हिन्दी में विज्ञान लेखक प्रो. महेश चरण सिन्हा

images-2-3.jpeg

अक्षय

लखनऊ । हिन्दी में सर्वप्रथम विज्ञान संबंधी लेख एवं पुस्तकें लिखने वाले प्रो. महेश चरण सिन्हा का जन्म छह नवम्बर, 1882 को लखनऊ (उ.प्र.) में हुआ था। लखनऊ के बाद उन्होंने प्रयाग से बी.ए. और कानून की शिक्षा पाई।

एक बार जापान के सिन्धी सेठ आसूमल द्वारा जापान में तकनीकी शिक्षा पाने वाले भारतीय छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति का समाचार छपा। लखनऊ के नगराध्यक्ष बाबू गंगाप्रसाद वर्मा एडवोकेट का पत्र तथा कुछ धन लेकर महेश जी बर्मा, मलाया, चीन आदि घूमते हुए जापान जा पहुंचे; पर वहां पहुंचने पर उस सेठ ने पढ़ाई की पूरी राशि देने से मना कर दिया।

तब तक महेश जी की जेब खाली हो चुकी थी। अतः कई दुकानों तथा उद्योगों में काम करते हुए उन्होंने टोकियो वि.वि. से टेक्नो केमिस्ट की डिग्री ली। अब आगे पढ़ने के लिए वे अमरीका जाना चाहते थे। उनसे प्रभावित होकर जापान के एक मंत्री ने अपने राजदूत को पत्र लिखा कि जब तक इनके आवास का उचित प्रबन्ध न हो, तब तक इन्हें राजदूतावास में रहने दिया जाए।

महेश जी जिस जहाज से अमरीका गये, उसका कप्तान सभी धर्मों के बारे में इनकी जानकारी से बहुत प्रभावित था। उसने वहां इनके कई व्याख्यान कराये। इससे इन्हें धन तथा प्रतिष्ठा दोनों ही प्राप्त हुईं। एम.एस-सी. करते समय उन्होंने कुछ व्यापारियों द्वारा कॉफी पाउडर में की जा रही मिलावट का सप्रमाण भंडाफोड़ किया। इससे ये प्रसिद्ध हो गये और बड़े-बड़े पत्रों में इनके लेख छपने लगे। इन्होंने भारत के हिन्दी व उर्दू पत्रों में भी कई लेख लिखे।

महेश जी की खूब पढ़ने तथा घूमने की इच्छा थी; पर इसके लिए पैसा चाहिए था। अतः बर्तन साफ करने से लेकर बाग में फल तोड़ने जैसे काम इन्होंने किये। अमरीका से ये इंग्लैंड चले गये। वहां स्वतंत्रता संबंधी इनके विचार पढ़ और सुनकर इनके पीछे जासूस लग गयेे। अतः फ्रांस, जर्मनी, इटली, मिस्र आदि की शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन करते हुए ये मुंबई आ गये। उन्होंने हर जगह वहां रह रहे भारतीयों से स्वाधीनता के लिए सक्रिय होने को कहा।

भारत आकर वे लोकमान्य तिलक और गरम दल वालों के साथ कांग्रेस में काम करने लगे। उच्च शिक्षा के कारण इन्हें कई अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव मिले; पर इन्होंने अंग्रेजों की नौकरी स्वीकार नहीं की। वे चाहते थे कि भारत में भी विदेशों जैसे अच्छे विद्यालय और स्वदेशी उद्योग हों, जिनमें युवक अपनी भाषा में तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

इसके लिए इन्होंने अनेक उद्योगपतियों से संपर्क किया; पर निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद वे गुरुकुल कांगड़ी में पढ़ाने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने अयोध्या में अपना एक उद्योग लगाया; पर वहां प्लेग फैलने से इनकी दो पुत्रियों की मृत्यु हो गयी। कर्मचारी भी भाग खड़े हुए और उद्योग बन्द हो गया।

अब लखनऊ आकर महेश जी ने हिन्दी में विज्ञान संबंधी पुस्तकें लिखनी प्रारम्भ कीं। उनकी सफलता से हिन्दी में विज्ञान लेखन की धारा चल पड़ी। इसके साथ ही उन्होंने अनेक सफल वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों तथा देशभक्तों की जीवनियां भी लिखीं। वे नौ वर्ष तक लगातार नगर पार्षद भी रहे।

महेश जी ने हिन्दी, अंग्रेजी तथा उर्दू के कई पत्रों का सम्पादन किया। वे लाला हरदयाल, वीर सावरकर, भाई परमानंद जैसे स्वाधीनता सेनानियों के पत्रों में नियमित लिखते थे। लखनऊ की अनेक सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय रहते हुए 23 जून, 1940 को उनका देहांत हुआ।

उत्तराखंड हिमालय की गोद में छिपे सबसे सेंसेटिव इलाके

Screenshot-2025-11-15-at-11.24.07-PM.png

डॉ. हरीश चन्द्र

देहरादून । चारधाम की धरती और प्रकृति का स्वर्ग देवभूमि उत्तराखंड अब प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बनता जा रहा है. यहां पहाड़ियां लगातार दरक रही हैं. नदियां बेकाबू हो रही हैं और आसमान से बादल मौत बनकर बरस रहे हैं. उत्तरकाशी के धराली में बादल फटने से जो तबाही मची, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमालय की गोद में बसे ये क्षेत्र अब सुरक्षित रह गए हैं? IIT रुड़की और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) जैसी संस्थाओं की रिसर्च बताती है कि उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं की फ्रीक्‍वेंसी लगातार बढ़ रही है. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि राज्य का एक बड़ा हिस्सा अब डिजास्‍टर प्रोन क्षेत्र में बदल चुका है. उत्तरकाशी की तो यहां जमीन लगातार दरक रही है. यहां भूस्खलन, बादल फटना जैसी घटनाएं दिख रही हैं. साल 2012, 2013, 2019 और 2024 और अब धराली में बादल फटना जैसी बड़ी घटनाएं यहां पर हुई हैं, जिनमें जानमाल का बड़ा नुकसान हुआ है. बड़ा खतरा यमुनोत्री और गंगोत्री के रूट पर है, जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. हालांकि उत्तरकाशी में अब तक ग्लेशियर झील विस्फोट की कोई घटना रिकॉर्ड नहीं हुई है, लेकिन उत्तरकाशी जैसे ऊंचाई वाले हिमालयी जिलों में GLOF का भौगोलिक खतरा हमेशा बना रहता है, क्योंकि यहां कई छोटे-बड़े ग्लेशियर मौजूद हैं, जिनके नीचे और आसपास अक्सर ग्लेशियल लेक (हिमनदीय झीलें) बन जाती हैं.

