तीन भाषा फार्मूला: स्कूल की घंटी से क्यों कांप उठता है भारत? अब सुप्रीम कोर्ट को करना है फैसला।

Supreme-Court-1-jpg.webp
दिल्ली । भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती। भाषा यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है। और कभी-कभी बारूद भी।
एक मामूली सा स्कूल सर्कुलर फिर तूफान ले आया है।
सीबीएसई ने कहा है कि जुलाई 2026 से कक्षा 9 के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सुनने में बात सीधी लगती है। लेकिन भारत में भाषा का मामला कभी सीधा नहीं होता। यहां तो खीर में भी राजनीति ढूंढ ली जाती है।
बस फिर क्या था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अभिभावक परेशान। बच्चे हक्के-बक्के। शिक्षक माथा पकड़कर बैठे हैं। लोग पूछ रहे हैं : गांव के स्कूल में गणित का मास्टर नहीं मिलता, अब तमिल और कन्नड़ कौन पढ़ाएगा? बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करें या भाषा प्रयोगशाला खोलें?
भारत में भाषा की आग नई नहीं है। यह चिंगारी आजादी के साथ ही पैदा हो गई थी। संविधान सभा में सवाल उठा : देश आखिर बोलेगा क्या?
हिंदी समर्थक चाहते थे कि अंग्रेजी का बोरिया-बिस्तर बांध दिया जाए। दक्षिण भारत डर गया। उन्हें लगा दिल्ली धीरे-धीरे हिंदी का बुलडोजर चला देगी।
आखिर समझौता हुआ। हिंदी राजभाषा बनी। अंग्रेजी को 15 साल की मोहलत मिली। लेकिन, भारत में असली लड़ाई मोहलत खत्म होने पर ही शुरू होती है।
1965 आया।
तमिलनाडु सुलग उठा। छात्र सड़क पर उतर आए। रेल रोकी गईं। नारे गूंजे।आग लगी। लाठियां चलीं। लाशें गिरीं।
दक्षिण भारत को लगा कि हिंदी अब सिर पर बैठाई जा रही है। आंदोलन ऐसा उठा कि कांग्रेस तमिलनाडु में बह गई। द्रविड़ राजनीति का सूरज वहीं से निकला। दिल्ली को पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजी बच गई। हिंदी रुक गई। लेकिन शक का कांटा दिल में धंसा रह गया।
इधर, उत्तर भारत की यूनिवर्सिटीज में सोशलिस्टों ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन को आगे बढ़ाया, स्ट्राइक, प्रदर्शन, बोर्ड पुताई, उपद्रव!
इसी तूफान से निकला “तीन भाषा फार्मूला”।
सोच बड़ी सुंदर थी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। हर बच्चा तीन भाषाएं सीखे।मातृभाषा भी। हिंदी भी। अंग्रेजी भी।
सपना ऐसा कि काशी वाला बच्चा तमिल कविता समझे और चेन्नई वाला बच्चा कबीर पढ़े। भाषा दिलों को जोड़े। देश को गोंद की तरह चिपका दे।
लेकिन भारत में नीति और जमीन का रिश्ता अक्सर सास-बहू जैसा रहता है।
कागज पर फार्मूला चमकता रहा।जमीन पर लड़खड़ाता रहा।
तमिलनाडु ने साफ कह दिया : हमें नहीं चाहिए तीन भाषा फार्मूला। वहां आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो भाषा नीति चलती है। दूसरी तरफ हिंदी पट्टी के कई राज्यों ने भी चालाकी दिखाई। दक्षिण भारतीय भाषाएं पढ़ाने की जगह संस्कृत डाल दी। सांप भी मर गया, लाठी भी नहीं टूटी।
यही बात दक्षिण भारत को चुभती है।
एक तमिल बच्चा हिंदी सीखे।
लेकिन उत्तर भारत का बच्चा तमिल क्यों नहीं सीखता?
यही सवाल आज भी राजनीति की हांडी में उबलता रहता है।
भाषा का मामला यहां सीधा कभी नहीं रहा। इसके पीछे सत्ता छिपी रहती है। नौकरी छिपी रहती है।पहचान छिपी रहती है।
नई शिक्षा नीति कहती है कि बहुभाषी बच्चे ज्यादा रचनात्मक होते हैं। कई भाषाएं सीखने से सोचने की क्षमता बढ़ती है। बात गलत भी नहीं है। यूरोप में लोग तीन-चार भाषाएं आराम से बोल लेते हैं।
लेकिन भारत यूरोप नहीं है। यहां गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा पड़ा है। कहीं पंखा नहीं। कहीं शिक्षक नहीं।कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं।
ऐसे में लोग पूछते हैं : पहले स्कूल तो संभाल लो, फिर भाषाई महल बनाना।
और सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए।
नेता मंच से भारतीय भाषाओं का गुणगान करते हैं। लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में भेजते हैं। घर में हिंदी। भाषण में संस्कृत। और करियर के लिए अंग्रेजी।
यानी मुंह में राम, बगल में अंग्रेजी कॉन्वेंट।
सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी आज भी नौकरी का पासपोर्ट है। आईटी कंपनी से लेकर अदालत तक, मेडिकल कॉलेज से लेकर कॉरपोरेट दफ्तर तक, अंग्रेजी का सिक्का चलता है। गरीब आदमी भी जानता है कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कई बार अच्छी हिंदी से ज्यादा कमाई करा देती है।
यहीं भाषा राजनीति का असली दर्द छिपा है।
दक्षिण भारत को डर है कि भाषा के नाम पर धीरे-धीरे केंद्रीकरण बढ़ेगा। उत्तर भारत को लगता है कि हिंदी राष्ट्रीय पहचान की डोर है। अंग्रेजी चुपचाप दोनों के सिर पर बैठी मुस्कुरा रही है।
भारत का नक्शा भी भाषा ने बदला है। आंध्र प्रदेश भाषा आंदोलन से बना। महाराष्ट्र और गुजरात भाषाई मांगों से निकले।
भाषा ने सरकारें गिराईं। नेता पैदा किए। और कई बार देश को बांटने की धमकी भी दी।
इसलिए भारत में भाषा केवल विषय नहीं है। यह भावनाओं का ज्वालामुखी है।
अब सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।
लेकिन अदालत कानून समझा सकती है, दिल नहीं बदल सकती।
तीन भाषा फार्मूला आज भी रस्सी पर चलने जैसा है।
हर सरकार संतुलन बनाती है। हर राज्य शक की नजर से देखता है। हर अभिभावक डरता है कि कहीं प्रयोग का बोझ उसके बच्चे पर न टूट पड़े।
भारत की भाषाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी सिरदर्दी भी हैं।
यहां भाषा केवल पढ़ाई नहीं जाती।उसकी पहरेदारी होती है। उसके सहारे राजनीति होती है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करना सबसे बड़ी गलती थी।

