एक ग्रह था, जो टल गया

2-3-11.jpeg

हरेश कुमार

अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चांडाल का।
काल उसका क्या बिगाड़े, जो भक्त हो महाकाल का।।

गुरु तेगबहादुर मेट्रो स्टेशन से ठीक पहले, ढाका गाँव में हरिमंदिर के सामने एक ठोकर (स्पीड ब्रेकर) बना है, जो बरसात में क्षतिग्रस्त हो चुका है। बारिश के मौसम में सड़कों की ऐसी स्थिति लोगों के लिए जानलेवा बन जाती है। सरकार को इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी क्षतिग्रस्त ठोकर के कारण मेरी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई।

हादसे से कुछ सेकंड पहले मैं अपनी बेटी से बात कर रहा था। अचानक क्या हुआ, कुछ याद नहीं। दो सेकंड में सब कुछ बदल गया। मैंने गाड़ी पर नियंत्रण खो दिया, और हम दोनों सड़क पर घसीटे गए। मेरी बेटी को पहले होश आया। उसने मुझे ढूंढा, पुकारा, “पापा, कहाँ हो?” मैं कुछ दूरी पर औंधे मुंह पड़ा था। मेरी बेटी, जो ग्रेटर नोएडा यूनिवर्सिटी में फिजियोथेरेपी की सातवें सेमेस्टर की छात्रा है, ने हिम्मत दिखाई। वह देखने में भले ही दुबली-पतली हो, लेकिन साहस और हौसले में उसका कोई मुकाबला नहीं। उसने मुझे थपकी दी, फिर हिम्मत जुटाकर सीपीआर दिया।
उसने लोगों को पुकारा। मुकुंदपुर के दीपक कुमार ने आगे बढ़कर मदद की। उन्होंने गाड़ी को साइड किया और मुझे नजदीकी क्लिनिक पहुंचाया, जहां टिटनेस का इंजेक्शन दिया गया। वहां से सलाह दी गई कि मुझे ट्रॉमा सेंटर ले जाया जाए। मेरी बेटी मुझे दिल्ली सरकार के ट्रॉमा सेंटर ले गई, लेकिन वहां का अनुभव निराशाजनक था।

ट्रॉमा सेंटर में मौजूद डॉक्टरों और कर्मचारियों का व्यवहार बेहद असंवेदनशील था। एक डॉक्टर ने तो यह तक कह दिया, “मर तो नहीं गया, इंतजार करो।” न तो वे इलाज कर रहे थे, न ही रेफर कर रहे थे। मेरा माथा, नाक, कान और मुंह से खून बह रहा था, लेकिन उनकी उदासीनता देखकर दुख हुआ। कुछ लोग वहां मौजूद थे, अगर उन्होंने हाथ उठाया होता, तो शायद स्थिति और बिगड़ जाती। चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को कुछ लोग बदनाम कर रहे हैं।

मैं, हरेश कुमार, दिल्ली और केंद्र सरकार से मांग करता हूं कि ऐसे ट्रॉमा सेंटर्स को तत्काल बंद किया जाए और चिकित्सा के पेशे में घुस आए असंवेदनशील लोगों पर कठोर कार्रवाई हो। यह मेरी व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि समाज की समस्या है। मेरे साथ कई लोग थे, शायद इसीलिए मुझे रेफर किया गया, वरना स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

मैं सभी जिम्मेदार लोगों से अपील करता हूं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दोपहर एक बजे के बाद का ट्रॉमा सेंटर का सीसीटीवी फुटेज जांचा जाए। चिकित्सा जगत को कलंकित करने वाले ऐसे लोगों पर कार्रवाई हो, ताकि किसी और की जिंदगी खतरे में न पड़े।

महाकाल की कृपा और समुदाय का समर्थन

दुर्घटना के बाद महाशक्ति कॉलोनी मंदिर, कौशिक एन्क्लेव, ब्लॉक-ए, बुराड़ी में नियमित भजन-कीर्तन बंद है। सभी लोग उदास हैं। जैसे ही हादसे की खबर फैली, लोग ट्रॉमा सेंटर से लेकर फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग तक दौड़े आए। महाकाल की कृपा और सभी की दुआओं से मैं तेजी से स्वस्थ हो रहा हूं।

जन्माष्टमी की पूजा के बाद भगवान का भंडारा होना था, लेकिन हादसे के कारण केवल भोग लगाया गया। सभी लोग उदास हैं। कल, 23 अगस्त को मुझे अस्पताल से छुट्टी मिलेगी। इसके बाद धूमधाम से भंडारा आयोजित किया जाएगा। कॉलोनीवासियों का कहना है, “हमारे चाचा कुर्सी पर बैठे रहेंगे, और भंडारा भव्य होगा।” जिसके साथ महाकाल हों, उसका काल क्या बिगाड़ सकता है?

