अब कोई भी माफिया आम नागरिक को डरा नही सकता

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लखनऊ । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करते। इसी क्रम में प्रदेश के नए डीजीपी राजीव कृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश में अपराध के प्रति जीरो टालरेंस की नीति का ही पालन किया जाएगा। प्रदेश में विगत कुछ दिनों में आपराधिक घटनाओं की संख्या में वृद्धि हुई जिसके परिणामस्वरुप अपराधियों का एनकाउंटर भी हुआ। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधान सभा चुनाव है इसलिए मुख्य विरोधी दल सपा के मुखिया अखिलेश यादव ऐसी किसी भी घटना को जाति या धर्म से जोड़कर भुना लेना चाहते हैं । अखिलेश यादव के जातिगत दुराग्रह और पीडीए के नाम पर समाज को तोड़ने वाले बयानों से सतर्क होकर मुख्यमंत्री योगी ने अपराधों के इस मुद्दे को समग्र हिंदुओं की सुरक्षा के साथ जोड़ दिया दिया है । मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि जब भाजपा सरकार समग्र हिंदुओं की बात कर रही है तो मंडल और कमंडल सब कुछ भाजपा के ही पास रहना है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मऊ में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि अब किसी माफिया या गुंडे में इतना दुस्साहस नही कि वह खुली जीप में पिस्तौल लहराते हुए किसी निर्दोष नागरिक को धमका सके। योगी ने कहा कि मऊ उनके लिए हमेशा विशेष रहा है। वह गोरखपुर मे रहते हुए भी यहाँ आते थे। योगी ने 2005 की याद दिलाते हुए पूछा कि तब किस प्रकार मऊ को दंगे की आग में झोंकने का प्रयास किया गया था। लोग चंदा जुटाकर रामलीला, यज्ञ, नवरात्र, शिवरात्रि, जन्माष्टमी करना चाहते थे तो उसे नहीं होने दिया जाता था। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे 2017 से पूर्व प्रदेश की सरकारें मफिया के आगे नतमस्तक रहती थीं । माफिया और शोहदे खुलेआम घूमते थे। बेटियां भरी दोपहरी में स्कूल -कालेज जाने में डरती थीं । यह समय स्वयं योगी जी को ही को मऊ जाने से रोक दिया गया था। तब मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफियाओं का ही राज था।
प्रदेश में 2017 में योगी सरकार आने तक किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इन माफियाओं का कभी सफाया हो सकता है। कुख्यात मााफिया मुख्तार अंसारी तो जेल में रहकर ही सांसद तक बनना चाहता था और यह तो वाराणसी की जनता की समझदारी रही कि उसने मुख्तार को 17 हजार वोटों से चुनाव में हरा दिया। मुख्तार बसपा का मुस्लिम तुष्टीकरण का सबसे बड़ा चेहरा बन गया था यद्यपि एक समय वह सपा मे भी रहा। आज जो लोग संविधान की किताब हाथ में लेकर घूम रहे हैं वह मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए मुख्तार व अतीक के खिलाफ नहीं बोल पाते। यह लोग तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए भी काम करते थे। सपा -बसपा के शासनकाल में प्रदेश मे दंगों का जो वातावरण बना रहता था उसके पीछे इन्हीं अराजक तत्वों का हाथ रहता था। आज मुख्यमंत्री 2017 के पूर्व के हालातों की याद दिलाते हुए अपराधियों व उनके संरक्षाकों को भी उनका हश्र याद दिला रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी की इन बातों का प्रभाव धरातल पर दिखाई दे रहा है।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था को लेकर एक बड़ी समीक्षा बैठक की और पुलिस अधिकारियों को कड़ा संदेश देते हुए अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की बात दोहराई।
गाजियाबाद में 17 वर्षीय हिंदू छात्र सूर्या चौहान की बकरीद के दिन धोखे से बुलाकर हत्या कर दी गयी। इस क्रूर और जघन्य घटना के बाद पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्यवाही करते हुए एक आरोपी असद का एनकाउंटर कर दिया गया तथा हत्या मे शामिल तीन अन्य लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। पुलिस प्रशासन ने बुलडोजर एक्शन की तैयारी भी प्रारंभ कर दी है और उसके घर पर नोटिस चस्पा कर दी गई है।
