Bangladesh scribes attacked by extortionists, PEC demands probe

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Nava Thakuria

Geneva (Switzerland): At least 12 Bangladeshi journalists were injured in an attack by extortionists and terrorists in Narsingdi locality of the south Asian nation on 26 January 2026 as the media professionals were returning to Dhaka by bus after attending a leisurely program of Crime Reporters Association of Bangladesh. According to Bangladesh Sangbad Sangstha, the Dhaka-based government sponsored news agency, reported that the wounded scribes were rushed to Narsingdi Sadar Hospital. The bus carrying the media persons was parked by the roadside when a group of local extortionists demanded money as tolls. As the journalists protested, an altercation ensued, after which the attackers assaulted them with locally made weapons, added the BSS report. The attackers even threatened to burn their accompanying wives and children.

The global media safety and rights body Press Emblem Campaign (PEC) condemned the attack and urged the interim government in Dhaka to bring the group of extortionists to justice. “It’s so unfortunate that the poll-bound Bangladesh remains in media headlines for a number of events revealing media atrocities in the last few weeks. In Narsingdi of Bangladesh, the journalists protested against an extortion bid by some unruly individuals and had to face the attacks, which is unacceptable by any means,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.net).

PEC’s south Asia representative Nava Thakuria informed that the Bangla police have already arrested two accused continuing search operations for the rest of the gang. The Muslim majority nation of over 170 million people is preparing for its 13th national election on 12 February under the patronage of an interim regime led by Nobel laureate Dr Muhammad Yunus. Recently, the caretaker government chief assured the countrymen of a free, fair and festive polling with a truly democratic spirit. The country on 5 January reported the murder of journalist Rana Pratap Bairagi (45), who incidentally became the first journo-victim across the world this year.

राहुल गांधी द्वारा संसद में दिखाई गई नरवणे की ‘अप्रकाशित’ किताब पर विवाद गहराया, पेंग्विन ने स्पष्ट किया – प्रकाशन नहीं हुआ

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ए के मिश्रा

नई दिल्ली: पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह इस किताब के अंशों का हवाला देते हुए सरकार पर हमला किया था, लेकिन अब प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया है कि किताब अभी तक किसी भी रूप में प्रकाशित नहीं हुई है।

राहुल गांधी ने संसद में हार्डकॉपी दिखाते हुए दावा किया कि किताब उपलब्ध थी, लेकिन “सरकार ने इसे गायब करवा दिया”। उन्होंने 2023 में जनरल नरवणे के एक पुराने ट्वीट का हवाला दिया, जिसमें लिखा था, “मेरी किताब उपलब्ध है, लिंक फॉलो करें।”

राहुल ने कहा, “या तो नरवणे झूठ बोल रहे हैं या पेंग्विन झूठ बोल रहा है। मुझे पूर्व सेना प्रमुख पर भरोसा है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किताब में 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान राजनीतिक नेतृत्व द्वारा स्पष्ट निर्देश न दिए जाने का जिक्र है, जो सरकार के लिए असुविधाजनक है।

हालांकि, पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने सोमवार को बयान जारी कर कहा, “हमारे पास ‘Four Stars of Destiny’ के एकमात्र प्रकाशन अधिकार हैं। किताब अभी प्रकाशन के लिए नहीं गई है। कोई प्रिंट या डिजिटल कॉपी प्रकाशित, वितरित, बेची या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं की गई है।” प्रकाशक ने चेतावनी दी कि अनधिकृत रूप से प्रसारित कोई भी संस्करण कॉपीराइट उल्लंघन है और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।जनरल नरवणे ने भी मंगलवार को पेंग्विन के बयान को शेयर करते हुए लिखा, “यह किताब की स्थिति है।” इससे पहले, दिल्ली पुलिस ने किताब के कथित लीक और प्रसार पर FIR दर्ज की है, जिसकी जांच स्पेशल सेल कर रही है।

प्रश्न उठ रहा है कि यदि किताब कभी प्रकाशित नहीं हुई और रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लंबित है, तो राहुल गांधी को हार्डकॉपी कैसे मिली?

