मनरेगा: मिट्टी से उगती नई उम्मीद

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बेतिया । जब बिहार जैसे राज्यों में हाल के 2025 विधानसभा चुनावों में रोज़गार, पलायन और गांवों की जिंदगी बड़े मुद्दे बनकर उभरे, तो यह साफ़ दिखा कि मनरेगा जैसी योजनाएँ सिर्फ विकास-रिपोर्ट का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक बहस की धुरी भी बन गई हैं। राज्य की दो-तिहाई से अधिक घरों पर बाहरी मज़दूरी का निर्भरता होने के बावजूद, पलायन को रोकने वाली नीतियाँ वोटरों की प्राथमिकता बनीं। जो दल गाँव की ज़मीन से कटे दिखते हैं, उन्हें नतीजों में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की ठोस बात करने वाली राजनीति को नया सहारा मिलता है।
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सवेरे का वक्त है। हल्की धूप धान के पत्तों पर जमी ओस को चमका रही है। कुछ टूटी- कुछ पक्की सड़क के किनारे लाल मिट्टी की परत उड़ती हुई हर चीज़ पर बैठती जा रही है। पोखर के पास गाँव की औरतों का झुंड जमा है—हाथों में कुदाल, माथे पर पसीना, मगर आँखों में उम्मीद की चमक। यह महाराष्ट्र का सुदूर इलाका है, जहाँ चलती ठंडी हवा के साथ बीते सालों की थकान और संघर्ष भी जैसे उड़ते महसूस होते हैं।

सरस्वती, जो टोली की सबसे उम्रदराज़ औरत है, मुस्कुराकर कहती है, “पहले तो बरसात ही पेट पालती थी, अब अगर मनरेगा का काम न मिले तो भूख लौट आती है।”

उसकी बात सिर्फ इस गाँव की नहीं, उस पूरे ग्रामीण भारत की कहानी है जहाँ पिछले दो दशकों से मनरेगा भूख और बेरोज़गारी के खिलाफ़ सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना—मनरेगा—ने लाखों घरों की रसोई जलाए रखी है और मज़दूरों को शहर पलायन से बचाया है। कोविड के ठहराव के दिनों में तो यह सचमुच जीवन-रेखा बन गई। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज इसकी सबसे बड़ी ताक़त गाँव की औरतें हैं—कुल कामगारों में 58.15% से ज़्यादा वही हैं; पहले जो घर की देहरी तक सीमित थीं, अब खेत, तालाब और सड़कों पर अपने हाथों से गाँव की तस्वीर बदल रही हैं। उनकी आवाज़ अब चौपाल तक पहुँचने लगी है।”

फ़रवरी 2006 में 200 जिलों में शुरू हुई मनरेगा योजना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तुरंत प्रभावी हुई और कुछ ही सालों में पूरे देश में फैल गई। हाल के वर्षों में जल संरक्षण और जलवायु-संवेदी कामों पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिससे सूबे ने 2024–25 में 33.65 करोड़ से ज़्यादा मानव-दिवस का काम पैदा कर देश में पहला स्थान हासिल किया। लाखों परिवारों को रोज़गार मिला, और कई ने 100 दिन का लक्ष्य पूरा किया। महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, वर्कसाइट सुपरवाइज़र के रूप में भी, भले ही जाति-आधारित असमानताएँ अभी पूरी तरह धुंधली नहीं हुईं। योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करते हुए कुल 3,029 करोड़ मानव-दिवस उत्पन्न किए हैं, जो 2014-15 से 82% की वृद्धि दर्शाता है।

आगरा ज़िले में, जहाँ ताजमहल की चमक के पीछे एक बड़ा देहाती इलाका छिपा है, मनरेगा ने पानी और बुनियादी ढाँचे के कामों के ज़रिए रोज़गार और संसाधन दोनों बढ़ाए हैं। उत्तर प्रदेश के समग्र आँकड़ों के अनुरूप, आगरा में भी करोड़ों मानव-दिवस उत्पन्न हुए, हज़ारों काम पूरे हुए—खेत-तालाब, चेक-डैम, कच्ची-पक्की सड़कें—जिन्होंने मिट्टी कटान घटाया और सिंचाई की नई संभावनाएँ खोलीं। यहाँ भी औरतों की हिस्सेदारी 58% से ऊपर पहुँच चुकी है, जो गाँव के सामाजिक संतुलन में एक साइलेंट मगर गहरा बदलाव है।

