संयुक्त राष्ट्र में भारत की छाप

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लखनऊ । संयुक्त राष्ट्र महासभा -2026 में भारत ने गहरी छाप छोड़ी। बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर व उनकी टीम ने जहां एक ओर अपने सहयोगी व मित्र राष्ट्रों के साथ संयुक्त राष्ट्र के सुधार व विस्तार पर चर्चा की वहीं दूसरी ओर इस अंतरराष्ट्रीय मंच से पाकिस्तान के झूठ और फरेब को बेनकाब किया । संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का संबोधन एक ऐसा सधा हुआ संबोधन था जिसको महासभा में उपस्थित सभी देशों के प्रतिनिधियों ने ध्यान से सुना और तालियां बजाकर उसका समर्थन भी किया ।
इससे पूर्व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाने और भारत के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करने पर भारत ने अपने राइट आफ रिप्लाई का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को अब गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने पाकिस्तान की झूठ की कलई खोलकर रख दी ।
पेटल गहलोत ने कहा कि दुनिया को गुमराह करने वाले इस देश का सच अब किसी से छुपा नहीं है। उन्होंने पाकिस्तान की सरकार को सेना द्वारा संचालित एक कठपुतली शासन करार दिया जिसको राजधानी में अपनी अवाम से बचने के लिए सुरक्षा की दीवारें खड़ी करनी पड़ रही हैं। शाहबाज शरीफ द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ करने पर भी भारत ने करारा जवाब दिया। भारत ने याद दिलाया कि यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया ने 9/11 के भयानक आतंकी हमले की 25वीं बरसी मनाई है। यह जगजाहिर है कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा बिन लादेन पाकिस्तानी सेना की अकादमी के ठीक बगल में पनाह पाए हुआ था। पेटल ने कहाकि हमारा आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा का अधिकार बना रहेगा। पाकिस्तान द्वारा जारी आतंकवाद के गंभीर परिणाम होंगे। भारत ने पूरी दुनिया को एक बार फिर स्पष्ट रूप से बता दिया है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है और हमेशा रहेगा।
विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अपने संबोधन में सभी विषयों पर विचार रखकर पूरी दुनिया को स्पष्ट कर दिया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगा। भारत ने रूस -यूक्रेन के मध्य चल रहे संघर्ष और अमेरिका -ईरान तनाव के कारण बढ़ रही वैश्विक चुनौतियों तथा ऊर्जा सप्लाई के बाधित होने पर चिंता व्यक्त की और भारतीय नाविकों पर हो रहे हमलों का मुद्दा भी उठाया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से मिलने वाले अवसरों का अधिकतम उपयोग करने के साथ इसके संभावित परिणामों और उभरते जोखिमों से निपटने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एआई में नवाचार को बढ़ावा देते हुए इसके सुरक्षा प्रभावों का भी ध्यान में रखना जरूरी है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत ने अत्यंत कड़ाई के साथ स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद को सामान्य बनाने और उसके नतीजों से बचने के लिए दलीलें दी गईं लेकिन इनमें से कोई भी तर्क अब नहीं टिकेगा। भारत ने स्पष्ट किया कि हम आतंकवाद के खिलाफ अपनी रक्षा करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। दोस्ती और सद्भावना, आतंकवाद के साथ नहीं चल सकती और ऐसी सोच पर आधारित समझौटन पर स्वाभविक रूप से सवाल उठेंगे।आतंकवाद फैलाने के अभ्यस्त देश को ही अपना रवैया बदलना होगा। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दुनिया में शांति और सुरक्षा के उद्देश्य से की गई थी किंतु आज भी संघर्ष और टकराव दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है।भारत ने पूरी दुनिया से शांति की अपील करते हुए कहा कि शांति बनाए रखने में नाकामी से न सिर्फ सुरक्षा कमजोर होती है अपितु विकास और प्रगति पर भी असर पड़ता है।
विश्व के 11 नेताओं के भाषणों में भी भारत किसी न किसी रूप में छाया रहा। अधिकतर नेताओं ने भारत की बढ़ती भूमिका और उसके साथ सहयोग की जरूरत को रेखांकित किया जबकि कुछ ने भारतीय नागरिकों से जुड़े मुद्दे भी उठाए। पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेरगो ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए भारत को स्थायी सदस्यता देने का समर्थन किया। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने बाढ़ के बाद भारत की मदद के लिए आभार जताया। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने बहुपक्षवाद,अंतरराष्ट्रीय कानून शांति और समृद्धि से जुड़ी पी4एम में भारत की भागीदारी का उल्लेख फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने व्यापार, दुर्लभ खनिजों व महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग में भारत का नाम लिया। भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने भारत की मदद से सीमा के पास विकसित हो रही गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी का उल्लेख किया। फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने भारत की यात्रा को याद किया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्कहम ने भारत एक उभरती हुई ताकत बताया। किया।आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने हिंद-प्रशान्त क्षेत्र में भारत -जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संबंध मजबूत करने की बात कही। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए कहा कि इतिहास में उन्होंने किसी भी नेता से अधिक लोगों तक ऊर्जा पहुंचाई है।मोदी के कार्यकाल में जितने लोगों को ऊर्जा की पहुंच मिली उतनी किसी दशक में किसी क्षेत्र या देश में नहीं मिली।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की 81वीं वार्षिक बैठक में यह स्पष्ट हो गया कि अब पूरा विश्व भारत को सुन रहा है और अधिकांश देश भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं।

