बाबा योगेन्द्र जन्मशती : जिन्होंने साबित किया कि संसाधनों की भव्यता से नहीं बल्कि “सत्व” से ही संगठन गढ़े जाते हैं।

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वेद प्रकाश

समस्त हिन्दू समाज को एक सूत्र में पिरोकर इस राष्ट्र को वैभवसंपन्न बनाने का संघ का अभियान धीरे – धीरे आकार ले रहा था। नागपुर के एक शाखा से प्रारंभ हुई इस यात्रा ने अब समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रवेश कर वहां भी स्थान बनाना शुरू कर दिया था। सामाजिक, धार्मिक, शिक्षा, मजदूर, किसान आदि विविध क्षेत्रों में पहल के बाद कला क्षेत्र की ओर ध्यान गया जहां, साम्यवादी प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में वैचारिक असहमति को “अछूत” और अपराधी सदृश्य समझा जाता था। स्वतंत्रता के बाद भारत के स्वबोध जागरण की बजाय वामपंथी ताकतें कांग्रेसी सत्ता के सहारे सशक्त कला माध्यम द्वारा समाज विखंडन और आत्महीनता दलदल के दुष्चक्र में भारत को जोर – शोर से धकेलने में जुटे हुए थे।

ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच सीतापुर (उ.प्र. ) के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री योगेंद्र जी को 57 वर्ष की आयु संघ ने कला क्षेत्र में कार्य कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी। तब संघ कार्य की व्याप्ति आज की तरह नहीं थी। योगेन्द्र जी के पास न इस क्षेत्र में कार्यकर्ता थे और न ही कोई पूंजी। बस एक चीज उनके पास थी – सबको जोड़ने वाला कोमल मन और प्रेमभरा हृदय।

बस 1981 के जनवरी में लखनऊ में दसेक कार्यकर्ताओं को इकट्ठा कर कला क्षेत्र में संस्कार भारती की स्थापना की गई और योगेन्द्र जी इसके संस्थापक संगठन मंत्री बनाए गए । 10 जून 2022 को 98 वर्ष की आयु में उनका शरीर पूर्ण हुआ। चार दशक की इस यात्रा में उनके पास संगठन को खड़ा करने के लिए संसाधन था तो केवल राष्ट्रीयता के ज्वाल से भरा हृदय, मन में अडिग संकल्प, घनघोर परिश्रमी स्वभाव और अपने – पराए से इतर सबको समा लेने की मधुरता। बस चल पड़े योगेन्द्र जी। 40 वर्षों की अपनी सांगठनिक अनथक यात्रा में उन्होंने सौ बार से ज्यादा देश को नापा। हजारों स्थानों पर समिति खड़ी की। कई हजार कलाकारों के हृदय को स्पर्श कर उन्होंने कार्य से जोड़ा। असंख्य हृदय को आत्मीयता के स्पर्श से अनुभूत किया। और बन गए सबके प्रिय बाबा योगेन्द्र।

आज बाबाजी की 101 वीं जयंती है। संवादहीनता के इस दौर में आज सबको उनकी कमी खलती है। लगता है कहीं से बाबा आकर बस अपनी खनकदार आवाज में कहेंगे – और बाबा कैसे हैं ? या सबका हाल – चाल लेने को फोन तो अवश्य ही आएगा। पर ऐसा कुछ अब होने वाला है नहीं।

बाबाजी का शरीर इस दुनिया में नहीं है लेकिन, अपने गुणों से आज भी वे हजारों कार्यकर्ताओं में मुझे स्पष्ट दिखते हैं। देशभर में असंख्य कला साधकों व कार्यकर्ताओं को जब संस्कार भारती को सींचते देखता हूं तो मुझे बाबाजी की उपस्थिति सभी जगह दिखती है। क्योंकि उन्हीं के द्वारा सिंचित कार्यकर्ता आज भी संगठन के नींव बन अनवरत कला क्षेत्र को संस्कारक्षम बनाने के अभियान में डटे हुए हैं।