फिर भी तस्वीर पूरी तरह चमकदार नहीं है। कागज़ पर हर परिवार को 100 दिन की गारंटी है, ज़मीन पर औसतन 44-45 दिन का काम ही मिल पाता है। कई जगह मज़दूरी में देरी, निरीक्षण की खामियाँ और सोशल ऑडिट की सीमाएँ हैं; देशभर में सिर्फ छह राज्यों में ही 50% से अधिक ग्राम पंचायतों तक ऑडिट पहुँच पाया है। नतीजा यह कि कुछ गाँवों में काम की माँग अधूरी रह जाती है, और नई परियोजनाएँ काग़ज़ी फाइलों में अटक जाती हैं।
फिर भी, इन सबके बीच जो ठोस फायदे हुए हैं, वे किसी खजाने से कम नहीं। देशभर में लाखों काम पूरे हुए हैं—जिनमें बड़ी हिस्सेदारी जल संरक्षण, सिंचाई और भूमि सुधार की है। इससे फसल उत्पादन बढ़ा, ज़मीन की नमी टिकी और कई इलाकों में भूजल ऊपर आया। योजना ने राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण-शहरी पलायन में 28% तक की कमी लाई है; कई राज्यों में मौसमी पलायन में तेज़ गिरावट दर्ज हुई—कहीं एक-तिहाई तक, तो कहीं आधे से भी ज़्यादा। राजस्थान जैसे राज्यों में गर्मियों में मज़दूरों को 8 अतिरिक्त दिन का काम मिलने से पलायन पर सीधा अंकुश लगा।

मध्य प्रदेश के जग्गू कहते हैं, “मनरेगा न होता तो हम सब शहर चले जाते। अब साल के कुछ महीने यहीं काम मिल जाता है, बच्चों की पढ़ाई भी चलती रहती है।” ऐसी आवाज़ें आंध्र प्रदेश से लेकर मेघालय, राजस्थान से हरियाणा तक सुनाई देती हैं। फिर भी पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में मनरेगा का असर सीमित है, और बेहतर मज़दूरी की तलाश में मज़दूरों का एक हिस्सा अब भी शहरों का रुख करता है।

कभी इस योजना पर फर्जी मस्टर रोल और बड़े घोटालों की छाया थी। झारखंड जैसे राज्यों में सैकड़ों करोड़ के गबन के मामले सामने आए, जिनमें हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने 22 लाख रुपये की संपत्तियाँ जब्त कीं। अब मजदूरी सीधे बैंक खातों में जाने लगी है, काम की तस्वीरें जियो-टैग होकर ऑनलाइन दर्ज होती हैं और सोशल ऑडिट ने गड़बड़ियों को काफ़ी हद तक रोका है। फिर भी दूरदराज़ इलाकों में ठेकेदारों और मशीनों का दबदबा, और स्थानीय राजनीति का हस्तक्षेप आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई जोहड़ और तालाब अब भी सिर्फ काग़ज़ों पर बने दिखते हैं।

मनरेगा ने आर्थिक झटकों से जूझते परिवारों के लिए बफर की तरह काम किया है। यह सिर्फ रोज़गार नहीं देता, बल्कि हर फावड़े के साथ आत्म-सम्मान भी लौटाता है। औरतों के हाथ में आई मज़दूरी ने घरों के भीतर फ़ैसलों की दिशा बदलनी शुरू कर दी है—बच्चों की पढ़ाई, दवाओं का खर्च, छोटे-मोटे त्योहार—अब सबमें उनकी हिस्सेदारी साफ़ दिखती है।