एसीवाईपीएल, सीआईए और प्रधानमंत्री मोदी

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डॉ पवन विजय

दिल्ली । पिछले दो हफ्तों से एक तस्वीर वायरल है। साल 1993, एक युवा भारतीय नेता अमेरिका में खड़ा है। तस्वीर पर लिखा है – एसीवाईपीएल। और नीचे कैप्शन – “सबूत मिल गया, प्रधानमंत्री सीआईए एजेंट हैं।”

हमने 10 दिन इस दावे के दस्तावेज खंगाले।एसीवाईपीएल की वेबसाइट, फॉर्म 990, ट्रंप का बयान, अलुमनाई लिस्ट। जो तथ्य सामने आया उसे आप सभी देखिए।

1. एसीवाईपीएल मतलब अमेरिकन काउंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स। 1966 में बना एक ओपन यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम जिसका काम – दुनिया के 25 से 40 साल के युवा नेताओं को दो हफ्ते अमेरिका घुमाना, अमेरिकी सिस्टम दिखाना।

इसकी पूरी जानकारी पब्लिक है। इसकी वेबसाइट: http://acypl.org है, इसका सीईओ लिब्बी रोजेनबॉम है और चेयरमैन का नाम जोसेफ जोन्स है। इसका 2023 बजट में 31 लाख डॉलर, यानी 26 करोड़ रुपये था जिससे दिल्ली में अक्षरधाम खेलगांव के आप केवल चार अपार्टमेंट खरीद सकते हैं। इसका स्पॉन्सर वॉलमार्ट, अमेजन, फाइजर, यूएस स्टेट डिपार्टमेंट है।

सीआईए अपना बजट, बोर्ड और स्पॉन्सर वेबसाइट पर नहीं डालती।

जोसेफ जोन्स कौन हैं? कोई जनरल नहीं, कोई जासूस नहीं। आयोवा के एक कम्युनिटी ऑर्गनाइजर हैं। ग्रेटर डेस मोइनेस पार्टनरशिप में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रहे, फिर यूनाइटेड वे ऑफ सेंट्रल आयोवा जैसे नॉन-प्रॉफिट में काम किया। पॉडकास्ट में खुद बताते हैं – 8 साल की उम्र में लिफाफे बांट कर करियर शुरू किया। भाषणों का टॉपिक सिर्फ तीन है – यूथ लीडरशिप, पड़ोसियों से बात करो, संवाद करो।

अगर ये सीआईए का फ्रंट होता, तो इसका चेयर एक रिटायर्ड जनरल होता, न कि एक चैरिटी में पैसा जुटाने वाला आदमी।

2. बीजेपी ने अकेले मोदी को नहीं भेजा था। 1993 वाला प्रोग्राम 10 जुलाई से 23 जुलाई 1993 तक चला था। उसमें अमेरिकी विदेश विभाग और एसीवाईपीएल ने भारत से एक सर्वदलीय डेलिगेशन बुलाया था। नरेंद्र मोदी उसमें बीजेपी के एक कार्यकर्ता के तौर पर बाजपेई जी द्वारा भेजे गए थे, तब उनका कोई बड़ा पद नहीं था।