बाबाजी की मधुर वाणी और मोती जैसे अक्षर में लिखे उनके लाखों पत्र आज भी कार्यकर्ताओं में चेतना का संचार करते हैं। क्योंकि वे संस्कार भारती के पदाधिकारी नहीं समस्त कार्यकर्ता / कलासाधक हृदय के अधिकारी थे। टेक्निकल जानकारी से वे लैस नहीं थे पर कार्यकर्ताओं के घर परिवार की वे प्रैक्टिकल चिंता करते थे। कीचड़ में कमल की भांति सादगी, शुचिता और पवित्रता यह उनका विशेषण नहीं बल्कि ऐसा ही था उनका जीवन ।

जैसे पतझड़ के बाद बसंत प्रकृति की स्वाभाविक नियति होती है। ऐसे ही इस राष्ट्रजीवन ने बहुत झंझावतों को सहन कर लिया है। आज वैश्विक क्षितिज पर “सर्वसमावेशी हिंदुत्व” का प्रकटीकरण दुनिया के सुख समृद्धि की एकमात्र गारंटी है। और इस गारंटी को भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति ही पूर्ण कर सकेगी। संस्कार भारती इसमें अपनी गिलहरी भूमिका से पीछे नहीं हटेगी।

पुनश्च: बाबा योगेन्द्र जी कला के कोई अध्येता नहीं थे लेकिन अपने जीवन अनुभव की विशाल दृष्टि उनके पास थी। प्रचलित कला जगत में व्यक्ति खड़ा करने की खतरनाक प्रवृत्ति की बजाय वे कहा करते थे –
” हम व्यक्ति खड़ा करने नहीं समाज को जोड़ने निकले हैं, व्यक्ति के अंदर अहंकार का जन्म होता है और समाज के अंदर संस्कार का जन्म होता है। ”
ऐसी विशाल कालादृष्टि के नींव पर संस्कार भारती का भविष्य का मार्ग प्रशस्त होना है।

पति पत्नी के रिश्तों में दरार क्या महिला सशक्ति करण ही जिम्मेदार है?

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पतियों द्वारा आत्म हत्याओं की कुछ दुखभरी खबरों ने सुप्त भारतीय समाज में भूचाल सा ला दिया है। पत्नियों पर दोष मढ़ा जा रहा है कि उनकी फरमाइशों या मानसिक तनाव, उत्पीड़न को झेलने से टूटने के पश्चात लगातार कई हसबैंड्स को सुसाइड के रास्ते समाज से रुखसत होना ही एक मात्र विकल्प बचा है। डेली दस आत्म हत्याएं शादी की वजह से हो रही हैं।

बैंगलोर के एक टेकी की पत्नी और मां बाप, भाई आदि अभी जेल में हैं। क्या वास्तव में शिक्षित कामकाजी भारतीय महिलाएं सशक्त हो चुकी हैं? आंकड़े बता रहे हैं कि फैमिली कोर्ट्स में केसों के अंबार लगे हैं, आए दिन तारीखों पर आने वाले पति पत्नियों में जूतम पेज़ार होती है। कब कौन किसके साथ भाग जाए, या आशिकों के साथ षडयंत्र कर, सुपारी पर किसको उठवा दे, रामजी ही जानें। दो दिन पहले पांच बच्चों की मैय्या एक कथित भिखारी के साथ कहीं दूर गगन की छांव में सुकून के लिए निकल ली।

