सनातनी मिथिला में डेमोग्राफी चेंज – आहट से आतंक तक का सफर।

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इम्पल्स कोटा

दरभंगा । 13वीं सदी के उत्तरार्ध तक, मिथिला में नव्यन्याय की तार्किक धारा के किनारे, सनातनी व्यवस्था पुष्पित-पल्लवित होती आ रही थी।

इसके पूर्व गंगेश उपाध्याय द्वारा ‘तत्वचिंतामणि’ पुस्तक की रचना हुई थी।

उससे पहले जयंतभट्ट की ‘न्यायमंजरी’, उदयनाचार्य की ‘न्यायकुसुमांजली तथा तात्पर्यशुद्धिविवेक’ और वाचस्पति मिश्र की ‘न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका’ द्वारा ‘मिथिला’ न्यायदर्शन को अपनी विद्वत परंपरा से अभिसिंचित कर चुका था।

मैथिल अक्षपाद गौतम ‘न्यायदर्शन’ के प्रणेता थे।

गौतम लिखित ग्रंथ ‘न्यायसूत्र’ से ही महात्मा बुद्ध को पूर्व के ‘विचार-प्रवाह’ को परिष्कृत करने की आवश्यकता जान पड़ी थी।

पक्षधर मिश्र या उनके बाद के कुछ दसकों तक, मिथिला के विद्वान अपनी ‘ज्ञान परंपरा’ को मिथिला से बाहर नहीं जाने देते थे। उस ज्ञान-परंपरा पर केवल मिथिला में रहनेवाले लोगों का अधिकार था।

यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि इस समय तक मिथिला में ‘इस्लाम’ की उपस्थिति का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

उदयनाचार्य सदृश नैयायिकों द्वारा बौद्ध मत को पहले ही निर्मूल कर दिया गया था।

मंडन मिश्र तथा आदि शंकराचार्य प्रकरण के बाद संपूर्ण मिथिला क्षेत्र ‘सनातन संस्कृति’ का क्षीर-सागर बन चुका था।

अनगिनत राज्याश्रित शिक्षण केंद्रों द्वारा ‘विद्या बल’ का संचय कर मिथिला सम्पूर्ण भारतवर्ष को सनातन दृष्टि प्रदान कर रही थी।

इस तरह से मिथिला ‘सनातन धर्म दर्शन परंपरा’ का सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र बन चुका था।

यह अलग बात है कि उसी समय मिथिला के चारों ओर इस्लामी प्रचार-प्रसार केंद्र विकसित हो चुके थे।

काशी में भी सनातनी व्यवस्था ध्वस्त होती जा रही थी।

12वीं-13वीं सदी में मोहम्मद गोरी और बख्तियार खिलजी के आक्रमणों से दिल्ली, जौनपुर, बिहारशरीफ, लखनौती तथा मालदा आदि क्षेत्र इस्लाम के राजनैतिक, सैनिक तथा जिहादी केंद्र के तौर पर विकसित हो चुके थे।

ऐसी स्थिति में भी मिथिला हिन्दू धर्म, संस्कार तथा संस्कृति की शरणस्थली बना हुआ था।

इसी बीच नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त कर बख्तियार खिलजी ने तत्कालीन मिथिला नरेश कर्णाट वंशी रामसिंह देव को परास्त किया।

मिथिला में लूटपाट कर खिलजी गौड़ बंगाल की ओर निकल गया।

यही वह समय था जब पहली बार मिथिला का सामना इस्लामी अतिक्रमण से हुआ। जिहादी तत्वों की पहली ‘आहट’ तभी सुनाई पड़ी।

कर्णाट वंश के बाद भी लेकिन मिथिला पर हिन्दू शासन ओइनवार राजाओ के रूपः में यथावत चलता रहा।

इसका कारण यह था कि उस समय राजनीतिक स्थिति में भले परिवर्तन आ गया परंतु धरातल पर स्थिति हिंदुत्व के पक्ष में थी।

