ग्रामीण रोजगार की नई राह

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दिल्ली । भारत का ग्रामीण क्षेत्र देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति का आधार रहा है। गांवों में रहने वाली बड़ी आबादी आज भी कृषि, मजदूरी और छोटे स्तर के रोजगार पर निर्भर है। ऐसे में ग्रामीण परिवारों को रोजगार सुरक्षा देना केवल गरीबी कम करने का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम लागू किया गया था। इस कानून ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार का अधिकार देकर देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू किया।
मनरेगा का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिनों का अकुशल मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराना था। यह योजना केवल रोजगार देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने जल संरक्षण, ग्रामीण सड़क, तालाब निर्माण, भूमि विकास और सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ सरकार ने ग्रामीण विकास की बदलती जरूरतों को देखते हुए रोजगार योजना को अधिक व्यापक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
इसी क्रम में विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम यानी वीबी-जी राम जी अधिनियम को ग्रामीण विकास के नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य रोजगार को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर गांवों में स्थायी संपत्ति निर्माण, आजीविका विकास और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना है।
मनरेगा का महत्व
मनरेगा भारतीय ग्रामीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें रोजगार को अधिकार के रूप में देखा गया। ग्रामीण परिवार काम की मांग कर सकते थे और सरकार की जिम्मेदारी थी कि निर्धारित समय के भीतर काम उपलब्ध कराया जाए। यदि काम नहीं मिलता था तो बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान भी किया गया था।
इस योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सुरक्षा प्रदान की। सूखा, बाढ़, महामारी और आर्थिक संकट जैसे कठिन समय में मनरेगा ने लाखों परिवारों को आय का सहारा दिया। कोरोना महामारी के दौरान जब शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर गांव लौटे, तब ग्रामीण रोजगार योजना ने उनके लिए जीवनयापन का महत्वपूर्ण साधन उपलब्ध कराया।
मनरेगा के माध्यम से गांवों में कई प्रकार की स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण हुआ। तालाबों की खुदाई, जल संरक्षण कार्य, वृक्षारोपण, खेत सुधार, ग्रामीण मार्ग और सामुदायिक सुविधाओं के निर्माण से गांवों की आधारभूत संरचना मजबूत हुई।
नया बदलाव
विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन का उद्देश्य ग्रामीण रोजगार को नए दृष्टिकोण से देखना है। इसमें रोजगार को गांवों की उत्पादक क्षमता बढ़ाने और विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इस नए ढांचे में रोजगार के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को अधिक आय सुरक्षा देना है। साथ ही यह भी प्रयास किया गया है कि रोजगार कार्य ऐसे हों जिनसे गांवों को लंबे समय तक लाभ मिले।
अब केवल मजदूरी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है, बल्कि ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है जो जल सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।
विकास से जुड़ा रोजगार
नए ग्रामीण रोजगार मॉडल में रोजगार और विकास को एक साथ जोड़ा गया है। इसके तहत जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था, ग्रामीण संपर्क मार्ग, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से बचाव जैसे क्षेत्रों में कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा।
गांवों में बनाए गए तालाब, छोटे बांध, वर्षा जल संचयन संरचनाएं और सिंचाई से जुड़ी परिसंपत्तियां किसानों की उत्पादकता बढ़ा सकती हैं। इससे ग्रामीण मजदूरों को रोजगार मिलने के साथ-साथ कृषि व्यवस्था भी मजबूत होगी। इस सोच का उद्देश्य यह है कि ग्रामीण मजदूर केवल मजदूरी प्राप्त करने वाले व्यक्ति न रहें, बल्कि गांव की आर्थिक प्रगति में भागीदार बनें।
महिलाओं की भागीदारी
ग्रामीण रोजगार योजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव महिलाओं के सशक्तिकरण के रूप में सामने आया है। मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया। कानून में महिलाओं के लिए न्यूनतम भागीदारी का प्रावधान रखा गया था, लेकिन कई राज्यों में महिलाओं की भागीदारी इससे भी अधिक रही है।
गांव के पास ही रोजगार मिलने से महिलाओं को घर और काम के बीच संतुलन बनाने में सहायता मिली। पहले ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के लिए दूर जाना पड़ता था, जिससे समय, सुरक्षा और सामाजिक कठिनाइयां सामने आती थीं। स्थानीय स्तर पर काम मिलने से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी।
महिलाओं की मजदूरी सीधे बैंक खाते में पहुंचने की व्यवस्था ने भी उनकी वित्तीय भागीदारी को मजबूत किया। इससे परिवार के निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ी और स्वयं सहायता समूहों जैसी गतिविधियों से जुड़ने के अवसर भी बढ़े।
नए ग्रामीण आजीविका मॉडल में महिलाओं को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर स्वरोजगार, कौशल विकास और छोटे उद्यमों से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तकनीक और पारदर्शिता