मैं 24 घंटे सभी के लिए उपलब्ध रहता हूं। मुझे अपनी चिंता नहीं, दूसरों की सेवा ही मेरी कमाई है। लोग मुझे “विधायक चाचा” कहते हैं, भले ही निर्वाचित विधायक कोई और हो। यह प्यार और सम्मान समाज की सेवा से ही मिला है। मैंने खुद को समाज और देश के लिए समर्पित कर दिया है। मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बस समाज के भले के लिए मैं हर पल तैयार रहता हूं।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का भावुक लेख, जनसुनवाई अब हर विधानसभा में

2-2-21.jpeg

नई दिल्ली: दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक भावुक लेख के माध्यम से अपनी जिंदगी के अनुभव और दिल्लीवासियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साझा किया। अपने कॉलेज के दिनों की एक कार दुर्घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिता ने उन्हें डर पर काबू पाने और आगे बढ़ने की सीख दी। इस सीख को याद करते हुए रेखा ने हाल ही में हुई एक और दुर्घटना का उल्लेख किया, लेकिन दृढ़ता के साथ कहा कि वह दिल्ली के हितों के लिए लड़ना कभी नहीं छोड़ेंगी।मुख्यमंत्री ने अपने लेख में लिखा, “मेरे जीवन का हर क्षण और शरीर का हर कण दिल्ली के नाम है। मैं इन सभी अप्रत्याशित प्रहारों के बावजूद दिल्ली का साथ कभी नहीं छोड़ूँगी।”

उन्होंने महिलाओं की सहनशक्ति और संघर्ष की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि महिलाओं में तकलीफों से लड़ने की दोहरी ताकत होती है। “मैं भी हर परीक्षा के लिए तैयार हूँ,” उन्होंने जोड़ा।रेखा गुप्ता ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि अब जनसुनवाई केवल उनके आवास तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दिल्ली की हर विधानसभा में होगी। “आपकी मुख्यमंत्री, आपके द्वार,” उन्होंने लिखा।

अपने लेख को उन्होंने कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों के साथ समाप्त किया, जो उनकी दृढ़ता और साहस को दर्शाती हैं: “कदम मिलाकर चलना होगा।” उनके लिखे पर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

दिल्लीवासियों ने उनकी संवेदनशीलता और जनता के प्रति समर्पण की सराहना की। यह कदम दिल्ली की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

“बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों से हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा”

तेजस्वी का सपना: चोर-चोर खेल में बिहार की कुर्सी!

2-1-29.jpeg

बिहार की सियासत में तेजस्वी यादव का एक नया कारनामा सामने आया है। एबीपी न्यूज के इंटरव्यू में उन्होंने राहुल गांधी को 2029 का पीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया, मानो बिहार की जनता ने उन्हें दिल्ली का ताज सौंपने का ठेका दे दिया हो। लेकिन तेजस्वी का असली गेम तो कुछ और था। सोचा कि राहुल को पीएम का तमगा देकर वे कांग्रेस से बिहार में सीएम का ताज छीन लेंगे। मगर कांग्रेस ने तो चुप्पी साध ली, जैसे कह रही हो, “भाई तेजस्वी, पहले अपने घर की तो सफाई कर लो!” परिवार का सर्टिफायड चोर तुम्हारा अध्यक्ष बना बैठा है।

तेजस्वी का सपना है बिहार का मुख्यमंत्री बनना, लेकिन नीतीश कुमार तो कुर्सी को सुपर-ग्लू से चिपकाए बैठे हैं। ऊपर से कांग्रेस भी तेजस्वी को सीएम फेस बनाने के मूड में नहीं। अब बेचारे तेजस्वी के सामने धर्मसंकट है। एक तरफ नीतीश, जो कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस, जो तेजस्वी को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं। और तो और, उनकी अपनी पार्टी का हाल देखिए! राष्ट्रीय अध्यक्ष, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने ‘सुप्रीम चोर’ का सर्टिफिकेट थमा दिया, वो पार्टी के भविष्य का ‘चमकता सितारा’ बने बैठे हैं। तेजस्वी को लगता है कि चोरी का इल्ज़ाम तो सारी दुनिया पर लग सकता है, बस उनका परिवार तो पवित्र गंगा की तरह निष्कलंक है। लेकिन बिहार की जनता को यह ‘चोर-चोर’ का खेल कहां पसंद आने वाला? वह तो चारा चोर, चारा चोर पुकार रही है।

बिहार के लोग स्वाभिमानी हैं। कानून और संविधान को मानते हैं। अगर कानून ने किसी को चोर ठहराया, तो वो बिहारी जनता के लिए चोर ही रहेगा, चाहे वह कितना ही बड़ा ‘सुप्रीम’ क्यों न हो। तेजस्वी को लगता है कि एक चोर के मार्गदर्शन में वे बिहार की गद्दी हथिया लेंगे, लेकिन जनता का मूड तो कुछ और कह रहा है। बिहार की जनता को चाहिए विकास, रोजगार, और सुशासन, न कि ‘मैं भी चोर, तू भी चोर’ का खेल। तेजस्वी का यह सपना शायद सपना ही रह जाए, क्योंकि बिहार की जनता सियासी ड्रामों से ज्यादा अपने स्वाभिमान को तरजीह देती है। अब देखना यह है कि तेजस्वी इस ‘चोर-चोर’ खेल में कितने प्यादे बचाते हैं, या फिर जनता ही उन्हें शह-मात दे देगी!

