The flame of ‘Sarang’ has been lit: The journey of breaking free from the shadow of NSD and building its own identity

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Ashish Kumar ‘Anshu’

For a long time, Delhi’s Bhagwan Das Road has been a sacred pilgrimage site for performing and visual arts. The National School of Drama (NSD) stands there like a huge banyan tree—many institutions that came under its shade either dried up or could not create their own separate identity. But now, 85 kilometers away in Rohtak, the Dada Lakhmi Chand State University of Performing and Visual Arts (DLC SUPVA) is slowly strengthening its roots. This is not just a university; it is a new story of democratizing art in Haryana.

The bitter truth of the past and the need for a new beginning

This university came into existence in 2014 with the mantra ‘Art is the highest worship.’ But in its early years, poor administration, shortage of teachers, and lack of proper equipment kept it trapped. Students in the Film and Television department had to wait for years—many batches were affected, and there were protests. The period from 2016 to 2024 was full of disappointment and struggle for the students. But this is exactly the point from where real change begins. When an institution is at its lowest, strong leadership can lift it up.

Amit Arya: The journey from a journalist to Vice-Chancellor

The air changed in 2025 when Dr. Amit Arya became the sixth Vice-Chancellor. As an experienced journalist and media strategist, he understood that art is not just taught—it is lived, celebrated, and spread. In April 2025, the Haryana government gave SUPVA the responsibility of mentoring other state universities to start filmmaking courses. Plans for film cities in Panchkula and Gurugram began. These steps show that art is no longer limited to the campus—it is being turned into a statewide movement.

The rebirth of ‘Sarang’: The magic of partnership with NSD

The most interesting change came when Dr. Arya revived the long-closed ‘Sarang’ festival. He linked it with the 25th edition of NSD’s Bharat Rang Mahotsav (Bharangam). The four-day festival held in February 2026 brought SUPVA onto the national stage. Chief Minister Nayab Saini sent good wishes and expressed his desire to attend future events-this is no small thing.

The festival included Assam’s Sattriya dance, Delhi’s Parth Hazarika group’s ‘Soul of Sattriya,’ Sudhir Rekhri’s band, and Sri Lanka’s experimental play ‘Colombo Hathe Thorana’-everything was there. But the most memorable was the closing: Padma Shri Malini Awasthi delighted the stage with Awadhi songs and said, “Coming here feels like I have reached NSD. The Vice-Chancellor has planted the seed of art and is also nurturing it.” Meghna Malik could not stop herself from dancing with Malini Awasthi. This was the magic of Malini Awasthi’s voice. In that magic, not just Meghna but the entire Gen Z group sitting in the audience was swaying. Shrivardhan Trivedi called theatre ‘complete knowledge.’ Fifty students from SUPVA presented performances like Kathak, Bharatanatyam, Bhangra, and Qawwali.

Why is this change important?

SUPVA is no longer becoming just an alternative to NSD—instead, it is becoming a complementary and democratic option. Outside Delhi-NCR, learning art is now becoming easier and more accessible for the youth of Haryana. Dr. Arya’s roadmap is clear: regular big events, mentorship, infrastructure like film cities, and student-focused improvements. This is not just the rise of one university-it is an effort to remove regional imbalance. While NSD has remained Delhi-centered, SUPVA is connecting with the soil of Haryana and giving space to talent from both rural and urban areas. In the words of Malini Awasthi, the natural acting in the songs of rural women is the real art—SUPVA is giving institutional form to this naturalness.

The road ahead: A bridge of hope

The journey of SUPVA has just begun. Challenges remain—shortage of faculty, funding, continuity. But if the leadership is strong, students are enthusiastic, and the government is supportive, this will not just be a banyan tree-it can become a new sacred fig tree under whose shade hundreds of artists can flourish.

A new morning for art is dawning in Haryana. The flame of ‘Sarang’ has been lit-now it must not be allowed to go out. This is the time for all of us to become part of this change, because art is not just entertainment-it is a medium to connect society, understand it, and make it better. SUPVA is the first strong step in that direction.