नए रोजगार ढांचे में तकनीक की भूमिका को बढ़ाया गया है। सरकार का उद्देश्य है कि डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से कार्यों में पारदर्शिता लाई जाए और भ्रष्टाचार कम किया जाए।
इसके लिए मोबाइल आधारित उपस्थिति, भू-स्थान आधारित निगरानी, ऑनलाइन कार्य विवरण और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। इससे यह पता लगाना आसान होता है कि कार्य कहां हो रहा है, कितने लोग जुड़े हैं और मजदूरी भुगतान की स्थिति क्या है।
मजदूरी को सीधे बैंक खातों में भेजने से बिचौलियों की भूमिका कम हुई है। इससे श्रमिकों को उनका भुगतान सीधे मिलने में सहायता मिलती है।
हालांकि तकनीक के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या, डिजिटल जानकारी की कमी और तकनीकी त्रुटियां कई बार गरीब मजदूरों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं। इसलिए डिजिटल व्यवस्था के साथ सहायता केंद्र और मानवीय सहयोग भी जरूरी है।
पंचायतों की भूमिका
ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायतों की भूमिका को और मजबूत किया गया है। नए मॉडल में गांव की जरूरतों के अनुसार योजनाएं तैयार करने पर जोर है। ग्राम सभा स्थानीय समस्याओं की पहचान करती है और पंचायत विकास योजनाएं बनाती है। इससे सड़क, पानी, स्वच्छता, रोजगार और अन्य आवश्यकताओं को स्थानीय स्तर पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
यदि पंचायतें तकनीकी और प्रशासनिक रूप से मजबूत होती हैं तो ग्रामीण विकास योजनाएं अधिक प्रभावी हो सकती हैं। इससे गांवों में स्थानीय नेतृत्व का विकास भी होता है।
कृषि और रोजगार का संतुलन
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व सबसे अधिक है। इसलिए रोजगार योजनाओं और कृषि कार्यों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। खेती के मुख्य समय जैसे बुवाई और कटाई के दौरान किसानों को पर्याप्त मजदूर मिल सकें, इसके लिए रोजगार कार्यों को कृषि जरूरतों के अनुसार संचालित करने का प्रयास किया जाता है।
इससे किसानों और मजदूरों दोनों के हितों को ध्यान में रखने की कोशिश की जाती है। मजदूरों को पूरे वर्ष रोजगार सुरक्षा मिले और किसानों को कृषि कार्यों के समय श्रमिक उपलब्ध हों, यही संतुलन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है।
वित्तीय व्यवस्था और चुनौतियां
नई व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारियों को लेकर भी चर्चा हुई है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच खर्च का अनुपात तय किया गया है, जबकि विशेष राज्यों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है।
कुछ राज्यों ने चिंता जताई है कि अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी से ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों को लागू करने में कठिनाई हो सकती है। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले राज्यों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाना चुनौती हो सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि राज्यों की भागीदारी बढ़ने से योजनाओं की जिम्मेदारी और प्रभावशीलता बढ़ेगी।
डिजिटल अंतर की चुनौती
ग्रामीण भारत में डिजिटल सुविधाओं का विस्तार तेजी से हुआ है, लेकिन अभी भी कई क्षेत्रों में डिजिटल अंतर मौजूद है। सभी ग्रामीण नागरिकों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और तकनीकी ज्ञान उपलब्ध नहीं है।
यदि पूरी व्यवस्था केवल ऑनलाइन हो जाती है तो बुजुर्ग, गरीब और कम शिक्षित लोग पीछे छूट सकते हैं। इसलिए कॉमन सर्विस सेंटर जैसे सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। तकनीक का उद्देश्य लोगों को सुविधा देना होना चाहिए, न कि उनके अधिकारों तक पहुंच में बाधा बनना।
भविष्य की दिशा
विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण भारत के विकास मॉडल में एक बड़ा परिवर्तन माना जा सकता है। यह रोजगार को सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास और स्थायी परिसंपत्ति निर्माण से जोड़ने का प्रयास करता है।
यदि इसे पर्याप्त बजट, मजबूत पंचायत व्यवस्था, पारदर्शी निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ लागू किया जाता है तो यह गांवों की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। ग्रामीण भारत की असली शक्ति उसके लोग, प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय क्षमता हैं। रोजगार योजनाओं का सही उद्देश्य तभी पूरा होगा जब गांव के लोगों को केवल मजदूरी नहीं बल्कि विकास प्रक्रिया में भागीदारी मिले।

मनरेगा से विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन तक का सफर ग्रामीण रोजगार नीति में बदलाव को दर्शाता है। पुरानी व्यवस्था ने ग्रामीण गरीबों को रोजगार सुरक्षा दी, जबकि नया मॉडल रोजगार को विकास, उत्पादकता और आत्मनिर्भर गांवों से जोड़ने का प्रयास करता है।

इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि रोजगार की गारंटी, मजदूरी भुगतान, महिलाओं की भागीदारी और गरीब परिवारों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाए रखा जाए।
भारत के विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में गांवों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। यदि ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पारदर्शी, समावेशी और प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो यह ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का मजबूत आधार बन सकती है।

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