हम ऊंची छलांग लगा सकते थे…

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प्रशांत पोळ

नागपुर : वैसे भ्रष्टाचार के साथ कांग्रेस का नाम बहुत पहले से जुड़ता आया है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद, वर्ष 1948 में, नेहरू सरकार ने भारतीय सेना के लिए 2000 पुरानी जीप्स का आर्डर दिया, जो ठीक करके नई जैसी बनाकर देनी थी। जिस ब्रिटिश कंपनी को ऑर्डर दिया, उसने 300 ब्रिटिश पाउंड प्रति जीप के हिसाब से दाम बताए थे। मजेदार बात यह, की 350 ब्रिटिश पाउंड की कीमत में ही अमेरिका या कनाडा में अच्छी नई जीप मिल रही थी। किंतु नेहरू के विश्वस्त कृष्ण मेनन, जो उस समय लंदन में भारत के उच्चायुक्त थे, ने रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को मनवाकर, उन्हें पुरानी (सेकंड हैंड) जीप, सेना के लिए खरीदने को विवश किया था।

कांग्रेस ने भ्रष्टाचार की कितनी दमदार शुरुआत की थी, इसकी बानगी देखिए – जिस कंपनी को इन 2000 जीप की ऑर्डर दी गई थी, वह M/s Anti-Mistantes, यह एक छद्म ( Shady) कंपनी थी, जिनकी जमा पूंजी मात्र 605 ब्रिटिश पाउंड थी..! इस कंपनी ने 2000 मे से केवल 155 जीपें ही भेजी, जिसमें से एक भी चलने के काबिल नहीं थी। भारतीय सेना ने वें सारी जीपें वापस कर दी, किंतु कंपनी ने उन्हें वापस लेने से इन्कार किया।

मेनन नहीं पर नहीं रुके। सेना के लिए जीपों की आवश्यकता तो थी। उन्होंने पहले से भी उंची कीमत पर, अर्थात 458 ब्रिटिश पाउंड की दर से, 1007 जीपों की ऑर्डर, M/s SCK Agencies को दी। दुर्भाग्य से, दो वर्षों में मात्र 49 जीपें भारतीय सेना को मिल सकी, किंतु पैसा पूरा गया।

इस पर कुछ कार्यवाही करना तो दूर, नेहरू ने कृष्ण मेनन को भारत का रक्षा मंत्री बनाया ! 1962 के चीन युद्ध के समय, कृष्ण मेनन भारत के रक्षा मंत्री थे। इसमें क्या आश्चर्य की हम युद्ध हार गए..!

कांग्रेस के भ्रष्टाचार का प्रारंभ यहां से हुआ था, जो आगे बढ़ता ही गया।

1958 में इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने, अपने ही ससुर, जवाहरलाल नेहरू सरकार के राज में हुआ ‘मुंदडा घोटाला’ उजागर किया था।

इंदिरा गांधी के राज में भी अनेक घोटाले हुए। ‘नागरवाला कांड’ का उल्लेख इस पुस्तक में आया हैं। 1970 का ‘मारुती घोटाला’, आपातकाल मे ‘केओल ऑइल (Kuo Oil) घोटाला’, ‘पीएसयू टेंडर घोटाला’, ‘जमीन अधिग्रहण – स्लम क्लियरेंस घोटाला’ आदी अनेक। राजीव गांधी की सरकार ही बोफोर्स कांड के कारण गई थी। बाद में नरसिंहराव सरकार मे भी ‘हवाला’ से लेकर अनेक घोटाले हुए।

किंतु इन सब घोटालों को मात दी, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए सरकार ने। वर्ष 2004 से 2014 तक, दस वर्ष यूपीए – 1और यूपीए – 2 के रहे। इस पूरे दस वर्ष के कार्यकाल की विशेषता रही की मंत्रीगण बढ़ चढ़कर घोटाले करते रहे। यूपीए – 1 से कई गुना ज्यादा घोटाले, यूपीए – 2 में हुए।