क्या यह अनधिकृत लीक है या कोई अन्य स्रोत? मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिष्ठित प्रकाशकों द्वारा बिना लोकार्पण, समीक्षा या शोर-शराबे के ऐसी महत्वपूर्ण किताब रिलीज होना असंभव है। यदि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होती, तो सोशल मीडिया पर समीक्षाएं और फोटो बाढ़ मार देती।विपक्ष का दावा है कि किताब में चीन के साथ टकराव में “राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सेना को छोड़ दिए जाने” का जिक्र है, जबकि सत्ताधारी पक्ष इसे राजनीतिक स्टंट बता रहा है। विवाद अब कोर्ट और संसदीय समितियों तक पहुंच सकता है, जहां तथ्य और सबूतों की जांच होगी।यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रकाशन प्रक्रिया और संसद में अप्रकाशित सामग्री के उपयोग से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। फिलहाल, किताब की सत्यता और उसके स्रोत पर बहस जारी है।

संविधान के 75 वर्ष : कला, स्वतंत्रता और मर्यादाओं पर IGNCA में विचारोत्तेजक संगोष्ठी सम्पन्न

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नई दिल्ली: भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में संस्कार भारती दिल्ली प्रान्त द्वारा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “कला अभिव्यक्ति : स्वतंत्रता एवं मर्यादाएँ” था, जिसमें देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों, चिंतकों और सिनेमा विशेषज्ञों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्कार भारती दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष श्री प्रभात कुमार के स्वागत वक्तव्य एवं प्रस्तावना से हुआ। प्रथम सत्र साहित्य पर केंद्रित रहा, जिसमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अलका सिन्हा तथा प्रसिद्ध लेखक श्री व्योमेश शुक्ल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्संबंध पर गहन विचार रखे।

द्वितीय सत्र दृश्य कला पर आधारित था। इसमें प्रख्यात मूर्तिकार श्री नीरज गुप्ता, ललित कला अकादेमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल ठाकुर तथा प्रसिद्ध आंतरिक सज्जाकार सुश्री सीतू कोहली ने कला में संवेदनशीलता, लोकमर्यादा और सौंदर्यबोध के महत्व को रेखांकित किया।

तृतीय सत्र प्रदर्शनकारी कलाओं पर केंद्रित रहा, जिसमें संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, प्रसिद्ध बाँसुरी वादक श्री चेतन जोशी तथा सुविख्यात गायिका सुश्री विद्या शाह ने परंपरा, नवाचार और आधुनिक चुनौतियों पर सार्थक संवाद किया।

चतुर्थ सत्र चल–चित्र (सिनेमा) पर आधारित था, जिसमें फिल्म निर्देशक श्री अतुल पांडेय, प्रख्यात पत्रकार श्री अनंत विजय तथा फिल्म समीक्षक श्री मुरतजा खान ने सिनेमा में अभिव्यक्ति की सीमाओं और सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए।

समापन सत्र में संस्कार भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री अभिजीत गोखले ने अपने संबोधन में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों एवं कर्तव्यों तथा देशकाल परिस्थितियों के अनुरूप कला निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कला की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हो।

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि प्रत्येक सत्र से पूर्व विषय बोध कराने हेतु नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए गए। साथ ही भारतीय संविधान की महिला शिल्पियों के योगदान एवं संविधान में निहित कला पक्ष को दर्शाती एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। कार्यक्रम के संचालक भूपेंद्र कौशिक के अनुसार, संगोष्ठी संविधान के 75 वर्षों की यात्रा को कला के माध्यम से समझने और आत्ममंथन करने का एक सार्थक एवं प्रेरक प्रयास सिद्ध हुई है। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में कलाकारों, कलाधर्मियों तथा कला के छात्र–छात्राओं एवं संस्कार भारती के कार्यकर्ताओं ने सहभाग किया।

तो अब तक नरवड़े तो गोली मार दी गई होती

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। यह एक किताब के दो कवर सोशल मीडिया पर मजे ले रहे हैं। किस को सच माना जाए? जब कि लेखक नरवड़े और प्रकाशक पेंग्विन दोनों कह रहे हैं कि किताब छपी नहीं है। पर यह दोनों अब जागे हैं जब दिल्ली पुलिस ने एफ़ आई आर दर्ज कर दी, तब। कारवां पत्रिका में इस किताब पर लेख भी छपा और बजट सत्र में राहुल गांधी ने अपने अराजक अंदाज़ में ग़दर काट दिया।