एसीवाईपीएल हर साल 5-6 भारतीय नेताओं का मिक्स बैच बुलाता है – बीजेपी, कांग्रेस, क्षेत्रीय दल सब मिलाकर। इसी पैटर्न से 2018 में भी अमेरिकी डेलिगेशन इंडिया आया था, जिसमें डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों थे।

1993 में मोदी के साथ उसी बैच में और कौन भारतीय थे, इसकी पूरी ऑफिशियल लिस्ट एसीवाईपीएल ने कभी पब्लिक नहीं की है। वो एक प्राइवेट नॉन-प्रॉफिट है, आरटीआई में भी नहीं आती।

उसी ट्रिप में मोदी वाशिंगटन डीसी में विश्व हिंदू परिषद के स्वामी विवेकानंद शताब्दी समारोह में भी शामिल हुए थे, जहां 15-20 हजार लोग आए थे। उनके साथ रहे आरएसएस प्रचारक हसमुख पटेल ने बताया कि मोदी ने वहां यूथ कॉन्फ्रेंस ऑर्गनाइज किया था।

3. क्या एसीवाईपीएल ने किसी देश को कंट्रोल किया?

इसका उत्तर है एक भी नहीं।

कंट्रोल के लिए तीन चीजें चाहिए – कर्ज, हथियार, तेल। एसीवाईपीएल के पास इनमें से कुछ नहीं है। 26 करोड़ के बजट से देश कंट्रोल नहीं होते।

एसीवाईपीएल 1966 से अब तक 100 देशों के 8000 से ज्यादा नेताओं को बुला चुका है। फिलिस्तीन को भी, चीन को भी, पाकिस्तान को भी, क्यूबा को भी।

क्या फिलिस्तीन अमेरिका से कंट्रोल है? नहीं। क्या चीन अमेरिका से कंट्रोल है? नहीं।

भारत से ही 120 से ज्यादा नेता गए हैं। भाजपा से अरुण जेटली, स्मृति ईरानी, रोहित चहल, प्रज्वल बुस्ता। बीजेडी से सस्मित पात्रा, जिनका सर्टिफिकेट 2020 का पब्लिक है।

अगर एसीवाईपीएल में जाना सीआईए का एजेंट होना है, तो भारत समेत विश्व की पूरी पॉलिटिकल लीडरशिप अमेरिका की एजेंट है।

4. अलुमनाई में कौन है? वामपंथी भी, दक्षिणपंथी भी।

एसीवाईपीएल की ऑफिशियल लिस्ट http://acypl.org/notable-alumni पर देखिए।

वामपंथी / डेमोक्रेट में – जेनेट मिल्स, गवर्नर मेन। जेबी प्रित्जकर, गवर्नर इलिनोइस। एंड्रिया कैंपबेल, अटॉर्नी जनरल मेसाचुसेट्स। एरोन फोर्ड, अटॉर्नी जनरल नेवादा, जो इंडिया 2018 में आए थे।

दक्षिणपंथी / रिपब्लिकन में – किम रेनॉल्ड्स, गवर्नर आयोवा, ट्रंप की करीबी। टॉड रोकिता, अटॉर्नी जनरल इंडियाना। ट्रे हर्गेट, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट टेनेसी।

अगर ये सीआईए का प्रोग्राम होता, तो सीआईए एक ही फ्लाइट में ट्रंप समर्थक और बर्नी समर्थक को क्यों बिठाती?

5. तो क्या प्रधानमंत्री अमेरिका से नियंत्रित हैं? अमेरिका क्या कहता है इस संदर्भ में यह जानना महत्वपूर्ण है।

20 जून 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक्सियोस को कहा –

“मुझे लगता है मोदी बहुत अच्छे हैं। वो युद्धों से दूर रहते हैं, जो समझदारी है। वो 1.5 अरब लोगों के नेता हैं। वो वास्तव में सबसे बड़े हैं। भारत वास्तव में सबसे बड़ा है। और मोदी एक महान नेता हैं।”

“हम उनके साथ बहुत व्यापार करते हैं, लेकिन अब हम बराबरी का व्यापार करते हैं। वो पहले हमें बहुत लूटते थे।”

“वो युद्धों से दूर रहते हैं” – अमेरिका चाहता था भारत रूस पर बैन लगाए। प्रधानमंत्री ने तेल 1 परसेंट से 40 परसेंट कर दिया। ये एजेंट का काम नहीं है।