मोबाइल नेटवर्क के लिए जब 2G स्पेक्ट्रम का आबंटन होना था, तो उसमें जमकर घोटाला हुआ। 1,76,000 करोड रुपए का सीधा घाटा सरकार को, अर्थात देश को हुआ। इस घोटाले में दूरसंचार मंत्री ए. राजा को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। बाद में वे गिरफ्तार हुए और अनेक महीनों तक दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद रहे। मोबाइल घोटाले में कनिमोझी, टेलिफोन कॉल रेट कांड मे दयानिधी मारन, एयरसेल-मैक्सिस घोटाले मे चिदंबरम जैसे यूपीए के मंत्रियों को जेल की हवा खानी पड़ी। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के शासनकाल मे 7 केंद्रीय मंत्री जेल के अंदर थे..!

यूपीए के दौरान कोयला खदानों की नीलामी में प्रचंड भ्रष्टाचार हुआ। देश का सीधा-सीधा 1.86 लाख करोड रुपए का नुकसान हुआ। पैसे खाकर यह कोल ब्लॉक, अत्यंत कम कीमत पर नीलाम कर दिए गए।

इटालियन फर्म से हेलीकॉप्टर खरीदी में भी भ्रष्टाचार हुआ। मात्र 12 चॉपर (हेलीकॉप्टर) 3,600 करोड रुपए में खरीदे गए। भारतीय सेना के लिए खरीदे जाने वाले टेट्रा ट्रक में भी भरपूर गोलमाल हुआ। तत्कालीन सेनाध्यक्ष, जनरल वी के सिंह को 14 करोड रुपए के रिश्वत की पेशकश हुई। सन 2010 में जब भारत में कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन हुआ, तो उसे भी कांग्रेस ने नहीं छोड़ा। कांग्रेस के मंत्री सुरेश कलमाड़ी ने खेलों के आयोजनों में भी घोटाला किया।

*इन घोटालों की सूची बहुत लंबी है। यह 10 वर्ष भारत के लिए अत्यंत दुखद रहे। अवसर हमारे आगे हाथ जोड़कर खड़े थे। हम तेज गति से भाग सकते थे। लंबी छलांग लगा सकते थे। किंतु सतत होने वाले भ्रष्टाचार और घोटालों ने देश को खोखला करके रख दिया था। सरकार के पास नई योजनाओं के लिए पैसे नहीं थे।*

नई योजनाएं तो दूर की बात, उन दिनों देश की सुरक्षा के लिए भी सरकार के पास पैसे नहीं थे। वर्ष 2013 में हमारे पास मात्र 20 दिनों के लिए गोला-बारूद थी। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के रिपोर्ट मे (CAG Report No 19 of 2013, Performance Audit on Ammunition Management) यह खुलासा हुआ था। उन दिनों यदि युद्ध छिड़ जाता, तो हमारी स्थिति गंभीर थी। टैंक के लिए लगने वाली गोला बारूद अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच गई थी। आर्टिलरी को आवश्यक ऐसे इलेक्ट्रॉनिक फ्यूज नहीं थे। वायुसेना के विमान पुराने हो चुके थे। उन्हें तत्काल नए आधुनिक युद्ध विमान की आवश्यकता भी। किंतु इसकी कोई चिंता कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए में नहीं दिख रही थी। सभी मंत्री अपनी-अपनी व्यवस्थाएं बनाने में जुटे थे।

_(शिघ्र प्रकाशित ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश।)

