Delhi’s Education Model: Reality vs. Claims

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Delhi : A press conference was held at Marigold Hall, India Habitat Centre, from 5 PM to 6 PM, bringing together faculty members and scholars from JNU, DU, and Jamia. Dr. Shubh Gupta, an Assistant Professor in GAE, School of Social Sciences, JNU, presented an in-depth analysis that uncovered significant gaps between the Delhi Government’s claims and the actual state of its education system.

While the government asserts that 25% of its budget is allocated to education, the study revealed stark inequalities in resource distribution. Elite districts like South West A receive substantially higher funding per student, while underprivileged areas of Vidhan sabha such as Karol Bagh (SC) Okhla and Ballimaran (Muslim dominated area) struggle with severe underfunding. Also, it was pointed out that districts with lesser population are funded more than the densely populated districts having marginalized people. Additionally, a ₹543 crore cut in education capital expenditure for 2024-25 has led to stalled infrastructure projects in disadvantaged districts.

It In March 2021, the restructuring of Rajkiya Pratibha Vikas Vidyalayas (RPVV) into Schools of Specialized Excellence (SOSE) has further widened the gap, favoring private school students over those in government schools. Another important issue is that SOSE doesn’t follows GFR rules which raises serious accountability issues. Meanwhile, spending on teacher salaries fell by 36% between 2022 and 2023, raising concerns about staff shortages. Security and sanitation budgets have observed unprecedented spike in pandemic-years and then observed sharp decline in security spending upto 26% and sanitation by 16.3%. There is a possible fund mis-management during covid times when the schools were closed as it was informed by an independent source in DOE that sanitation budget used for sanitizer and masks came from different budget head.

A troubling 44% dropout rate from Class IX to X in 2023-24 suggests that weaker students are being systematically excluded. Many are being diverted into Patrachar Vidyalaya and the National Institute of Open Schooling (NIOS) to artificially boost pass percentages. Enrollment in NIOS has surged 12.5 times over the past decade, pointing to serious shortcomings in mainstream education. Furthermore, the percentage of Scheduled Caste (SC) students has declined from 16.5% in 2014 to 12.5% in 2024, highlighting the ineffective implementation of SC scholarship programs.

Another pressing issue is menstrual absenteeism, which reaches 40% in some schools and spikes to 65% in those lacking separate toilets for girls—shedding light on inadequate sanitation facilities. Concerns were also raised over shrinking playgrounds and possible fund misallocation in ‘Cash Incentives to the Outstanding Players/Sportsman and Rajiv Gandhi Sport Award – Rewards’, where only ₹12 lakh is allocated to athletes, despite ₹13-14 crore being spent under this category and the scheme code was changed.

The study calls for urgent reforms to ensure fair distribution of funds, improved infrastructure, and greater transparency in budget allocations. These findings challenge the Delhi Government’s portrayal of a thriving education model and emphasize the need for immediate corrective action to provide quality education for all students, particularly those from marginalized communities.

पत्नि सलीमा बेगम अकबर महान के हरम में पहुँची…

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सल्तनत और अंग्रेजी काल का इतिहास धोखे और फरेब से भरा है । दिखावटी दोस्ती और मीठी बातों में फँसाकर कर भारतीय शासकों को धोखा दिया ही गया, उनके अंदरूनी रिश्तों में भी ऐसी असंख्य घटनाएँ हैं। इसी शैली में 31 जनवरी 1561 को हमलावरों के एक गिरोह ने मुगल सेनापति बैरम खान की हत्या की थी । इस हत्या के बाद बैरम खान पत्नि सलीमा सुल्तान बेगम और बेटे रहीम को मुगल बादशाह अकबर के हरम में पहुँचा दिया गया ।

यह घटना गुजरात के पाटन में घटी । बैरम खान अपने परिवार सहित हज के लिये मक्का जा रहा था। हज पर जाने का आदेश भी बादशाह अकबर ने दिया था । यह काफिला नमाज के लिये रास्ते में रुका । तभी वहाँ बीस पच्चीस पठानों का समूह आया ।उस समूह का सरदार मुबारक खान था । वह बैरम खान का परिचित था । उसने साथ नमाज पढ़ी और नमाज के बाद बैरम खान से गले मिला । जब वह गले मिल रहा था तभी उसके दूसरे साथी ने बैरम खान की पीठ में छुरा मारकर हत्या कर दी । अन्य सभी सैनिक भी बैरमखान के समूह पर एक साथ टूट पड़े। कोई संभलता इससे पहले ही काफिले में बैरम खान के वफादारों का काम तमाम हो गया ।