सवाल यह है कि लेखक और प्रकाशक एफ़ आई आर होने के पहले गूंगे क्यों बने हुए थे। प्रकाशक व्यवसाई है l इस तरह की मूर्खता से वह भरसक परहेज़ करेगा। फिर अंगुली उठती है, नरवड़े पर। नरवड़े अब राहुल गांधी बन चुके हैं। नरवड़े और राहुल के फ्रस्ट्रेशन अब एक पड़ाव पर हैं। ठीक उस फिल्मी गाने की तरह l तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं।

अराजक, अहंकारी राहुल गांधी को छोड़िए। लेकिन नरवड़े ने न सिर्फ़ सेना का अनुशासन तोड़ा है, अपने सेनाध्यक्ष होने की साख पर बट्टा लगाया है। सब जानते हैं कि सरहद पर सेना ही नहीं, डिप्लोमेसी भी लड़ती है। सोचिए कि जब चीनी टैंक भारत की सरहद में घुसे होंगे तब सेनाध्यक्ष की सूचना के बाद भी रक्षा मंत्री, प्रधान मंत्री क्या कंबल ओढ़ कर सो गए होंगे? स्पष्ट है कि नहीं। चीन और भारत के बीच कांग्रेस के समय का समझौता है कि कोई समस्या आती है, सरहद पर तो सैनिक कार्रवाई नहीं होगी। नरवड़े यह बात नहीं जानते थे?

अच्छा चीनी टैंक क्या नरवड़े ने भगाए कि ख़ुद वापस चले गए? क्या अपने आप चले गए? कोई डिप्लोमेसी नहीं हुई होगी, भारत और चीन के बीच? नरवड़े इतने नादान तो नहीं। नरवड़े नहीं जानते कि इस तरह के कंवर्सेशन प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री या सेनाध्यक्ष कभी भी लिखित या मौखिक पब्लिक डोमेन में नहीं रख सकते। नरवड़े जानते थे तो किस खुशी में यह लिखा और रखा?

किस के लिए इस्तेमाल हुए यह सब लिख कर? जब सरकार ने यह किताब प्रकाशित करने के लिए अनुमति नहीं दी तो प्रकाशक के पास क्यों पहुंची? सरकार ने अनुमति नहीं दी छापने की तो उस के अंश कैसे और क्यों पब्लिक डोमेन में आए?

सेना अनुशासन में बंधी होती है। नरवड़े ने यह अनुशासन तोड़ने की क्या क़ीमत हासिल की? यह बड़ा सवाल है।

नेपोलियन दुनिया का सर्वोच्च कमांडर माना जाता है। अकसर वह युद्ध में ही होता था। पर जब कभी युद्ध नहीं होता था तब वह अपने सैनिकों को नदी के जल में उतार देता था। कहता था कि पानी को बटो। पानी को रस्सी की तरह कभी नहीं बटा जा सकता, दुनिया जानती है। नेपोलियन भी जानता था और उस के सैनिक भी। फिर भी अगर कोई सैनिक इस बाबत सवाल उठाता था तो नेपोलियन उस सैनिक को अनुशासनहीनता के आरोप में तुरंत बर्खास्त कर देता था। क्यों कि वह सेना का अनुशासन तोड़ रहा होता था। सैनिक का काम सेनापति के आदेश को आँख मूँद कर मान लेना होता है। सवाल जवाब करना नहीं।

नरवड़े ने यही अनुशासन तोड़ा है। उन को जो भी क़ानूनी सज़ा मुमकिन हो ज़रूर दी जानी चाहिए। सख़्त से सख़्त सज़ा। बिना किसी रियायत के। अगर नियम है कि बिना अनुमति किताब नहीं छपे तो बिना छपे पब्लिक डोमेन में कैसे आई? और जो कनवर्सेशन गोपनीयता के तहत थे, वह क्यों सार्वजनिक किए गए?

हिंदुस्तान की जनता और सरकार भी सेना को अपने सिर माथे बिठाती है। अपनी आन बान शान मानती है। जनता और सरकार द्वारा दिए गए मान और सम्मान को मिट्टी में मिला दिया है, नरवड़े ने।

नरवड़े ने देश की अनुशासित सेना पर एक काला दाग़ लगाया है। सेना का राजनीतिक दुरुपयोग किया है। चीन , रूस जैसे देश में अगर नरवड़े होते तो अब तक उन को गोली मार दी गई होती। अफ़सोस कि नरवड़े हिंदुस्तान में हैं।

नहीं होना चाहिए।

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