सभी देशवासियों के नाम खुला पत्र

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आर. के. सिंह

पटना। क्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? यदि हाँ तो कृपया जागे और देखे। SIR – मतदाता सूचि के विशेष पुनरीदान – के नाम पर वोटरों को मतदाता सूची से काट कर लोकतंत्र पर प्रहार किया जा रहा है।
– विशेष पुनरीदान के नाम पर कानून का उल्लंघन कर अभी तक 13 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची से निकला गया है। इनमे से 99 प्रतिशत गरीब भारतीय नागरिक है।

• कानून की धारा 21 के अनुसार, विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष कारणों से ही किया जाना है और वह भी केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में तथा प्रत्येक मामले में विषिस्ट कारणों को लिखित रूप में उल्लेख किया जाना है। अतः पुरे देश में एक साथ विशेष पुनरीक्षण (Intensive Revision) का आदेश अवैध था। विशेष परिस्थितियों के लिए किया गया अपवाद स्वस्वरूप प्रावधान सामान्य नियम नहीं बन सकता। SIR विशेष गहन पुनरीक्षण को कानूनन ठहराने वाला सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत था।
एक प्रश्न यह भी है कि पूरे देश में SIR का निर्णय किसने लिया? क्या यह पूरे आयोग का निर्णय था या केवल ज्ञानेश कुमार का?

•        जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of The People Act 1950) की धारा 21 के अनुसार जब किसी मतदाता सूची (Electoral Roll) का पुनरीक्षण शुरू किया जाता है, तो पुनरीक्षण की अधिसूचना जारी किए जाने के समय लागू मतदाता सूची तब तक प्रभावी रहती है जब तक पुनरीक्षण समाप्त होने की उपरांत नई मतदाता सूची प्रकाशित नहीं हो जाती है। पुनरीक्षण तभी पूर्ण मानी जाती है जब नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में दायर सभी अपीलों का निपटारा हो जाए। जहाँ अपीलें लंबित थीं, वहाँ पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई थी, अतः पुनरीक्षण के पूर्व वैध मतदाता सूची का ही उपयोग किया जाना था। इसके विपरीत, पुनरीक्षण में तैयार की जा रही नई  मतदाता सूची – जो उस समय अपूर्ण थी चूँकि लाखों अपील लंबित थी उसका उपयोग चुनाव हेतु किया गया। यह अवैध था।

• जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को है, किसी अन्य व्यक्ति को नहीं; और वह भी केवल धारा 22(a), (b) और (c) में दिए गए कारणों के आधार पर विशिष्ट जांच करने तथा संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिए जाने के उपरांत ही आदेश पारित करके और उस आदेश के विरुद्ध अपीलों के निपटारे के बाद ही नाम हटाया जा सकता है। ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद मतदाता सूची में ERO द्वारा वैध तरीके से जोड़े गए सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जांच और पंजीकृत मतदाताओं को कोई कारण बताओ नोटिस दिए बिना हटा दिया। यह स्पष्ट रूप से अवैध था।

जिन व्यक्तियों के नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटा दिए गए, उन्हें नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरकर आवेदन करना पड़ा और यह प्रमाण देना पड़ा कि वे पंजीकरण के पात्र हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय के Lal Babu Hussain and Others v. Electoral Registration Officer and Others, [(1995) 3 SCC 100] के फैसले का स्पष्ट उल्लंघन है। इस फैसले में कहा गया था कि किसी पंजीकृत मतदाता को अयोग्य ठहराने के दावे के समर्थन में आवश्यक साक्ष्य जांच प्राधिकारी द्वारा या आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत करना होगा, न कि मतदाता को; और ऐसे मामलों में मतदाता को अवसर दिया जायगा कि जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत आधारों पर अपनी प्रतिक्रिया दे और उसके उपरांत मतदाता पंजीकरण पदाधिकारी द्वारा सुनवाई कर लिखित आदेश दिया जाएगा। इनमें से कुछ भी नहीं किया गया।

स्थापित न्यायिक सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार की अयोग्यता या दंड लगाए जाने के लिए पर्याप्त आधार होने का प्रमाण देने का भार उस व्यक्ति या संस्था पर होता है जो वह दंड या कार्रवाई करना चाहती है। ज्ञानेश कुमार ने प्रमाण का भार उलट दिया है। यह भी कानून के विरुद्ध है।

अब तक सभी सरकार और निर्वाचन आयोगों के प्रयास हमेशा रहा है कि सभी पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाए। यह लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का मिशन था। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि पुनरीक्षण का मकसद अधिक से अधिक मतदाताओं को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना बन गया।

ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म छे में एक नया परिशिष्ट (Appendix) जोड़ दिया। उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि फॉर्म 6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है। उन्होंने यह परिशिष्ट दोनों निर्वाचन आयुक्तों की राय के विरुद्ध जोड़ा। कानून के अनुसार आयोग के निर्णय या तो सर्वसम्मति से लिए जाने है अथवा बहुमत से। इस मामले में दोनों निर्वाचन आयुक्त इस नए परिशिष्ट को जोड़ने के खिलाफ थे। इसलिए नया परिशिष्ट जोड़ना स्वयं आयोग के निर्णय के विरुद्ध था। फिर इसे कैसे जोड़ा गया और किसके आदेश पर यह सवाल है। यह परिशिष्ट अभी भी लागू है। इस परिशिष्ट में मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदक से कहा गया है कि वे यह बताये कि 2003 की मतदाता सूची में उनके माता पिता का नाम किस क्रमांक पर था। ज़रा सोचें कि 18 वर्ष का कोई युवा—2003 की मतदाता सूची कैसे उपलब्ध कर सकता है? इससे सभी युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधा उत्पन्न हुई। BJP जानती है कि युवा मतदाता उसे वोट नहीं देंगे।
फॉर्म 7 में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के विरुद्ध आपत्तियाँ दी जा सकती हैं। बड़ी संख्या में एक साथ सैकड़ों, हजारों, लाखों आपत्तियां फॉर्म 7 में दाखिल की गईं। इन्हें किसने दाखिल किया? जिन लोगों का इन पर हस्ताक्षर है, वे स्वयं उपस्थित नहीं हुए। फिर इन फॉर्मों को कैसे स्वीकार किया गया और उन पर कार्रवाई कैसे की गई? ये आपत्तियां किसी राजनितिक दाल द्वारा थोक में जाली दस्तखत कराकर कराई गयी होगी। उन्हें बिना सवाल किये स्वीकार कर लिया गया और उसके आधार पर मतदाताओं का पंजीकरण रोका गया। यह सरासर धांधली थी।
बंगाल में ERO द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं के नाम पंजीकृत नहीं किए गए क्योंकि किसी ने उनके विरुद्ध अपीलें दाखिल कीं। किस ने या किन लोगों ने अपील दायर किया यह स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि आयोग ने खुद अपील दायर किया। आयोग मतदाता के पंजीकरण के विरुद्ध अपील दायर करे यह अप्रत्याशित है। आयोग को अपील दाखिल करने का अधिकार किसने दिया? दो निर्वाचन आयुक्तों का कहना है कि उन्होंने ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया। इसलिए आयोग ने किसी को अपील दाखिल करने के लिए अधिकृत नहीं किया था। फिर यह किसने अपील दायर किया? ज्ञानेश कुमार ने? इस आधार पर उन मतदाताओं को चुनाव में मतदान करने से रोक दिया गया। यह गंभीर धांधली है।

क्या निर्वाचन आयोग और किसी राजनीतिक दल के कुछ लोग मिलीभगत करके बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म 7 की आपत्तियाँ दाखिल करवा रहे थे और नाम हटवा रहे थे?
जब लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित थीं, तब चुनाव कैसे होने दिए गए? निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इसका जवाब देना होगा। जिन अपीलों का अब तक निपटारा हुआ है, वे दिखाती हैं कि जिन मतदाताओं को बाहर रखा गया था, उसमे 90 प्रतिशत वैध मतदाता थे।

एक हास्यास्पद बात सामने आई है। अब मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के ERO के आदेश पर कंप्यूटर भी आपत्ति कर पंजीकरण रोक देता है। इसको कहा गया है “logical discrepancy”।  यह बताया गया है कि पिता और पुत्र में 15 वर्ष से काम का अंतर “logical discrepancy” है। ज्ञानेश कुमार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भारत में गरीब लोग कैसे रहते हैं। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होते। आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी हमारे अधिकांश गरीब मतदाता अनपढ़ है। उनके घरों में कैलेंडर नहीं होते। जब BLO उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने के लिए उनके पास जाता है तो वे अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताते है। इसी प्रकार, जब उनके पिता के नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज किया गया तब उन्होंने भी अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताया था। इसमें एक दो वर्ष इधर उधर होंगे। उसे logical discrepancy बताकर मतदाता सूची में उनका पंजीकरण रोक देना – जब कि वह व्यक्ति आपके सामने है, व्यस्क है तथा भारतीय है गरीब के साथ अन्याय है। कंप्यूटर द्वारा “logical discrepancy” बताये जाने के आधार पर लाखों लोगों के नाम बिना किसी जांच के हटा दिए गए। यह अधिनियम की धारा 21 के सरासर विरुद्ध है।