बैरम खान मुगल बादशाह हुँमायु के बाल सखा और रिश्ते में साढ़ूभाई थे । दिल्ली में हेमचंद्र विक्रमादित्य ने मुगलों को खदेड़ दिया था हुमायूं काबुल चले गये थे । बैरम खान ने ही दिल्ली के शासक हेमचंद्र विक्रमादित्य को धोखे से पराजित कर मुगलों को पुनः दिल्ली का अधिपति बनाया था । वह भयानक युद्ध इतिहास के पन्नों में पानीपत के द्वितीय युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है जो 1556 में हुआ था । इससे प्रसन्न होकर हुँमायु की पत्नि ने अपनी सगी नंनद गुलरुख की बेटी सलीमा सुल्तान का निकाह बैरम खान से करा दिया था । सलीमा बेगम अपने सौन्दर्य के लिये भी मुगल परिवार में प्रसिद्ध थीं। रिश्ते में सलीमा सुल्तान और अकबर मामा बुआ के बहन भाई थे । जब यह शादी हुई तब सलीमा बेगम की आयु अठारह वर्ष थी और बैरम खान की आयु 56 वर्ष । दोनों की आयु में लगभग अड़तीस वर्ष का अंतर था । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि होश संभालते ही अकबर की नजर सलीमा बेगम पर थी । जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बादशाह अकबर को पालने वाली माहमअंगा बैरम खान के विरुद्ध अकबर के कान भरा करती थी । अब सत्य जो हो । पर अकबर को सुरक्षित रखने और गद्दी पर बिठाकर हमलों से सुरक्षित करने का श्रेय बैरम खान को ही है । हुँमायु की मृत्यु के बाद बैरम खान ही अकबर का अभिभावक था । एक अन्य रिश्ते में वह अकबर का मौसा भी लगता था। सलीमा बेगम के बैरमखान से विवाह के बाद ही दोनों में मतभेद बढ़े और बादशाह के आदेश पर बैरम खान परिवार सहित हज को चल दिये । रास्ते में उनकी हत्या कर दी गई। आइने अकबरी में इस घटना को लूट के इरादे से हमला माना गया । जबकि अन्य इतिहासकारों ने इसे लूट नहीं षड्यंत्र माना। चूँकि घटना में केवल कुछ पुरुष ही मारे गये थे । स्त्री बच्चे सभी सुरक्षित रहे और इन्हें महल में भेज दिया गया । बैरम खान की मौत के बाद सलीमा बेगम और पुत्र रहीम को भी दरबार में लाया गया । इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि बैरम खान के काफिले में पहले दिन से कुछ लोग ऐसे होंगे जो हमलावरों के संदेश वाहक हों और बैरमखान का विश्वास अर्जित करके मार्ग एवं रुकने का स्थान भी तय कर रहे हों । चूँकि जहाँ नमाज के लिये यह काफिला रुका था उसके कुछ दूरी पर ही पठानों का डेरा पहले से लगा हुआ था । बैरम खान का डेरा लगते ही वे लोग मिलने के बहाने इस डेरे में आये और नमाज के तुरन्त बाद धावा बोल दिया ।

बादशाह अकबर ने सलीमा से निकाह किया और रहीम के पालन पोषण का जिम्मा लिया । यह रहीम आगे चलकर सुप्रसिद्ध कवि अब्दुल रहीम खान ए खाना बने ।

यहाँ एक और बात है । अधिकांश इतिहास की पुस्तकों में रहीम को सलीमा सुल्तान बेगम का पुत्र माना है । जबकि रहीम बैरम खान के तो पुत्र थे पर उनकी माँ सुल्ताना बेगम थीं जो जलाल खाँ मेवाती की बेटी थीं। रहीम का जन्म 1556 में हुआ था । जबकि सलीमा बेगम से बैरम खान का विवाह 1557 में हुआ था । जब धोखे से बैरम खान को मारा गया तब रहीम की आयु पाँच वर्ष की थी । जबकि विवाह को चार वर्ष हुये थे ।