पूरे मिथिला क्षेत्र में हिन्दू धर्म को मानने वाली जनता के दवाब के सम्मुख इस्लामी राजनीतिक सत्ता-केंद्र असहाय ही रहा।

क्षेत्रीय स्तर पर मिथिला की बागडोर हिन्दू राजाओं के हाथ रही।

राज्याश्रित कौलिक शैक्षणिक व्यवस्था निरंतर अपने संचित ज्ञान-बल द्वारा मिथिला समाज को प्रदीप्त करती रही।

इस हिन्दू शासन का अंत 1527 में तब हुआ जब सिकंदर लोदी ने अंतिम ओइनवार राजा कंसनारायन लक्ष्मीनाथ देव को पराजित किया।

इस बीच यह जानना आवश्यक है कि बख्तियार खिलजी से सिकंदर लोदी तक, मिथिला के दरभंगा पर ग्यारह बार आक्रमण हुए।

इन आक्रमणों के पीछे लूटमार तथा इस्लामी जिहाद प्रमुख कारक थे। मिथिला की हिन्दू जनता के साथ अत्याचार उनमें ‘गाजी’ की भावना विकसित करती थी।

इन्हीं आक्रमणों के बीच मिथिला में इस्लामी उन्माद की आहट जोरदार ढंग से सुनाई देने लगी।

1326 ईसवी में हिन्दू राजा हरिसिंह देव की पराजय के बाद इस्लामी ताकतों द्वारा दरभंगा के क़िलाघाट में एक जामा मस्जिद, एक टकसाल तथा एक किला बनाकर उसका नाम तुग़लकपुरी रखा गया।

मिथिला के स्थानीय हिन्दू लोगों के प्रतिरोध के कारण ही दिल्ली सल्तनत ने ओइनवार ब्राह्मण भोगीस्वर ठाकुर को लगभग 1335 में मिथिला का राजा नियुक्त किया था।

ऊपर बताया जा चुका है कि 1527 में सिकंदर लोदी से हार के बाद यह हिन्दू शासन खत्म हो गया।

तत्पश्चात दिल्ली से बंगाल की यात्रा के लिए ‘मिथिला’ के भूभाग का उपयोग किया जाने लगा।

इसके पीछे उनकी मंशा यही थी की स्थानीय हिन्दू बहुल जनता को भयाक्रांत रखा जा सके और सनातनी व्यवस्था के प्रमुख केंद्रों को भी लगातार कमजोर किया जाता रहे।

मुख्य रूप से निम्नलिखित मार्गो का उपयोग किया जाता था-

1. जौनपुर- गोरखपुर- बनारस- सिवान- केसरिया- तुर्की- मुजफ्फरपुर- दरभंगा- पुर्णिया- दिनाजपुर- लखनौती।

2. दरभंगा- बहेड़ा- रोसड़ा- बलिया- मुंगेर।

3. दरभंगा- समस्तीपुर- बाजिदपुर- तेघरा- बलिया- मुंगेर।

इन मार्गों का उपयोग कर बख्तियार खिलजी, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान, गयासुद्दीन, मुहम्मद बिन तुगलक, फिरोजशाह, सिकंदर लोदी तथा शेरशाह सूरी के सैनिको ने गौड़ बंगाल पर आक्रमण किया था।

इन लगातार आक्रमणों से उत्पन्न इस्लामी आतंक को देख मिथिला के विद्वानों का यह निश्चय दृढ़ होता गया कि सनातन धर्म व्यवस्था के प्राचीन मान्यताओं को नवीन, समयानुकूल और सोद्देश्यपूर्ण आधार पर सुदृढ़ कर समाज के प्रत्येक वर्ग को एकता के सूत्र में बांधकर सनातनी आदर्शों के प्रति एकनिष्ठ रखने का प्रयास किया जाए।

मिथिला के विद्वानों को यह आभास हो गया था कि राजनीतिक रूप से मजबूत हो रहे इस्लामी झंझावात से सनातनी मैथिल सामाजिक बंधन शिथिल हो सकते हैं।