सबसे अधिक संख्या में बाहर किए गए लोग गरीब और वंचित वर्गों से हैं—वे लोग जिनकी कोई आवाज नहीं है। वे अपने घरों से दूर रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। लाखों लोग दूर-दराज के स्थानों/राज्यों में काम कर रहे हैं। वे अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक महीने के लिए अपने घर वापस जाने का खर्च नहीं उठा सकते। यदि वे काम नहीं करेंगे तो भूखे रह जाएंगे। वे जटिल फॉर्म नहीं भर सकते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र और आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं। वे वोट के लिए अपनी रोज की मजदूरी का नुकसान उठाना नहीं चाहते हैं। अधिकतर इन गरीब लोगों का नाम मतदाता सूची से काट दिया गया। इससे विदेशी नहीं छंटे। विदेशी नागरिक जो अवैध रूप से भारत आये है वे सबसे पहले अपने कागजात – आधार कार्ड/राशन कार्ड – बनवा लेते है। निर्वाचन आयोग में बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया।

ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची को कंप्यूटर पर डाल कर उस डिजिटल मतदाता सूची पर पूरा नियंत्रण अपने तथा अपने अधीन एक पदाधिकारी द्वारा कर रखे है। उस डिजिटल मतदाता सूची पर बाकी दोनों चुनाव आयुक्त को कोई अधिकार नहीं है। जो Electoral Registration officer – मतदान पंजीकरण पदाधिकारी मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का आदेश पारित करते है – अथवा उनके अपीलीय पदाधिकारी आदेश पारित करते है वे लागू होंगे या नहीं यह आयोग तय करता है। ERO के आदेश के बाद भी logical discrepancy के नाम पर मतदाता के नाम नहीं दर्ज जाते है। यह कानून के विरुद्ध है। कानून के अनुसार नाम जोड़ने या हटाने और मतदाता सूची प्रकाशित करने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को दिया गया है। इसके विपरीत, मतदाता सूची को केंद्रीकृत कर दिया गया और मतदाता सूची का पुनरीक्षण भी केंद्रीय स्तर पर किया गया। यह अवैध था।

दोनों निर्वाचन आयुक्तों को ERO तथा DEO और CEO, जो कानून द्वारा मतदाता सूची मई नाम जोड़ने या हटाने के लिए अधिकृत है ने बताया कि उनको मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने नहीं दिया जा रहा है। गोवा में 97 मतदाताओं को वैध और मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया। वहाँ के ERO, DEO तथा CEO मतदाता सूची में उनका नाम शामिल नहीं करवा पाए हैं।

मतदाता सूची में संशोधन का केंद्रीकरण गैर कानूनी एवं खतरनाक है। इसका उपयोग उन बूथों से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा सकता है जो किसी पार्टी विशेष के विरुद्ध मतदान करते हैं। क्या ऐसा ही हुआ?

बिना जांच तथा सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है और ज्ञानेश कुमार इसके लिए दोषी हैं।
SIR के माध्यम से अब तक 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। यह कुल मतदाताओं का 13% है और SIR अभी समाप्त नहीं हुआ है। 2024 के चुनावों में NDA और INDIA के बीच अंतर केवल 3% था। इसलिए इन नामों को हटाए जाने का चुनावों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और पड़ेगा।

26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी प्रेस नोट ऊपर बताए गए अवैध कार्यों की पुष्टि करता है।

प्रश्न है कि ज्ञानेश कुमार ने ये सभी अवैध कार्य स्वतः किए या किसी ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया?

विपक्ष का कहना है कि वह ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाएगा। यह व्यर्थ होगा। इसके लिए विपक्ष के पास आवश्यक संख्या नहीं है। यदि वास्तव में उन्हें निष्पक्ष चुनाव चाहिए, तो उन्हें ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज कराने चाहिए, तथा सभी विपक्षी दल एकजुट होकर निश्चय करें कि वे तब तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेंगे, जब तक कि वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त इस्तीफा नहीं देते और उनके उत्तराधिकारियों का चयन पिछली चयन प्रणाली के अनुसार नहीं किया जाता—जिसमें प्रधानमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। उन्हें यह भी मांग करनी चाहिए कि जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित रहते हुए चुनाव कराए गए, उन चुनावों को निरस्त किया जाए और नए चुनाव कराए जाए। यह भी माँग हो कि मतदान EVM के बजाय बैलेट पेपर से हो, क्योंकि अभी तक ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नहीं बनाई गई है जिसे हैक न किया जा सके। यही कारण है कि विकसित देशों में EVM का उपयोग नहीं किया जाता।

यदि हम अपने लोकतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो पूरे देश को जागरूक और एकजुट करना होगा।

SIR पर दिए गए फैसले से सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है। यह प्रतिष्ठा की दृष्टि से उस फैसले के समान है जिसने आपातकाल को सही ठहराया था। निर्वाचन आयुक्तों के चयन से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर हो रही देरी भी सर्वोच्च न्यायालय के बारे में गलत संदेश दे रही है—क्योंकि यह स्पष्ट है कि निर्वाचन आयुक्तों का चयन सत्तारूढ़ दल द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष चयन समिति द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।

आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों।

(लेखक सेवानिवृत्त IAS अधिकारी एवं पूर्व केंद्रीय गृह सचिव हैं)

कला संकुल में गूंजे सुर, थिरके कदम और जीवंत हुई लोककला की परंपरा

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बृजेश

नई दिल्ली:   भारतीय कला और संस्कृति की विविध परंपराओं को मंच देने वाला संस्कार भारती दिल्ली का ‘कला संकुल’ बीते सप्ताह अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों का साक्षी बना। शास्त्रीय संगीत और कथक से लेकर लोक एवं पारंपरिक चित्रकला तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा से प्रेरित समकालीन कला तक, विभिन्न आयोजनों ने कला के अलग-अलग रूपों को एक ही सांस्कृतिक परिसर में सामने रखा।

27 सितंबर को ‘भारतीय दृष्टि से समकालीन कथक—परंपरा, नवाचार और अभिव्यक्ति’ विषय पर कला संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर ने कथक की परंपरा, उसके शास्त्रीय अनुशासन और बदलते समय में हो रहे प्रयोगों पर अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में शास्त्रीय गायन तथा प्रीति सिन्हा समूह की कथक प्रस्तुति ने आयोजन को सजीव सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया।

26 सितंबर को दृश्य कला विद्या की ओर से ‘रंग मंजूषा’ लोक एवं पारंपरिक कला प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। सीसीआरटी के अध्यक्ष डॉ. विनोद नारायण इंदूरकर ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। 33 कलाकारों की भागीदारी वाली इस प्रदर्शनी में मधुबनी, वरली, गोंड, पिछवाई, फड़, सुजनी, मंजूषा सहित देश की विभिन्न लोक एवं पारंपरिक कला शैलियों को प्रदर्शित किया गया है। इन कलाकृतियों में भारतीय लोकजीवन, परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों की विविध छवियां दिखाई देती हैं। प्रदर्शनी 30 सितंबर तक कला संकुल में दर्शकों के अवलोकन के लिए खुली रहेगी।

इसी सांस्कृतिक श्रृंखला में 19 से 24 सितंबर तक एआईएफएसीएस गैलरी में कलाकार पंकज सचदेवा की एकल चित्रकला प्रदर्शनी ‘ETERNAL ECHOES’ आयोजित हुई। प्रदर्शनी में रामायण, महाभारत, शिव-शक्ति, बुद्ध, महावीर, सिख दर्शन और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा जैसे विषयों को समकालीन प्रतीकात्मक शैली में अभिव्यक्त किया गया। चित्रों के माध्यम से भारतीय जीवन-दृष्टि, आध्यात्मिक चिंतन और मानवीय मूल्यों को सामने लाने का प्रयास किया गया।

कला संकुल में हुए इन आयोजनों की विशेषता यह रही कि यहां परंपरा केवल संरक्षित दिखाई नहीं दी, बल्कि संवाद और सृजन के माध्यम से वर्तमान से जुड़ती हुई दिखाई दी। शास्त्रीय कलाओं की साधना, लोक कलाओं की विरासत और समकालीन कलाकारों की अभिव्यक्ति का यह संगम कला संकुल को एक ऐसे सांस्कृतिक परिसर के रूप में सामने ला रहा है, जहां भारतीय कला की जड़ों से लेकर उसके वर्तमान स्वरूप तक को एक साथ अनुभव किया जा सकता है।

संस्कार भारती दिल्ली का कला संकुल इस प्रकार कलाकारों, कला-साधकों और कला-प्रेमियों के लिए भारतीय कला-संस्कृति के निरंतर संवाद, संरक्षण और सृजन का एक जीवंत मंच बनता जा रहा है।

विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध का भारत पर प्रभाव

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दिल्ली । वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में, परिस्थितियां तेजी से रसातल में जाती हुई दिखाई दे रही हैं। विभिन्न देशों (रूस-यूक्रेन, इजराईल-हम्मास, ईरान-अमेरिका एवं सऊदी अरब-हूथी) के बीच चल रहे युद्ध ने उन देशों के आर्थिक क्षेत्र को भी विपरीत रूप से प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया है, जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में किसी भी प्रकार से नहीं जुड़े हैं। इस श्रेणी के देशों में भारत का नाम सबसे ऊपर उभर कर सामने आ रहा है। दरअसल, भारत अपनी कुल खपत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल अन्य देशों से आयात करता है। उक्त युद्ध प्रारम्भ होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं एवं यह 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गईं हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति किसी भी कीमत पर उचित नहीं है, क्योंकि भारत को महंगी दरों पर कच्चे तेल का आयात करना पड़ रहा है और इससे महंगे कच्चे तेल के साथ साथ भारत में मुद्रा स्फीति भी आयातित हो रही है। साथ ही, भारत को महंगे कच्चे तेल के आयात का अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना होता है, जिससे भारतीय रुपए की कीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव बढ़ता जा रहा है एवं भारतीय रुपए का लगातार अवमूल्यन होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारतीय रुपए के अवमूल्यन से भारत द्वारा आयात किए जाने वाले समस्त उत्पाद महंगे हो जाते हैं।