ट्रंप ने उन्हें टफ कुकी कहा। एजेंट को टफ नहीं, आज्ञाकारी कहा जाता है।

अंतिम बात

अमेरिका का प्रभाव थिंक टैंक, फंडिंग, एफसीआरए के जरिए होता है, एक 1993 की फोटो से नहीं।

आप मोदी से सहमत हों, असहमत हों चलेगा लेकिन मोदी को देशद्रोही बताना आपका उन शक्तियों के प्रभाव। में आना माना जाएगा जिन्होंने मोदी को 2002 से आजतक घृणा का पात्र बताया, हिंदुत्व का जहरीला पोस्टर बॉय बताया और जाने क्या क्या कहा, जो सत्ता में मोदी को एक पल नहीं देखना चाहते।

मोदी को सीआईए का एजेंट बताना यह सिद्ध करता है कि जिन शक्तियों से मोदी लड़ते रहे, उन शक्तियों ने अब मोदी से सीधा लड़ना छोड़ मोदी के पूर्व समर्थकों की ढाल लेकर लड़ने की रणनीति पर काम करने लगी हैं। यह रणनीति काफी कारगर है। मुखौटा बदलने में वामपंथी माहिर होते हैं।

अब मुखौटा मोदी समर्थक का है। इससे पार पाना बहुत मुश्किल प्रतीत होता है क्योंकि सच और झूठ के बीच की लाइन धुंधली करने में वामपंथी सफल हो रहे हैं।

‘Grit & Glory’ released in Guwahati, homage paid to RSS martyrs

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Guwahati: Grit & Glory : How India’s Northeast was Transformed One Heart at a Time, a book penned by acclaimed author Abhijit Joag, was released on 26 September 2026 at NEDFi Convention Centre in the city. Rajiv Kr Bora, IAS (retired) released the book in the gracious presence of senior Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) pracharaks Haribhau Mirasdar and Ulhas Kulkarni on the dais. Presided over by journalist Nava Thakuria, the meeting witnessed a large number of RSS Karyakartas and civil society representatives.
Published by New Delhi-based Suruchi Prakashan, the book with 300 pages and priced at Rs 445 is forwarded by Union minister Nitin Gadkari. RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat, stated as saying, “The book is an inspiring word picture of the dedication and grit with which many young workers of Rashtriya Swayamsevak Sangh and Rashtra Sevika Samiti transformed the North-East of Bharat, which will create the same grit and dedication in the youth of Bharat so that our sacred motherland will attain supreme glory to the benefit of all mankind.”
The book narrates the stories of individuals who worked with Sangh for social transformation in northeast India, where many had to sacrifice their precious lives. It also focuses on the history, challenges and social transformation of the region, surrounded by Nepal, Bhutan, Tibet (now under China), Myanmar and Bangladesh, with special attention to the pracharaks and other volunteers associated with RSS affiliated organisations. It contains inputs from hundreds of RSS volunteers from across the nation turning the book as a treasure of hope and aspiration for billions of Bharatiyas.
Inaugurating the book, Bora mentioned about the challenges faced by RSS workers at the initial years in the region. Many RSS pracharaks even lost their lives while working, he added. Mirasdar revealed that the RSS started working for the region in 1946 from Guwahati and its expansion remained slow for many years. However, the Sangh workers faced all challenges and led the RSS to a greater height soon. Kulkarni in his speech narrated how the Sangh volunteers were hated by a section in north-eastern society even though the RSS supported the Assam Agitation against the illegal migrants from Bangladesh.
Thakuria, in his closing remark, emphasised on credible reporting on the RSS and its activities by the media outlets. At the beginning of the program, Pushpanjali was offered in front of Bharat Mata portrait by the distinguished guests. The program was anchored by Nabamita Deb, where a Borgeet was performed by Rita Bhuyan, and vote of thanks was offered by Hirak Sarma. It ended with the singing full version of ‘Vande Mataram’, the national song of Bharat.

अर्थव्यवस्था सातों दिन चल रही है, तो बैंकिंग सेवा को क्‍यों सीमित करने का तर्क दिया जा रहा?

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । भारत की अर्थव्यवस्था बदल रही है और उसके साथ बैंक की भूमिका भी। आज बैंक रुपये जमा करने और निकालने के साथ ही वेतन, पेंशन, किसान भुगतान, व्यापारिक लेन-देन, ऋण, निवेश, सरकारी योजनाओं की राशि और डिजिटल भुगतान, सबकी धुरी बन चुका है। ऐसे समय में सप्ताह में दो दिन बैंक शाखाओं को बंद करने की मांग पर एक बुनियादी सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलती आर्थिक जरूरत का उत्तर है या कर्मचारी सुविधा का विस्तार?