विदेशी विधर्मी आक्रमणकारियों से सनातनी मैथिल जीवन पूर्ववत स्वायत्त रहे इसीलिए तब मिथिला के विद्वानों ने मिथिला ही नहीं वरन संपूर्ण भारतीय जनमानस को सांस्कृतिक रूप से ‘एकसूत्र’ में पिरोने के लिए प्राचीन धर्मशास्त्रों का नवीन प्रणयन शुरू किया।

इस प्रणयन की मेखला तो ‘न्याय दर्शन’ को बना परंतु परिधि पर अन्य धर्मशास्त्रीय निबंधों, साहित्यिक पदावलियों तथा भगवद लोकगीतों को रखा गया।

मिथिला के निकट, बंगाल का नवद्वीप क्षेत्र था। उस क्षेत्र को भी प्राचीन धर्म दर्शन जीवन परंपरा से संपृक्त रखने की जिम्मेदारी मिथिला ने उठाया।

नवद्वीप के वासुदेव सार्वभौम तथा रघुनाथ शिरोमणि अध्धयन के लिए मिथिला आए।

तत्समय महापंडित पक्षधर मिश्र से शिक्षा ग्रहण कर उन्होंने नवद्वीप में न्याय विद्यापीठ की स्थापना किया। समय के गर्भ से उसी नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु ने ‘कृष्ण-भक्ति’ को नई ऊंचाई तक पहुंचाया।

इसी विद्यापीठ से उत्पन्न मथुरानाथ तर्कवागीश, जगदीश तर्कालंकार, गदाधर भट्टाचार्य प्रभृत विद्वानों ने उस क्षेत्र में सनातनी धर्म व्यवस्था की ध्वजा को मजबूती से थामे रखा।

इतना ही नहीं, पक्षधर मिश्र के नाटक ‘प्रसन्नराघव’ से प्रभावित गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना कर, इस्लामी अतिक्रमण से उद्वेलित उत्तर भारतीय जनमानस को श्रीराम के रूप में अपना अनन्य नायक प्रदान किया।

इस्लामी अतिक्रमण से उत्पन्न अराजकता से सनातनी मर्यादा के टूटते तंतुओं को एक ऐसे नायक की आवश्यकता थी जिसके व्यक्तित्व में वही पुरातन कौलिक आदर्शों की उपस्थिति संभव हो जिनके दम पर आजतक हिंदुत्व की सरिता से अपना जीवन-जल प्राप्त कर रहा समाज, अविकल अपने दैनिक जीवन में ‘धर्म’ के आचरणों को धारण करता आ रहा था।

मैथिल सीता और अवधेश श्रीराम के कठिन परंतु आदर्श जीवन को श्रीरामचरितमानस के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाकर, सम्पूर्ण सनातनी समाज को वह आवश्यक संबल प्रदान किया गया जिसकी उपादेयता तब के समय सर्वाधिक थी।

काशी तब हिंदुत्व की हृदयस्थली था जिसे मिथिला की पांडित्य परंपरा का रक्त पर्याप्त पोषण प्रदान कर रहा था।

मगर केंद्र में संगठित हो रहे मुगल साम्राज्य ने मिथिला क्षेत्र में ‘इस्लामी प्रचार प्रसार’ को तब महत्वपूर्ण सहायता प्रदान किया जब मुगल सम्राट अकबर ने 1570 ईसवी में गंगा के दक्षिणी तथा गंगा के उत्तरी क्षेत्रों को जोड़कर एक ‘सूबा’ बना दिया।

अब मिथिला अपना स्वतंत्र अस्तित्व खो चुका था।

इसके साथ ही दरभंगा, मधुबनी, रोसड़ा, बेलसंड, परसरमा, महुआ, दलसिंहसराय, बलिया, तुर्की, महिषी आदि स्थानों में इस्लामी सैन्य छावनियों का निर्माण किया गया।