उक्त वर्णित युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व, भारतीय अर्थव्यवस्था (सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर) वैश्विक स्तर पर अमेरिका, चीन, जर्मनी के पश्चात चौथे स्थान पर पहुंच गई थी। परंतु, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए की कीमत में आए परिवर्तन के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर छठे स्थान पर पहुंच गई है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद उसी स्तर पर बना रहा है। इसका मुख्य कारण, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर का भारतीय रुपए की तुलना में लगातार मजबूत होते जाना है।

जैसे जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध और अधिक आक्रामक होता जा रहा है, वैसे वैसे अब यह सम्भावना बलवती होती जा रही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं एवं अन्य खाद्य पदार्थों के दामों में भी भारी वृद्धि देखने में आ सकती है, क्योंकि यूक्रेन गेहूं का बड़ा उत्पादक देश है। यूक्रेन ने रूस के कच्चे तेल को संसाधित कर पेट्रोल एवं डीजल बनाने वाली उत्पादन इकाईयों को भी भारी नुक्सान पहुंचाया है। इससे रूस ने गैस एवं ईंधन की आपूर्ति को यूरोपीयन देशों को स्थगित कर दिया है। सर्दी के मौसम में यूरोपीयन देशों को गैस एवं ईंधन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। परंतु, इस वर्ष यूरोपीयन देशों को सर्दी के मौसम में गैस एवं ईंधन की आपूर्ति प्रभावित होने वाली है इससे इन देशों के नागरिकों को सबसे अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध प्रारम्भ करके विश्व के कई देशों को भारी परेशानी में डाल दिया है। न केवल कच्चा तेल बल्कि फर्टिलाइजर, खाद्य पदार्थ, गैस, आदि की आपूर्ति प्रभावित हुई है। साथ ही, वित्तीय क्षेत्र में भी कई देशों को भारी कठिनाईयों के बीच में धकेल दिया है। यदि यह युद्ध कुछ समय और चलता है, जिसके कि आसार दिखाई दे रहे हैं, तो कई देशों के दिवालिया होने की सम्भावना बनती नजर आ रही है। अमेरिका में मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यू एस फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 25 आधार बिंदुओं की बढ़ौतरी की है। अक्टोबर 2026 एवं दिसम्बर 2026 माह में भी पुनः 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की जा रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहने की प्रबल सम्भावना है एवं इसके चलते अमेरिका में भी मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण मुश्किल है। ब्याज दरों में वृद्धि के चलते अमेरिका में यू एस बांड यील्ड में भी लगातार वृद्धि हो रही है एवं यह अपने लगभग उच्चतम स्तर 5.25 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बांड यील्ड के उच्च स्तर पर पहुंचने के चलते अमेरिकी निवेशक तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं से अपना निवेश निकाल कर अमेरिकी बांड में निवेश कर रहे हैं क्योंकि अपेक्षाकृत यह सुरक्षित निवेश है एवं ब्याज दर भी अधिक मिल रही है। भारत जैसी तेजी से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। भारत सहित अन्य विकासशील देशों से निकल रहे विदेशी निवेश से इन देशों की अपनी मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है, जिससे इन देशों में विभिन्न पदार्थों के आयात महंगे हो रहे हैं एवं इन देशों में मुद्रा स्फीति फैलने का खतरा उत्पन्न हो गया है। भारत सहित इन विकासशील देशों को भी मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में वृद्धि करनी होगी। कुल मिलाकर अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध प्रारम्भ कर विश्व के कई देशों के लिए विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में समस्याएं खड़ी कर दी हैं।