रात का खाना या मौत का न्योता?

image-2025-12-c7daffa0c8b55d2b16db762e31bb171c.jpg
मुंबई । आज रात खाने में क्या बनेगा?
यह सवाल शायद दुनिया का सबसे साधारण सवाल है। हर घर में पूछा जाता है। कभी प्यार से, कभी शिकायत के साथ, कभी मज़ाक में।
लेकिन अगर यही सवाल किसी की जान ले ले तो?
अगर चिकन करी, नमक या बिरयानी की एक प्लेट हत्या का कारण बन जाए तो समझ लीजिए कि समस्या रसोई में नहीं, रिश्तों में पक रही है।
हाल के महीनों में भारत के अलग-अलग हिस्सों से आई घटनाएं चौंकाती भी हैं और डराती भी हैं।
तेलंगाना के कामारेड्डी में एक युवक ने पत्नी से चिकन करी न बनने पर नाराज़गी जताई। बहस बढ़ी। रिश्तेदारों ने बीच-बचाव किया। मामला शांत होता दिखाई दिया। लेकिन घर के भीतर जमा गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। कुछ देर बाद पत्नी ने हंसिया उठाया और पति की गर्दन पर वार कर दिया। युवक की मौत हो गई।
गुजरात के वडोदरा में एक मजदूर ने पत्नी के बनाए भोजन को खाने से इनकार कर दिया। कहासुनी हुई। आरोप-प्रत्यारोप चले। कुछ मिनटों में बहस हिंसा में बदल गई और एक व्यक्ति की जान चली गई।
सवाल है कि क्या लोग सचमुच चिकन करी या एक थाली भोजन के लिए हत्या कर सकते हैं?
जवाब है: नहीं।
मौत चिकन करी से नहीं हुई। मौत उस तनाव से हुई जो वर्षों से भीतर जमा था।
खाने का विवाद केवल आखिरी चिंगारी था।
देश भर की पुलिस फाइलें ऐसी घटनाओं से भरी पड़ी हैं। कहीं साबूदाना खिचड़ी में नमक ज्यादा होने पर पत्नी की हत्या कर दी गई। कहीं बिरयानी के स्वाद पर शुरू हुआ झगड़ा खून-खराबे में बदल गया। कहीं मटन करी न बनने पर घरेलू हिंसा ने जान ले ली।
दुनिया भी इससे अलग नहीं है।
ब्रिटेन में जन्मदिन के भोजन को लेकर हुए विवाद ने एक परिवार उजाड़ दिया। अमेरिका में चिकन ड्रमस्टिक पर शुरू हुई बहस हिंसा तक पहुंच गई। वॉशिंगटन में पैनकेक को लेकर झगड़ता बुजुर्ग दंपती आखिरकार हत्या के मामले में बदल गया।
देश बदल जाते हैं। भाषाएं बदल जाती हैं। लेकिन कहानी वही रहती है।
रसोई में पकता भोजन कई बार रिश्तों की कड़वाहट भी उबाल देता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी घटनाओं में भोजन असली कारण नहीं होता। असली कारण होता है आर्थिक तनाव, बेरोजगारी, शराब की लत, घरेलू हिंसा, अपमान, असफल अपेक्षाएं और वर्षों से दबा हुआ गुस्सा।
जब ये सब परत-दर-परत जमा होते रहते हैं तो फिर एक मामूली वाक्य भी विस्फोट कर सकता है।
“आज चिकन क्यों नहीं बनाया?”
“इतना नमक किसने डाल दिया?”
“मैं यह खाना नहीं खाऊंगा।”
सुनने में साधारण लगने वाले ये वाक्य कभी-कभी बारूद पर गिरी चिंगारी बन जाते हैं।