IIT रुड़की, वाडिया इंस्‍टीट्यूट और NDMA जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों में यह जरूर चेताया गया है कि उत्तरकाशी समेत उत्तराखंड के कई ऊंचाई वाले क्षेत्र GLOF के लिए संभावित हॉटस्पॉट हैं. यहां हर साल 10 से अधिक ऐसे इलाके चिन्हित किए जाते हैं जहां जमीन अस्थिर होती जा रही है. बादल फटने जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं. चमोली का, जहां लगातार पहाड़ धंस रहे हैं. उदाहरण जोशीमठ के रूप में सबके सामने है, जहां घर धंस रहे हैं. ये जगह भी फ्लैश फ्लड और भूस्खलन के लिहाज से बेहद सेंसेटिव है. फरवरी 2021 में रैणी गांव में ग्लेशियर टूटने से NTPC परियोजना को भारी नुकसान हुआ. 7 फरवरी 2021 को रैणी गांव में एक ग्लेशियर टूटने से यहां भीषण तबाही हुई थी. इस बड़ी आपदा में 200 से ज्‍यादा लोग मारे गए और कई तो लापता हुए. यहां सबसे बड़ी चिंता जोशीमठ भू-धंसाव है, जिसको लेकर सरकार भी चिंतित है. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और धारचूला क्षेत्र की बात करें तो यह राज्य के सबसे संवेदनशील और आपदा प्रवण यानि आपाद के लिहाज से सेंसेटिव इलाकों में गिना जाता है. यह सीमांत जगहें भले ही अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सामरिक महत्व के लिए जाने जाते हों, लेकिन हर मानसून सीजन में यहां की जिंदगी मौत के साये में आ जाती है. यहां खतरा तीन तरफ से होता है. भूस्खलन, बादल फटना और सड़क कटाव.

पिथौरागढ़ जिले में खासकर धारचूला तहसील और उसके आसपास के गांवों में हर साल भूस्खलन, बादल फटना और नदी द्वारा सड़क या गांवों के कटाव जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं. इन आपदाओं का सबसे बड़ा कारण है यहां की नाजुक भौगोलिक बनावट और बढ़ते इंसानी हस्तक्षेप. अगस्त 2023 में धारचूला क्षेत्र में बादल फटने की घटना हुई थी, जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई थी. इस घटना में दर्जनों मकान और सड़कें बह गई थीं और पूरे इलाके में कनेक्टिविटी ठप हो गई थी. यह घटना साफ बताती है कि पहाड़ों में मौसम की जरा सी करवट कितनी जानलेवा साबित हो सकती है. दरअसल, धारचूला और पिथौरागढ़ भारत-नेपाल और चीन की सीमा से सटे हुए क्षेत्र हैं. यहां बुनियादी ढांचे की स्थिति बेहद कमजोर है. अच्‍छा, यह इलाका न केवल भौगोलिक दृष्टि से अस्थिर है, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है. धारचूला से लिपुलेख पास होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा जाती है और यहां सेना की गतिविधियां भी बनी रहती हैं. ऐसे में किसी भी आपदा का असर सामरिक गतिविध‍ियों पर भी पड़ सकता है. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले का नाम लेते ही श्रद्धा और विनाश दोनों बातें साथ उभरती हैं. यहां एक ओर केदारनाथ धाम जैसी दिव्य आस्था का केंद्र है तो दूसरी ओर 2013 की भीषण त्रासदी की कड़वी यादें भी. मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों के संगम पर बसा यह जिला उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील आपदा क्षेत्रों में से एक है. रुद्रप्रयाग का भौगोलिक स्थान इसे विशेष रूप से संवेदनशील बनाता है.

यहां दोनों नदियों का जलस्तर बारिश के दौरान अचानक बढ़ जाता है. बरसात के दिनों में नदी अपना रुख बदल लेती है, जिससे तटवर्ती इलाके बर्बाद हो जाते हैं. भूस्खलन और चट्टानों का खिसकना भी यहां सबसे बड़ी चुनौती होती है. पहाड़ों की ढलानों पर बसे गांव और सड़कें हर साल लैंडस्लाइड की चपेट में आ जाते हैं. यहां सबसे भयानक अनुभव 2013 में सामने आया, जब केदारनाथ में अचानक आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने हजारों लोगों की जान ले ली. मंदाकिनी नदी का रौद्र रूप ऐसा था कि पूरा केदार घाटी मलबे में तब्दील हो गई थी. IIT रुड़की, IMD और NDMA की रिपोर्टों में मंदाकिनी-अलकनंदा संगम क्षेत्र को अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है. इसका सीधा मतलब है कि यहां प्राकृतिक आपदाओं की संभावना अत्यधिक है और थोड़ी सी बारिश या हल्का भूकंप भी बड़ी तबाही ला सकता है. यहां हर साल लाखों श्रद्धालु यात्रा पर आते हैं. टिहरी और पौड़ी गढ़वाल जिले, कभी स्थिर और मजबूत माने जाने वाले ये पहाड़ी इलाके अब भूस्खलन, जमीन दरकने और दरारों के लिए जाने जाते हैं. खासतौर पर टिहरी झील के आसपास के गांवों में हर मानसून के साथ डर में रहते हैं. इन दोनों जिलों में बीते दो दशकों में तेज गति से सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण और जल विद्युत परियोजनाएं शुरू हुईं. विशेषज्ञों के अनुसार, ये पहाड़ों की भू-संरचना को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं. टिहरी झील के किनारे बसे डोबरा, प्रतापनगर, गजा, घनसाली जैसे गांव हर साल बारिश में खतरे की जद में आ जाते हैं. कई गांवों में पुराने भूस्खलन जोन अब दोबारा एक्टिव हो रहे हैं, जिससे नई दरारें पड़ने लगी हैं. पौड़ी के कोटद्वार, सतपुली, द्वारीखाल जैसे इलाकों में सड़कें बार-बार धंस रही हैं.