मान लीजिए किसी छोटे दुकानदार की दुकान सोमवार से शनिवार तक खुलती है। किसी निजी कर्मचारी को भी सप्ताह में छह दिन काम करना पड़ता है। किसी श्रमिक के पास रविवार ही एकमात्र अवकाश है। वह बैंक की शाखा में कब जाए? उसे यह कह देना कि मोबाइल बैंकिंग या इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल करे। वास्तव में समझना होगा कि यह हर समस्या का समाधान नहीं है। भारत का बड़ा हिस्सा आज भी शाखा आधारित बैंकिंग पर निर्भर है। वरिष्ठ नागरिकों, छोटे कारोबारियों, ग्रामीण ग्राहकों और जटिल दस्तावेजी कार्यों वाले लोगों के लिए बैंक की भौतिक शाखा आज भी आवश्यक है, इसलिए शनिवार बैंक के लिए एक कार्यदिवस से कहीं बढ़कर वह ग्राहक के लिए एक अतिरिक्त सेवा-दिवस भी है।

फिर बैंक कर्मचारियों को यह भी याद रखना ही चाहिए कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए नियमानुसार विभिन्न अवकाश पहले से उपलब्ध हैं, इसलिए हर सप्ताह दो दिन का स्थायी अवकाश मांगते समय वह यह भी विचारें कि इससे नागरिक को मिलने वाली सेवा पर क्या असर पड़ेगा। सार्वजनिक संस्थान का मूल उद्देश्य जनता को सेवा देना है। यहीं पांच दिवसीय बैंकिंग के पक्ष में दिया जाने वाला यह तर्क भी अधूरा लगता है कि सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना अतिरिक्त समय देकर शनिवार की भरपाई हो जाएगी। कर्मचारी के कुल कार्यघंटे संतुलित हो सकते हैं, किंतु उस ग्राहक के लिए शनिवार की सेवा वापस कैसे आएगी जो सप्ताह के बाकी छह दिनों में काम करता है? अतः कर्मचारी के समय और ग्राहक की सुविधा को एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता, जिसमें कि शाम चार बजे के बाद बैंक किसी भी ग्राहक को बैंक के अंदर नहीं घुसने देती हों!

वस्‍तुत: बैंकिंग व्यवस्था का महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि सरकार को मौजूदा सितंबर के घटनाक्रम में रविवार को भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को खोलने की व्यवस्था करनी पड़ी है। 28 से शुरू की गई और 30 सितंबर तक चलने वाली हड़ताल के बीच यह भी देखें कि 30 सितंबर को अर्धवार्षिक लेखा समापन भी है। सप्ताहांत और हड़ताल के लगातार पड़ने से बैंकिंग सेवाओं पर कई दिनों तक प्रभाव पड़ने की आशंका स्वभाविक ही है। जब सरकार को बैंकिंग व्यवस्था सुचारु रखने के लिए रविवार को बैंक खोलने पड़ रहे हों, तब यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी इस सेवा को नियमित रूप से एक और दिन बंद करने की मांग को किस आधार पर उचित माना जाए?

बैंक से जुड़े कर्मचारी यह समझें कि श्रम का सम्मान उस जिम्मेदारी में भी है जिसके लिए कर्मचारी को समाज भुगतान करता है। डॉक्टर, पुलिसकर्मी, अग्निशमनकर्मी, बिजलीकर्मी या परिवहनकर्मी यह तय नहीं कर सकते कि समाज की जरूरत सप्ताहांत में समाप्त हो गई। बैंकिंग भी आज धीरे-धीरे ऐसी ही अनिवार्य सेवा बनती जा रही है, यदि नागरिक को शनिवार की बैंकिंग सेवा की जरूरत है तो वह उसे मिलनी ही चाहिए।