जिस धोखे से बैरम खान ने दिल्ली के शासक हेमचंद्र विक्रमादित्य की हत्या की थी । वैसी ही धोखे की मौत 31 जनवरी 1561 को बैरम खान को मिली ।

समान नागरिक संहिता लागू करने वाला प्रथम राज्य बना उत्तराखंड

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देवभूमि उत्तराखंड समान नागरिक संहिता लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है। वर्ष 2022 में उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने राज्य में सत्ता में आने पर समान नागरिक संहिता लागू करने का संकल्प लिया था। मुख्यमंत्री बनते ही अपने मंत्रिपरिषद की पहली बैठक में पुष्कर सिंह धामी ने समान नागरिक संहिता के प्रस्ताव तथा उसके लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करने की अनुमति दी थी। उत्तराखंड विधानसभा में यह विधेयक पारित हो जाने के बाद 27 जनवरी 2025 को यह कानून लागू हो गया है। कानून के क्रियान्वयन के लिए एक पोर्टल भी लांच किया गया है जिसमें सभी दिशा निर्देश जारी किये गये हैं । समान नागरिक संहिता कानून लागू होने के कारण राज्य में व्यापक बदलाव होने जा रहा है । यह कानून महिला सुरक्षा को व्यापक स्तर पर प्राथमिकता दे रहा है। यह कानून अनुसूचित जातियों/जनजातियों को छोड़कर संपूर्ण उत्तराखंड राज्य तथा राज्य से बाहर रहने वाले उत्तराखंड के समस्त निवासियों पर लागू होगा।

पोर्टल लांच करते समय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि कानून में किसी भी धर्म की मूल मान्यताओं और प्रथाओं को समाप्त नहीं किया गया है। इस कानून द्वारा सभी लोगों के लिए शादी, तलाक और उत्तराधिकार के नियमों को समान किया गया है। सभी धर्म के लोग अपने- अपने रीति रिवाज के अनुसार शादी कर सकते हैं।

स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाली सेक्युलर ताकतों तो यह कानून पसंद नहीं आ रहा है,वहीं कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन इस कानून को कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनेक अवसरों पर समान नागरिक संहिता कानून की बात रख चुके हैं।स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से संबोधन तथा संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए भी प्रधानमंत्री मोदी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए प्रतिबद्धता जता चुके है और उत्तराखंड के माध्यम से यह पहल आगे बढ़ रही है। समान नागरिक संहिता लागू हो जाने के बाद सभी धर्म, जाति व पंथ के लोगों को समान अधिकार मिलने प्रारम्भ हो जायेंगे। इस कानून में महिलाओं को विशिष्ट लाभ प्राप्त होगा।

मुस्लिम तुष्टिकरण की विकृत राजनीति के चलते कांग्रेस ने सदा समान नागरिक संहिता का विरोध किया। अगर कांग्रेस में इच्छाशक्ति होती तो यह कानून पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी के समय में ही लागू हो गया होता किंतु वह मुस्लिम तुष्टिकरण में इतने डूब चुके थे कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कई कांग्रेसी नेताओं के विचार अच्छे नहीं लगे। यहां तक कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी संविधान में ही समान नागरिक संहिता को रखने के प्रबल पक्षधर थे और इन्हीं सब मुद्दों के कारण डॉ.अम्बेडकर और नेहरू जी के मध्य विवाद था।

उत्तराखंड विधानसभा द्वारा पारित विधेयक चार खंडों में विभाजित है। पहला खंड – यूजीसी की धाराओं के उल्लंघन पर छह माह तक कारावास व 50 हजार रूपये जुर्माने की व्यवस्था की गई है। विवाह विच्छेद के मामलों में तीन वर्ष का कारावास रखा गया है। पुनर्विवाह के लिए तय नियम के उल्लंघन पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना व छह मास तक के कारावास का प्रबंध किया गया है।