फिल्मों पर विवाद और कोर्ट की दहलीज: क्या सेंसर बोर्ड को मिले अधिक अधिकार?

2-38.jpeg

मुम्बई। हाल के वर्षों में भारत में फिल्मों को लेकर कानूनी विवादों में तेजी आई है। जॉली एलएलबी, बंगाल फाइल्स, और उदयपुर फाइल्स जैसी फिल्में न केवल चर्चा का विषय बनीं, बल्कि इन्हें कोर्ट तक ले जाया गया। ये प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन इसका बढ़ता दायरा चिंता का विषय बन रहा है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी), जिसे आमतौर पर सेंसर बोर्ड के नाम से जाना जाता है, के पास फिल्मों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके निर्णयों को बार-बार अदालतों में चुनौती दी जा रही है।

 ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सेंसर बोर्ड को और अधिक अधिकार दिए जाने चाहिए ताकि वह फिल्मों से संबंधित शिकायतों का निपटारा कर सके, और अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके?  या सेंसर बोर्ड अपना काम ठीक से नहीं कर पा रही। जिसकी वजह से बार बार कोर्ट को उसके निर्णय में हस्तक्षेप करना पड़ता है तो सेंसर बोर्ड को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए?

उदयपुर फाइल्स के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में फिल्म की रिलीज पर रोक लगाई थी, जब जमीअत उलेमा-ए-हिंद और अन्य याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि यह फिल्म सांप्रदायिक तनाव भड़का सकती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को सिनेमैटोग्राफ एक्ट की धारा 6 के तहत फिल्म की प्रमाणन प्रक्रिया की समीक्षा करने का निर्देश दिया। इसी तरह, बंगाल फाइल्स और अन्य फिल्मों पर भी सामाजिक और धार्मिक समूहों ने आपत्ति जताई, जिसके चलते मामला अदालतों तक पहुंचा। ये विवाद न केवल फिल्म निर्माताओं के लिए चुनौती बन रहे हैं, बल्कि अदालतों पर भी अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं, जहां पहले से ही लाखों मामले लंबित हैं।

सेंसर बोर्ड की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि सीबीएफसी को केवल फिल्मों को प्रमाणित करने का अधिकार है, लेकिन इसके पास शिकायतों के निपटारे के लिए कोई मजबूत तंत्र नहीं है। सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के तहत, बोर्ड फिल्मों को ‘यू’, ‘यू/ए’, ‘ए’ जैसे प्रमाणपत्र देता है और आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए कट्स सुझा सकता है। हालांकि, बोर्ड के फैसलों को अक्सर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है, क्योंकि याचिकाकर्ता मानते हैं कि बोर्ड ने सामाजिक संवेदनशीलता को नजरअंदाज किया। उदाहरण के लिए, उदयपुर फाइल्स के मामले में, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि फिल्म निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को प्रभावित कर सकती है।

अदालतों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए, कई विशेषज्ञ और फिल्म निर्माता मांग कर रहे हैं कि सेंसर बोर्ड को एक स्वतंत्र और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र के साथ सशक्त किया जाए। इससे न केवल कोर्ट केस कम होंगे, बल्कि फिल्म निर्माताओं को भी स्पष्टता मिलेगी। हालांकि, कुछ का मानना है कि बोर्ड को असीमित अधिकार देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी उदयपुर फाइल्स के मामले में टिप्पणी की थी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार में संतुलन जरूरी है।

फिल्म प्रमाणन अपीलीय ट्रिब्यूनल (एफसीएटी) के 2021 में खत्म होने के बाद, फिल्म निर्माताओं को सीधे हाई कोर्ट का रुख करना पड़ता है, जो समय और धन दोनों के लिहाज से महंगा है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि एक विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना या सेंसर बोर्ड के भीतर एक स्वतंत्र अपीलीय इकाई बनाई जाए, जो शिकायतों का त्वरित निपटारा कर सके।

 फिल्मों से जुड़े विवादों का कोर्ट तक पहुंचना न केवल न्यायिक प्रणाली पर बोझ डाल रहा है, बल्कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच तनाव को भी उजागर कर रहा है। सेंसर बोर्ड को सशक्त करने से अदालतों का बोझ कम हो सकता है, लेकिन इसके लिए एक संतुलित और पारदर्शी तंत्र की जरूरत है।

scroll to top