कई रिपोर्टों के मुताबिक, टिहरी और पौड़ी क्षेत्र में जमीन की बाइंडिंग क्षमता अब पहले जैसी नहीं रही. यहां मिट्टी की पकड़ कमजोर हो चुकी है. भूगर्भीय हलचलें अब यहां आम होती जा रही हैं. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है. नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है.

नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है. हिमालय की तलहटी में बसे कुमाऊं क्षेत्र खासकर नैनीताल को भारत का लेक डिस्ट्रिक्ट कहते हैं, क्‍योंकि यहां की हरियाली, झीलें और शांत वातावरण देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाते हैं. लेकिन इस सुंदरता के नीचे छिपा है एक गहरा और चुपचाप बढ़ता संकट. यह हर साल भूस्खलन, जल रिसाव और जमीन धंसने के रूप में बारिश के साथ बाहर आता है.

नैनीताल शहर और आसपास का कुमाऊं क्षेत्र खासकर भीमताल, भवाली, रामगढ़ और मुक्तेश्वर अब हर मानसून सीजन में भूस्खलन और सड़क धंसने की घटनाओं का गवाह बन रहा है. बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों से भारी मलबा और पत्थर शहर की ओर बहते हैं, जिससे न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, बल्कि जान का भी खतरा बना रहता है. यहां बड़े आपदा खतरे में नैनी झील का जलस्तर असंतुलित हो रहा है. बारिश के समय यह अत्यधिक भर जाती है और गर्मी में सूखने लगती है. जल निकासी के पुराने सिस्टम जाम हो चुके हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी के अनुसार, उत्तराखंड भूकंपीय जोन-5 में आता है, जो भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है.

(लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं)

जनजातीय गौरव दिवस : राष्ट्रीय अस्मिता और कृतज्ञता ज्ञापन का महापर्व

81b64a21-97ad-4b91-b15c-cca02203d1c3_Janjatiya-Gaurav-Divas-thumb_202311151032319683_H@@IGHT_300_W@@IDTH_450.jpg


~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रांची । धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती भारत के सांस्कृतिक क्षितिज में अपनी एक नई आभा के साथ समाज जीवन में दृष्टिगोचर हुई। एक ऐसे योद्धा की जयंती जिसने अपने जीवन के मात्र 25 वर्षों में अपनी यशस्वी काया गढ़ ली। एक ओर जन-जन के उद्धारक बने तो दूसरी ओर क्रूर ब्रिटिश सरकार और ईसाई मिशनरियों के काल के रूप में प्रकट हो गए। उलगुलान की क्रान्ति के पर्याय भारत के स्वत्व के शीर्ष जनजातीय समाज के एक ऐसे महानायक जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए होम हो गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 नवम्बर 2021 को बिरसा मुंडा की जयंती पर भोपाल के जम्बूरी मैदान से —

“जोहार मध्यप्रदेश! राम राम सेवा जोहार! मोर सगा जनजाति बहिन भाई ला स्वागत जोहार करता हूँ। हुं तमारो सुवागत करूं। तमुम् सम किकम छो? माल्थन आप सबान सी मिलिन,बड़ी खुशी हुई रयली ह। आप सबान थन, फिर सी राम राम । ”
इस सम्बोधन के साथ भारत के विकास में जनजातीय समाज की समृद्ध विरासत के स्मरण लिए ‘जनजातीय गौरव दिवस’ का शुभारम्भ किया था।

जनजातीय गौरव यह किसका प्रतीक है ? क्या है इसके पीछे की भावना ? यदि हम इसका अवलोकन करें तो ध्यान में आता है कि — राष्ट्र के स्वाभिमान का, जन-जन के अभिमान का स्मरण करना। वो स्मरण यानी अपने उन महान पूर्वजों का पुण्य स्मरण करना जिन्होंने अभावों और षड्यंत्रों की त्रासदी के बाद भी अपने ‘स्व’ से समझौता नहीं किया। अपितु राष्ट्र रक्षा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण संवर्धन में अपनी आहुति दे दी। प्राणोत्सर्ग कर दिया। षड्यंत्रों के दुर्दम्य पाशों को काटकर स्वतंत्रता की देवी का तिलक किया। वनांचलों में रहना स्वीकार किया किंतु राष्ट्र रक्षा और मूल्यों के संरक्षण संवर्धन से पीछे नहीं हटे। जनजातीय गौरव दिवस के पीछे की संकल्पना यही है कि उन राष्ट्रभक्तों – राष्ट्रदूतों का पुण्य स्मरण किया जाए। उनका अनुकरण किया जाए जिन्हें स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास में दर्ज ही नहीं किया गया। दर्ज भी किया गया तो फौरी तौर पर इतना ही नहीं बल्कि इसके विपरीत इन महान जनजातीय वीर-वीरांगनाओं का चरित्र चित्रण भी गरिमापूर्ण नहीं किया गया। पाठ्यक्रम तो दूर की कौड़ी रहा । वर्षों तक सत्ता के केन्द्र में रही कांग्रेस सरकार ने उनका नामोल्लेख करना तक उचित नहीं समझा। जनजातीय समाज से आने वाले महापुरुषों और उनसे जुड़े स्थानों के संरक्षण सम्वर्द्धन पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया। उनके नाम पर संस्थानों/ स्थानों के नामकरण तो कांग्रेस सरकार में कोरी कल्पना ही सिद्ध हुए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में ‘जनजातीय गौरव दिवस ‘ की शुरुआत एक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय निर्णय है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों को जनजातीय समाज के गौरव की पुनर्स्थापना के महत् संकल्प के रूप में उभरा है। इसके पीछे भारतीय इतिहास में जनजातीय समाज के नायक/ नायिकाओं के योगदान। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उनके अभूतपूर्व त्याग, बलिदान सहित राष्ट्र के विकास में जनजातीय समाज के सांस्कृतिक अवदान को रेखांकित करने का भाव समाया हुआ है। उनके नवीन विकास की आशा- आकांक्षाओं को साकार करने की दूरदृष्टि दिखती है। जनजातीय समाज में पृथकता की भावना जगाने वालों के विरुद्ध सत्याग्रह – उलगुलान क्रान्ति का संदेश झलकता है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के बारे में प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं —

“जनजातीय गौरव और संघर्ष के प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा की गाथा हर देशवासी को प्रेरणा से भर देती है। झारखंड का कोना-कोना ऐसे ही महान विभूतियों, उनके हौसलों और अनथक प्रयासों से जुड़ा है। अगर हम आजादी के आंदोलन को देखें तो देश का ऐसा कोई कोना नहीं था, जहां जनजातीय योद्धाओं ने मोर्चा नहीं लिया हो । ”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने जनजातीय समाज के लिए कई सारी परिवर्तनकारी योजनाएं चलाई। इतिहास के पुनर्लेखन, पाठ्यक्रमों में जनजातीय समाज के अवदान, संस्थानों/ स्थानों के नामकरण किए। वीरांगना रानी दुर्गावती की 500 वीं जयंती पर देश भर में कार्यक्रम किए। असम के जोरहाट में पूर्वोत्तर के शिवाजी कहे जाने वाले लाचित बोरफूकन की 125 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं इसका अनावरण किया। उनकी स्मृति में डाक टिकट और चांदी के सिक्के जारी किए। भोपाल में रानी कमलापति स्टेशन का नामकरण, टंट्या मामा स्टेशन, टंट्या मामा चौक इंदौर, वीरांगना रानी दुर्गावती एयरपोर्ट जबलपुर, राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय छिन्दवाड़ा — ये मध्यप्रदेश में नए नामकरणों के उदाहरण हैं। राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान की स्मृति में केन्द्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से जबलपुर में करोड़ों रूपये की लागत से ‘संग्रहालय सह स्मारक’ निर्माणाधीन है।

इसी दिशा में जनजातीय समाज को राजनीति की मुख्य धारा में लाने और उनके समुचित प्रतिनिधित्व की दिशा में भी महत्वपूर्ण काम हुए। केन्द्रीय कैबिनेट से लेकर बीजेपी शासित राज्यों में जनजातीय समाज का प्रतिनिधित्व इसकी बानगी प्रस्तुत करता है। इतना ही नहीं वर्ष 2022 में भारतीय राजनीति का स्वर्णिम अध्याय लिखा गया। जब जनजातीय समाज से आने वाली बेटी द्रौपदी मुर्मु को बीजेपी ने राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया और वो ऐतिहासिक मतों से विजयी हुईं। देश की 15 वीं राष्ट्रपति बनीं। यह अपने आप में ऐतिहासिक था। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कांग्रेस ने उनके खिलाफ यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया था। यानी स्पष्ट रूप से जनजातीय गौरव केवर महापुरुषों के पुण्यस्मरण ही नहीं बल्कि उनकी प्रेरणा से सकारात्मकता का सर्जन करना है। नई दृष्टि के साथ नवाचार करते हुए जनजातीय समाज को सशक्त समर्थ बनाने का संकल्प प्रतीत होता है। यह उसी दूरदृष्टि एवं कृतज्ञता के साथ समानता – एकत्व का शंखनाद है जो सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है ‌।

आगे चलकर दूसरे जनजातीय गौरव दिवस यानी 15 नवंबर 2022 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली झारखंड के उलिहातू गांव का दौरा किया।वहां के मर्म को विश्व के समक्ष रखा तो 2023 में जनजातीय गौरव दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने झारखंड के रांची में भगवान बिरसा मुंडा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का दौरा किया।तत्पश्चात भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू गांव का दौरा किया। ऐसा करने वाले वो देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। भारत के सांस्कृतिक उन्मेष और जनजातीय समाज के लोकमङ्गल – भाजपा के मूल वैचारिक ढांचे का हमेशा अंग रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लेकर वर्तमान की मोदी सरकार इस दिशा में सतत् अग्रसर दिखाई देती है। सन् 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में ही जनजातीय समाज के उत्थान एवं कल्याण के लिए अलग से ‘जनजातीय मन्त्रालय ‘ का गठन किया गया था।

वास्तव में ये कार्य बहुत पहले हो जाने चाहिए थे लेकिन यह सब संभव नहीं हो पाए। हमारे संविधान में जनजातियों के विकास के लिए पर्याप्त प्रबंध तो संविधान निर्माताओं ने अवश्य किए । किन्तु तत्कालीन सत्ताधीशों ने जनजातीय समाज की दशा एवं दिशा सुधारने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखलाई । उसका परिणाम यह हुआ कि – वनांचलों में निवास करने वाला जनजातीय समाज आज भी विकास की राहें ताकने के साथ साथ ‘ईसाई मिशनरियों’ के निशाने पर बना हुआ है। जहाँ सेवा- सहायता और लालच देकर उनके कन्वर्जन का खुला खेल जा रहा है‌। कन्वर्जन की त्रासदी जनजातीय अस्मिता के लिए ही नहीं अपितु राष्ट्र के लिए गंभीर समस्या है। यह राष्ट्र के विखंडन का सुनियोजित षड्यंत्र है।