सनातनी धर्म व्यवस्था के केंद्रों तथा उसके उन्नायकों की अनुपस्थिति में यह इस्लामी जिहादी अतिक्रमण निर्बाध चलता रहा।

इस काल में इस्लामी फ़क़ीर, मौलवी, मखदूम, मुल्ला लोगों ने इस्लामी शासन के सहयोग से ‘धर्म प्रचार’ करना शुरू किया। इनमें से कइयों ने तो मिथिला पर हो रहे आक्रमणों में जिहादी तत्वों का साथ भी दिया।

अंग्रेजी शासन व्यवस्था आने तक यह इस्लामी प्रचार-प्रसार पूरी सक्रियता से चलता रहा, जिससे मिथिला की ‘जननांकिय स्थिति’ प्रभावी रूप से परिवर्तित होने लगी।

इस बीच सनातन धर्म दर्शन परंपरा के जितने भी ‘संदर्भ केंद्र’ थे वो धराशायी हो गए। याज्ञवल्क्य, वाचस्पति, मंडन, उदयन तथा पक्षधर सदृश केंद्रों का संरक्षण और संवर्धन क्षीण होता गया।

परिणामस्वरूप 1872 की प्रथम जनगणना में मिथिला क्षेत्र में मुस्लिम जनसंख्या 12 प्रतिशत दर्ज की गई।

आज के समय मे 2011 की जनगणना के अनुसार मिथिला क्षेत्र के अधिकांश भागों में मुसलमानों की जनसंख्या 35 प्रतिशत से अधिक हो गई है।

मिथिला के सुदूरवर्ती कुछ क्षेत्रों में तो मुस्लिम जनसंख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है।

इस स्थिति की शुरुआत धर्म-परिवर्तन से हुई जिसे उनकी जनसंख्या-विस्फोट ने आगे बढ़ाया।

नेपाल तथा बांग्लादेश से जुड़े होने के कारण भारत के सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी उन्माद की जो आहट चौदहवीं शताब्दी में सुनी गई, वह खतरनाक आहट आज केवल सात सौ वर्षों के बाद एक आसन्न ‘संकट’ में परिणत हो चुकी है।

स्पष्ट है कि जिस मिथिला ने मध्य काल में बंगाल, आसाम तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘हिंदुत्व’ का जोरदार संरक्षण किया, वही मिथिला 19वीं-20वीं-21वीं सदी में इतना कमजोर हो गया है कि आसाम-बंगाल से पूर्वी उत्तर प्रदेश तक की संपूर्ण भारतीय सीमा संकटापन्न हो गई है।

देश एवं समाज के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ प्रचारक ओम प्रकाश गर्ग

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गाजियाबाद । ओमप्रकाश गर्ग जी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मोरटा नामक ग्राम में स्व0 बेनी प्रसाद गर्ग जी के घर में दिनांक 21 जून, 1926 को हुआ।

बाल्यकाल में ही आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गए एवं बाल गणशिक्षक के रूप में दायित्व सम्भाला तत्पश्चात् विज्ञान विषय में स्नातक करने के उपरान्त वर्ष 1946 में वाराणसी से प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करके उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद में नगर प्रचारक, वर्ष 1947 में भरतपुर से द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करके फर्रूखाबाद के जिला प्रचारक बने एवं वर्ष 1954 में नागपुर से तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् वर्ष 1956 में लखीमपुर के जिला प्रचारक के दायित्व का निर्वहन किया।

वर्ष 1960 में लखनऊ जिले में भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री का दायित्व सम्भाला तत्पश्चात् वर्ष 1972 तक आप आगरा, मथुरा, गया, भागलपुर एवं पटना विभाग के विभिन्न दायित्वों पर कार्यरत रहे।

संगठन के प्रति आपकी लगन एवं निष्ठा को देखते हुए संगठन द्वारा आपको वर्ष 1974 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पटना विभाग के विभाग प्रचारक के रूप में दायित्व सौंपा गया। वर्ष 1981 में बिहार प्रान्त के सह प्रान्त प्रचारक के रूप में दायित्व सम्भाला और आपकी कार्यकुशलता को देखते हुए वर्ष 1985 में आपको उत्तर बिहार के प्रान्त प्रचारक के रूप में दायित्व प्रदान किया गया।