भारत अभी तक तो अपनी आर्थिक सेहत को सम्हाले हुए है, क्योंकि भारत के पास 75,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है एवं भारत में आर्थिक गतिविधियों में रफ्तार के चलते प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों में वसूली प्रभावी बनी हुई है। परंतु, युद्ध यदि और अधिक लंबे समय तक चलता है तो भारत में भी आर्थिक क्षेत्र में कुछ परेशनियां आ सकती हैं। बहुत सम्भव है कि भारतीय रिजर्व बैंक अपनी अक्टोबर 2026 माह में होने वाली बैठक में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि करने को मजबूर हो। ब्याज दरों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के आर्थिक विकास की गति पर पड़े बिना नहीं रह सकेगा। भारत द्वारा आयात की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं की कीमतें यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ रही हैं तो भारत को इन वस्तुओं को उच्च कीमतों पर खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा। भारतीय शेयर बाजार भी विपरीत रूप से प्रभावित हो सकता है क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशक भी भारतीय पूंजी बाजार से अपने निवेश को निकाल कर अमेरिकी बांड में अपना निवेश बढ़ा रहे है। इससे भारतीय रुपए पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत और अधिक कम हो सकती है।

विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध के बीच, भारतीय नागरिकों को भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करने हेतु आगे आना होगा। इस संदर्भ में केंद्र एवं समस्त राज्य सरकारें तो अपना कार्य पूरी ईमानदारी से सम्पन्न करने का प्रयास कर ही रही हैं, परंतु नागरिकों को भी स्वदेशी अपनाकर एवं विभिन्न उत्पादों का संयम के साथ उपयोग कर अन्य देशों से उत्पादों के आयात को कम करने के प्रयास करने होंगे। भारत में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देना होगा एवं आयातित वस्तुओं के उपयोग को कम करना होगा ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। भारतीय नागरिकों द्वारा यदि भारत में उत्पादित वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है तो भारतीय विनिर्माण इकाईयों को विस्तार में जाना होगा एवं इससे भारत में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। कुल मिलाकर अब अन्य देशों से आयातित वस्तुओं के उपयोग को समाप्त करना होगा, यदि समाप्त नहीं कर सकते हैं तो कम तो करना ही होगा।

भविष्य में, भारत सहित विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में आने वाली कठिनाईयों के हल के लिए इन देशों के नागरिकों को अपनी महती भूमिका निभाने के लिए अपने आप को अभी से तैयार करना होगा। बहुत सम्भव है कि इन देशों के केंद्रीय बैकों को ब्याज दरों में वृद्धि करना पड़े एवं इन देशों में पेट्रोल, डीजल, फर्टिलाईजर, गैस एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि देखने को मिले, ऐसे समय में इन देशों के नागरिकों को अपने देश के हित में इस कठिन समय को सहज बनाने के लिए अपने आप को अभी से तैयार करना होगा।

शक्ति सिर्फ सत्ता नहीं होती: नीम करौली बाबा और इतिहास की गलत कसौटी

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आनंद स्वरूप काशिव

भोपाल। सोशल मीडिया पर अक्सर एक सवाल घूमता है—“अगर नीम करौली बाबा इतने शक्तिशाली थे, तो उन्होंने अंग्रेजों को भारत से क्यों नहीं निकाल दिया?” पहली नजर में यह सवाल तार्किक लगता है। थोड़ा गहराई से देखें तो समस्या सवाल में नहीं, शक्ति की परिभाषा में है।इसी मानसिकता से दूसरा सवाल भी निकलता है—“RSS का आजादी की लड़ाई में क्या योगदान है?” दोनों के पीछे एक ही धारणा है: जिसने किसी ऐतिहासिक घटना को तत्काल और सीधे नहीं बदला, उसने इतिहास में कुछ किया ही नहीं।यह इतिहास को मशीन समझने जैसा है—एक व्यक्ति ने लीवर खींचा और परिणाम निकल आया। समाज और सभ्यताएँ ऐसे नहीं बदलतीं। वे विचारों, संगठनों, संस्थाओं, अर्थव्यवस्था, सामाजिक चेतना, नेतृत्व, तकनीक, जनसंगठन, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और सबसे बढ़कर सामूहिक मानसिकता के परस्पर प्रभाव से बदलती हैं।