समाजशास्त्री बता रहे हैं कि सेपरेशन, टकराव, तलाक, लिविंग इन, विधवा विवाह, पुनर्विवाह, सिंगल मदर, सरोगेट मदर, कई अन्य तरीके के प्रयोग नित दिन बढ़ रहे हैं। प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि “समकालीन भारत में, लिंग परिदृश्य एक गहन परिवर्तन से गुजर रहा है, जो विकसित होते सामाजिक मानदंडों और पारंपरिक पुरुष प्रतिरोध के बीच असंगति द्वारा चिह्नित है। हाल की घटनाओं ने लिंग पूर्वाग्रह को लेकर बहस को उत्प्रेरित किया है, जैसा कि परेशान पतियों से जुड़ी आत्महत्याओं के दुखद मामलों के बाद सार्वजनिक और न्यायिक टिप्पणियों में उछाल से उजागर हुआ है। कथाएँ एक विपरीतता के साथ सामने आती हैं: जबकि कुछ पुरुष सार्वजनिक रूप से अपनी परेशानी के लिए अपनी पत्नियों को जिम्मेदार ठहराते हैं, एक गहरा सामाजिक परिवर्तन चल रहा है, जो शिक्षित, कार्यरत महिलाओं की आकांक्षाओं से प्रेरित है।”

डॉ ज्योति खंडेलवाल कहती हैं, “ऐतिहासिक रूप से, भारत में लिंग पूर्वाग्रह गहराई से जड़ जमाए हुए हैं, जिसमें पितृसत्तात्मक मानदंड सामाजिक गतिशीलता और पारिवारिक संरचनाओं को निर्धारित करते हैं। फिर भी, जैसे-जैसे महिलाएँ तेज़ी से कार्यबल में शामिल हो रही हैं, घिसे पिटे नेराटिवस को फिर से लिखा जा रहा है। ”

बैंगलोर की डॉ शालिनी के मुताबिक आज अनेकों महिलाएँ सशक्तिकरण को तलाश कर रही हैं, जो विवाह और मातृत्व से परे स्वतंत्रता, समानता और अवसरों की विशेषता वाली लाइफ स्टाइल की ख्वाइश रखती हैं। एक रोचक बदलाव हो रहा है: महिलाएँ परिवार इकाई के भीतर अपनी भूमिकाओं पर पुनर्विचार कर रही हैं, बड़े परिवारों और अधीनस्थ पदों की पारंपरिक अपेक्षाओं से दूर जा रही हैं। यह विकास न केवल एक व्यक्तिगत जागृति की ओर इशारा करता है, बल्कि लिंग मानदंडों की एक व्यापक, सामूहिक पुनर्परिभाषा की ओर संकेत करता है।”

दूसरे एंगल से देखें तो पति की आत्महत्या की कहानी जटिल मुद्दों को ओवर सिम्पलिफाई, करती है, अक्सर गहरी सामाजिक समस्याओं को संबोधित करने के बजाय पत्नियों को गलत, अनुचित, तरीके से दोषी ठहराती है। जबकि पुरुषों के बीच मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को स्वीकार करना और उनका समाधान करना महत्वपूर्ण है, महिलाओं को दोषी ठहराने का अति सरलीकृत लेंस ऐसी त्रासदियों में योगदान देने वाले प्रणालीगत कारकों से ध्यान हटाता है, सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं।

हाल ही की घटनाओं पर पब्लिक हस्तियों और अदालतों की प्रतिक्रिया घरेलू रिश्तों में शामिल पेचीदगियों के बारे में बढ़ती जागरूकता को दर्शाती है। यह नई आवाज़ अक्सर हाई-प्रोफाइल मामलों की प्रतिक्रिया में सामने आती है, जो लैंगिक मुद्दों के आसपास न्यायसंगत चर्चाओं के महत्व को अंडरलाइन करती हैं।
हालांकि, सिर्फ़ महिलाओं को दोषी ठहराना वैवाहिक कलह और सामाजिक अपेक्षाओं की बहुआयामी प्रकृति को नज़रअंदाज़ करता है। यह एक अति सरलीकरण है जिसे चुनौती दी जानी चाहिए, क्योंकि यह समानता की खोज में महिलाओं द्वारा की गई वास्तविक प्रगति को नकारने की धमकी देता है, ये कहना है डॉ टी पी श्रीवास्तव का जो बिहार में पारिवारिक समस्याओं का अध्ययन कर रहे हैं।