महिलाओं को समान अधिकार- संपत्ति में सभी धर्मों की महिलाओं को समान अधिकार दिया गया है। सभी जीवित बच्चे पुत्र अथवा पुत्री संपत्ति में बराबर के अधिकारी बनाये गये हैं।अगर कसी व्यक्ति की वसीयत नहीं है और उसकी कोई संतान अथवा पत्नी नहीं है तो उत्तराधिकार के लिए रिश्तेदारों को प्राथमिकता दी गई है।

समान नागरिक संहिता का तीसरा खंड अत्यंत विशिष्ट है। जिसमें आजकल प्रचलन में आए लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है । लिव इन में पैदा हुए बच्चे को भी वैध संतान माना गया है।अब नये कानून के अंतर्गत लिव इन रिलेशनशिप को कोई भी पक्ष समाप्त भी कर सकता है। यदि किसी भी धर्म का कोई पुरुष अपनी पत्नी को छोड़ देता है तो वह उसे भरण पोषण की मांग कर सकती है। किसी एक पक्ष के नाबालिग अथवा विवाहित होने पर लिव इन की अनुमति नही दी जाएगी।

उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता विधेयक में पति की क्रूरता और विवाहेत्तर संबंधों पर पत्नी को भी तलाक का अधिकार दिया गया है।प्रस्तावित कानूनों के अंतर्गत नपुंसकता या जानबूझकर यौन संबंध नहीं बनाने पर विवाह शून्य हो जायेगा। समान नागरिक संहिता में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस अधिनियम के अलावा किसी अन्य प्रथा/ परंपरा के अंतर्गत तलाक मान्य नहीं होगा। किसी प्रथा रूढ़ी या परंपरा के तहत तलाक देने पर तीन साल की जेल और सजा का प्रावधान भी किया गया है। पूर्व की पत्नी होने के बावजूद पुनर्विवाह करने पर तीन वर्ष की जेल एक लाख रुपये तक जुर्माना और सजा भी बढ़ाई जा सकती है।

यह कानून उत्तराखंड के सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देगा, विशेषकर उन महिलाओं के सम्मान व अधिकार की रक्षा होगी जिन परंपराओें में पुरुष वर्चस्व का चलन है। देवभूमि उत्तराखंड की मुस्लिम महिलाओं को अब तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला जैसी बर्बर प्रथाओं से मुक्ति मिलेगी। लिव इन रिलेशनशिप को लेकर जो व्यवस्था समान नागरिक संहिता में की गई है उससे लव जिहाद में फंसकर अपने प्राणों तक की आहुति देने वाली बेटियों को भी एक बड़ा सुरक्षा कवच मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई अवसरों पर माना और कहा कि केंद्र सरकार को एक समान नागरिक संहिता लानी ही चाहिए और जिसे उत्तराखंड की सरकार ने पूर्ण कर दिखाया है।उत्तराखंड विधानसभा से समान नागरिक संहिता विधेयक पारित हो जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि अनेक प्रांतों ने भी इसे लागू करने की तैयारी प्रारम्भ कर दी है।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता कानून को यूनिफार्म की बजाय कॉमन सिविल कानून नाम दिया गया है। यह एक प्रगतिशील कानून है। इस कानून का एकमात्र उद्देश्य महिलाओं और बाल अधिकारों को सुरक्षित करना है। यह कानून लोगों के अधिकार छीनने का नहीं अपितु लोगो को अधिकार देने से सम्बंधित है।यह कानून सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस कानून से विभिन्न धर्मों के वैवाहिक रीति –रिवाजों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। ज्ञातव्य है कि समान नागनिक संहिता के विरोधी इसे बढ़ा चढ़ाकर अपने हिसाब से प्रस्तुत कर रहे हैं। इस कानून के अंतर्गत मुसलमानों में निकाह, सिखों में आनंद कारज, हिंदुओं में अग्नि के समक्ष फेरे और ईसाई की विवाह अपनी -अपनी मान्यताओं के अनुसार ही होते रहेंगे।