शक्ति हमेशा हेडलाइन में नहीं दिखती
एक व्यक्ति संविधान लिखता है। दूसरा संस्था बनाता है। तीसरा विचार देता है। चौथा लोगों को संगठित करता है। पाँचवाँ आर्थिक क्षमता पैदा करता है। छठा समाज में आत्मविश्वास जगाता है। सातवाँ इन सबको सत्ता-परिवर्तन में बदलने वाला राजनीतिक नेतृत्व तैयार करता है। भूमिकाएँ अलग हैं, परिणाम सामूहिक होता है।हेडलाइन में जो शक्ति दिखती है, वह अक्सर उन हजारों अनदेखी प्रक्रियाओं का अंतिम फल होती है जिन्हें हेडलाइन कभी नहीं बताती। संतों और सामाजिक नेताओं को भी इसी पैमाने से देखा जाना चाहिए। अगर कोई संत लोगों के जीवन, आत्मविश्वास, संबंधों और मानसिक संसार को बदलता है, तो उसका प्रभाव इस बात से नहीं नापा जा सकता कि उसने किसी औपनिवेशिक अधिकारी को जाकर चुनौती दी या नहीं।यहाँ एक साफ फर्क समझना जरूरी है। व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रभाव और राजनीतिक-सैन्य शक्ति एक श्रेणी की चीजें नहीं हैं। अनुयायी किसी संत को अत्यंत शक्तिशाली मान सकते हैं—नैतिक, आध्यात्मिक या मनोवैज्ञानिक रूप से। इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि वह व्यक्ति किसी औपनिवेशिक राज्य को सैन्य रूप से समाप्त कर सकता था। यह श्रेणी-दोष है। जैसे किसी महान वैज्ञानिक से पूछना—“अगर आप इतने बुद्धिमान थे तो युद्ध क्यों नहीं जीता?” सवाल ही गलत है। बुद्धिमत्ता और सैन्य शक्ति अलग हैं। आध्यात्मिक प्रभाव और राज्य-शक्ति भी अलग हैं।
अब यही सवाल RSS पर
“RSS आजादी के आंदोलन में क्या कर रही थी?” इसका जवाब देने से पहले पूछिए-स्वतंत्रता आंदोलन से आप क्या समझते हैं?अगर इसका अर्थ केवल उन संगठित राजनीतिक अभियानों से है जिनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन पर तत्काल दबाव बनाना था, तो कांग्रेस, क्रांतिकारी संगठन, किसान और श्रमिक आंदोलन, आजाद हिंद फौज और अन्य धाराओं की भूमिकाएँ अलग-अलग देखनी पड़ेंगी। लेकिन अगर स्वतंत्रता को सिर्फ 15 अगस्त 1947 की सत्ता-हस्तांतरण की घटना मान लिया जाए, तो बड़ा प्रश्न गायब हो जाता है-भारत को स्वतंत्र होने के लिए केवल अंग्रेजों को हटाना था, या भारतीय समाज को भीतर से भी पुनर्गठित करना था?यहीं बहस का दूसरा आयाम खुलता है। RSS की स्थापना 1925 में हुई। उसने स्वयं को मूलतः सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में विकसित किया। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जोर संगठन और समाज के दीर्घकालीन निर्माण पर था। इसका अर्थ यह नहीं कि RSS को स्वतंत्रता आंदोलन के हर चरण की प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधि बना दिया जाए। ऐसा करना ऐतिहासिक रूप से ठीक नहीं होगा। लेकिन यह कहना भी उतना ही सरल है कि जिसने अंग्रेजों के खिलाफ प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन नहीं किया, उसका स्वतंत्रता या राष्ट्रनिर्माण में कोई योगदान नहीं था। तब राष्ट्रनिर्माण की अवधारणा ही फिर से परिभाषित करनी पड़ेगी।
राष्ट्र केवल राजनीतिक सत्ता का नाम नहीं है
आधुनिक पश्चिमी राजनीतिक कल्पना में राष्ट्र अक्सर राज्य, भूभाग और संप्रभुता के फ्रेम में समझा जाता है। भारतीय सभ्यता की दृष्टि में समाज राज्य से पैदा नहीं होता। राज्य समाज की एक संस्थागत अभिव्यक्ति है। समाज की अपनी स्मृति, संस्कृति, संस्थाएँ, भाषा, परंपराएँ, तीर्थ, परिवार, समुदाय और साझे प्रतीक होते हैं।यदि कोई सभ्यता लंबे समय तक राजनीतिक पराधीनता में रही हो, तो उसकी मुक्ति केवल सत्ता-परिवर्तन का प्रश्न नहीं होती। सबसे बड़ी चुनौती यह होती है—क्या वह अपने बारे में फिर से स्वयं सोचना शुरू कर सकती है? औपनिवेशिक शासन की सबसे गहरी शक्ति केवल पुलिस या सेना नहीं थी। वह यह भी समझाने की कोशिश करता था कि तुम्हारा अतीत पिछड़ा था, संस्थाएँ अवैज्ञानिक थीं, ज्ञान आदिम था और आधुनिकता बाहर से आएगी। इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रश्न भी जुड़ा था। सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों का महत्व यहीं उभरता है।