इसी दिशा में कन्वर्टेड लोगों द्वारा जनजातीय समाज के आरक्षण पर डाका डालने के विरुद्ध देश भर में जनजातीय समाज ने डी-लिस्टिंग अभियान चलाए। ताकि जो लोग हिन्दू धर्म से दूसरे मजहबों में कन्वर्ट हो गए हैं। उन्हें जनजातीय समाज से बाहर किया जाए। क्योंकि संविधान में अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण केवल हिंदुओं के लिए प्रदान किया गया है। यद्यपि जनजातीय समाज में कन्वर्जन के खिलाफ समय के साथ जागृति तो अवश्य आई है। किन्तु आज भी कन्वर्जन के विरुद्ध कोई ठोस रणनीति नहीं दिखाई देती है। फिर भी विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में धरती आबा बिरसा की संतानें इस कुचक्र को अंततोगत्वा अवश्य तोड़ेंगी।

जनजातीय गौरव दिवस प्रत्येक वर्ष अपने नए रंग में दिखाई देता है। भारत के सांस्कृतिक स्वरुप को निर्मित करने में अभिन्न योगदान देने वाले जनजातीय समाज की समृध्द विरासत, ऐतिहासिक योगदान , समरसता, समानता, एकता, समन्वय – साहचर्य के बहुआयामी रंगों – बहुलतावादी संस्कृति से सम्पूर्ण विश्व को एक विशिष्ट पहचान के साथ परिचित करवाने का यह राष्ट्रीय उत्सव बनेगा।यह महापर्व जन-जन के मन में जनजातियों के गौरवपूर्ण इतिहास, सांस्कृतिक विरासत , त्याग, बलिदान और प्रकृति के साथ एकात्मकता के मूल्यों से रुबरु करवाने में मील का पत्थर सिद्ध होने वाला होगा। वस्तुत : भारत एवं भारतीयता के प्राणों में रचा- बसा हुआ जनजातीय समाज – हमारे सांस्कृतिक इतिहास का वह संवाहक है। जो सनातन काल से ही अरण्य को अपना आश्रय बनाकर वहां सृजन के गीत संगीत गाता चला आ रहा है। पद्मश्री से सम्मानित डॉ. कपिल तिवारी का मानना है कि — “वे प्रकृति के साथ इतने अभिन्न हैं कि उनका और प्रकृति का होना एक चीज है। इसीलिए उनकी धार्मिकता का आधार भी प्रकृति ने बनाया है। और उनकी कला का आधार धार्मिक है। और उनकी बौद्धिक संस्कृति का आधार भी मूल रूप से प्रकृति ही है। जो सम्पूर्ण जीवन का आधार है ‌। प्रकृति का अर्थ उनके लिए पूरा होना है — जिस जगत में वे निवास करते हैं। ”

प्रकृति के मध्य प्रकृति की पूजा करने वाला जनजातीय वनवासी समाज विविध क्षेत्रों में अपनी भिन्न भिन्न पहचानों, विविधताओं, कला संगीत ,साहचर्य परम्पराओं के साथ प्रकृति के प्रति असंदिग्ध श्रद्धा एवं समर्पण के साथ सनातन काल से ही अग्रसर रहा आया है। प्रकृति के क्रीड़ाङ्गन में जीवन के सूत्रों को तलाशने वाला जनजातीय समाज भारतीय हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति का वह अभिन्न अंग है जिसके बिना सनातन हिन्दू संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती है।जनजातीय वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति — परम्पराएं , मान्यताएं , कला, वेशभूषा,रहन सहन, खान- पान, उपासना पद्धतियां, विवाह प्रणाली, नृत्य, गीत, गायन, वाद्ययंत्र अपने आप में अनूठी एवं अनुपमेय हैं। सम्पूर्ण भारत के वनांचलों के विविध स्थानों में निवासरत जनजातीय समाज ने सुखमय जीवन के कई सूत्र अपनी जीवन पध्दतियों से दिए हैं‌। इन सूत्रों से वर्तमान कालखण्ड की पर्यावरणीय समस्याएं स्वत: समाप्त हो सकती हैं। जो प्राप्त है – वही पर्याप्त है – इस अवधारणा के साथ जनजातीय समाज प्रकृति के साथ अभिन्न, अद्वैत एवं एकात्म है। प्रकृति की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने का अदम्य साहस उन्हें ‘प्रकृति का दूत’ बनाता है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विकास काल से लेकर वर्तमान काल खण्ड तक अरण्य संस्कृति के उपासक जनजातीय वनवासी समाज ने हमारे समक्ष आदर्श जीवन के दिशासूत्र सौंपे हैं।

भगवान श्री राम के वनगमन के समय जिस आत्मीयता श्रद्धा एवं भक्ति के भाव के साथ जनजातीय वनवासी समाज ने उन्हें अपना माना। वह कालखण्ड ‘सांस्कृतिक शिखर’ की महागाथा गा रहा है। भीलनी माता शबरी, निषाद राज गुह, नौका पार लगाने वाला केवट,। कोल – किरात सहित अरण्य में निवासरत अन्यान्य बन्धुजनों ने श्री राम लक्ष्मण व माता जानकी के साथ कुछ यूं घुल मिल गए कि सबकुछ राममय हो गया। वहीं वो महाभारत के कालखंड में कौरवों एवं पाण्डवों की सेनाओं में शामिल योद्धा महारथी भी थे। भारतीय समाज को अलग- अलग ढंग से परिभाषित करने व श्रेष्ठ एवं हेय के रूप में दिखलाने का चलन तो आक्रमण काल और अंग्रेजी विभाजन के समय से प्रारम्भ हुआ है। जो स्वातंत्र्योत्तर भारत में कम्युनिस्ट मानसिकता- भारत विरोधी मानसिकता से लिखे गए इतिहास के कारण और गहराता चला गया। यदि हम महाभारत काल की करें तो उस कालखंड में भी वर्तमान में जनजातीय वनवासी समाज के सम्बोधन से प्रयुक्त किए जाने वाले रणबांकुरे विभिन्न राज्यों के राजा या उच्च पदों पर आसीन थे। अभिप्राय यह कि – भारतीय संस्कृति के कालखंड में विभिन्न जातियां अपनी वर्ण परम्परा के साथ ही महत्वपूर्ण होती थीं। जो ‘भिन्नता के साथ अभिन्न’ होती थीं।