इस मंथन के दौर में हमारा समाज, बदलती गतिशीलता से जूझ रहा है। शहरी परिदृश्य में ऐसी महिलाएँ तेज़ी से सामने आ रही हैं जो न सिर्फ़ अनुकूलन कर रही हैं बल्कि आगे बढ़ रही हैं। उच्च शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता की पहचान वाली मेट्रो संस्कृतियाँ कांच की छत को तोड़ने में महत्वपूर्ण हैं।
समाज सेविका विद्या झा कहती हैं कि “पोषण, स्वास्थ्य सेवा और जीवनशैली विकल्पों तक बेहतर पहुँच एक जनसांख्यिकीय बदलाव में योगदान दे रही है जहाँ महिलाओं की भूमिकाएँ तेज़ी से विकसित हो रही हैं। विकास केवल आर्थिक वृद्धि का एक पैमाना नहीं है; यह एक प्रभावी गर्भनिरोधक साबित हो रहा है, जिससे छोटे, अधिक शिक्षित परिवार बन रहे हैं जो बदलते मूल्यों को दर्शाते हैं।”

फिर भी, ऐसी प्रगति प्रतिरोध के बिना नहीं आती है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म युद्ध के मैदान बन गए हैं जहाँ परंपरावादी अपनी आशंकाएँ व्यक्त करते हैं, और सार्वजनिक प्रवचन अक्सर महिला सशक्तिकरण की प्रशंसा और बीते लिंग भूमिकाओं के लिए उदासीनता के बीच झूलते रहते हैं। यह तनाव न केवल व्यक्तिगत पहचान के लिए बल्कि इन नई भूमिकाओं की सामाजिक स्वीकृति के लिए भी चल रहे संघर्ष की ओर इशारा करता है।

वास्तव में, ऐसे संवाद और वार्तालापों को बढ़ावा देना ज़रूरी है जो विभाजन के बजाय सहयोग और समझ को बढ़ावा दें। पुरुषों को महिलाओं की उभरती भूमिका में शामिल होने और उसका समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित करना एक अधिक समतापूर्ण समाज के निर्माण में आवश्यक है।

सामाजिक सलाहकार मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “अंततः, भारत में बदलता लिंग परिदृश्य एक युद्ध का मैदान नहीं है, बल्कि एक ऐसे भविष्य की ओर एक साझा यात्रा है जहाँ पुरुष और महिला दोनों सम्मान, समझ और समानता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। लिंग गतिशीलता का कायापलट केवल कुछ लोगों के लिए नुकसान की कहानी नहीं है, बल्कि विविध भूमिकाओं और साझा आकांक्षाओं से समृद्ध दुनिया की एक झलक है।”

खेल के मैदानों से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म तक:

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डिजिटल भूलभुलैया से बच्चों को बाहर खींचना, पेरेंट्स के लिए भारी चुनौती

हर नई टेक्नोलॉजी अपने साथ खतरों का एक पूरा पिटारा लेकर आती है। शुरुआत में हर कोई इंटरनेट आधारित गैजेट्स और तकनीकों से इतना विस्मित और मुग्ध हो गया था कि लगा अलादीन का चमत्कारी चिराग हाथ लग गया हो। जैसे जैसे मोबाइल फोन्स सुलभ, सुविधाजनक, और अफोर्डेबल हुए, इंटरनेट के आभासी मकड़जाल ने सबको अपने गिरफ्त में ले लिया। आज एक नया भस्मासुर का अवतार हमारे सम्मुख है, और हमें समझ नहीं आ रहा है इसकी काट क्या है!!