अब शाम को जब सरस्वती घर लौटती है, उसकी हथेलियों पर जमी मिट्टी सिर्फ दिनभर की मेहनत का निशान नहीं, बल्कि इस भरोसे की मुहर है कि उसके बच्चों का कल थोड़ा बेहतर होगा। मनरेगा ने गाँवों में जो बीज बोया है, वह अब पत्तियों और पौधों से आगे बढ़कर एक सोच बन चुका है—यह सोच कि मेहनत की अपनी इज़्ज़त होती है, और उस इज़्ज़त की हिफ़ाज़त सरकार से लेकर समाज तक, सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।

वंशवाद की ढलती शाम: बिहार की शिकस्त के बाद कांग्रेस का धुंधला होता भविष्य

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दिल्ली । गांधी परिवार की रणनीति हमेशा यह रही है कि पार्टी का मुखिया कोई ऐसा व्यक्ति हो जो “काबू में” रहे। वर्तमान अध्यक्ष खड़गे इस सोच के लिए बिल्कुल मुफ़ीद साबित हुए। पार्टी के हर स्वतंत्र या प्रभावशाली नेता को धीरे-धीरे किनारे लगाया गया। ममता बनर्जी बाहर हो गईं, शरद पवार को ठंडे बस्ते में भेज दिया गया, जगन रेड्डी दूर चले गए, हेमंत विश्व शर्मा जैसे नेता अपमानित महसूस कर निकल गए। सिंधिया, देवरा, थरूर, पायलट एक लंबी फेहरिस्त है उन लोगों की जिन्होंने या तो हार मान ली या दरकिनार कर दिए गए। सवाल यह नहीं कि गाड़ी का पहिया पंचर है, बल्कि यह है कि गाड़ीवान को मंज़िल का पता ही नहीं। राहुल गांधी आज पीटर पैन की तरह दिखते हैं, जिन्हें बड़ा होना ही मंज़ूर नहीं।
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2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का धुआँ अभी छँटा भी नहीं कि तस्वीर एकदम साफ़ झलकने लगी।कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन का पतन ऐतिहासिक रहा। 243 सीटों में से कांग्रेस केवल एक पर सिमट गई। यह हार सिर्फ़ एक चुनावी नतीजा नहीं, राहुल गांधी के नेतृत्व पर गहरा अविश्वास भी है। ठीक वैसे ही जैसे इस साल हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में देखा गया।
आज कांग्रेस घटकर केवल तीन राज्यों में रह गई है, और इंडिया गठबंधन में भी साथी दल उससे दूरी बना रहे हैं। बिहार का नतीजा अब एक आईना है जिसमें कांग्रेस न दिशा लिए दिखाई देती है, न उद्देश्य।

नेतृत्व द्वारा एस्केपिज्म का खेल
इस राजनीतिक मलबे के बीच होंठों पर वही पुराने बहाने हैं। राहुल गांधी ने नतीजों को “चौंकाने वाला” और “अनफेयर” करार देकर ज़मीनी हक़ीक़त से अपने फासले को ही उजागर किया। मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ मीटिंग में फिर “वोट चोरी” का रोना। वही पुरानी स्क्रिप्ट जो अब असरहीन हो चुकी है।
यह नेतृत्व नहीं, बचने की कोशिश है। राहुल का दृष्टिकोण अब भी वहीं अटका है कि विपक्ष का मतलब हर सरकारी निर्णय का विरोध करना है, चाहे अर्थव्यवस्था का मामला हो, विदेश नीति हो या सुधारों का। जबकि असली विपक्ष वह होता है जो वैकल्पिक दृष्टि दे, तर्कपूर्ण आलोचना करे और अपनी नीति गढ़े।
एक रिएक्शन मशीन बन चुकी पार्टी
राहुल के युग में कांग्रेस एक “रिएक्शन पार्टी” बन गई। न विज़न, न दिशा। हर बयान में ग़ुस्सा है, हर बयान में असुरक्षा। चुनाव आयोग को “क़ैदी”, लोकतंत्र को “घेराबंदी में” बताने वाली भाषा जनता के भरोसे को ही कमजोर करती है। यह वक्त है कि पार्टी अपनी राजनीति में गरिमा लाए। टकराव नहीं, संवाद तलाशे; दीवारें नहीं, पुल बनाए।