हम अवसर चूक गए…

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प्रशांत पोळ

नागपुर : अंग्रेज जब देश छोड़कर गए, तब भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, क्योंकि हम गुलाम राष्ट्र थे। स्वाभाविक रूप से अंग्रेजों ने हमारा भरपूर शोषण किया। हमारी व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न किया। हमारा विकास करने में अंग्रेजों की रुचि रहने का प्रश्न ही नहीं था। जिन्हें हमारे तत्कालीन नेता विकास मान रहे थे, जैसे रेलगाड़ी, टेलीफोन, टेलीग्राम, कुछ सड़के आदि.. यह सब उन्होंने अपने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बनाई हुई सुविधाएं थी, भारत के विकास के लिए नहीं! तत्कालीन अंग्रेज अफसरों ने ही ऐसा लिखकर रखा हैं। किसी जमाने में वैश्विक व्यापार में सिरमौर रहे हम, विश्व व्यापार मे मात्र 2.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी तक सिमट गए।

ऊपर से विभाजन का भारी बोझ देश पर आ पड़ा था। लगभग एक करोड़ विस्थापित हिंदू-सिख, अपने ही देश भारत में, शरणार्थी के रूप में आए थे। उनकी व्यवस्था लगानी थी।

संक्षेप में कहे, तो अनेक प्रश्न थे। अनेक समस्याएं थी। और अनेक चुनौतियां थी। किंतु इन्हीं चुनौतियों में अनेक अवसर भी छिपे थे। उन अवसरों का लाभ लेकर हम आगे बढ़ सकते थे। उन्नत राष्ट्र बनने की दिशा में चल सकते थे।

हमारे आसपास जिन राष्ट्रों को स्वतंत्रता मिली, या जो महायुद्ध की आग में जल गए थे, उनके सामने भी यही समस्याएं थी। यही चुनौतियां थी।

जापान और जर्मनी तो विश्व युद्ध की ज्वाला में तथा परमाणु बम के विस्फोट में मानो बर्बाद हो गए थे। उनकी युवा पीढ़ी बड़ी संख्या में युद्ध में मारी जा चुकी थी। उनके सामने तो समस्याओं का अंबार लगा था। इजराइल, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका जैसे देश भी, हमें स्वतंत्रता मिलने के आसपास ही स्वतंत्र हुए थे। इन सभी की अपनी-अपनी समस्याएं थी।

*किंतु यह सभी देश, यह सभी राष्ट्र, हिम्मत के साथ खड़े हुए। इन सब ने अपने स्वयं को पहचाना। अपनी ‘आइडेंटिटी’ तलाशी। अपने उस पहचान के अभिमान का, गर्व का भाव, अपने देशवासियों में जगाया। और धीरे-धीरे यह सारे राष्ट्र उठ खड़े हुए।*

इजराइल का ही उदाहरण लेते हैं। 14 मई 1948 को इजराइल आधिकारिक रूप से राष्ट्र बन कर सबके सामने आया। यहूदियों की पुरानी मातृभूमि, बाद में पॅलेस्टाईन बन गई थी। इसी पॅलेस्टाईन के एक हिस्से में इजरायल की नींव रखी गई।

किंतु जब इजराइल बना, तो समस्या सामने आई कि, इस देश की भाषा कौन सी होगी? इस प्रश्न का स्वाभाविक उत्तर तो हिब्रू ही था। क्योंकि हिब्रू ही यहूदियों की (ज्यू लोगों की) अधिकृत भाषा और धार्मिक भाषा थी। किंतु इसमें भी एक पेंच था। सैकड़ो वर्षों से हिब्रू में कोई नया साहित्य ना लिखे जाने के कारण हिब्रू यह मृत भाषा (dead language) बन गई थी। लगभग दो हजार वर्षों से हिब्रू किसी भी देश की राज भाषा तो थी ही नहीं, अपितु लोक भाषा भी नहीं बन सकी थी। विश्व भर में बिखरे हुए यहूदी, कुछ धार्मिक अवसरों पर ही हिब्रू का प्रयोग करते थे। इसलिए आधुनिक हिब्रू तैयार करने में कड़े परिश्रम करने की आवश्यकता थी।