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने निस्संदेह बच्चों के संवाद करने, सीखने और अपने साथियों और समुदायों के साथ बातचीत करने के तरीके को बदल दिया है। स्कूल जाने वाले बच्चों के पेरेंट्स के लिए, ये प्लेटफ़ॉर्म चिंता और बेचैनी का एक महत्वपूर्ण सबब बन चुके हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं “सोशल मीडिया का व्यापक प्रभाव अक्सर लत की ओर ले जाता है, जो बच्चों की भलाई और विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। दुनिया भर में विभिन्न सरकारें विनियमन की आवश्यकता को पहचान रही हैं, कुछ सख्त आयु प्रतिबंधों पर विचार कर रही हैं, और भारत भी वर्तमान में ऐसे नियंत्रणों को लागू करने की संभावना पर विचार कर रहा है।”

हमारे जीवन में सोशल मीडिया की सर्वव्यापकता के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। ऑनलाइन मार्केटिंग प्रभावी रूप से युवा दर्शकों को लक्षित करती है, आकर्षक सामग्री का लाभ उठाती है जो बच्चों को डिजिटल दुनिया में खींचती है। डिलीवरी ऐप, गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म और ऑनलाइन ट्यूशन के उदय के साथ, बच्चे स्क्रीन से चिपके हुए काफी समय बिताते हैं, अक्सर आवश्यक सामाजिक या पारिवारिक गतिविधियों की उपेक्षा करते हैं। एक्चुअली, ऑनलाइन मनोरंजन का आकर्षण पारंपरिक शगल को पीछे छोड़ देता है, जिससे पढ़ने की आदतों में गिरावट आती है और हॉबीज में इंटरेस्ट खत्म हो जाता है। जैसे-जैसे बच्चे अपने गैजेट्स में अधिक से अधिक तल्लीन होते जाते हैं, इस डिजिटल जुनून के परिणाम खुद ही सामने आते हैं, स्कूल टीचर हरि दत्त शर्मा जी बताते हैं।

“कई युवा सामाजिक अलगाव और अधिकार वाले लोगों के प्रति अनादर के लक्षण प्रदर्शित करते हैं, आमने-सामने बातचीत करने के बजाय लंबे समय तक चैटिंग करते हैं। वास्तविक जीवन में जुड़ाव की इस निरंतर उपेक्षा ने बड़े होने के साथ-साथ सार्थक संबंध बनाने और सामाजिक गतिशीलता को नेविगेट करने की उनकी क्षमता के बारे में चिंताएँ पैदा की हैं। इसके अलावा, ऑनलाइन घोटालों और साइबरबुलिंग में चिंताजनक वृद्धि बच्चों को खतरनाक वातावरण में धकेलती है, जिससे माता-पिता डिजिटल युग की कठोर वास्तविकता से जूझते हैं,” शर्माजी कहते हैं।

विशेषज्ञों का तर्क है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू करना एक व्यापक समाधान प्रदान नहीं कर सकता है। बच्चे नियमों को दरकिनार करने और वैकल्पिक खाते बनाने के लिए पर्याप्त समझदार हैं, जिससे कोई भी निषेधात्मक उपाय अप्रभावी हो जाता है।

इसके बजाय, एक अधिक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो माता-पिता, शिक्षकों और बच्चों को जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग के बारे में बातचीत में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है। जबकि कई लोग सख्त आयु प्रतिबंध चाहते हैं – जैसे कि सोशल मीडिया एक्सेस के लिए प्रस्तावित न्यूनतम आयु 18 वर्ष – ऐसा माहौल बनाना महत्वपूर्ण है जहाँ बच्चों को ऑनलाइन इंटरैक्शन से जुड़े जोखिमों और जिम्मेदारियों के बारे में शिक्षित किया जाए। माता-पिता का मार्गदर्शन, खुला संचार और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम बच्चों को सोशल मीडिया की जटिलताओं को सुरक्षित रूप से नेविगेट करने में सक्षम बना सकते हैं।