संगठन ने आपको वर्ष 1991 में नेपाल राष्ट्र के प्रचारक का दायित्व सौंपा एवं इस अवधि में आपका केन्द्र काठमाण्डू रहा तत्पश्चात् आपने सीमा सुरक्षा संगठन के अन्तर्गत भारत के बिहार एवं उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाली नेपाल देश के सीमा का दायित्व का निर्वहन किया तथा इस दौरान आपका केन्द्र लखनऊ रहा।

संगठन के प्रति आपकी निष्ठा को देखते हुए संगठन ने आपको वर्ष 2007 में विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय मंत्री एवं नेपाल प्रभारी का दायित्व सौंपकर आपका केन्द्र दिल्ली कर दिया। वर्ष 2015 से अपने जीवन के अन्तिम समय तक विहिप के प्रबन्ध समिति के सदस्य के रूप में अनवरत आठ वर्षों तक आप विहिप कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा राष्ट्र और समाज के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाले श्री ओमप्रकाश गर्ग जी का देहावसान पटना के एक अस्पताल में लम्बी अस्वस्थता के पश्चात् दिनांक 06 नवम्बर, 2021 को सायंकाल 4.05 बजे हुआ।

समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व समझते हुए आपने दधीचि देहदान समिति को अपना नेत्रदान एवं देहदान करके कार्यकर्ताओं के समक्ष एक सर्वोच्चतम उदाहरण प्रस्तुत किया है।

वासुदेव घाट पर विश्व मांगल्य सभा महाशक्ति आराधना का आयोजन

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दिल्ली । रविवार की शाम दिल्ली के यमुना तट पर वासुदेव घाट पर विश्व मांगल्या सभा और दिल्ली सरकार की सांस्कृतिक और भाषा विभाग के तत्वाधान में महाशक्ति आराधना का आयोजन किया गया । विश्व मांगल्य सभा द्वारा आयोजित महाशक्ति आराधना आयोजन का उद्देश्य भारत के वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करना था जी होने भारत की रक्षा और राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वस्व न्योछावर कर शौर्य की गाथा गायी । ये कार्यक्रम उन सभी को समर्पित था जो जिन्होंने भारत की संस्कृति , संस्कार, परंपरा और सीमा की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है ।

इस कार्यक्रम में यमुना के तट के नवनिर्मित वासुदेव घाट पर क़रीब 2000 से ज़्यादा महिलाओं ने हाथों में दीपक लेकर माँ जगदंबा के महिषासुर मर्दानी स्त्रोत का गायन पाठ एक स्वर में किया । कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई और कार्यक्रम का समापन यमुना आरती के साथ हुआ । दोपहर 4 बजे से सांय 6 बजे तक चले महाशक्ति आराधना में जब वाहन उपस्थित महिलाओं ने हाथों में दीपक लेकर महिषासुरमर्दनी स्त्रोत “ए गिरि नंदिनी ,नंदित मेदनी” पाठ का गायन शुरू किया तो माँ यमुना के वासुदेव घाट का नज़ारा देखने लायक था । इन स्त्रोतों के साथ ही यमुना मैया की लहरें जीवंत हो उठीं थी ।

इस ऐतिहासिक अवसर पर कार्यक्रम में विश्व मांगल्य सभा की संगठन मंत्री वृषाली जोशी , दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता , भारत सरकार के केंद्रीय राज्य परिवहन एवं वाणिज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा , दिल्ली सरकार के सांस्कृतिक मंत्री कपिल मिश्रा एवं विश्व मांगल्य सभा के मार्ग दर्शक एवं आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक प्रशांत हड़तालकर जी की गरिमामयी उपस्थिति रही ! इसके अलावा कार्यक्रम में। भारतमाता राष्ट्र मंदिर के संस्थापक अजय भाई जी , वरिष्ठ समाज सेविका किरण चोपड़ा जी , तथा विश्व मांगल्य सभा की सह संगठन मंत्री पूजा देशमुख की गरिमामयी उपस्थिति रही ।

कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई और भारत माता राष्ट्र मंदिर के संस्थापक अजय भाई जी के भजन तथा महिषासुर मर्दजी स्रोत गायन के बाद यमुना आरती से कार्यक्रम का समापन हुआ ।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्व मांगल्या सभा की अखिल भारतीय संगठन मंत्री वृषाली जोशी ने कहा कि डॉ वृषाली जोशी जी विश्वामंगलय सभा की अखिल भारतीय संगठन मंत्री ने विश्वामंगलय सभा का ध्येय परिचयत देते हुए बताती है कि विश्वामंगलय सभा गत १५ वर्षों से एक विचार एक तत्व के लिए कार्य के रही है ओर वह तत्व है मातृ निर्माण। एक महिला की मिल भूत भुमिका अपने परिवार संस्था के लिए अपने समाज के लिए अपने राष्ट्र निर्माण के लिए पुनः परिभाषित करने के लिए विश्वामंगलय सभा ने शुरुवात की है। मातृशक्ति, मातृत्व इसमें मातृ इस शब्द का अर्थ बताते हुए वृषाली जी कहती है कि मातृ इस शब्द का उल्लेख सर्व प्रथम रामायण में हुआ है जब मां सीता रावण की अशोक वाटिका में कैद थी और रावण अपने अहंकार में कई बाते बताता था तब माता सिया के हाथ में एक घास का पत्ता था तब माता सिया कहती है कि गर मैने ये घास का पत्ता भी पूरी क्षमता से तुम्हारी और फेंका तब भी तुम खत्म हो जाओगे उससे शब्द निर्माण हुआ मातृ शब्द को घास के पत्ते समान हल्का मत समझो उसमें बहुत ताकत समाहित है।
जो स्त्री मां स्वरूप में छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे वीर पुत्रों को जन्म दे कर देश की अस्मिता मै अपना
तेजस्वी योगदान करती है।
7 लाख महिलाओं के बीच और 11 विभागों में पूरे भारत वर्ष में संगठन कार्यरत है। सबका समर्थन मांगते हुए उन्होंने कहा यह धर्म राष्ट्र और ईश्वरीय कार्य है

आपको बता दें कि विश्व मांगल्य सभा महिलाओं द्वारा संचालित एक स्वायत्त संस्था है
जिसकी स्थापना 16 साल पहले साल 2010 में श्रीनाथ पीठाधीश्वर स्वामी जितेंद्रानाथ जी ने की थी । इस संगठन में 17 प्रचारिकाएँ हैं जो पूरे भारतवर्ष में मातृत्व पर महिलाओं के बीच कार्य कर रही है । इस संगठन के मार्गदर्शक के रूप में वरिष्ठ प्रचारक और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कॉर्डिनेटर रहे प्रशांत हड़तालकर जी हैं और पालक के रूप में स्वयं आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत जी का सानिध्य मिलता है । ये संस्था छात्र सभा के रूप में छात्राओं के बीच कार्य करती है । बाल सभा के नाम से छोटे बच्चों के बीच , सदाचार सभा लगा कर ये संगठन महिलाओं ख़ास कर मातृव्व सृजन के चौतरफा विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है और सबसे ज़्यादा स्वास्थ परिषद के साथ अनाथ बच्चों के बीच इस संगठन का कार्य है जो इन बच्चों को अनाथ नहीं स्वनाथ नाम देती है और हर बच्चे को एक माँ मिले उस उद्देश्य के साथ निरंतर प्रयासरत है ।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मातृशक्ति को देश की शक्ति बताया । CM रेखा गुप्ता जी ने महिला की परिभाषा बताते हुए कहा जिसे कोई हिला नहीं सकता वह एक महिला होती है। अगर किसी महिला ने निश्चित कर लिया तो वह कुछ भी कर सकती है इतनी शक्ति एक महिला अपने अंदर समाएं हुए है। उन्होंने विश्वामांगल्य सभा को धन्यवाद देते हुए कहा कि ” इस महाशक्ति आराधना के सुंदर आयोजन के लिए संगठन दिल्ली का चयन किया इसके लिए मैं संगठन की आभारी हूं। रेखा जी ने नारी शक्ति के लिए कहा ” जब एक नारी प्राण करती है तब उसके सामने कोई आसुरी शक्ति उसके सामने ठहर नहीं सकती हम सभी शक्तियों से सपन्न हैं बस उन्हें पहचानना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर का नेतृत्व करने वाली २ महिला अफसरों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे देख की हर महिला अपने घर समाज और राष्ट्र का रक्षण पूरे सामर्थ्य से कर सकती है तथा उन्हें दिशा देने का कार्य भी एक सशक्त महिला ही कर सकती है।