भारतीय समाज में भोजन केवल भोजन नहीं है। वह भावनाओं की भाषा भी है।
एक पत्नी के लिए खाना बनाना अक्सर जिम्मेदारी, सेवा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। दूसरी ओर पुरुष पर कमाने, परिवार चलाने और आर्थिक दबाव झेलने की अपेक्षा रहती है।
दोनों पक्ष अपने-अपने तनाव ढो रहे होते हैं।
मुसीबत तब शुरू होती है जब संवाद खत्म हो जाता है।
तब दाल में केवल दाल नहीं होती। उसमें महंगाई भी होती है। थकान भी होती है। शिकायतें भी होती हैं। अधूरी इच्छाएं भी होती हैं।
और फिर एक दिन थाली बहस का मैदान बन जाती है।
मनोवैज्ञानिकों ने एक दिलचस्प शब्द गढ़ा है: “हैंग्री”।
अर्थात भूख और गुस्से का मिश्रण।
शोध बताते हैं कि भूखे व्यक्ति की सहनशीलता कम हो जाती है। वह जल्दी चिढ़ता है। छोटे विवाद बड़े लगने लगते हैं। यही कारण है कि अधिकांश घरेलू झगड़े शाम या रात के भोजन के आसपास भड़कते हैं।
दिन भर की थकान।
जेब की चिंता।
काम का दबाव।
और ऊपर से भूख।
यह मिश्रण कई बार खतरनाक साबित होता है।
इन घटनाओं में एक और समानता दिखाई देती है। हथियार अक्सर पहले से खरीदे नहीं जाते। वे घर में ही मौजूद होते हैं।
रसोई का चाकू।
हंसिया।
कैंची।
बेलन।
यानी हत्या की योजना नहीं होती। केवल एक ऐसा क्षण होता है जब गुस्सा विवेक को धक्का देकर बाहर कर देता है।
लेकिन वही एक क्षण पूरी जिंदगी बदल देता है।
पांच मिनट का क्रोध कई बार पचास साल की सजा बन जाता है।
विडंबना देखिए। जिस रसोई को भारतीय संस्कृति ने प्रेम, सेवा और परिवार का केंद्र माना, वही जगह कभी-कभी सबसे भयावह हिंसा का मंच बन जाती है।
हम अक्सर हत्या के बाद नमक, चिकन या बिरयानी की चर्चा करते हैं। असली सवाल पूछना भूल जाते हैं।
घर में संवाद क्यों खत्म हो गया?
क्रोध इतना अनियंत्रित क्यों हो गया?
लोग मदद मांगने से क्यों हिचकते हैं?
घरेलू तनाव को मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे की तरह क्यों नहीं देखा जाता?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं खोजे जाएंगे, तब तक ऐसी खबरें आती रहेंगी।
चिकन करी किसी की जान नहीं लेती।
बिरयानी भी नहीं।
एक चुटकी नमक भी नहीं।
जान लेती है वर्षों से जमा कड़वाहट, लगातार अपमान, अनियंत्रित क्रोध और संवाद का अभाव।
रसोई की आग का काम भोजन पकाना है।
जब वही आग रिश्तों को जलाने लगे, तब समझ लीजिए कि समाज को केवल रेसिपी नहीं, रिश्तों की भी मरम्मत करनी होगी।
क्योंकि मौत कभी थाली में परोसे गए भोजन से नहीं होती।
मौत उस ज़हर से होती है जो धीरे-धीरे रिश्तों में घुलता रहता है।