आओ, पहले अपनी विरासत पढ़ो, फिर अपना समय लिखो

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डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी

दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का ‘समवेत’ सभागार कल कुछ यूँ लगा, मानो हिंदी पत्रकारिता की पूरी एक शताब्दी एक साथ कुर्सियों पर नहीं, स्मृतियों पर विराजमान हो गई हो। वहाँ पहुँचने का बहाना पुस्तक लोकार्पण था, पर भीतर-भीतर जाना मानो अपने ही पेशे की जड़ों तक लौटना था।

मंच पर सजी तीन खंडों की एक ही किताब ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ को देखकर भरोसा हुआ कि काग़ज़ अब भी इतिहास से हारा नहीं है, उसे सिर्फ़ सही हाथों की तलाश रहती है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ये तीनों खंड, पत्रकारिता की पहली सदी, तिलक युग और गांधी युग, एक-एक युग के धूप-छाँह को ऐसे समेटे खड़े थे, जैसे बुज़ुर्ग दादा अपने पोतों के सामने अपनी लंबी यात्रा का मौन ब्यौरा हों। पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर जी का नाम लेते ही भारतीय पत्रकारिता का एक अनुशासित, शोध-प्रिय चेहरा आँखों के सामने आ जाता है; इस ग्रंथि को देखकर लगा कि अपने समय में कोई व्यक्ति अगर सचमुच ‘इतिहास’ लिखता है तो वह केवल तारीख़ें नहीं जोड़ता, वह समय की अंतरात्मा दर्ज करता है।

मुख्य अतिथि की भूमिका में उपस्थित न होकर भी हरिवंश जी की आवाज़ उस दिन काग़ज़ के ज़रिए सभागार में उपस्थित थी। संदेश पढ़ा जा रहा था, पर लग रहा था मानो राज्यसभा के उपसभापति खुद अपनी अनुभव-संपन्न दृष्टि से पत्रकारिता के इस भगीरथ प्रयत्न को आशीर्वाद दे रहे हों। उन्होंने इसे पत्रकारिता-जगत का अमूल्य कार्य कहा और मीडिया संसार की कृतज्ञता की बात की तो लगा कि पहली बार ‘इतिहास’ शब्द पर पत्रकारिता ने मुस्कराकर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय जी ने जब कहा कि पत्रकारिता अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती की पहचान कर समाधान का मार्ग खोजती है, तो वाक्य सिर्फ़ विचार नहीं रहा, किसी पहाड़ी झरने की तरह कानों में देर तक बजता रहा। उन्होंने 1946 से 2026 तक के आठ दशकों को संविधान और संविधान-पालन की चेतना का कालखंड बताया, तो लगा जैसे देश का राजनीतिक इतिहास अचानक हमारे समाचार कक्षों में रखी पुरानी फ़ाइलों से निकलकर सामने खड़ा हो गया हो।

वहीं पुस्तक लेखक श्री विजय दत्त श्रीधर जी ने अपने वक्तव्य में संपादकों की ऐतिहासिक भूमिका को जिस ठहराव और आत्मीयता से याद किया, वह आज के ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के कोलाहल में लगभग असंभव-सा लगता है। व्यापार, पुरातत्व और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में पत्रकारिता के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने समाचार पत्रों को समाज के सिर्फ़ दर्पण नहीं, बल्कि संयमी व्याख्याकार के रूप में रेखांकित किया। उनके शब्दों में एक पुराना समाचार कक्ष कहीं दूर से झाँकता दिखता था—टेलीप्रिंटर की खट-खट, संपादक की लाल पेंसिल, और बीच में सच की खोज में झुकी हुई आँखें।

नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल जी ने मार्के की बात कही। इतिहास इतिवृत्त-संग्रह से बनता है और यह कि हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके इस कथन ने क्षणभर को कार्यक्रम को वर्तमान से उठाकर उन छापाख़ानों की ओर पहुँचा दिया, जहाँ देवनागरी के अक्षर पहली बार ख़बर बनकर जगे होंगे। लगा, जैसे भाषा और पत्रकारिता दो अलग नदियाँ नहीं, एक ही धारा के दो मोड़ हों—एकमें शब्द का संस्कार, दूसरे में समय का साक्ष्य।

वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र जी ने जब कहा कि राम बहादुर राय जी का पचपन पृष्ठों का पुरोवाक्य ही इस ग्रंथ की गहनता का अहसास करा देता है, तो इस कथन में साहित्यिक रस भी था और विद्वत्तापूर्ण भरोसा भी। वहीं अनंत विजय जी ने इसे स्वाधीनता-पूर्व शब्दों की शक्ति और राष्ट्रवाद के उभार को समझने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक बताते हुए विश्वविद्यालयों तक पहुँचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, तो एक अनकहा प्रश्न हवा में तैरने लगा, क्या हमारे पत्रकारिता-विभागों की अलमारियाँ इस तरह के गंभीर अध्यवसाय के लिए पर्याप्त जगह निकाल पाएँगी?