दूसरी भी एक समस्या थी। इजरायल बनने के बाद, विश्व के सभी देशों से यहूदी वहां बसने के लिए आ रहे थे। वह स्थानिक भाषा, अर्थात उनके देश की भाषा, बोलते थे। हंगरी, पोलैंड, जर्मनी, रूस, चेकोस्लोवाकिया आदि अनेक देशों से यहूदी वहां आ रहे थे। अपने भारत से भी बडी संख्या मे यहूदी वहां गए। भारत में अधिकांश यहूदी पश्चिमी तट के गांवों में बसे थे। विशेषता महाराष्ट्र में ज्यादा। इस समूह को ‘बेने इजरायली’ या ‘बेने ज्यू’ समूह कहा जाता था। प्रसिद्ध सिने कलाकार डेविड, सुलोचना (रुबी मायर), राजकपूर के मित्र और पत्रकार बनी रुबेन आदि यहूदी (ज्यू) ही थे। ये सारे लोग् मराठी बोलते थे।

भाषा की इतनी विविधता होने के कारण एक विचार यह सामने आया कि चुंकी अंग्रेजी यह पूरे विश्व की संपर्क भाषा हैं, अतः अंग्रेजी को ही कुछ दिनों तक संपर्क भाषा के रूप में चलाएंगे। हिब्रू को बाद में कैसे लागू करना, यह देख लेंगे।

किंतु यहूदी नेतृत्व के सामने अपने लक्ष्य के बारे में स्पष्टता थी। अत्यधिक विरोध के बाद बने इस नए राष्ट्र में उन्हें सबको जोड़कर रखना था। इसलिए भाषा यह प्रभावी साधन और माध्यम था। अतः तत्कालीन यहूदी नेतृत्व ने निर्णय लिया, हम हिब्रू को ही अपनाएंगे।

अब हिब्रू का निर्णय तो लिया। इसको लागू कैसे करेंगे..?

इस पर, नए बने इजरायली सरकार ने सर्वप्रथम आधुनिक हिब्रू का पाठ्यक्रम तैयार किया। यह बनाने में सबसे ज्यादा मेहनत की थी, एलिजर बेन यहूदा ने। इन्हें आधुनिक हिब्रू का पितामह कहा जाता है। वीर सावरकर जी ने जैसे महापौर, नगर पालिका, दूरदर्शन, प्राध्यापक, नेतृत्व, दिनांक, हुतात्मा, दूरभाष, चित्रपट, उपस्थित, स्तंभ, प्राचार्य… आदि नए शब्दों की रचना की थी, वैसे ही एलिजर बेन यहूदा ने हिब्रू में अनेक नए शब्द तैयार किये, और भाषा संपन्न की।

फिर इजराइल ने 1948 के अंत से 1953 तक, पांच वर्षों में, संपूर्ण इजराइल को हिब्रू सिखाने की योजना तैयार की। पूरे विश्व में यह सबसे अनूठी योजना थी।

इस योजना के अंतर्गत, आधुनिक हिब्रू का मानक पाठ्यक्रम तैयार किया गया। पूरे देश में, जो भी हिब्रू जानता हैं, ऐसे लोगों की सूची बनाई गई। उन सभी को इस हिब्रू के पाठ्यक्रम का क्रैश कोर्स जैसा प्रशिक्षण दिया गया। इन प्रशिक्षित लोगों में कोई डॉक्टर था, कोई बढई, कोई बैंक कर्मचारी, कोई प्राध्यापक, कोई इंजीनियर तो कोई गृहिणी थे।

इन सभी को कहा गया – ‘आप को अपने निकट के शाला में जाकर बच्चों को हिब्रू सीखाना है’।

समय भी नियत किया गया – प्रात 11:00 से 1:00 बजे। रविवार से गुरुवार। (शुक्रवार, शनिवार को इजराइल में सार्वजनिक छुट्टी होती है) इन सभी प्रशिक्षित हिब्रू शिक्षकों को, उनके कार्यस्थल के निकट के स्कूल, (पाठशाला) से जोड़ा गया। इनमें से जो नौकरी करते थे, उनके मालिकों को बताया गया कि सप्ताह में पांच दिन, इन्हें प्रातः 11:00 से दोपहर 1:00 तक छुट्टी देना अनिवार्य हैं।

अब ये प्रशिक्षित हिब्रू के अध्यापक, अपने निकट के शालाओं में जाकर बच्चों को हिब्रू पढ़ाने लगे !