हमेशा से अपने मुखर आवाज के लिए जाने जाने वाले दिल्ली सरकार के सांस्कृतिक मंत्री कपिल मिश्रा ने इस मातृ शक्ति जागरण कार्यक्रम के आयोजन के लिए विश्व मांगल्य सभा को बधाई दी और कहा कि यमुना किनारे हजारों की संख्या में आई मातृशकित्यों ने आतंकवादियीं की करारा चांटा मारा है । उन्होंने बताया कि बेहद के नाम पर। भले तुम बम फोड़ो मगर हम सनातन शेरनियां नहीं डरने वाले । अपने नापाक इरादों के साथ तुम भले कट्टरपंथी पढ़े लिखे दहशतगर्द पैदा करो मगर हम राष्ट्र धर्म निभायेंगे और भारत माता के सपूत शिवाजी ही पैदा करेंगे । ये संख्या बता रही है कि ये देश राष्ट्रभक्ति में डूबी मातृशक्ति का है जो सनातन शेरनी है । लेकिन

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ समाज सेविका और पंजाब केसरी अखबार की चीफ किरण चोपड़ा ने कहा कि – मातृशक्ती शक्ती स्वरूपा है। इंसान मंगल पर जरूर जा रहा है मगर परिवार के जीवन में मंगल तभी आएगी जब मातृशक्ति के चेहरे पर मुस्कान होगा वो तनाव रहित होंगी । सेवा बस्ती में स्थित लोगो के चेहरे पर खुशहाली होगी । संगठन की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कारों वाली मां बेटी का निर्माण करने का काम विश्वमांगल्य सभा कर रही है जो राष्ट्र निर्माण का काम है ।

कार्यक्रम में विश्व मांगल्य सभा के मार्गदर्शक एवं वरिष्ठ प्रचारक प्रशांत हड़तालकर , विश्व मांगल्या सभा की अखिल भारतीय सह संगठनमंत्री पूजा देशमुख और अन्य गण्य मान्य लोगों की उपस्थिति रही ।

बिहार विधानसभा में मुस्लिमों की घटती संख्या (11 = 8%), जबकि आबादी

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पटना । वर्ष 2010* के चुनावों में मुस्लिम विधायक बिहार विधानसभा में 19 थे। यानी मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 7.81% था।

JDU के 7 + राजद के 6 + कांग्रेस के 3 + LJP के 2 और एक भाजपा के सबा जफ़र –
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वर्ष 2015 में मुस्लिम विधायक 24 हो गए यानी 9.87% जिसमें राजद के 12 थे, कांग्रेस के 6, JDU के 5 और CPI (ML) का 1 था

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उसके बाद 2020 में मुस्लिम विधायक फिर से 19 रह गए यानी 7.81%।

इसमें से राजद के 8 थे, ओवैसी के 5, कांग्रेस के 4 और एक-एक बसपा और CPI(ML) का –

——————————————गौर करने वाली बात है कि 2025 में नीतीश की JDU ने 11 मुस्लिम खड़े किये लेकिन सभी हार गए –