प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ल जी ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक भटके हुए लोगों और भटकती पत्रकारिता—दोनों को सही दिशा देगी। उनके इस वाक्य में आज की मीडिया-बहसों की कड़वाहट भी थी और किसी सजग संपादक का ईमानदार सपना भी। लगा, जैसे उन्होंने एक ही वाक्य में चैनलों के शोर, पोर्टलों की जल्दबाज़ी और सोशल मीडिया की चंचल निसंगता को कटघरे में खड़ा कर दिया हो।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रो. कृपाशंकर चौबे जी ने पूरे संयम के साथ, किसी अनुभवी नाविक की तरह, विमर्श की इस नाव को एक विचार से दूसरे विचार की तरफ़ मोड़ा। उन्होंने पुस्तक की बारीकियों से परिचित कराते समय कहीं भी अतिशयोक्ति का सहारा नहीं लिया, बल्कि सूक्ष्मता से यह संकेत दिया कि पत्रकारिता का इतिहास लिखते समय लेखक को जितनी विद्वत्ता चाहिए, उतनी ही विनय भी। कलानिधि विभागाध्यक्ष और डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश चंद गौड़ ने जब कृति की वैचारिक गहराई पर विस्तार से चर्चा की, तो सभागार कुछ देर के लिए किसी शोध-परिसर में बदल गया, जहाँ हर चेहरा पाठक भी था, शोधार्थी भी और कहीं न कहीं स्वयं ‘समय का साक्षी’ भी।

इस पूरे आयोजन के बीच एक अनकहा भाव बार-बार मन में उठता रहा। दरअसल पत्रकारिता पर लिखी यह ‘समग्र’ कृति दरअसल भारतीय सार्वजनिक जीवन के चरित्र-पत्र की तरह है। यहाँ परंपरा का पथ भी है, मूल्यों की धूप भी और राष्ट्र-निर्माण के श्रमसिक्त पड़ाव भी। यह सिर्फ़ तिथियों, शीर्षकों और अख़बारों की सूची नहीं, बल्कि इस देश की उस सतत प्रयासशील चेतना का वृतांत है जिसने सच को कभी केवल ख़बर समझकर नहीं देखा, उसे समाज की आत्मा मानकर जिया।

इंदिरा गांधी कला केंद्र से बाहर निकलते समय शाम की रोशनी लॉन में हल्के पीले धब्बों की तरह फैली हुई थी। लगता था जैसे अब भी मंच पर रखी वे तीनों पुस्तकें चुपचाप नई पीढ़ी के पत्रकारों को बुला रही हों। आओ, पहले अपनी विरासत पढ़ो, फिर अपना समय लिखो। यह कृति भारतीय पत्रकारिता की परंपरा, उसके मूल्यों और राष्ट्र-निर्माण में उसकी भूमिका को समझने की एक सशक्त और प्रेरक पहल ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्ममंथन की दर्पण-पुस्तिका भी है।

अपनी बात

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प्रशांत पोळ

अहमदाबाद : कुछ सौं वर्ष पहले तक, भारत विश्व के सबसे संपन्न देशों में शामिल था। लगभग दसवीं शताब्दी तक तो हम विश्व के सबसे धनी, सबसे समृद्ध देश थे। मेरी दोनों पुस्तकों में, ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ और ‘खजाने की शोधयात्रा’ में, इसका विस्तृत वर्णन है। ग्यारहवीं- बारहवीं शताब्दी मे आए हुए इस्लामी आक्रांताओं ने हमें जी भर के लूटा। हमारे धर्म पर आक्रमण किया। रही सही कसर, यूरोपीय आक्रांताओं ने, विशेष कर अंग्रेजों ने, निकाल ली। इस्लामी आक्रांता आने तक विश्व की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा (33%) हमारे पास था। किंतु जब अंग्रेज गए, तब वह मात्र 2.4% रह गया था।