इस पद्धति से बच्चे तो भाषा सीख जाएंगे। पर बड़ों का क्या ?

इसके बारे में भी इजराइल सरकार ने सोच कर रखा था। प्रतिदिन रात को 7 से 8 , यह बच्चे अपने घर पर, अपने माता-पिता को हिब्रू पढ़ाएंगे। परंतु यदि बच्चे पढ़ाने में गलती करते हैं, या फिर जिनके घर में बच्चे ही नहीं है, उनका क्या?

इसके बारे में भी योजना तैयार थी।

सभी बड़े, बुजुर्गों के लिए, शाम को 7 से 8 बजे, रेडियो इजराइल से हिब्रू का पाठ्यक्रम, जो उस दिन शाला में बच्चों को सिखाया गया हैं, ब्रॉडकास्ट किया जाता था। उन दिनों इजराइल की सड़कों पर, सप्ताह के पांच दिन, रात को 7:00 बजे से 8:00 बजे तक मानो कर्फ्यू लगा होता था। पूरा सन्नाटा। सारा इजराइल अपने-अपने घरों में बैठकर हिब्रू पढ़ रहा होता था।

1953 में जब यह अभियान बंद हुआ, तब तक सारा इजराइल हिब्रू पढ रहा था / लिख रहा था / हिब्रू सुन रहा था / हिब्रू में बोल रहा था..!

आज यदि विश्व में कोई भी, ऑप्टिक्स, इरीगेशन और साइबर सिक्योरिटी पर नया, कुछ लेटेस्ट पढ़ना चाहता है, या शोध करना चाहता हैं, तो उसे हिब्रू आना अनिवार्य है!

इजराइल का तत्कालीन नेतृत्व जानता था, कि देश को अगर एकजुट रखना हैं, तो सारे व्यवहार स्वभाषा में ही होने चाहिए। इसलिए उन्होंने एक मृत भाषा को इस विश्व की, न केवल आधुनिक भाषा बनाया, वरन् ज्ञान भाषा और व्यापार की भाषा भी बनाया।

किसी मृत भाषा को इस प्रकार से जीवित करने का, विश्व का यह अनूठा उदाहरण है।

जैसा इजराइल ने किया, वैसे ही भारत के साथ स्वतंत्र हुए दक्षिण कोरिया जैसे देश ने भी किया। इन्ही के साथ, विनाश की गर्त से उठकर खड़े होने वाले जापान और जर्मनी ने भी किया। इन देशों ने अपनी पहचान, अपने ‘स्व’ का अभिमान, देश के नागरिकों के सामने रखा और उन्हें राष्ट्र का पुनर्निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।

*भारत में भी अंग्रेजों ने बर्बाद की हुई सभी व्यवस्थाएं फिर से खड़ी करनी थी। उन्होंने 150 से ज्यादा वर्षों से भारतीय मानसिकता पर जो औपनिवेशिकता का आवरण चढ़ाया था, उसे कुरेदकर निकालना आवश्यक था।*

भारत के सामने यह एक जबरदस्त अवसर था, नया भारत बनाने का। बलशाली, वैभव संपन्न और तेजस्वी भारत के पुनर्निर्माण का।

किंतु हम यह अवसर चूक गए…!