विगत 24 घंटे में प्रदेश मे दस मुठभेड़ हुई हैं जिसमें एक अपराधी ढेर किया गया है और 20 गिरफ्तार किये जा चुके हैं। स्पष्ट है मुख्यमंत्री कानून क राज की केवल बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उसे स्थापित भी कर रहे हैं ।

ईरान को कमजोर समझ कर हमला करने का खामियाजा भुगत रहा अमेरिका

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लखनऊ । अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर महाशक्तियाँ एक गंभीर भूल कर बैठती हैं—वे अपने प्रतिद्वंद्वी की सैन्य शक्ति को नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति, भूगोल, सामाजिक सहनशीलता और रणनीतिक क्षमता को कम आंक लेती हैं। 28 फरवरी 2026 को ईरान के विरुद्ध अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किया गया सैन्य अभियान भी कुछ हद तक इसी भूल का उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है। फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष को तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन न तो अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल कर सका है और न ही ईरान को निर्णायक रूप से झुका पाया है। इसके विपरीत, आज स्थिति यह है कि अमेरिका स्वयं आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक दबावों का सामना कर रहा है।
युद्ध की शुरुआत में यह धारणा बनाई गई थी कि ईरान की सैन्य और आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि कुछ सप्ताह के भीतर उसे बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सकता है। वर्षों के प्रतिबंध, आर्थिक संकट, आंतरिक असंतोष और क्षेत्रीय दबावों को देखते हुए अनेक पश्चिमी विश्लेषकों को लगा कि ईरान लंबी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं है। लेकिन घटनाक्रम ने बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत की।
ईरान ने प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति से अधिक अपनी भू-राजनीतिक स्थिति को हथियार बना दिया। फारस की खाड़ी और विशेष रूप से होरमुज़ जलडमरूमध्य पर उसका प्रभाव इस पूरे संघर्ष का निर्णायक तत्व बन गया। यही वह समुद्री मार्ग है जिसके माध्यम से विश्व के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद इस मार्ग पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। जहाँ पहले प्रतिदिन लगभग 125 से 140 जहाजों का आवागमन होता था, वहीं कई अवधियों में यह संख्या घटकर लगभग 10 जहाज प्रतिदिन तक पहुँच गई। हजारों नाविक और सैकड़ों जहाज खाड़ी क्षेत्र में फँसे रहे।
यही वह बिंदु है जहाँ अमेरिका की रणनीतिक गणना कमजोर पड़ती दिखाई देती है। अमेरिका ने सोचा था कि आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव ईरान को झुका देंगे, लेकिन ईरान ने दुनिया को यह याद दिला दिया कि आधुनिक युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति और भूगोल से भी लड़े जाते हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर बने संकट ने वैश्विक तेल बाजारों को झकझोर दिया। जून के पहले सप्ताह तक तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी गई और हर नई सैन्य झड़प के साथ ऊर्जा बाजारों में घबराहट बढ़ती गई।
विडंबना यह है कि इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव केवल यूरोप, एशिया या विकासशील देशों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि स्वयं अमेरिका पर भी पड़ा। मूडीज़ के विश्लेषण के अनुसार युद्ध और ऊर्जा संकट के कारण अमेरिकी परिवारों पर लगभग 100 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। ईंधन, हवाई यात्रा, परिवहन, उर्वरक और अनेक उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ी है। मध्यम और निम्न आय वर्ग के अमेरिकी नागरिकों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा है।