1947 में हमें स्वतंत्रता मिली। भले ही तीन टुकड़ों में बटकर, खंडित रूप से यह स्वातंत्र्य मिला हो, पर जितना भी मिला था, वह तो हमारा था। हम हमारी मर्जी से, हमारे सिद्धांतों से, हमारी ज्ञान परंपरा से नया भारत खड़ा कर सकते थे। इतिहास में हमने कर दिखाया था। हम वही रास्ता, युगानुकूल बनाकर, फिर से चुन सकते थे। वातावरण हमारे अनुकूल था। सैकड़ो वर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली थी। जनसामान्य हमारे नेतृत्व की हर बात मानने के लिए तैयार था। हिंदू – मुस्लिम प्रश्न भी नहीं था। कारण, यहां के मुसलमानों को मालूम था, कि भले ही अलग पाकिस्तान की मांग उन्होंने की हो, भले ही वह पाकिस्तान उन्हें मिला भी हो, तो भी अगर वह पाकिस्तान में नहीं जा सके हैं, तो उन्हें भारत की हर एक बात मानना होगी।

संक्षेप में, सब कुछ अपने देश के पक्ष में था।

किंतु नया भारत बनाने के प्रयास ही नहीं हुए। हम हमारे संविधान के प्राक्कथन (Preamble) में लिखा है, वैसे ‘इंडिया’ ही रहे..!

डेढ़ सौ वर्ष इस देश पर राज करने वाले अंग्रेजी राजसत्ता के ‘एक्सटेंशन’ के रूप में..!

उन दिनों जो भी भारत की बात करता था, वह दकियानूसी, प्रतिगामी, ऑर्थोडॉक्स कहलाता था। दुर्भाग्य से ‘इंडिया’ का यह प्रवास काफी लंबा चल गया। लगभग साठ – पैंसठ वर्ष..! इस दरमियान हमारे साथ स्वतंत्र हुए, या नए निर्मित हुए, राष्ट्र हम से आगे निकल गए। राख से उठकर खड़े हुए जापान, जर्मनी कहां से कहां पहुंच गए। दक्षिण कोरिया, इसराइल जैसे देशों ने भी उंची छलांग लगाई। हम कदमताल ही करते रहें।

ऐसा क्यों हुआ..?

कारण, हम अपने आप को भूल गए थे। हम अपने ‘स्व’ के बोध को भूल गए थे। हम में सागर लांघने की शक्ति हैं, इसका हमें विस्मरण हो गया था।

हम अपने ‘स्व’ को भूले, कारण हमें हमारा सत्य इतिहास बताया ही नहीं गया। हमारे आक्रांताओं का महिमामंडन किया गया। अयोध्या में सेना भेजकर, हम सबके आराध्य श्रीराम का मंदिर ध्वस्त करने वाले, आक्रांता बाबर के बारे में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिख रखा हैं –
Babur comes down as a Soldier of Fortune and Adventure, full of energy and restless spirit with a love for nature and beauty. There was a gentleness and tenderness about him and an appreciation of beauty and culture which mark him out as a man of wide interests.

_(बाबर, इतिहास में एक भाग्य, रोमांच और साहस से भरपूर योद्धा के रूप में सामने आता हैं, जिसे प्रकृति से और सुंदरता से प्रेम हैं। उसके (बाबर) के भीतर कोमलता और संवेदनशीलता भी हैं, तथा सौंदर्य और संस्कृति के प्रति गहरा प्रशंसात्मक लगाव भी। यह सब उसे व्यापक रुचियों वाला मनुष्य सिद्ध करते हैं।)_
(The Discovery of India / The Coming of the Mughals / Page 299 – 300)

मजेदार बात यह, की नेहरू जिस बाबर की तारीफों के पुल बांध रहे हैं, उसने हिंदुस्तान और हिंदुओं के बारे में क्या लिख रखा है..
Hindustan is a country of few charms. Its people have no good looks, no manners, no good horses, no good food or drink.
The people of Hindustan are entirely infidel. They worship idols and have no regard for the true faith. By the grace of Almighty God, we conquered Hindustan, so that Islam might be exalted in this land of infidels. I am proud that I have become a Ghazi today. We must spread the true faith and uphold the laws of Islam in Hindustan.