इसके अलावा, माता-पिता को डिजिटल क्षेत्र से परे अपने बच्चों की रुचियों को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। बाहरी गतिविधियों, खेल, रचनात्मक कलाओं और आमने-सामने सामाजिक संपर्कों को प्रोत्साहित करने से संतुलित जीवनशैली विकसित करने में मदद मिल सकती है। पढ़ने की आदतों को बढ़ावा देना और बच्चों को सार्थक शौक में शामिल करना भी जरूरी है।

सोशल मीडिया के उदय ने वास्तव में स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, क्योंकि वे लत, अनादर और समाजीकरण के खोए अवसरों के संभावित खतरों से जूझ रहे हैं। सरकारें विनियामक उपायों का पता लगाने के लिए सही हैं, लेकिन अधिक सक्रिय दृष्टिकोण आवश्यक है। जिम्मेदार उपयोग के बारे में चर्चाओं को बढ़ावा देने और विविध हितों को प्रोत्साहित करने से, परिवार बच्चों को डिजिटल और वास्तविक दुनिया दोनों में पनपने में मदद कर सकते हैं।

“हमारी चिंताएं बिल्कुल जायज़ हैं। आजकल के बच्चे स्मार्टफोन और सोशल मीडिया में इतने खो गए हैं कि उन्हें खेलने-कूदने, परिवार के साथ समय बिताने और अपनी रुचियों को विकसित करने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। ये चिंताजनक है क्योंकि इससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है, सेंट पीटर्स कॉलेज के शिक्षक डॉ अनुभव कहते हैं।

“स्क्रीन टाइम सीमित करें: बच्चों के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करने का समय निर्धारित करें। परिवार के साथ समय बिताएं: साथ में खाना खाएं, बोर्ड गेम्स खेलें, या फिर कहीं घूमने जाएं। नई चीज़ें सीखने के लिए प्रोत्साहित करें: बच्चों को कोई नया शौक सिखाएं, जैसे कि संगीत, पेंटिंग या डांस। यह याद रखना ज़रूरी है कि बच्चों को धीरे-धीरे सोशल मीडिया से दूर करना होगा। उन्हें समझाएं कि असली दुनिया में भी बहुत कुछ करने को है,” सोशल सलाहकार मुक्ता गुप्ता कहती हैं।

नट सम्राट बार बार नहीं जन्मते

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सच्चिदानंद जोशी

सन 2015 के अंतिम महीनों की बात है शायद सितम्बर या अक्टूबर रहा होगा। मैं उन दिनों भोपाल में ही पदस्थ था माखनलाल विश्वविद्यालय में।मोबाइल पर काल आया जयंत देशमुख का मुंबई से। “और नंदू इन दिनों क्या कर रहे हो। नाटक वाटक करना है कि नहीं।” मुझे लगा जयंत भाई मुंबई की आपाधापी से तंग आकर कोई नाटक करना चाहते हैं भोपाल में। मनःस्थिति कुछ ठीक नहीं थी और कोई नाटक करने की या रंगयात्री समूह को फिर से जोड़ने की इच्छा नहीं थी। “नहीं यार अभी नाटक वाटक कुछ नहीं। बस ऑफिस और घर।”

” अरे यार नाटक कर नहीं सकते तो लिख ही डालो।” जयंत भाई के स्वर में आग्रह भी था और आदेश भी।
” हां लिखने के बारे सोचूंगा।”
” सोचना नहीं है करना है। मुझे हिंदी में” नट सम्राट ” चाहिए। तुमने कई बार पढ़ा है और मराठी में डायरेक्ट भी किया है। तुम उसका हिंदी कर दो। मैं जानता हूं तुम ही कर सकते हो।”
“नट सम्राट” मराठी के प्रसिद्ध लेखक वि.वा.शिरवाडकर जी की ऐसी अजर अमर कृति है कि उसमें अभिनय करने के लिए बड़े अभिनेता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और अलग अलग अभिनेताओं द्वारा किए अभिनय को देखने के लिए दर्शक आस लगाए बैठते हैं।श्रीराम लागू, यशवंत दत्त, मोहन जोशी, नाना पाटेकर न जाने कितने अभिनेताओं ने उसके कई हजार प्रदर्शन किए है।हमने इसे दिल्ली की स्पर्धा में खेला था और पुरस्कार पाया था।विजय डिंडोरकर जी ने इसमें मुख्य भूमिका की थी। इतना सब होने के बावजूद उसका हिंदी अनुवाद करने का लॉजिक मेरी समझ से परे था।