नई राजनीति की ज़रूरत
बिहार की शिकस्त एक संकेत है। कांग्रेस को बुनियादी पुनर्गठन की जरूरत है। नेतृत्व, विचार और चेहरों, तीनों में नवाचार जरूरी है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पुरानी सियासत अब असरदार नहीं रही, विशेषकर बिहार जैसे सूबे में जहाँ जातीय समीकरण ही राजनीति की रीढ़ हैं।
आरजेडी पर निर्भरता और यादव, मुस्लिम वोट बैंक की उम्मीद कांग्रेस को बार-बार कमजोर साबित करती रही है। जबकि एनडीए ने हिंदू वोटों के एकत्रीकरण, (कंसोलिडेशन) से अपनी स्थिति मज़बूत की है। कांग्रेस को अब धर्मनिरपेक्षता के अपने पुराने ढाँचे से बाहर निकलकर, एक समावेशी सांस्कृतिक बहुलता का नया नैरेटिव पेश करना होगा ।

कांग्रेस के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा, न प्रतिष्ठा, न जनविश्वास। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी उसकी हिंदी पट्टी की कमज़ोरी से बेचैन हैं। वक्त आ गया है पार्टी नई पीढ़ी को निर्णायक जिम्मेदारी दे, बूढ़ी हो चुकी दरबारी राजनीति को किनारे रखे, और युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा सुधार, डिजिटल समानता, पर केंद्रित नई राजनीति शुरू करे।
राहुल गांधी को अब यह स्वीकार करना होगा कि नेतृत्व सिर्फ उपस्थिति का नाम नहीं होता। 2009 की बुलंदी से अब तक के सफर में कांग्रेस का वोट शेयर बीस प्रतिशत से नीचे गिर चुका है, यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, एक संकेत है कि जनता अब बदलाव चाहती है।
अगर राहुल पीछे हटते हैं, तो पार्टी के पास रीसेट का मौका है, ठीक वैसे जैसे भाजपा ने आडवाणी युग के बाद अपने को नया रूप दिया था। लेकिन अगर नहीं हटते, तो यह डूबती नाव और नीचे जाएगी। यूपी में समाजवादी पार्टी पहले ही गठबंधन पर पुनर्विचार कर रही है, और बिहार की लहर का असर वहाँ भी महसूस होने लगा है।
बिहार का नतीजा सिर्फ एक हार नहीं, एक चेतावनी है। या तो कांग्रेस अब आत्ममंथन कर जाग जाए, या इतिहास की किताब में एक हाशिया बनकर रह जाए। समाप्त।
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पीटर पेन 1902 में लिखे एक उपन्यास का नायक है।
राहुल गांधी की छवि की तुलना अकसर पीटर पैन से की जाती है, वह काल्पनिक लड़का जो बड़ा होने से इंकार करता है। जैसे पीटर पैन कभी-कभी ज़िम्मेदारियों से बचते हुए रोमांच और आदर्शवाद की दुनिया में खोया रहता है, वैसे ही आलोचक कहते हैं कि राहुल गांधी भी राजनीति की कठोर यथार्थवादी दुनिया में पूरी तरह “परिपक्व नेता” की भूमिका अपनाने से हिचकते नज़र आते हैं। पीटर पैन की बाल सुलभ ऊर्जा उसे Neverland का नायक बनाती है।

हास्य ही हमारा सुरक्षा कवच है!