क्या भारत की सीमाएं केवल नक्शे पर खींची गई रेखाएं हैं?

images-1.jpeg

सिलीगुड़ी । यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

यह सवाल केवल सीमा राज्यों का नहीं है। यह सवाल देश के हर करदाता, हर बेरोजगार युवक, हर किसान और हर उस नागरिक का है जो बेहतर जीवन, बेहतर सुविधाओं और सुरक्षित भविष्य का सपना देखता है। अवैध घुसपैठ का मुद्दा वर्षों से राजनीति के अखाड़े में उछलता रहा है, लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव अब धीरे-धीरे पूरे देश में महसूस किए जाने लगे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। लेकिन विकास की इस दौड़ के बीच एक ऐसी समस्या लगातार बढ़ रही है, जिस पर राजनीति तो खूब होती है, पर समाधान कम दिखाई देता है। यह समस्या है अवैध घुसपैठ और अनधिकृत प्रवासन की।

यह विषय केवल सीमा सुरक्षा का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध रोजगार, संसाधनों, जनसंख्या संतुलन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी है।
अवैध प्रवासियों की वास्तविक संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि वे सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होते। फिर भी समय-समय पर विभिन्न सरकारी बयानों में इनकी संख्या लाखों से लेकर करोड़ों तक बताई गई है। अधिकांश अवैध प्रवासी बांग्लादेश से आने वाले लोगों के रूप में चिन्हित किए जाते रहे हैं, जबकि म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों की भी एक उल्लेखनीय संख्या भारत के विभिन्न राज्यों में निवास कर रही है।”

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल, ने दशकों से इस दबाव को महसूस किया है। असम आंदोलन का इतिहास इसी चिंता से जुड़ा रहा। स्थानीय लोगों का आरोप रहा कि लगातार हो रही घुसपैठ ने न केवल जनसंख्या का स्वरूप बदला, बल्कि भूमि, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी असर डाला।

कल्पना कीजिए कि किसी छोटे शहर की आबादी अचानक कुछ वर्षों में लाखों बढ़ जाए। अस्पतालों में भीड़ बढ़ेगी, स्कूलों पर दबाव पड़ेगा, पानी और बिजली की मांग बढ़ेगी, और सस्ते श्रम की उपलब्धता स्थानीय मजदूरों की आय को प्रभावित कर सकती है। यही स्थिति कई सीमावर्ती क्षेत्रों और महानगरों में देखने को मिलती है।

दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में निर्माण कार्यों, घरेलू श्रम, रिक्शा संचालन और असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर कार्यरत हैं। इनमें अधिकांश वैध भारतीय नागरिक होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने समय-समय पर अवैध विदेशी नागरिकों के नेटवर्क भी उजागर किए हैं। नकली आधार कार्ड, फर्जी राशन कार्ड और जाली पहचान पत्रों का कारोबार इस समस्या को और जटिल बनाता है। समूचा नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम के अर्बन क्लस्टर्स में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में हजारों बाहरी तत्व कार्यरत हैं। दक्षिण भारत की चाय और काफी बागानों में बाहर के घुसपैठी काम कर रहे हैं, सस्ती लेबर के रूप में।

समाजशास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, “आर्थिक दृष्टि से भी यह चुनौती कम नहीं है। भारत पहले ही अपने करोड़ों नागरिकों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार उपलब्ध कराने के संघर्ष से जूझ रहा है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में अवैध लोग सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करें, तो सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है। करदाताओं के पैसे से चलने वाली योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र नागरिकों तक कम पहुंचने का खतरा भी बढ़ जाता है।”

मामला केवल आर्थिक नहीं है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक तनाव का कारण बने हैं। स्थानीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और पारंपरिक जीवन शैली पर खतरा महसूस होने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब संसाधन सीमित हों और आबादी तेजी से बढ़े, तो सामाजिक टकराव की आशंका भी बढ़ जाती है।

भारत को इस चुनौती का समाधान संतुलित और व्यावहारिक तरीके से खोजना होगा। सीमाओं की बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक आधारित सर्विलांस, पहचान प्रणालियों को मजबूत बनाना और पड़ोसी देशों के साथ प्रभावी प्रत्यर्पण एवं सत्यापन व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि मानवीय आधार पर संरक्षण पाने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो।

अवैध घुसपैठ किसी एक राज्य या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह राष्ट्रीय संसाधनों, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की विकास योजनाओं से जुड़ा प्रश्न है। यदि इसे समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ सकता है।

एक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों, नागरिकों के अधिकार संरक्षित हों और प्रवासन की व्यवस्था कानून तथा मानवीय मूल्यों दोनों के अनुरूप संचालित हो। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन संप्रभुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

नई कुली अर्थव्यवस्था: क्या भारत के स्टार्टअप आधुनिक गुलामी गढ़ रहे हैं?