आधुनिक सन्दर्भ में यानी कि सातवीं सदी से भारत में हुए विभिन्न आक्रमणों जिसमें शक, हूण, मंगोल, तुर्क , मुगलों की इस्लामिक तलवारें भारत को रक्तरंजित कर रही थीं। इन क्रूर बर्बर आतंकी लुटेरों का प्रतिकार करने में चाणक्य शिष्य प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त मौर्य , शिवाजी के मावळा सैनिक, राणा प्रताप के साथ – भील सरदार राणा पूंजा, रानी दुर्गावती, रानी कमलापति सहित अनेकानेक नाम स्मृतियों में आ जाते हैं। इतना ही नहीं वर्तमान में जनजातीय वनवासी समाज कहे जाने वाले समाज के पूर्वज भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में राज करते थे। वे वहां के शासक थे। वहां उन्होंने इस्लामिक और अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध तब तक लड़ाई लड़ी जब तक कि उनके शरीर में प्राण रहे। किन्तु राष्ट्र की अस्मिता को अपने जीते जी खोने नहीं दिया। वहीं अंग्रेजी शासन और ईसाईयत के विरुद्ध भी आर पार की लड़ाई में जनजातीय नायक / नायिकाओं के नाम अव्वल हैं । उन्होंने अपनी स्वातंत्र्य चेतना , प्रकृति की उपासना तथा भारतीयता के मूल्यों से अनुप्राणित अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव अग्रणी भूमिका निभाई। जनजातीय समाज के वीर वीरांगनाओं ने ब्रिटिश सरकार के संरक्षण में ईसाई मिशनरियों के द्वारा चलाए जाने वाले ‘कन्वर्जन ‘ के कुचक्र – षड्यंत्र के विरुद्ध भी लड़ाई लड़ी । लोभ ,छल , भय या दण्ड से डराकर मिशनरियों ने भले ही उनका कन्वर्जन कराया । लेकिन सत्य का भान होते ही जनजातीय समाज पुनः अपने मूल की ओर लौट आए। साथ ही अपने ‘ मूल ‘ को पुनर्स्थापित किया।

धर्मरक्षक भगवान बिरसा मुंडा का समूचा जीवन चरित्र उसी संघर्ष , त्याग, बलिदान से भरा हुआ है । जनजातीय- वनवासी समाज ने अपने स्वत्व, स्वाभिमान एवं सनातनी हिन्दू जीवन मूल्यों के आलोक में सदा से ही अपनी रौशनी देखी है। फिर कन्वर्जन के – अस्थि- पंजर, षड्यंत्रकारी मुखौटों को नोंचकर दूर फेंक दिया। जनजातीय गौरव दिवस जनजातीय वनवासी समाज के असंख्य – ज्ञात अज्ञात वीर पूर्वजों – वीरांगना माताओं के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की कृतज्ञता के ज्ञापन का महापर्व है। यह महापर्व उनके प्रति कृतज्ञता है जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बगैर राष्ट्र व समाज के लिए समय समय पर इस्लामिक एवं ईसाईयत के अंग्रेजी आक्रान्ताओ के विरुद्ध मोर्चा खोला। स्वातंत्र्य समर में अपने रक्त से त्याग और बलिदान की गाथा लिखी। अपना सर्वस्व न्यौछावर कर राष्ट्र को समाज को दिशाबोध दे गए। मूल्यों और राष्ट्र संस्कृति के लिए जीना-मरना सिखा गए।

स्वातन्त्र्य यज्ञ में कुछ वीर / वीरांगनाओं के नाम जो सहज ही स्मृतियों में आते हैं उनमें — टंट्या मामा, लाचित बोरफूकन अहोम, सिद्धू ,कान्हू, जात्रा उरांव, बोरोबेरा के बंगम मांझी, तिलका मांझी, खाज्या नायक, भीमा नायक ,भाऊसिंह राजनेगी, शहीद वीर नारायण सिंह, श्री अल्लूरी सीता राम राजू ,रानी गौंडिल्यू, रानी दुर्गावती, झलकारी बाई, कालीबाई, फूलो और झानो, राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह , सोना , चकरा विशोई, राघो जी ,गोंड वीर कुमरा भीमू,जोरिया भगत , रूपा नायक दास,पझसी राजा, क्रांतिवीर-तीरथ सिंह, शंभुधन फूंगलो, कृष्णम् बन्धु, भागो जो नाईक, गोंड रानी तिलकावती, वीर नारायण, लक्ष्मण नायक सहित तत्कालीन ब्रिटिश शासन के समय मध्यप्रांत एवं बरार व खोनोमा युद्ध के बलिदानियों की एक लम्बी सूची रोम रोम में ऊर्जा का संचार करती है। इतना ही नहीं बलिदानी सुरेन्द्र साय का संघर्ष भी प्रेरणा बनकर उपस्थित है।इसी प्रकार सन् 1842 में बुंदेला क्रांति में जनजातीय योद्धाओं के विशाल समूह ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और वीरगति को प्राप्त हुए थे। साथ ही जबलपुर के क्षेत्र में गंगाधर गोंड सहित बाला साहेब देश पाण्डे ,राजा अर्जुन सिंह गोंड व रिपुदमन सिंह सहित अनेक रणबांकुरों ने स्वातंत्र्य यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतन्त्रता की अलख जगाई थी।