_(हिंदुस्तान एक ऐसा देश हैं, जहां बहुत कम आकर्षण हैं। यहां के लोग सुंदर नहीं हैं। उन्हें शिष्टाचार नहीं आता। यहां अच्छे घोड़े नहीं हैं और न हीं अच्छी खान-पान की वस्तुएं भी। हिंदुस्तान के लोग काफिर हैं। वह मूर्तियों की पूजा करते हैं, तथा उन्हें ‘सच्चे धर्म’ (इस्लाम) पर श्रद्धा नहीं हैं। अल्लाह की कृपा से हमने हिंदुस्तान को फतह किया हैं, ताकि इस ‘काफिरों की भूमि’ में, इस्लाम प्रतिष्ठित हो। हमें ‘सच्चे धर्म’ को फैलाना चाहिए तथा हिंदुस्तान में इस्लाम के कानून को लागू करना चाहिए।)_
(Baburnama – English translation by Annette Beveridge / Volume 1 / Edition 1922 / Page 360 – 363)

हमारा, आपका, हम सब का, इस देश का दुर्भाग्य था, कि नेहरू जी की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’, लगभग सारे देश में, विभिन्न कक्षाओं में पाठ्यपुस्तक के रूप में चलती थी। अस्सी के दशक के अंत में (1988 – 1989), इस पुस्तक पर, ‘भारत – एक खोज’ यह 53 एपिसोड का धारावाहिक, दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसे बाद में अनेकों बार रि-टेलिकास्ट किया गया।

यह सब विस्तार से लिखा हैं, वह इसलिए, कि इस देश में अपने ‘स्व’ के भाव को योजना पूर्वक दबाया गया। हमारी अपनी भाषा, हमारा अपना वेश (परिधान), हमारे अपने पुरखे, हमारे अपने रीति-रिवाज / परंपरा, हमारा अपना धर्म.. इन सब के बारे में हीन भावना बनी रहे, ऐसा ही वातावरण रहा। हमारे इतिहास के बारे में गर्व करना तो बहुत दूर की बात थी.!

भारत ने अपने ‘स्व’ बोध को जानने में अच्छा खासा विलंब कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन इस दिशा में वर्षों से लगे थे। उन्हें सफलता भी मिल रही थी। ‘हिंदुत्व’ यह प्रतिष्ठा का शब्द बन गया था। सामान्य नागरिक, कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों के ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ से तंग आ चुके थे।

इन सब की परिणीति 2014 के बदलाव में हुई।

2014 के लोकसभा चुनाव ने, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से जागृत हुए जनसामान्य को, राजनीतिक शक्ति से लैस किया। और फिर ‘इंडिया’, ‘भारत’ में बदलने लगा…

इसी बदलाव की ये कहानी हैं।

*यह पुस्तक स्वतंत्र भारत का इतिहास नहीं हैं। स्वतंत्रता के बाद, ‘इंडिया’ से ‘भारत’ में बदल रहे इस देश की यह कहानी हैं। अपनी ताकत, अपनी क्षमता, अपने ‘स्व’ की अनुभूति होने की यह यात्रा, इस पुस्तक में समेटने का प्रयास किया हैं।*

इसमें कुछ ऐसी भी कहानियां हैं, जिन्हें ‘इंडिया’ ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया था। ऐसी कहानियां, जिनकी जानकारी हमें होना चाहिए थी, किंतु वह आज तक हमारे सामने आ न सकी।

*मैं अत्यंत सौभाग्यशाली हूं, कि इस पुस्तक की प्रस्तावना के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक, डॉक्टर मोहन भागवत जी का आशीर्वचन मिल रहा हैं।* जबलपुर में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के समय, मैं उनसे मिला था, तब इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने का उनसे अनुरोध किया। उन्होंने इसे स्वीकार किया। मैं सरसंघचालक जी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूं।

सरसंघचालक जी ने हमेशा ही, आग्रहपूर्वक, ‘स्व’ के बोध के बारे में प्रतिपादन किया हैं। ‘अपनी स्वाक्षरी (हस्ताक्षर) से लेकर, तो स्वभाषा, स्वभूषा इन सब का हमें गर्व होना चाहिए’, यह आपके आग्रह के विषय रहते हैं।

अच्छी बात यह हैं, कि ‘इंडिया’ को ‘भारत’ में बदलने की अनुभूति हम कर रहे हैं। देश निश्चित रूप से ‘भारत’ बनने की ओर अग्रसर हैं। इसके सुखद परिणाम भी मिल रहे हैं। ऐसे वातावरण में यह पुस्तक आपके हृदय में स्थान बनाएगी ऐसी आशा हैं।

_(सोमवार, 16 फरवारी को, अहमदाबाद मे प्रकाशित होने जा रही ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश)_