20251029113053.jpg
28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है।
बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुँचा रहा है।
उधर हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है।
मोतियाबिंदी अर्थ शास्त्री इसे “स्टार्टअप क्रांति” कहते हैं। लेकिन क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण?
चेहरे बदल गए हैं। लठैत जमींदार की जगह अब हूडी पहनने वाले फाउंडर हैं। कुली अब सूटकेस नहीं, फूड पैकेट और किराने के बैग ढो रहा है।
ढांचा मगर वही है। भारत के महानगरों में लाखों प्रवासी युवक आज क्विक कॉमर्स, डिलीवरी ऐप्स, लॉजिस्टिक्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। निवेशक अरबों डॉलर की वैल्यूएशन पर ताली बजाते हैं। स्टार्टअप फाउंडर नए भारत के “आइकॉन” कहलाते हैं। विज्ञापन इन्हें “डिलीवरी हीरो” और “पार्टनर” बताते हैं। लेकिन चमकदार शब्दों के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। ये नव युग के कुली मेहनत करते हैं, कौशल प्रदर्शन नहीं।
दो सौ वर्षों से कुली गिरी चल रही है, पहले अंग्रेजों की, अब अमेरिकन्स की। या तो गोरे आदमी का मैन फ्राइडे, या बाबुओं का सामान ढोता कुली! बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश या राजस्थान से आया युवक दस-दस घंटे बाइक चलाता है। बारिश, धूप, प्रदूषण, दुर्घटना: सब झेलता है। पाँच साल बाद उसके पास क्या बचता है? बस टूटता शरीर और अनिश्चित भविष्य। यह रोजगार अवसर कम, श्रम दोहन अधिक है।
मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर्स तो कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन हौले हौले हमारी अर्थव्यवस्था “सुविधा सेवा” आधारित समाज बनती जा रही है। एक ऐसा समाज जहाँ मध्यम वर्ग अपनी सुविधा के लिए अलादीन का बटन दबाता है और कोई अदृश्य भूत, यानी श्रमिक दस मिनट में सामान लेकर दरवाज़े पर हाज़िर हो जाता है।
आराम अब नया धर्म बन चुका है।
देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल इंडिया और नवाचार की बातें करता है, मगर करोड़ों युवा आज भी बेहद प्राथमिक श्रम चक्र में फँसे हुए हैं। शहरों की सुविधा का बोझ इन्हीं कुलियों के कंधों पर लदा है, कहते हैं पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।
समाज शास्त्री टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, “हमारी भाषा भी अब सच्चाई छिपाने लगी है। कुली अब “गिग पार्टनर” बन गया है। नौकरी “फ्लेक्सिबिलिटी” कहलाने लगी। शोषण “ऑपर्च्युनिटी” बन गया। स्टार्टअप संस्कृति कई बार नई रंगाई-पुताई वाला पुराना हवेली तंत्र लगती है।”
यह समस्या केवल डिलीवरी ऐप्स तक सीमित नहीं है। भारत पहले भी ऐसा दौर देख चुका है।
बीपीओ और आईटी सर्विस सेक्टर के उभार के समय लाखों युवा कॉल सेंटर और आउटसोर्सिंग नौकरियों में चुक गए। शुरुआती वर्षों में यह आर्थिक चमत्कार जैसा लगा। वेतन बढ़े। अंग्रेज़ी बोलने वाली पीढ़ी तैयार हुई। परिवार खुश हुए। लेकिन दो दशक बाद तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।
बहुत बड़ी संख्या में युवाओं ने सीमित और दोहराव वाले कौशल सीखे। वे वैश्विक सेवा उद्योग के “रिप्लेसेबल पार्ट” बनकर रह गए। देश ने डिग्रीधारी युवाओं की फौज तो पैदा कर ली, मगर नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता उतनी विकसित नहीं हुई।
आज की गिग अर्थव्यवस्था उसी गलती को और बड़े पैमाने पर दोहरा रही है। एक डिलीवरी बॉय रोज़ी तो कमा सकता है, मगर क्या यही किसी युवा राष्ट्र का सपना होना चाहिए? रोजगार अगर व्यक्ति को ऊपर उठाने की बजाय वहीं जकड़ दे, तो वह विकास नहीं, संगठित ठहराव है।सबसे खतरनाक असर मानसिक है।
शहरी भारत आज प्रवासी श्रमिकों पर पूरी तरह निर्भर है। गरम खाना इसलिए पहुँचता है क्योंकि कोई बारिश में भीग रहा है। रातोंरात पार्सल इसलिए आता है क्योंकि किसी ने नींद छोड़ी है। दस मिनट में किराना इसलिए मिलता है क्योंकि किसी ने अपनी सेहत दाँव पर लगाई है।
लेकिन कोई यह नहीं पूछता;
चालीस साल की उम्र में उस डिलीवरी राइडर का क्या होगा? उसकी टूटी कमर का इलाज कौन करेगा?एल्गोरिद्म उसे बेकार कर देंगे तो नया कौशल कौन देगा?
किसी सभ्यता की असली पहचान उसके अरबपतियों से नहीं, उसके श्रमिकों की गरिमा से होती है।
मज़दूरी सीढ़ी बननी चाहिए, दलदल नहीं। देश तब आगे बढ़ते हैं जब श्रमिक मांसपेशियों से कौशल की ओर बढ़ते हैं।
यह आधुनिकता नहीं। यह डिजिटल सामंतवाद है। स्टार्टअप कहानी केवल यूनिकॉर्न पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। उसे कुशल नागरिक भी पैदा करने चाहिए। क्योंकि जो अर्थव्यवस्था दस मिनट में बर्गर पहुँचा सकती है, लेकिन दस साल में श्रमिक को गरिमा नहीं दे सकती, वह वास्तव में प्रगति नहीं कर रही। वह बस गोल-गोल दौड़ रही है, लाइक एलिस इन वंडरलैंड।
scroll to top