जनजातीय समाज ने भारत की लोकसंस्कृति लोक परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी अनेकानेक अभावों,दु:खों को सहकर भी बचाए रखा। जो प्राप्त है वही पर्याप्त है इस अवधारणा को उन्होंने जीवन का मन्त्र बनाया। फिर समृद्ध संस्कृति की थाती हमें सौंप दी है। अनेकानेक विविधताओं से परिपूर्ण जनजातीय समाज ने — भारत के सांस्कृतिक स्वरुप को वैभवशाली बनाने में अतुलनीय योगदान दिया है। कला, साहित्य, संगीत,नाटक , नृत्य ,गीत, गायन, वाद्ययंत्र, रहन सहन, वस्त्राभूषण, प्रकृति पूजा, धार्मिक आचरण, कलाकृतियां, शिल्पविधान, आश्रय स्थल, स्थापत्यकला जैसी बहुलतावादी – बहुरंगी विशिष्टताओं से राष्ट्र के सांस्कृतिक प्रतिमान गढ़े हैं। आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य हो चुका है कि ‘ जनजातीय गौरव दिवस’ के महापर्व में रंगकर राष्ट्र भारत की आबादी के 8.6 प्रतिशत हिस्से के जनजातीय समाज को उसकी अपनी मौलिक संस्कृति के साथ- साथ गतिमान बनाए रखने के लिए कृत संकल्पित हो। उनके सामाजिक आर्थिक – राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए पर्याप्त प्रबंध किए जाएं। ताकि भारतीय संस्कृति के उन संवाहकों के जीवन में खुशहाली आ सके । जो निश्छल भाव से – प्रकृति के साथ अद्वैत – एकात्म होकर राष्ट्र की समृद्धि के लिए अपने जीवन को आहुत करते चले आ रहे हैं। जनजातीय गौरव दिवस मनाने का अभिप्राय यही है कि भारत की चारों दिशाओं में जहां भी जनजातीय समाज निवासरत है। उनके सर्वांगीण विकास के लिए काम किए जाएं। हमारे आसपास जितनी भी जहां भी गौरव गाथाएं हैं उन्हें संजोया जाए। जनजातीय नायकों से जुड़े स्थलों का जीर्णोद्धार हो।उनका पुण्य स्मरण कराया जाए। जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाए। उनके सुख-दु:ख का समाज सहभागी बने। कन्वर्जन की त्रासदी का समूलनाश करने के लिए समाज और शासन – प्रशासन संकल्प लें। ताकि जनजातीय अस्मिता यानी राष्ट्र की अस्मिता पर कोई संकट न मंडरा सके…

बिहार चुनाव 2025: जनादेश का संदेश

Election-scaled.jpg.avif

15 नवंबर 2025 को घोषित बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। 243 सीटों वाली इस सभा में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने करिश्माई प्रदर्शन करते हुए 202 सीटें हासिल कर लीं, जो एक ऐतिहासिक बहुमत है। 89 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भी मजबूत आधार दिखाया। दूसरी ओर, विपक्षी इंडिया गठबंधन (महागठबंधन) को मात्र 35 सीटें ही मिल सकीं, जो उनकी अपेक्षाओं से कहीं कम है। यह जीत न केवल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पांचवीं सत्ता प्राप्ति का प्रतीक है, बल्कि बिहार की जनता का एक स्पष्ट संदेश भी है: नकारात्मक राजनीति को अब स्थान नहीं। इस परिणाम ने साबित कर दिया कि बिहार की जनता अब विकास, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित है, न कि पुरानी जातिगत समीकरणों पर।

चुनाव प्रचार के दौरान इंडिया गठबंधन, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस प्रमुख थे, ने अपनी रणनीति को मुख्य रूप से नकारात्मक प्रचार पर केंद्रित रखा। विपक्ष ने एनडीए सरकार पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विकास की कमी के आरोप लगाते हुए एक आक्रामक अभियान चलाया। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी ने ‘नौकरी दो’ जैसे नारों को तो प्रमुखता दी, लेकिन इसे जातिगत तुष्टिकरण और एनडीए के खिलाफ व्यक्तिगत हमलों से जोड़ दिया। कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार के खिलाफ बिहार को ‘उपेक्षित’ बताते हुए भावनात्मक अपील की। लेकिन बिहार की जनता ने इस नकारात्मकता को ठुकरा दिया। मतदान प्रतिशत 66.91% रहा, जो 1951 के बाद का सर्वोच्च है, जो दर्शाता है कि मतदाता सक्रिय थे और उन्होंने सकारात्मक विजन को प्राथमिकता दी।  यह परिणाम विपक्ष की रणनीति की विफलता का प्रमाण है, जहां नकारात्मकता ने विकास की आकांक्षाओं को दबाने का प्रयास किया, लेकिन जनता ने इसे नकारते हुए एनडीए को पूर्ण विश्वास प्रदान किया।

इस जीत के साथ एनडीए पर एक भारी जिम्मेदारी आ गई है। बिहार की जनता ने अपना पूरा विश्वास इस गठबंधन पर जताया है, और अब अगले पांच वर्ष बिहार के हैं। यह संदेश स्पष्ट है: राज्य को विकास और सशक्तिकरण की दिशा में ले जाना एनडीए की प्राथमिकता होनी चाहिए। सबसे पहले, उद्योग स्थापना पर फोकस जरूरी है। बिहार, जो कभी औद्योगिक पिछड़ापन का शिकार रहा, अब निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नीतियां बना सकता है। नीतीश कुमार सरकार ने पहले ही ‘बिहार बिजनेस कनेक्ट’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन अब बड़े पैमाने पर औद्योगिक पार्कों का विकास, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) का विस्तार और एमएसएमई को प्रोत्साहन देना होगा। उदाहरणस्वरूप, पटना, बेतिया, पूर्णिया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में फूड प्रोसेसिंग और आईटी हब स्थापित हो सकते हैं, जो लाखों नौकरियां पैदा करेंगे।