बेटा का दर्द और बाप की पीड़ा

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आशुतोष कुमार सिंह
दिल्ली। 02 तारीख, फरवरी का महीना, सन 2026। रात्रि का समय। बेटे के पेट में दर्द होना शुरू हुआ। रात्रि के 9 बज रहे थे। दिल्ली के जाने माने होमियोपैथिक चिकित्सक डॉ. पंकज अग्रवाल की सलाह पर उसको दवा दी गई…थोड़ा राहत मिला। फिर दर्द। दर्द और दवा का दौर सुबह 3 फरवरी तक चलता रहा। सुबह दूसरी दवा शुरू की गई। बेटे को स्थानीय एलोपैथिक चिकित्सक के पास लेकर गए। उन्होंने तुरंत भर्ती करने को कहा। और कुछ टेस्ट लिखा। हमने तुरंत भर्ती तो नहीं किया लेकिन सारे टेस्ट कराए। इस बीच दर्द आराम हो चुका था। पेशाब ठीक से होने लगा था।

दोपहर बाद अल्ट्रासाउंड कराने ले गए। अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट में अपेंडिसाइटिस होने की आशंका जताई गई और सीटी कराने की सलाह दी गई। इस बीच हमारे मित्र बड़े भाई डॉ मनीष कुमार को मैंने अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट दिखाई, उन्होंने कहा कि आप मेरे नजफगढ़ स्थित सेंटर पर लेकर आइए। हम उनके यहां शाम को 8 बजे पहुंचे। उन्होंने एक दवा प्रिसक्राइव किया और सुबह तक ऑबजर्ब करने के लिए कहा। पूरी रात दर्द नहीं हुआ, पेशाब और स्टूल समयानुसार होता रहा। 4 तारीख की सुबह में हमने निर्णय लिया कि इसे किसी बड़े अस्पताल में एडमिट कराते हैं। अपने चिकित्स मित्रो की सलाह पर द्वारका में स्थित अग्रसेन अस्पताल में 12 बजे के आस-पास भर्ती कराया गया। एंटीबायोटिक्स, डीएनएस एवं एनस का डोज शुरू हुआ। इस बीच क्लिनिकली बेटा बिल्कुल ठीक रहा। रात भर उसे जब भी प्यास लगी पानी मांग कर पिता रहा। सुबह उसका स्टूल भी ठीक हुआ।

दोपहर बाद चुकी पिछले तीन दिनों से उसने दूध नहीं पिया था, सो दूध दिया गया। दूध पीने के बाद उसने पेट दर्द की शिकायत की, जो कि आधे घंटे में सेटल हो गई थी। फिर अग्रसेन अस्पताल प्रशासन ने कहा कि उनके यहां कोई शिशु रोग सर्जन नहीं है, अतः बेटे को ऐसे जगह एडमिट कराएं जहां पर सर्जन हो। उनकी सलाह एवं एक अन्य चिकित्सक मित्रो की सलाह पर बेटे को लेकर आकाश अस्पताल, द्वारका पहुंचे हम।

वहां पर कुछ देर इमरजेंसी में बेटे को रखा गया। इस दौरान एडमिशन प्रोसेस चलता रहा। मेरा हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी एसबीआई थी। उनके यहां से अप्रूवल आने में एक से दो घंटे लग गए। शाम को 8 बजे तक अप्रूवल आ चुका था। बेटे के लिए रूम नं. 607 बुक हो चुका था। रूम में पहुंचते ही एंटीबायोटिक का दौर शुरु हुआ। अभी तक क्लिनिकली बेटा ठीक था। अस्पताल की ओर से कहा गया था कि पानी नहीं पिलाना है, बच्चे को। बेटा पानी के लिए तड़प रहा था। मैंने जानने की कोशिश की कि क्या ऑपरेशन प्लान कर रहे हैं ये लोग या कंजरवेटिव ट्रिटमेंट ही चलेगा। कोई साफ-साफ कुछ नहीं बता रहा था। जब ऑपरेशन का कोई कंफरमेशन नहीं मिला मुझे तब लड़-झगड़कर मैंने बच्चे को पानी पिलाने के लिए डॉक्टरों पर दबाव बनाया। उन्होंने थोड़ा सा अलाऊ किया। सुबह 3 बजे तक ऑपरेशन करना है कि नहीं कंफर्म नहीं था। सर्जन का विजिट अभी तक नहीं हुआ था। सुबह 5 बजे मैंने फिर कड़ा रूख अख्तियार किया और यह जानने की कोशिश की कि यह बताया जाए कि ऑपरेशन होना है या नहीं। कहा गया कि ऑपरेशन होगा। लेकिन तब तक कोई भी ओटी बुक नहीं था।