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शिमला । भारत में लोकतंत्र की मजबूती, और स्थायित्व की प्रमुख वजह हमारा हंसमुख स्वभाव है। हम न कानून को सीरियसली लेते हैं, न ही अपने देवताओं को, नेताओं को तो सर्कस का जोकर मानते हैं। बाबाओं, गुरुओं, प्रवचन कर्ताओं ने हमारी जिंदगी को हास्यात्मक कवच से सुदृढ़ कर दिया है जिसकी वजह से इमरजेंसी की तानाशाही फेल हो गई, कोविड महामारी कन्फ्यूज्ड हो गई , ट्रंप के टैरिफ दिशा भ्रमित हो गए। न सरकार को पता है, न आंदोलन जीवियों को कैसे अपना भारत उपलब्धियों की बुलंदी छू रहा है। सबसे बड़ा मजाक बिहार चुनाव परिणाम आपके सामने हैं। जीतने वाले खिलाड़ी भी de code नहीं कर पा रहे हैं प्रशांत किशोर ने ये कौन सा एल्गोरिथम लिखा!

भारत में हंसी कोई साधारण चीज़ नहीं—यह राष्ट्रीय स्तर का स्टेबिलाइज़र है, ट्रिपल-डोज़ का वैक्सीन है जो किफायती तनाव-नाशक है, और लोकतंत्र का असली ‘Z+ सुरक्षा कवच’ है। 1.4 अरब लोगों वाला देश, जिसमें लोग गोलगप्पे की तीखेपन पर भी भीषण युद्ध छेड़ सकते हैं, वहाँ हर चुनाव, घोटाला और घमासान के बाद देश शांत कैसे रहता है?

सिंपल: क्योंकि यहां लोग नेता को लाठी से नहीं, LOL से मारते हैं। कभी पीलू मोदी, कभी राज नारायण, लालू यादव या राहुल भैया।
हम दुनिया का पहला देश हैं जिसने खोजा कि “Kill them with humour”। ये वास्तव में हथियारबंद टकराव से ज़्यादा असरदार है। यहाँ नेता का मज़ाक उड़ाओ, और पब्लिक का गुस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।नेता मीम में बदल जाए, तो जनता पत्थर से नहीं, गुलगुली से लोट पोट हो जाती है।
जिस दिन राहुल गांधी पहली बार “पप्पू” हुए, कांग्रेस ने समझ लिया कि ट्रेन जलाने से अच्छा है टेम्पलेट जलाओ। और जनता को भी पता चल गया: “इतनी आसानी से गुस्सा निकल जाए? ये तो थेरेपी से भी सस्ता है!”

मोदी जी के 10-लाख वाले सूट ने अर्थव्यवस्था को भले न बढ़ाया हो,लेकिन मीम इंडस्ट्री का Sensex आसमान छू गया। उनके समर्थकों ने दंगे नहीं किए, बल्कि उन्हें भारतीय Met Gala का “Best Dressed Leader” अवार्ड दे दिया। दूर-दूर तक Photoshop फैक्ट्रियाँ चलने लगीं, देश में GDP से ज़्यादा GIF बनने लगे।

उधर मफलर धारी केजरीवाल की खांसी अब दिल्ली का बैकग्राउंड म्यूज़िक है। लोग कहते हैं: “सर, आपका खांसना भी जनता से कनेक्शन बढ़ाता है, WiFi से तेज़।”

यह है असली सर्जिकल नहीं सेटआयरिकल स्ट्राइक, गुस्से पर! हमारे कार्टूनिस्ट, मीम-मास्टर्स और स्टैंड-अप आर्टिस्ट असल में लोकतंत्र के ICU डॉक्टर हैं। गुस्सा बढ़े तो तुरंत पंचलाइन की IV drip लगा देते हैं। दिमाग गरम हो तो ठंडा कम्प्रेस मीम लगा देते हैं।

और अगर जनता उबल रही हो, तो एक तगड़ा व्यंग्य का इंजेक्शन सीधे नस में। UN के शांति सैनिकों को बुलाने की ज़रूरत नहीं, एक सही समय पर डाला गया वॉट्सऐप फॉरवर्ड दंगे रोक सकता है।