यह स्थिति अमेरिका के लिए इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि युद्ध का घोषित उद्देश्य ईरान को कमजोर करना था, लेकिन वास्तविकता में अमेरिका को अपनी ही अर्थव्यवस्था में महँगाई और आपूर्ति संकट का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी प्रशासन को अब घरेलू राजनीतिक दबावों का भी सामना करना पड़ रहा है। युद्ध जितना लंबा खिंचता है, उसका आर्थिक और राजनीतिक मूल्य उतना ही बढ़ता जाता है।
ईरान की दूसरी बड़ी सफलता यह रही कि उसने संघर्ष को पूर्ण सैन्य पराजय या विजय के बजाय “लंबे गतिरोध” में बदल दिया। आज तीन महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी युद्ध निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुँचा है। एक अस्थिर युद्धविराम, रुक-रुक कर होने वाली सैन्य कार्रवाइयाँ और लगातार चल रही वार्ताएँ इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका भी अब किसी न किसी समझौते की तलाश में है।
इतिहास में अमेरिका को इराक और अफगानिस्तान में भी इसी प्रकार के अनुभवों से गुजरना पड़ा है। सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली होने के बावजूद वह राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने में कठिनाइयों का सामना करता रहा। ईरान का मामला उससे भी अधिक जटिल है। ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की शक्ति-संरचना का केंद्रीय घटक है। उसके पास क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क, वैचारिक प्रभाव, सामरिक भूगोल और ऊर्जा मार्गों पर प्रभाव जैसी ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें केवल हवाई हमलों से समाप्त नहीं किया जा सकता।
युद्ध ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के भीतर भी मतभेद पैदा किए हैं। यूरोप की प्राथमिकता ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता है, जबकि इज़राइल की प्राथमिकता सुरक्षा है। अमेरिका को इन दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। यही कारण है कि हाल के सप्ताहों में वाशिंगटन की भाषा में पहले जैसी आक्रामकता नहीं दिखाई देती। अब बातचीत, समझौते और युद्धविराम की चर्चा अधिक सुनाई दे रही है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ईरान ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता प्रदर्शित कर दी है। आधुनिक विश्व व्यवस्था अत्यधिक परस्पर निर्भर है। यदि होरमुज़ जैसा एक समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो उसका प्रभाव टोक्यो से लेकर मुंबई, फ्रैंकफर्ट से लेकर न्यूयॉर्क तक दिखाई देता है। यही कारण है कि ईरान के साथ संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रहा; वह वैश्विक आर्थिक संकट का स्रोत बन गया।
अमेरिका की एक रणनीतिक भूल यह भी रही कि उसने ईरान को मुख्यतः आर्थिक दृष्टि से देखा। यह सही है कि प्रतिबंधों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाया है, लेकिन किसी राष्ट्र की प्रतिरोधक क्षमता केवल सकल घरेलू उत्पाद से नहीं मापी जाती। राष्ट्रीय अस्मिता, वैचारिक प्रतिबद्धता, ऐतिहासिक स्मृति और भूगोल भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक होते हैं। ईरान ने बार-बार यह दिखाया है कि वह आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद लंबे संघर्ष झेलने की क्षमता रखता है।