इस बार 2025 में मुस्लिमों की संख्या घटकर सबसे कम मात्र 11 रह गई है – विपक्ष और सत्ताधारी NDA दोनों ने पहले के मुकाबले कम मुस्लिम खड़े किये थे – ओवैसी ने 23 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 5 जीते है

यानी जीते हुए 11 में से आधे ओवैसी के है वह भी सीमांचल से जहां मुस्लिम आबादी 40% से ज्यादा है –

JDU के 1 विधायक बना है (मोहम्मद जमा खान) और
3 राजद के है और 2 मुस्लिम विधायक कांग्रेस के हैं – शेष 5 ओवैसी के। कुल 11 मुस्लिम विधायक।

ओवैसी के अलावा राजद ने सबसे ज्यादा 18 मुस्लिम खड़े किए
और कांग्रेस ने 10
JDU ने 4
LJP ने 1
और CPI(M), Bahujan Samaj Party, और प्रशांत किशोर की Jan Suraaj Party ने सबसे ज्यादा 25 मुस्लिम खड़े किए लेकिन कोई नहीं जीत पाया –

राजद के 2 उम्मीदवार मात्र 8 से 9 हजार वोट से जीते है और ओवैसी के सीमांचल में भी वोट बंट सकते थे –
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*मुस्लिम वोट अपनी अहमियत खो रहे हैं* –
मुस्लिम प्रभाव वाली सीट 2020 और 2025 में किस पार्टी ने कितनी जीती, वो समझने के लिए ये आंकड़े देखना जरूरी है –

*पार्टी (2020)/(2025)*
भाजपा। 13 /15
JDU 4 / 7
LJP 0 / 3
Congress। 6 / 4
RJD 6 / 2
AIMIM। 4 / 6

इससे पता चलता है कि कुछ *सेकुलर दलों में भी मुस्लिमों से मोह भंग हो रहा है* और मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें भी हिंदू जीत सकते हैं – लेकिन मुस्लिमों की अपना कोई नेतृत्व नहीं है जो उन्हें सही राह दिखा सके –

*मुस्लिम कौम की छवि* फिर आतंकवाद से जुड़ती दिखाई देती है तो किसी को एतराज नहीं होना चाहिए –

मुसलमानों के नाम पर *अल फ़लाह यूनिवर्सिटी* बनाने के लिए सब कुछ सुविधाएं ली, लेकिन परिणाम क्या दिया, मगर किसी मुस्लिम नेता ने दिल्ली धमाके की निंदा नहीं की है।

इसके उल्टे महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला बड़े फक्र से कह रहे थे कि कश्मीरी मुसलमान आतंक में शामिल नहीं मिलेगा और अगले दिन ही श्रीनगर के पुलिस स्टेशन में धमाका हो गया जिसमें 9 लोग मारे गए।

इधर *फर्जी गांधी परिवार* का चश्मो चिराग दिल्ली धमाके के बाद से गायब है – उसी ने धमकी दी थी कि देश को आग लगने जा रही है।

अब क्या धमाकों में अपना नाम शामिल होने के सबूत मिटाने के लिए गया हुआ है, क्या ऐसा भी हो सकता है –

*मुस्लिमों की कौम को स्वयं अपनी रणनीति बनानी होगी* जिसमें देश से जुड़ाव दिखाई दे –

भारत के 85% मुस्लिम *सुन्नी* है और मुसलमानों की Minority 15% की *शिया* कौम है।

लेकिन ज़ोहरान ममदानी के न्यू यॉर्क के मेयर बनने पर सभी खुश थे जबकि वह एक *खोजा समुदाय* से आते हैं।

खोजा समुदाय को भारत और अन्य कई देशों के मुसलमान मुस्लिम ही नहीं मानते और वैसे भी वह एक शिया मुस्लिम है।

यह तथ्य भारत के मुस्लिमों को पता है भी कि नहीं, कह नहीं सकते पर दुनिया भर के मुस्लमान खुश हो रहे हैं !!!!

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