अगर देश का तापमान सच में कम करना है, तो AC से नही, ह्यूमर से होगा। स्कूलों में “Advanced Sarcasm 101”, कॉलेजों में “लोकतांत्रिक Mimicry Lab”, और सरकारी बजट में “National Meme Mission” जरूरी है।

सरकार को अपने सटायरिकल कलाकारों को रणनीतिक संपत्ति की तरह बचाना चाहिए, जैसे एटॉमिक वैज्ञानिक होते हैं, वैसे ही ये “बम के बिना बम” वाले कलाकार होते हैं।

और हाँ, “hurt sentiments” वाला कानून थोड़ा आराम दे, वरना देश का सबसे उपयोगी उद्योग: हँसी-व्यंग्य, बार-बार बंद हो जाएगा।
भारत का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक करिश्मा : हम दुनिया को ये साबित कर चुके हैं कि यहाँ आप एक नेता को दिन में सौ बार roast कर सकते हैं, और दूसरे दिन भी देश सलामत उठता है। क्योंकि हमारा नियम सरल है,

जोक मारो, रोस्ट करो, फ्राई मत करो।

मेम बनाओ, मोर्चा नहीं।

The Humour Times, व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट और मीम आर्टिस्ट, न सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं, वे लोकतंत्र का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखते हैं। टकराहट होने वाली हो, तो ये हंसी का हैंडब्रेक खींच देते हैं। और इसलिए लिख लो, छाप लो, फ्रेम कर लो, पंचलाइन तलवार से तेज़ होती है,व्यंग्य लाठी से भारी होता है,और ह्यूमर बम से ज्यादा धमाकेदार।

पवित्र ब्रजभूमि की मौन कशिश: पर्यावरण विनाश से मिटती ‘कृष्ण लीला’ की धरती

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बृज खंडेलवाल

मथुरा । ब्रजभूमि — श्रीकृष्ण की वह पावन धरती जो मथुरा के आस-पास लगभग 150 किलोमीटर तक फैली है — केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक गहरी रूहानी और पौराणिक विरासत है। यह वही इलाका है जहाँ वृंदावन, गोवर्धन और गोकुल की गलियाँ आज भी “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” की पुकार से गूंजती हैं। लेकिन अफसोस! आज यही धरती एक अस्तित्व संकट से जूझ रही है — बेहिसाब विकास परियोजनाओं, अवैध निर्माणों और पर्यावरणीय विनाश की वजह से। भीड़ तो हजार गुणा बढ़ी है पर भक्ति भावना की जगह व्यावसायिक लाभ के लिए टूरिज्म हावी हो रहा है।

धर्म और आस्था के नाम पर चल रही ये “तरक्की” दरअसल ब्रज की आत्मा को खोखला कर रही है — जहाँ कभी हरे-भरे वन थे, वहाँ अब कंक्रीट के जंगल खड़े हैं; जहाँ कभी पवित्र कुंड और नदियाँ बहती थीं, वहाँ अब गंदगी और प्लास्टिक का सैलाब है। श्रद्धालु जब इस पावन भूमि पर कूड़े और भीख माँगते बच्चों के बीच थकान से गुजरते हैं, तो सवाल उठता है — क्या ब्रजभूमि अब सिर्फ एक “पिकनिक स्पॉट” बनकर रह जाएगी?

ब्रज के पर्यावरण संकट की जड़ में उसकी प्राकृतिक पहचान का विनाश है। गोवर्धन पर्वत, जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से ग्वालों की रक्षा के लिए उठाया था, अब चारों ओर से कालोनियों और ऊँची इमारतों से घिर गया है। जहाँ कभी हरियाली और गायों के झुंड दिखते थे, वहाँ अब सीमेंट और धूल है। पवित्र कुंड, मेड़ और झाड़ियाँ मिट रही हैं, जिससे भूमि क्षरण, जैव विविधता का ह्रास और जलसंकट बढ़ रहा है।