उच्चतम न्यायालय ने कई अवसरों पर समान नागरिक संहिता लागू करने पर बल दिया है सन 1973 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एम. एच. बेग ने बहुविवाह जैसी कुप्रथा पर रोक लगाने और तलाक के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सिफारिश की थी। केरल उच्च न्यायालय के जज वी. खालिद ने भी मार्च 1973 में मुसलमानों से अनुरोध किया था कि वह महिला अधिकारों की दिशा में सुधार पर ध्यान दें। 10 मई 1995 को उच्चतम न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव से अनुच्छेद 44 पर पुनर्विचार करने को कहा था उस खंडपीठ में न्यायाधीश कुलदीप सिंह और आरएम सहाय शामिल थे।13 सितंबर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता पर बल दिया। 11मई 1962 को कांग्रेस की राज्यसभा सांसद श्रीमती सीता परमानंद ने एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था यूनिफार्म सिविल कोड फॉर कंट्री। 29 जुलाई 1986 को केंद्रीय विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने वादा किया था कि समान नागरिक कानून के प्रस्ताव को लागू करने के लिए सरकार तीव्र गति से प्रयास कर रही है किंतु कांग्रेस यह वादा ही रह गया।

समान नागरिक कानून लागू हो जाने से सबसे अधिक सुरक्षा उन महिलाओं को प्राप्त होगी जो किसी न किसी कुप्रथा का शिकार हो रही थीं। इस कानून से लव जिहाद के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण व अवैध गतिविधियों पर भी लगाम लग सकेगी। मुस्लिम समाज के लिए – समान नागरिक संहिता के अंतर्गत मुस्लिम समाज को अब चार शादी करने की छूट नहीं है और बिना तलाक दूसरी शादी भी नहीं हो सकती। सभी धर्मों में लड़कियों की विवाह करने की न्यूनतम आयु 18 और लड़कों की 21 वर्ष निर्धारित की गई है।

समान नागरिक संहिता पर उत्तराखंडी समुदाय का समर्थन, बीजेपी की प्रतिबद्धता के लिए आभार।

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दिल्ली – उत्तराखंड में लागू हुई समान नागरिक संहिता (UCC) का स्वागत करते हुए, दिल्ली में रहने वाली उत्तराखंडी संस्था देवभूमि उत्तराखंड धार्मिक-सामाजिक विकास संगठन ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की प्रतिबद्धता के लिए आभार व्यक्त किया है। संस्था ने कहा कि आगामी दिल्ली चुनाव में उत्तराखंडी मतदाता राष्ट्रीय विचारधारा और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

संगठन के अध्यक्ष नारायण दत्त लखेड़ा ने कहा कि दिल्ली की वर्तमान सरकार ने उत्तराखंडी समुदाय की लगातार उपेक्षा की है। विशेष रूप से, एक भी उत्तराखंडी उम्मीदवार को टिकट न दिए जाने के कारण, उनकी राजनीतिक भागीदारी को शून्य बनाए रखा गया है। आम आदमी पार्टी द्वारा यह रवैया उत्तराखंडियों के राजनीतिक अधिकारों का सीधा अपमान है।

यह उल्लेखनीय है कि दिल्ली की सभी विधानसभा सीटों पर उत्तराखंड मूल के मतदाताओं की बड़ी संख्या मौजूद है। इसके बावजूद, उनकी राजनीतिक भागीदारी को नजरअंदाज किया गया है, जो गहरी चिंता का विषय है।

हाल ही में आयोजित एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री द्वारा उत्तराखंड के युवा नेता रवि नेगी के पैर छूने की घटना को दिल्ली में बसे उत्तराखंडी समाज ने अत्यंत सम्मान और गौरव का विषय माना है। इस घटना से प्रेरित होकर, दिल्ली में रह रहे उत्तराखंडियों सहित दिल्ली की सभी जनता ने इस बार राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए मतदान करने का संकल्प लिया है।

देवभूमि उत्तराखंड धार्मिक-सामाजिक विकास संगठन दिल्ली में रहने वाले सभी उत्तराखंडियों से आग्रह करती है कि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करते हुए एक सशक्त और समान नागरिक संहिता का समर्थन करने वाली सरकार के पक्ष में मतदान करें।

देवभूमि उत्तराखंड धार्मिक-सामाजिक विकास संगठन दिल्ली दो दशकों से दिल्ली में उत्तराखंड के धार्मिक एवं सामाजिक विषय पर कार्य कर रही है

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