आज की स्थिति यह है कि अमेरिका को वही करना पड़ रहा है जिसे वह युद्ध के आरंभ में टालना चाहता था—बातचीत। विभिन्न सूत्रों के अनुसार युद्ध समाप्त करने के लिए प्रस्तावित समझौते पर चर्चा जारी है। ईरान भी अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए किसी अंतरिम व्यवस्था पर विचार कर रहा है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अभी भी गहरा है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सबक सामने आता है। किसी देश को केवल उसकी आर्थिक कठिनाइयों, प्रतिबंधों या तकनीकी पिछड़ेपन के आधार पर कमजोर मान लेना खतरनाक भूल हो सकती है। ईरान ने यह सिद्ध किया है कि सामरिक भूगोल, ऊर्जा मार्गों पर प्रभाव और दीर्घकालिक प्रतिरोध क्षमता किसी भी आधुनिक युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज अमेरिका केवल ईरान से नहीं लड़ रहा, बल्कि उस भू-राजनीतिक वास्तविकता से जूझ रहा है जिसे उसने प्रारंभ में पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझा। युद्ध शुरू करना अपेक्षाकृत आसान होता है; उसे अपने अनुकूल परिणाम तक पहुँचाना कहीं अधिक कठिन। ईरान को शीघ्र झुकाने की जो परिकल्पना युद्ध के आरंभ में दिखाई दे रही थी, वह आज एक लंबे और महँगे गतिरोध में बदल चुकी है।
यदि आने वाले दिनों में कोई व्यापक समझौता होता है, तो वह केवल सैन्य शक्ति की नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक यथार्थ की जीत होगी। और यदि यह संघर्ष लंबा चलता है, तो उसकी कीमत केवल ईरान ही नहीं, बल्कि अमेरिका और पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ईरान को कमजोर समझकर शुरू किए गए अभियान का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला है, जबकि उसका आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक मूल्य अमेरिका को लगातार चुकाना पड़ रहा है।

विराट की टीम ने फिर दिखाया विराट दम, पर महफिल लूट ले गए वैभव

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लखनऊ । क्रिकेट के आईपीएल टी -20 का तूफान तो अगले सत्र तक के लिए शांत हो चुका है लेकिन 2026 आईपीएल की गहन समीक्षा जारी है। रजत पाटीदार के नेतृत्व वाली रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरू ने अपने गेंदबाज़ों और बल्लेबाज़ों के करिश्माई प्रदर्शन के चलते अपना खिताब बचाने में सफलता प्राप्त की और लगातार दूसरी बार आईपीएल ट्रॉफी उठाई । एक बार फिर विराट कोहली जीत के नायक बने। आईपीएल- 2026 में विराट ने अपने प्रदर्शन से अपने उन आलोचकों को करारा उत्तर दिया जिन्होंने विराट को संन्यास लेने के लिए मजबूर किया था। विराट ने खेल के मैदान में एक बार फिर जता दिया कि जब कोई टीम किसी लक्ष्य का पीछा करने के लिए मैदान में उतरती है तो उसके महारथी अभी भी विराट कोहली ही हैं। आईपीएल के फाइनल में विराट एक छोर पर डटे रहे और 42 गेंदों में 75 रन बनाकर अपनी टीम को जिताने में सफल रहे। शुभमन गिल के नेतृत्व वाली गुजरात टाइटंस को अपने ही मैदान मे निराश होना पड़ा।
आईपीएल -2026 कई कीर्तिमानों व रोचक पलों के लिए याद किया जाएगा। आईपीएल- 2026 में कुछ नए सितारों का उदय हुआ, कुछ पुराने खिलाड़ियों ने अपनी टीम के लिए बेहतरीन प्रदर्शन करके लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
वैभव रघुवंशी – बल्लेबाजी में राजस्थान रॉयल्स के 15 वर्षीय वैभव रघुवंशी ने अपने पहले ही सत्र में बेहद आक्रामक व तूफानी बल्लेबाजी से सभी को सम्मोहित करने मे सफलता प्राप्त की। सत्र की समाप्ति तक वैभव भारत के दुलारे बन गए। वैभव दो बार शतक के बेहद करीब आकर भी शतक बनाने से चूक गए नहीं तो एक यह रिकार्ड भी उनके नाम हो जाता। वैभव अपने पहले ही सत्र में ऑरेंज कैप अवार्ड जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं। वैभव ने आईपीएल- 2026 में सबसे अधिक 776 रन बनाए और छक्कों के मामलो में वेस्टइंडीज के तूफानी क्रिसगेल के 14 छक्कों का रिकार्ड भी ध्वस्त कर दिया। वैभव ने 16 मैचों की 16 पारियों में 48.50 के औसत और 237.30 स्ट्राइक रेट से 776 रन बनाए। इनमें एक शतक तथा 5 अर्धशतक शामिल हैं। आईपीएल में वैभव ने चौकों – छक्कों की बारिश करते हुए कुल 63 चौके और 72 छक्के लगाए।