इस संबंध में भारतीय मजदूर संघ का वर्तमान रुख जरूर संतुलित नजर आया है। बीएमएस ने कार्य-जीवन संतुलन, महिला कर्मचारियों की समस्याओं, पेंशनभोगियों, चिकित्सा सुविधाओं, शिकायत निवारण और स्थानांतरण नीति जैसे मुद्दों को भी उठाया है और संवाद के रास्ते को प्राथमिकता देने की बात कही है। यहां एक व्यापक प्रश्न सामने आता है: क्या कर्मचारी हितों की रक्षा के लिए हड़ताल ही सबसे प्रभावी रास्ता है? क्या यह बैंक कर्मचारियों को नहीं समझ आता कि बैंकिंग जैसे क्षेत्र में हड़ताल का असर उस आम नागरिक पर पड़ता है जो विवाद में शामिल ही नहीं है? वस्तुतः व्यापारी का भुगतान अटक सकता है, पेंशनभोगी परेशान हो सकता है, जरूरी नकदी की समस्या पैदा हो सकती है और कारोबार की गति प्रभावित हो सकती है, इसलिए बैंकिंग क्षेत्र में आंदोलन का प्रत्येक निर्णय लोकहित की कसौटी पर भी देखा जाना चाहिए।

आज यह हड़ताल करनेवालों से अवश्‍य पूछा जाए कि भारत की अर्थव्यवस्था सप्ताहांत पर बंद नहीं होती, बाजार खुले रहते हैं, कारोबार चलता है, परिवहन चलता है, ऑनलाइन भुगतान चलता है, वित्तीय लेन-देन चलता है। ऐसे में बैंकिंग की शाखा-व्यवस्था को लगातार कम उपलब्ध कराना बदलती अर्थव्यवस्था के साथ कितना संगत है, क्‍या यह उपभोक्‍ता के साथ न्‍याय है, जिसके रुपयों की दम पर बैंकिंग सेवा में कर्मचारियों के घर चल रहे हैं?

फिर पांच दिवसीय बैंकिंग की बहस को सिर्फ शनिवार की छुट्टी की मांग के रूप में देखने से उसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छूट जाता है। यह प्रश्न है कि सार्वजनिक बैंक किसके लिए हैं? कर्मचारी के लिए वे रोजगार हैं, बैंक प्रबंधन के लिए संस्था हैं, मगर नागरिक के लिए वे उसकी आर्थिक जिंदगी का आधार हैं, इसलिए बैंक कर्मचारियों की उचित कार्यस्थितियां सुनिश्चित हों, उन्हें पर्याप्त विश्राम मिले और उनका सम्मान बना रहे, यह जरूरी है, ये कौन मना कर रहा है? पर साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि बैंकिंग सेवा नागरिक की बदलती जरूरतों के अनुरूप उपलब्ध रहे।

वस्‍तुत: भारत को ऐसी बैंकिंग व्यवस्था चाहिए जिसमें कर्मचारी को मशीन की तरह काम करने के लिए बाध्य न किया जाए, मगर नागरिक को भी अपने बैंक तक पहुंचने के लिए पांच दिनों की सीमा में कैद न होना पड़े। अर्थव्यवस्था जब सातों दिन चल रही है, जब कई शासकीय संस्‍थानों के कर्मचारी भी सप्‍ताह में रविवार छोड़कर छह दिन अपना कार्य पूर्ण जिम्‍मेदारी के साथ कर रहे हैं, तब बैंक कर्मचारियों को अपने कार्य में क्‍यों दिक्‍कत आना चाहिए ?

ऐसे में यह स्‍वभाव‍िक है कि बैंकिंग सेवा को पांच दिनों में सीमित करने का औचित्य सिर्फ कर्मचारी सुविधा से तय नहीं हो सकता। इसका उत्तर लोकहित, सेवा की आवश्यकता और बदलते आर्थिक भारत की वास्तविक जरूरतों में निहित है।यदि संपूर्ण भारत श्रमरत है, तब बैंक कर्मचारी यह नहीं कह सकते कि उन्‍हें अतिरिक्‍त अवकाश चाहिए। फिर सबके साथ से ही सबका विकास होना है और सबके विकास से ही विकसित भारत बनना है, इसलिए भी अच्‍छा यही होगा कि बैंक यूनियनें एवं कर्मचारी हर सप्‍ताह में दो दिन अवकाश की अपनी जिद छोड़ें। वैसे भी उनके पास हर साल तमाम सिंचित अवकाश रहते ही हैं जिनका कि वह समय-समय पर उपयोग करते हैं, तब अतिरिक्‍त शनिवार का बोझ देश की अर्थव्‍यवस्‍था पर डालना कहीं से भी उचित नहीं है।

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