यमुना, जिसमें कृष्ण ने कालिया नाग का विनाश किया था, अब जहरीले कचरे और नालों की गंदगी से बेहाल है। यह न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि इस पवित्र नदी की रूहानी पाकीज़गी को भी दागदार कर रहा है। मथुरा के पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं — “कृष्ण की लीला करुणा और समानता की प्रतीक थी, लेकिन आज का ब्रज लोभ और असंवेदनशीलता का शिकार है।”

तेज़ी से बढ़ते निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन ने हालात को और बदतर कर दिया है। ब्रज सर्किट — जो उत्तर प्रदेश की सबसे लोकप्रिय धार्मिक यात्रा मानी जाती है — असली विकास के बजाय अवैध कब्ज़ों और अंधाधुंध निर्माण का गढ़ बन गई है। वृंदावन और गोवर्धन में महंगे फ्लैट, आलीशान आश्रम, और फिल्मी हस्तियों के रिज़ॉर्ट बन रहे हैं। गोवर्धन की 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा मार्ग को सीमेंट से पाटा जा रहा है और जगह-जगह दुकानों से घेर दिया गया है। वृंदावन में तो अब मथुरा से ज़्यादा ऊँची इमारतें हैं, जहाँ हरियाली का नामोनिशान मिट रहा है।

स्थानीय ब्रजवासी कहते हैं, “अब यह भूमि हमारे हाथ से निकल रही है। परिक्रमा मार्गों को भी अब निजी होटलों और आलीशान भवनों में बदल दिया गया है।”

यह सब ब्रज की आत्मा के खिलाफ है — जो सादगी, भक्ति और प्रकृति की पवित्रता पर आधारित है। प्रस्तावित गगनचुंबी मंदिर को लेकर भी स्थानीय पर्यावरणविदों ने विरोध जताया है कि इससे जल और बिजली संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और ब्रज की ‘देहाती-रूहानी’ छवि नष्ट होगी। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) में न दृष्टि है, न योजना। आधुनिकता की अंधी दौड़ में पुरानी वास्तुकला और सांस्कृतिक माहौल सब गड्डमड्ड हो गया है। ब्रज संस्कृति की आत्मा लापता है।

ट्रैफिक जाम, गंदे नाले, अतिक्रमण, टूटी हवेलियाँ और उजड़े घाट — सब इस विनाश की गवाही दे रहे हैं। मनोरंजन पार्कों, लग्ज़री रिज़ॉर्ट्स और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स ने आध्यात्मिकता की जगह उथले मनोरंजन को दे दी है। यह पर्यटकनुमा विकास ब्रज की पवित्रता और पुरातात्विक धरोहर दोनों को मिटा देगा।
विदेशी अनुयायियों की बढ़ती भीड़ भी इस पवित्र भूमि पर उपभोक्तावाद का दबाव बढ़ा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य और धरोहर संरक्षणवादी डॉ. मुकुल पंड्या का कहना है कि अब वक़्त है कि “मुनाफे के लालच” के बजाय “संतुलित और सतत विकास” को अपनाया जाए। हेरिटेज ग्रुप के गोपाल सिंह कहते हैं, “ब्रज की पाकीज़गी को बचाना ही असली भक्ति है, न कि इसे मनोरंजन का बाज़ार बनाना।”

अब वक्त है एक समन्वित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का — जिसमें वृक्षारोपण, यमुना की सफाई, ठोस कचरा प्रबंधन, और स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो। शाश्वत पर्यटन, पर्यावरण शिक्षा, सांस्कृतिक जागरूकता और निगरानी के ठोस कदम उठाने होंगे।

अंततः, ब्रजभूमि का विनाश सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि उसकी आत्मा पर वार है। श्रीकृष्ण की वह भूमि जहाँ प्रकृति और प्रेम एक थे, अब लालच और लापरवाही की भेंट चढ़ रही है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह धरती ‘भक्ति की भूमि’ से ‘व्यापार की भूमि’ बन जाएगी।
ब्रज को बचाना केवल पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की अमर कथा की अस्मिता को बचाना है — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पवित्र भूमि की सच्ची खुशबू महसूस कर सकें

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