दूसरे स्थान पर गुजरात टाइटंस के बल्लेबाज कप्तान शुभमन गिल रहे जिन्होंने 732 रन बनाए और तीसरे नंबर पर गुजरात के ही बल्लेबाज साई सुदर्शन रहे जिन्होंने 722 रन बनाए और आईपीएल -2026 में चमकदार बल्लेबाज बनकर उभरे । साई सुदर्शन भी क्रिकेट प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। क्रिकेट कमेंटर्स, समीक्षक तथा विश्लेषकों ने साईं के प्रदर्शन की सराहना करते हुए कहा कि वह आने वाले समय में भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम का अहम हिस्सा हो सकते हैं।
आई पी एल से उभरे नए खिलाड़ियों में वैभव के लिए भारत की राष्ट्रीय टीम में शामिल होने का द्वार खुल गया है। वैभव को भारत -ए की टीम मे शामिल कर लिया गया है और उनका पहला विदेशी दौरा श्रीलंका की धरती से शुरू होगा जहां त्रिकोणीय श्रृंखला खेली जानी है। वैभव का नाम सितंबर -अक्टूबर में जापान मे आयोजित होने जा रहे एशियाई खेलों की क्रिकेट टीम में भी शामिल किया गया है। वैभव की अग्निपरीक्षा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व दक्षिण अफ्रीका के मैदानों पर होगी क्योंकि इन देशों की पिचें काफी तेज मानी जाती हैं।
वैभव, शुभमन और साईं के अलावा यशस्वी जायसवाल, राजस्थान के रियान पराग आदि ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है और लोगों को आकर्षित किया है।
गेंदबाज़ी – भारतीय क्रिकेट टीम से बाहर चल रहे बंगलुरू के तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार सर्वाधिक 28 विकेट लेकर सबसे सफल गेंदबाज रहे और अपनी फिटनेस को साबित किया दूसरे नंबर पर ज्योफ्रा आर्चर रहे जिन्होंने अपनी टीम के लिए 25 विकेट लिए। आईपीएल -2026 नए गेंदबाजों को खोजने में नाकाम रहा। इस बार बल्लेबाज ही पूरे सत्र पर छाए रहे। हार्दिक पांड्या जैसे गेंदबाजो के लिए यह सीजन एक बुरा सपना रहा।
नाम बड़े दर्शन छोटे – आईपीएल सीजन- 2026 में 10 महंगे खिलाड़ी लगभग 125 करोड़ में बिके लेकिन ये नाम बड़े और दर्शन छोटे की कहावत सिद्ध करने में लगे रहे। कोलकाता के कैमरून ग्रीन, चेन्नई के कार्तिक शर्मा, चेन्नई के ही प्रशांत वीर, राजस्थान के रवि विश्वनोई, दिल्ली के आकिब अली, लखनऊ के जोस इग्लिस, हैदराबाद के लिविंगस्टोन आदि खिलाड़ी पूरी तरह से नाकाम रहे।
आईपीएल -2026 में किसी भी टीम का कप्तान अपने घरेलू मैदानों पर अपने मन की पिच नही बनवा सका और न ही विजय प्राप्त कर सका। फाइनल मुकाबले में भी यह देखने को मिला, जहां अहमदाबाद में गुजरात को अपने ही स्टेडियम में हार का सामना करना पड़ा। लखनऊ की टीम भी अपने ही मैदान में हारती चली गई।
आईपीएल- 2026 क्रिकेट प्रेमियों को कई यादगार अनुभव देकर विदा हुआ है, वैभव के साथ साथ दूसरी उभरती प्रतिभाओं के लिए मार्ग खोलकर विदा हुआ है।

Not For Sale सफाई से घिरा प्रतिष्ठित अख़बार The Assam Tribune

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । क्या आपने कभी किसी दैनिक अखबार के प्रबंधन द्वारा प्रकाशित कोई ऐसा विज्ञापन पहले पन्ने पर देखा या सुना है, जिसमें कहा गया हो कि वह अखबार बिक्री के लिए नहीं (Not For Sale) है? खबरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण जगह (जो सम्मानित पाठकों के लिए होती है) का इस्तेमाल करते हुए, The Assam Tribune के मालिकों ने 26 मई 2026 को एक विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें जोर देकर कहा गया कि यह प्रतिष्ठित दैनिक अखबार बेचा नहीं जा रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि Assam Tribune के मौजूदा प्रबंधन ने ऐसा असामान्य कदम उठाने का फैसला क्यों किया? वे सोशल मीडिया पर फैल रही कुछ अफवाहों का खंडन करते हुए, सिर्फ एक छोटे से स्पष्टीकरण तक ही क्यों सीमित नहीं रहे? क्या इसे वैकल्पिक मीडिया में छपी किसी बात पर की गई ‘अति-प्रतिक्रिया’ माना जाए, या फिर प्रबंधन वास्तव में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बात छिपाने की कोशिश कर रहा था?