रोजगार सृजन बिहार की सबसे बड़ी चुनौती है। 2025 के चुनाव में युवाओं ने इसे प्रमुख मुद्दा बनाया, और एनडीए को अब वादों को अमल में लाना होगा। सरकार ने पहले 10 लाख नौकरियों का वादा किया था; अब इसे वास्तविकता बनाना होगा। कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना, आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों का आधुनिकीकरण, तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा देना आवश्यक है। इसके अलावा, कृषि-आधारित रोजगार को मजबूत करने के लिए सिंचाई परियोजनाएं जैसे गंगा नहर विस्तार और जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जाए। बिहार की 70% आबादी कृषि पर निर्भर है, इसलिए फसल विविधीकरण और कोल्ड चेन सुविधाएं रोजगार के नए द्वार खोलेंगी।

सुरक्षा का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लंबे समय से बिहार ‘जंगलराज’ की छाया में रहा, जहां अपराध, माफिया राज और सामाजिक अस्थिरता ने विकास को बाधित किया। एनडीए को वादा करना होगा कि अगले पांच वर्षों में जंगलराज का पूर्ण खात्मा हो। पुलिस सुधार, सीसीटीवी नेटवर्क का विस्तार, महिला सुरक्षा कानूनों का कड़ाई से अमल और साइबर क्राइम से निपटने के लिए विशेष यूनिट्स गठित करना जरूरी है। नीतीश कुमार की पिछली सरकारों ने अपराध दर में कमी लाई है, लेकिन अब इसे शून्य के करीब ले जाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत स्तर पर सुरक्षा समितियां और युवाओं को पुलिस भर्ती में प्राथमिकता देकर बिहार को सुरक्षित राज्य बनाया जा सकता है। यह न केवल निवेशकों का विश्वास बढ़ाएगा, बल्कि महिलाओं और अल्पसंख्यकों को सशक्त भी करेगा।

एनडीए की इस जीत ने बिहार को सशक्तिकरण की नई दिशा दी है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर, बिहार को पूर्वी भारत का विकास इंजन बनाया जा सकता है। सात निश्चय योजना को अपग्रेड करते हुए डिजिटल शिक्षा और टेलीमेडिसिन को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाना होगा। पर्यटन को बढ़ावा देकर, बोधगया, चंपारण और नालंदा जैसे स्थलों को वैश्विक हब बनाना भी सशक्तिकरण का हिस्सा है। कुल मिलाकर, एनडीए को यह साबित करना होगा कि बिहार अब ‘बीमारू’ राज्यों की श्रेणी से बाहर हो गया है, और यह जनता के विश्वास का इनाम है।

दूसरी ओर, इस चुनाव परिणाम ने आरजेडी और कांग्रेस को एक कड़ा सबक दिया है। दशकों पुराना जाति-आधारित फॉर्मूला और तुष्टिकरण की राजनीति अब बिहार में काम नहीं आएगी। आरजेडी, जो यादव और मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर रही, को मात्र 22 सीटें मिलीं, जो उनके दशक के सबसे खराब प्रदर्शन का संकेत है। कांग्रेस की स्थिति और भी दयनीय रही, मात्र 5 सीटें। विपक्ष ने जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दों को हवा दी, लेकिन जनता ने इसे नकार दिया। बिहार का युवा वर्ग अब जाति से ऊपर उठकर विकास चाहता है। यह परिणाम दर्शाता है कि तुष्टिकरण की पुरानी किताबें अब अप्रासंगिक हो गई हैं। विपक्ष को अब अपनी रणनीति बदलनी होगी – सकारात्मक वैकल्पिक एजेंडा पर फोकस करना होगा, न कि केवल आलोचना पर।

यह जीत दोनों गठबंधनों के लिए अगले पांच वर्षों की परीक्षा है। एनडीए को न केवल डिलीवर करना होगा, बल्कि पारदर्शिता बनाए रखनी होगी। विकास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, और जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। वहीं, विपक्ष को अपनी नकारात्मकता भुलाकर बिहार के विकास में सहयोगी बनना होगा। जहां सरकार से गलती हो, वहां राह दिखानी होगी – जैसे पर्यावरण संरक्षण या ग्रामीण विकास में सुझाव देना। यदि पब्लिक के साथ कोई ठगी हो, जैसे भूमि अधिग्रहण में अनियमितताएं, तो उसे एक्सपोज करना विपक्ष का कर्तव्य है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है, जहां विपक्ष सरकार का आईना बने, न कि बाधा। प्रशांत किशोर की जन सुराज जैसी नई ताकतों का उदय भी दर्शाता है कि बिहार की राजनीति बहुलवादी हो रही है, और सभी को इसमें स्थान मिलना चाहिए।

बिहार चुनाव 2025 के परिणाम एक नई सुबह का आगमन हैं। एनडीए की प्रचंड जीत ने न केवल प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी की लोकप्रियता को पुनः स्थापित किया, बल्कि राज्य को विकास की रेल पर चढ़ाने का अवसर प्रदान किया।  लेकिन यह जिम्मेदारी का बोझ भी है। यदि एनडीए उद्योग, रोजगार, सुरक्षा और सशक्तिकरण पर खरा उतरा, तो बिहार भारत का सबसे तेजी से बढ़ता राज्य बनेगा। विपक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा, ताकि जाति की बेड़ियां टूटें और विकास का चक्रव्यूह बने। बिहार की 13 करोड़ जनता का सपना अब साकार होने का समय है – एक समृद्ध, सुरक्षित और सशक्त बिहार। यह चुनाव न केवल राजनीतिक था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सूचक भी। अगले पांच वर्ष बिहार के हैं, और यही जनादेश की सच्ची व्याख्या है।

scroll to top