_(शीघ्र प्रकाशित ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’इस पुस्तक के अंश। यह पुस्तक हिन्दी के साथ ही मराठी, तेलुगु, गुजराती और अंग्रेजी में भी प्रकाशित हो रही हैं।)_

एआईआईए द्वारा नाड़ी परीक्षा पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

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नई दिल्ली :
रोग निदान एवं विकृति विज्ञान (आरएनवीवी) विभाग, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए), नई दिल्ली द्वारा आज संस्थान परिसर में नाड़ी परीक्षा विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला में दिल्ली-एनसीआर एवं पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश के 19 आयुर्वेद महाविद्यालयों से आए शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. (वैद्य) पी. के. प्रजापति, निदेशक, एआईआईए ने की। इस अवसर पर डॉ. आर. के. यादव, डीन (पीजी); डॉ. राजा राम महतो, चिकित्सा अधीक्षक (एएमएस); तथा डॉ. विवेक अग्रवाल, विभागाध्यक्ष, आरएनवीवी विशिष्ट रूप से उपस्थित रहे।

अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. (वैद्य) पी. के. प्रजापति ने आयुर्वेद में व्यावहारिक एवं साक्ष्य-आधारित निदान कौशल को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नाड़ी परीक्षा एक शास्त्रीय निदान पद्धति होने के साथ-साथ आज की आधुनिक नैदानिक प्रैक्टिस में भी अत्यंत प्रासंगिक है, जिसके लिए इसे शैक्षणिक रूप से सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने नाड़ी परीक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ वैद्यों—वैद्य बसंत लाड़, प्रो. आर. के. सिंह एवं प्रो. एम. एस. बागेल—का स्मरण किया। साथ ही उन्होंने नाड़ी तरंगिणी ऐप जैसी नवीन तकनीकों के समावेश द्वारा नाड़ी परीक्षा के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण पर भी जोर दिया।

कार्यशाला में सुप्रसिद्ध नाड़ी वैद्य डॉ. सुधा शर्मा एवं डॉ. राजीव शर्मा ने अतिथि वक्ता के रूप में सहभागिता की। उन्होंने अपने समृद्ध नैदानिक अनुभव साझा करते हुए व्यावहारिक प्रदर्शन, हस्त-प्रशिक्षण एवं सूक्ष्म व्याख्यात्मक पहलुओं पर विस्तृत जानकारी दी। सत्रों का मुख्य फोकस नाड़ी परीक्षा की व्याख्यात्मक तकनीकों तथा पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक निदान दृष्टिकोण के साथ समन्वित करने पर रहा।

इस कार्यशाला का उद्देश्य शोधार्थी एवं शिक्षक स्तर पर नाड़ी परीक्षा के व्यावहारिक पक्षों का प्रसार करना तथा इसे मुख्यधारा की नैदानिक चिकित्सा में प्रभावी रूप से एकीकृत करना था। संवादात्मक सत्रों, लाइव डेमोंस्ट्रेशन एवं केस-आधारित चर्चाओं के माध्यम से प्रतिभागियों को। अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ।

यह अकादमिक पहल एआईआईए की आयुर्वेदिक शिक्षा में उत्कृष्टता, क्षमता निर्माण एवं प्रामाणिक निदान पद्धतियों के राष्ट्रीय स्तर पर संवर्धन के प्रति सतत प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

7 फरवरी 1833 अंग्रेजों ने वीर गंगा नारायण सिंह सहित सैकड़ो क्रान्तिकारियों को तोप से उड़ाया

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–रमेश शर्मा

भोपाल । इतिहास की पुस्तकों में इस संघर्ष का सबसे कम विवरण है । यह अंग्रेजों के विरुद्ध एक गुरिल्ला संघर्ष था । जिसे इतिहास में डकैतों का गिरोह लिखा । स्वाधीनता का यह संघर्ष 1767 से 1833 तक चला । अंतिम एक साल का युद्ध तो तोपखाने के साथ था । इसका अंदाजा सहज लग सकता है कि कितने लोग बलिदान हुये होंगे इसका विवरण नहीं मिलता । केवल इस संघर्ष के नायक का नाम मिलता है । अन्य बलिदानियों का नहीं। इस संघर्ष के नायक थे वीर गंगा नारायण सिंह । जिन्हे 7 फरवरी 1833 को तोप से उड़ाया गया ।