” उसका हिंदी अनुवाद है न।और फिर जब तक तय नहीं कि नट सम्राट की केंद्रीय भूमिका कौन करेगा ये नाटक उठाने का अर्थ ही नहीं है। और फिर इस पर तो अब हिंदी में फिल्म भी बन चुकी है।”

मैने अपनी तरफ से भरपूर दलीलें दी लेकिन जयंत भाई लगता है मन बना चुके थे।बोले ” मैं वो सब नहीं जानता। जो अनुवाद है वो मुझे नहीं अच्छा लगा और मुझे मालूम है कि तुम्हे भी अच्छा नहीं लगा। नट सम्राट के रोल के लिए आलोक से पूछूंगा। उसने हां कहा तो ठीक नहीं तो किसी और को देखूंगा। लेकिन पहले आलोक से पूछूंगा और वो मना नहीं करेगा।”
आलोक चटर्जी और जयंत देशमुख की पहले गहरी दोस्ती और फिर अनबन के किस्से भोपाल के रंग जगत में चर्चित थे।दोनों ने रंग मंडल छोड़ने के बाद स्वतंत्र थिएटर शुरू किया। जयंत ने हिंदी में शिवाजी सावंत के कालजई उपन्यास मृत्युंजय जो कि कर्ण के जीवन पर आधारित था का हिंदी में नाट्य रूपांतर प्रस्तुत किया था।इसमें कर्ण की केंद्रीय भूमिका आलोक चटर्जी ने की थी।इस नाटक से भोपाल के सभी बड़े नाम जुड़े थे। कई कलाकारों को इसमें ब्रेक भी मिला था। अपनी अत्यंत विशिष्ट निर्देशकीय शैली और बेहद कसे हुए अभिनय के कारण इस नाटक के दस बारह शो हुए। जो भी शो हुए वे हाउस फुल थे और कई दर्शकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। हिंदी नाटक जगत का ब्लॉक बस्टर था मृत्युंजय।
लेकिन फिर किसकी नजर लगी पता नहीं निर्देशक और अभिनेता में तना तनी हो गई। मृत्युंजय कुछ समय के लिए बंद हुआ और आलोक ,जयंत की जुगल जोड़ी बिखर गई। बाद में प्रवीण महुवाले ने यह भूमिका हिंदी और मराठी में की।मराठी हिंदी में दुर्योधन की भूमिका करने का अवसर मुझे भी मिला।बाद में यह नाटक 30 -35 शो के बाद बंद हो गया।
इस पृष्ठ भूमि पर मैने जयंत भाई के आग्रह के बारे में सोचा और हामी भरी। मन में एक लालच था कि चलो इस बहाने दोनों दोस्त एक बार फिर एक साथ काम करेंगे।

नट सम्राट का हिंदी अनुवाद इतना आसान भी नहीं था। विशेषकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हिंदी का व्यावसायिक नाटक जगत मराठी से एकदम अलग है। बहुत सारी बाते सिर्फ मराठी नाटक पर ही फिट बैठती है।नाटक के पीरियड को तय करना भी जरूरी था।

काफी सोच विचार कर और कड़ी मेहनत करके मैने एक अंक लिखा और जयंत भाई को भेजा।उन्हें वो बहुत पसंद आया। विशेषकर वे प्रसंग जो मैने भाषा के बदलाव के कारण अलग तरीके से लिखे थे।कविताएं भी उन्हें अच्छी लगी।
पहला अंक लिख कर मैं थोड़ा सुस्ताने लगा। उस बीच दिल्ली की नौकरी का भी बुलावा आया। मन भी थोड़ा भटक गया।