एक कड़े शब्दों वाले विज्ञापन में, जिसमें यह मजबूत पंक्ति लिखी थी—‘द असम ट्रिब्यून बिक्री के लिए नहीं है’—यह दावा किया गया कि सोशल मीडिया पर अखबार की कथित बिक्री को लेकर जो व्यापक अटकलें लगाई जा रही हैं, वे पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। विज्ञापन में कहा गया, “पिछले 88 गौरवशाली वर्षों से, ‘द असम ट्रिब्यून’ एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और जिम्मेदार संस्था के रूप में खड़ा रहा है; यह पूरी ईमानदारी, साहस और पत्रकारिता की उत्कृष्टता के साथ राष्ट्र और जनता की सेवा के लिए समर्पित है।” विज्ञापन में यह भी जोड़ा गया कि प्रबंधन के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति, समूह या संस्था के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करे, जो इस तरह की आधारहीन और मानहानिकारक सामग्री को बनाने, फैलाने या बढ़ावा देने में शामिल पाया जाता है।
इस मुद्दे ने तब और जोर पकड़ा, जब मई 2026 के चौथे सप्ताह में सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैल गई कि इस प्रतिष्ठित अखबार को पहले ही उद्योगपति गौतम अडानी (अडानी समूह के अध्यक्ष) को लगभग 421 करोड़ रुपये में बेच दिया गया है। जल्द ही कई जानी-मानी हस्तियों ने भी इस बात को आगे बढ़ाया। उन्होंने कई तरह के दावे किए, जैसे कि प्रबंधन पिछले काफी समय से Assam Tribune के कर्मचारियों को नियमित रूप से वेतन नहीं दे पा रहा है, और ट्रिब्यून मीडिया हाउस के 75 से अधिक पूर्व कर्मचारियों को अभी भी उनके कानूनी बकाए का भुगतान नहीं मिला है, जिसके चलते उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। हालांकि, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने वाले अधिकांश लोगों ने इस भरोसेमंद अखबार की बिगड़ती वित्तीय स्थिति पर अपना दुख और चिंता व्यक्त की।
पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे पुराना मीडिया समूह वित्तीय संकट का सामना कर रहा है—इस बात की पुष्टि ‘असम ट्रिब्यून कर्मचारी संघ’ के आधिकारिक बयानों से भी हुई। संघ ने अपने बयानों में नियमित वेतन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले अन्य बकाए के भुगतान में हो रही देरी का आरोप लगाया। यूनियन ने दफ़्तर परिसर में कई प्रदर्शन आयोजित किए और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी संबोधित किया, जिसमें दावा किया गया कि असम सरकार के सूचना और जनसंपर्क विभाग के पास बड़ी मात्रा में पैसा (विज्ञापन से होने वाली कमाई) बकाया है। प्रबंधन ने भी इसी तरह की बात दोहराते हुए कहा कि उसे उन बकाया लाखों रुपयों की तत्काल ज़रूरत है।
इन सभी परेशान करने वाले घटनाक्रमों के बीच, प्रबंधन ने अपनी एक सहयोगी प्रकाशन, ‘दैनिक असम’ की ज़िम्मेदारी एक अलग मीडिया हाउस के मालिक को सौंप दी। नए मालिक ने 17 सितंबर 2025 को इस असमिया दैनिक का नेतृत्व संभालते हुए, 75 से ज़्यादा कर्मचारियों (जो ‘दैनिक असम’ से जुड़े थे) की देनदारी लेने से इनकार कर दिया। पुराने प्रबंधन को निकाले गए कर्मचारियों के सभी बकाए का भुगतान जल्द से जल्द कर देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आखिरकार, उन्होंने कानूनी मदद के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, और ख़बरों के मुताबिक, अदालत ने हाल ही में प्रबंधन को उन कर्मचारियों का बकाया चुकाने का निर्देश दिया है।