संघर्ष की शुरुआत अंग्रेजों और मुगल बादशाह शाह आलम के बीच 1765 में हुये उस समझौते से होती है जिसे इतिहास में इलाहाबाद संधि के नाम से जाना जाता है । इस समझौते के तहत बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी सौंप दी थी । तब बंगाल की सीमा में वर्तमान राज्य असम ही नहीं झारखंड और बिहार भी हुआ करता था ।

दीवानी मिलते ही अंग्रेजों ने आदिवासियों और नागरिकों का शोषण शुरू कर दिया । अंग्रेजों ने नमक कर, दरोगा प्रथा, जमीन बिक्री कानून इसपर टैक्स आदि लागू किये है । इसके अलावा सालाना बसूली की दर भी बढ़ा दी । इस अबैध बसूली के लिये उन्होंने एक लोकल ऐजेंट बनाया । वराह भूमि के राजा विवेक नारायण सिंह की दो रानियां थी । दोनों के एक एक बेटा । रीति के अनुसार बड़ी रानी के बेटा उत्तराधिकारी होता था । राजा के मरने के बाद अंग्रेजों ने छोटी रानी के बेटे रघुनाथ नारायण सिंह से संपर्क किया और सेना भेजकर गद्दी पर बिठा दिया । और बड़ी रानी का बेटा लक्ष्मण सिंह को निष्कासित कर दिया । उन्हे जंगल में कुछ जमीन निर्वाह के लिये दी । जनता का सद्भाव उनके साथ था । उनहोंने लोगों को संगठित किया । और अंग्रेजों से मुक्ति का संघर्ष शुरू हुआ । अंग्रेजों ने उन्हे पकड़ कर जेल में डाल दिया । उनकीं मृत्यु जेल में ही हुई ।

गंगा नारायण सिंह उन्ही के बेटे थे । उनके मन में अंग्रेजों से मुक्ति का तो सपना था अब पिता के बलिदान से गुस्सा बढ़ा । उन्होंने एक गुरिल्ला सेना गठित की और अपनी जन्म भूमि को मुक्त कराने का अभियान छेड़ा तथा । अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का कर न देने का आव्हान किया । उनकी बात का प्रभाव पड़ा। पूरा समाज एकत्र होकर संघर्ष में जुट गया । इसमें नगरवासी, ग्रामवासी और वनवासी सब थे । यह संघर्ष इतना प्रबल था कि अंग्रेजों की साधारण सेना काम न आ सकी । दमन के लिये 1832 में अंग्रेजों ने वैरकपुर छावनी से तोपखाने के साथ सेना भेजी । यह युद्ध लगभग साल भर तक चला । अंत में जैसा हर युद्ध में हुआ । अंग्रेजों ने मुखविर से खबर ली और रात में घेर लिया । वहां जितने लोग़ थे उनमें कोई जिन्दा न बचा । वीर गंगा नारायण सिंह को तोप से उड़ा दिया । इस एक साल में कितने वीर शहीद हुये कितने गाँवों में आग लगाकर लोगों को जिन्दा जला कर मार डाला गया इसका हिसाब कहीं नहीं । अंग्रेजों ने इन क्राँतिकारी बलिदानियों के लिये डकैत लिखा । और अपने दमन को सही ठहराने के लिये गजेटियर में इतना लिखा कि “डकैतों की तलाश के लिये गांवो में आग लगाई गई ”
भारत के इतिहास में ऐसी कहानियाँ हर क्षेत्र में फैली हैं।

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