इसी उधेड़बुन में एक दिन फोन की घंटी घनघनाई।
जयंत भाई का फोन था “कितना हो गया नंदू।”
” कितना!अरे अभी तो दूसरा अंक शुरू ही नहीं किया है।”

” अरे तो कर न यार। उधर वो आलोक तो पागल हो गया स्क्रिप्ट देख कर। उसने तो डायलॉग याद करना भी शुरू कर दिए।मुझसे कह रहा है कि ब्लॉकिंग और कास्टिंग भी शुरू कर दे।”

” लेकिन जयंत भाई अभी थोड़ा तो समय लगेगा” मुझे दिल्ली भी जाना ।”
” अरे यार नंदू तू समझ नहीं रहा।अब आलोक को रोकना मुश्किल है। ये नाटक उसके दिमाग में बुरी तरह घुस गया है। तू तो जैसे जैसे होते जाए वैसे वैसे पेज भेजते जाना। बाकी मैं और आलोक सम्हाल लेंगे।”

फिर क्या था किसी दिन दो किसी दिन चार ऐसा करके पेज जयंत भाई को भेजते रहे।और अन्ततः जून या जुलाई 2016 में उस नाटक का अनुवाद पूरा किया ।

उसके बाद की कहानी इतिहास है और ज्यादातर लोग जानते है। इस नाटक ने हिंदी नाट्य जगत में इतिहास बना डाला।

वैसे मेरी आलोक चटर्जी से बहुत घनिष्ठ मित्रता नहीं रही।एक शानदार अभिनेता के रूप में मेरे मन में उनके प्रति गहरा सम्मान था। इसलिए जब भी मिलते थे परस्पर स्नेह और सम्मान से मिलते थे।

नट सम्राट की कुछ शो होने के बाद एक दिन रात को फोन आया आलोक का।

मैने जैसे ही ” हेलो” कहा आलोक शुरू हो गए” मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं।आपने एक अभिनेता के रूप में मेरा जीवन सफल कर दिया। मैं सोच ही नहीं सकता कि यदि मैं यह नाटक न करता तो कितना अधूरा रह जाता।” आलोक न जाने कितने देर सिर्फ नाटक के विषय में ही बात करते रहे।बात बात भावुक होते रहे।जयंत भाई को और मुझे बार बार आभार देते रहे।शायद ये कॉल उन्होंने मुंबई के अति भव्य शो के बाद किया था।
वैसे जयंत भाई भी हर दो तीन शो के बीच काल करके नाटक की प्रगति बताते रहते ही थे। फिर रायपुर के शो में प्रत्यक्ष उपस्थित रहने का अवसर मिला।शो के बाद आलोक जिस तरह गले मिले उसका वर्णन करना संभव नहीं है।उसमें प्रेम था, कृतज्ञता थी, प्रसन्नता थी और सबसे बड़ी बात नट सम्राट के प्रमुख पात्र गणपत राव बेलवलकर जी का वात्सल्य था। मेरी भी आंखे सजल हो आई। वापस लौटा तो एक बात का संतोष मन में था वो ये कि हिंदी “नट सम्राट ” नाटक को उसका सुर मिल गया है। साथ ही इस बात की खुशी भी थी कि हिंदी रंग मंच को एक नया ” नट सम्राट ” मिल गया है।

ये लिखते हुए भी उंगलियां कांपती है कि आलोक चटर्जी अब हमारे बीच नहीं हैं।और ये सोचते हुए रूह कांपती है कि अब ” नट सम्राट” नाटक का क्या होगा। नाट्य जगत में आज भी कई श्रेष्ठ अभिनेता हैं और कई होंगे भी ,लेकिन नट सम्राट तो बार बार पैदा नहीं होते।

(सोशल मीडिया से)

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