यह मीडिया हाउस, जिसकी स्थापना 1939 में असम के उद्यमी ‘राधा गोविंदा बरुआ’ ने की थी और जो गुवाहाटी से कई अखबार प्रकाशित करता था, इस क्षेत्र में एक ईमानदार समाचार प्रकाशन के रूप में जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि ट्रिब्यून हाउस ने 2010 में देश में पहली बार ‘मजीठिया वेतन बोर्ड’ की सिफारिशों को लागू किया था। ‘दैनिक असम’ की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने से ठीक पहले, मालिकों के मौजूदा समूह ने चुपचाप अपने सात दशक पुराने टैब्लॉइड ‘असम बानी’ को भी खामोशी से खत्म कर दिया। इस मुख्यधारा के साप्ताहिक अखबार को ‘दैनिक असम’ के साथ एक रविवार परिशिष्ट के रूप में मिला दिया गया था। हालाँकि, खरीदार ने इस साप्ताहिक का स्वामित्व नहीं लिया, और इस तरह इसे एक अवांछित और दुखद अंत का सामना करना पड़ा। ‘असम बानी’ आखिरी बार 12 सितंबर 2025 को एक परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित हुआ था, लेकिन ट्रिब्यून प्रबंधन ने इसके बंद होने पर कोई बयान जारी नहीं किया।
ट्रिब्यून मीडिया समूह ने असम के विभिन्न महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों को देखा और रिपोर्ट किया—जैसे कि स्कूली शिक्षा के माध्यम से जुड़ा आंदोलन, घुसपैठ-विरोधी आंदोलन, अलगाववादी उग्रवाद का अचानक उभार, आम सामाजिक अशांति, क्षेत्रीय राजनीति का उदय, आदि—और यह सब उसने यहाँ की मूल आबादी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ किया। कोविड-19 महामारी के ठीक बाद, असम के सभी अखबारों को प्रसार और राजस्व में भारी गिरावट के कारण अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ा।
मीडिया पर्यवेक्षकों का कहना है कि ट्रिब्यून हाउस ने ऐतिहासिक रूप से सूचनाओं, संपादकीय और लेखों के प्रसार में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखी थी, लेकिन हाल के वर्षों में, इन सिद्धांतों के साथ काफी हद तक समझौता किया गया है। Assam Tribune ने 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन को व्यापक रूप से कवर किया, और केंद्र सरकार की उस पहल के खिलाफ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को काफी जगह दी, जिसका उद्देश्य मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए सताए हुए हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई परिवारों को राजनीतिक समर्थन देना था। इस कवरेज ने असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में हफ्तों तक अशांति को हवा दी, जिसमें यह नैरेटिव (कथा) उभरा कि नया नागरिकता कानून Assam Accord को कमजोर कर देगा, जिसने विदेशियों के खिलाफ चले आंदोलन को 1985 में समाप्त किया था।
इसके अलावा, असम के लोगों को छह साल पहले गुवाहाटी प्रेस क्लब चुनावों की पूर्व संध्या पर Assam Tribune के लिए तैयार की गई पक्षपातपूर्ण मीडिया रिपोर्टों की एक श्रृंखला याद है। वे कम विश्वसनीयता वाली रिपोर्टें प्रेस क्लब के तत्कालीन सचिव पर व्यक्तिगत हमलों से भरी हुई थीं, जिसने अंततः इस अखबार की कड़ी मेहनत से अर्जित प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया।
भले ही ट्रिब्यून मीडिया हाउस की मौजूदा आर्थिक स्थिति बेहद खराब है, लेकिन यह संकट केवल कोविड-19 की वजह से पैदा नहीं हुआ है; बल्कि न्यूज़-डेस्क के कुछ बदनीयत कर्मचारियों द्वारा बिना किसी जवाबदेही के संपादकीय स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल करने की आदत ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया। असल में, वे मीडिया पेशेवर जो संस्थान के भीतर तमाम सुविधाओं का लाभ उठाते हुए भी अशांति फैला रहे थे, उन्होंने भारी मुसीबतें खड़ी कर दीं—और इस दौरान प्रबंधन मूक दर्शक बना रहा, जिसके कारण केवल वही बेहतर जानते हैं।
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक)
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