अंग्रेजों को हराना और समाज को तैयार करना—दो अलग काम
कल्पना कीजिए, किसी कंपनी को प्रतिस्पर्धी से बाजार वापस लेना है। एक टीम बिक्री करेगी, दूसरी उत्पाद बनाएगी, तीसरी आपूर्ति श्रृंखला ठीक करेगी, चौथी प्रतिभा तैयार करेगी, पाँचवीं तकनीक बनाएगी। अब कोई कहे—“उत्पाद बेचने वाली टीम ने प्रतिद्वंद्वी को हराया, बाकी लोगों ने क्या किया?” तो वह संगठन को सिर्फ बिक्री विभाग मान रहा है।राष्ट्र भी ऐसा ही जटिल तंत्र है। स्वतंत्रता की अंतिम राजनीतिक लड़ाई में कुछ चेहरे सामने दिखते हैं। उनके पीछे समाज की संगठनात्मक क्षमता, आर्थिक क्षमता, सामाजिक चेतना और नेतृत्व की नई पीढ़ियाँ तैयार होती हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता एक घटना हो सकती है; राष्ट्रनिर्माण एक प्रक्रिया है। ऐतिहासिक बहसों में यही फर्क रखना चाहिए।
इसलिए बाबा वाला सवाल भी बदलिए
अगर कोई पूछे—“अगर बाबा इतने शक्तिशाली थे तो अंग्रेजों को क्यों नहीं भगा दिया?” तो आस्था का मजाक बनाने की जरूरत नहीं। बस पूछिए—“आप शक्ति को केवल राज्यसत्ता बदलने की क्षमता क्यों मान रहे हैं?”एक शिक्षक की शक्ति क्या है? विचारक की? संत की? वैज्ञानिक की? उद्यमी की? संगठन-निर्माता की? इनमें से किसी का प्रभाव दूसरे की कसौटी से नहीं नापा जा सकता। धीरूभाई अंबानी से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने संविधान क्यों नहीं लिखा। होमी भाभा से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने गरीबी क्यों नहीं मिटाई। विवेकानंद से नहीं पूछा जा सकता कि उन्होंने अंग्रेजों को सैन्य रूप से क्यों नहीं हराया। और किसी सामाजिक संगठन से नहीं पूछा जा सकता कि उसने वही काम क्यों नहीं किया जो किसी राजनीतिक आंदोलन का घोषित उद्देश्य था।हर ऐतिहासिक शक्ति का अपना क्षेत्र होता है। असली प्रश्न है—किसने क्या बनाया? किसी व्यक्ति का मूल्य केवल इस आधार पर तय नहीं होता कि उसने स्वयं सत्ता प्राप्त की या नहीं। कभी सबसे बड़ा योगदान यही होता है कि वह ऐसी संस्थागत क्षमता बना दे जिसमें बाद की पीढ़ियाँ काम कर सकें। व्यक्ति का आकर्षण उसकी आयु के साथ समाप्त हो सकता है। लेकिन अगर वह नेतृत्व की पाइपलाइन बना दे, तो संस्था उसके बाद भी चलती है। भाषण खत्म हो जाता है; विचार पीढ़ियों तक चलता है। आंदोलन समाप्त हो जाता है; संगठनात्मक संस्कृति का प्रभाव कहीं लंबा रहता है। व्यक्ति की शक्ति उसकी जीवनकाल में नापी जा सकती है; संस्था की शक्ति उसकी उत्तर-जीवन में दिखाई देती है।इतिहास पढ़ते समय केवल यह नहीं पूछना चाहिए—“उसने उस दिन क्या किया?” यह भी पूछना चाहिए—“उसने आने वाले पचास वर्षों के लिए क्या क्षमता पैदा की?”
इतिहास व्हाट्सएप फॉरवर्ड नहीं, पारिस्थितिकी है
सोशल मीडिया ने इतिहास को भी छोटी क्लिप बना दिया है-“इसने अंग्रेजों को मारा।” “उसने जेल काटी।” “उसने आंदोलन किया।” “इसने नहीं किया।” फिर फैसला तैयार। सभ्यताओं का इतिहास तीस सेकंड का रील नहीं है। उसमें कई समानांतर पटरियाँ चलती हैं-राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, संस्थागत, आर्थिक। इनके मिलने से समाज की दिशा बदलती है।किसी व्यक्ति या संगठन को समझने का ईमानदार तरीका यही है कि उसकी दर्ज भूमिका को उसी संदर्भ में देखा जाए जिसमें वह काम कर रहा था। न किसी को अनावश्यक रूप से स्वतंत्रता संग्राम का नायक बना देना चाहिए, न यह मान लेना चाहिए कि जो सीधे राजनीतिक मोर्चे पर नहीं था, वह इतिहास में अप्रासंगिक था। योगदान का सवाल द्विआधारी नहीं है-“आजादी की लड़ाई में था या नहीं था।” सही सवाल है-किसने क्या किया, किस उद्देश्य से किया, किस सीमा में किया, और उसका प्रभाव किस समय-सीमा में दिखाई दिया?यही दृष्टि भावनात्मक इतिहास से निकालकर बौद्धिक इतिहास की ओर ले जाती है। और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यही है-अंग्रेजों को भारत से निकालना स्वतंत्रता का एक अध्याय था; भारतीय समाज को अपने पैरों पर खड़ा करना उससे कहीं लंबी कहानी थी।
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