप्त की है। समूचा विद्वत समाज उसके आगे नतमस्तक है। फेसबुक ट्विटर पर उसके लिए करोड़ों पोस्ट लिखे जा चुके। यह अपने आप में कितनी बड़ी बात है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्नीस वर्ष की आयु में किसी व्यक्ति को और कितनी प्रतिष्ठा चाहिये!
मैं अपने आस-पड़ोस में देखता हूँ, जिन परिवारों में सदियों से पुरोहित परम्परा रही है, उन परिवारों के बच्चे भी अब संस्कृत नहीं पढ़ते। कुछ तो दिल्ली मुंबई में कहीं पन्द्रह हजार की नौकरी करते हैं, प्राइवेट विद्यालयों में छह छह हजार पर भी पढ़ाते हैं, लेकिन अपना कर्म नहीं करते। उनकी दर्जनों आपत्तियां हैं- भइया संस्कृत पढ़ कर क्या होगा, अरे अब उतनी प्रतिष्ठा नहीं है, भीमटे तो गालियां देते रहते हैं, पुरोहिती में कोई आय भी तो नहीं, वगैरह वगैरह… इनमें कुछ बातें सही भी हैं। पुरोहितकर्म में कोई विशेष आय तो सचमुच नहीं है। और गाली देने वाले भी हैं ही… पर क्या इसी लिए संस्कृत छोड़ दी जाय?
अपनी असफलता की कुंठा में जल रहे नफरती मूर्खों की सोशल मिडीआई बकवास वस्तुतः बकवास ही होती है, वह मिट्टी का मूल स्वर नहीं होता। वे तो चाहते ही हैं कि संस्कृत समाप्त हो जाय, उसे पढ़ने वाले समाप्त हो जाएं, धर्म समाप्त हो जाय… ऐसों की बात क्यों ही सुनी जाय? इनकी फूहड़ गलीबाजी से चिढ़ कर धर्म छोड़ना तो इनके एजेंडे को सफल बनाने जैसा ही है न!
और दूसरी बात यह कि इन फूहड़ गालीबाजों की संख्या अब भी बहुत कम है। उनका स्वर इस मिट्टी का स्वर नहीं है। देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए अब भी संस्कृत एक भाषा से अधिक है। संस्कृत देश की श्रद्धा है। इसमें विद्वता प्राप्त करने वालों को यह देश ऐसे ही पूजता रहा है और भविष्य में भी पूजता रहेगा।
देवव्रत की सफलता पर देश का उत्सव मनाना सुखद संकेत है। संस्कृत और धर्म से भाग रहा हमारा समाज वापस इसकी ओर मुड़े तो और बात बने। वैसे यदि यह उत्सव न होता तब भी हमें उस युवक पर गर्व होता, क्योंकि यह प्रसिद्धि उसका लक्ष्य तो नहीं ही थी। वेदाध्ययन तो धर्मकाज है। प्रसिद्धि तो उपहार जैसी है…
बहुत बहुत बधाई देवव्रत को! नई पीढ़ी उनसे सीखे, उनका अनुशरण करे, इसी कामना के साथ…

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