सुबह 9:30 के आस-पास सर्जन डॉ. अंजनी आए। आते ही उन्होंने सर्जरी से संबंधित कंप्लिकेशंस को बताया। मतलब यह था कि वे सर्जरी करने के लिए मन बनाकर ही आए थे। तब तक हम भी इस बात से कंविंस हो चुके थे कि अगर सर्जरी ही करनी है तो जल्दी करें। 6 फरवरी तकरीबन 10:50 सुबह बच्चे को ओटी में ले जाया गया। दोपहर बाद 12:40 में हमें कॉल आया कि बच्चा ओटी से वापस आ गया है। हम भागते हुए पहुंचे। अथर्व ऑपरेशन के बाद लगभग होश में आ चुका था। पानी की रट लगा रहा था। लेकिन ऑपरेशन के बाद भी पानी नहीं देना था। उसके पेट में एक पाइप लगा दिया गया था, जिससे पेट के अंदर से कथित रूप से गंदगी बाहर निकल रही थी। अपेंडिक्स के ऊपर फैट का लेयर होने के कारण उसे नहीं निकाला जा सका था।
बच्चे को ऑबजर्वेशन के लिए PICU में शाम तक रखा गया। शाम को 8 बजे तक उसे रूम नंबर 607 में शिफ्ट कर दिया गया। इस बीच बच्चे का यूरीन सामान्य तरीके से पास होने लगा था। लेकिन पानी नहीं मिलने से बेटे की तड़प बढ़ती जा रही थी। जब वह कहता था कि, “पापा थोड़ा पानी दे दो, जल्दी पानी दे दो…वहां से पानी दे दो…उस बर्तन में पानी है…आप झूठ बोल रहे हैं…डॉक्टर झूठा है…मइया झूठी है…हॉस्पटिल झूठा है…” उसकी इस तड़प को शब्द देते हुए मेरा अंग सिहर रहा है, उस वक्त मेरी क्या हालत थी, इसको शब्दों में व्यां नहीं कर सकता। उस दौरान कितनी बार वाशरूम में जाकर अपने गिली हो चुकी आंखों को धोया हूं बता नहीं सकता।

7 फरवरी 2026 सुबह 10 बजे के बाद बेटे को ओरल डाइट अलाऊ हुआ…पानी दिया गया…पानी पीने के बाद पूरी तरह से नकारात्मक हो चुका बेटा, मुझसे तकरीबन आधे घंटे तक सकारात्मक तरीके से बातचीत किया। मेरे माथे को चुमा। थैक्यू बोला। और डॉक्टर वैन से घर वापस आने के बाद वह क्या-क्या करेगा क्या क्या खायेगा उसका लेखा-जोखा बताया। उस पल को एवं पिता-पुत्र संवाद को लिखा नहीं जा सकता है।

इसी तरह दो दिन बाद सॉफ्ट डाइट शुरू हुआ। 10 फरवरी को बेटे को स्टूल हुआ। 11 को बेटे को डिसचार्ज किया गया। पेट में लगी पाइप हटा दी गई। 11 को रात्रि 10 बजे तक हम एंश्योरेंस का क्लेम अप्रूव कराकर अपने घर पहुंच गए। तब से आज 13.02.26 की दोपहर तक बेटा लगातार रिकवरी की ओर बढ़ रहा है। अभी ओरल एंटिबायोटिक्स चल रहा है।

इन सबके बीच मैं अपने तमाम चिकित्सक मित्रो खासतौर से डॉ.पंकज अग्रवाल, डॉ. मनीष कुमार, डॉ. शैलेन्द्र गोयल, डॉ दीलीप, संजय श्रीवास्तव सहित उन तमाम शुभचिंतकों एवं सहयोगियों को आभार प्रकट करता हूं। और आपसे आंकाक्षा रखता हूं कि आप सबकी शुभेच्छाएं ऐसे ही बनी रहेगी। साथ ही अग्रसेन अस्पताल एवं आकाश अस्पताल को भी आभार प्रकट करता हूं।

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