डायमंड क्रॉसिंग पर भारत: बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन की कला

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दिल्ली । भारत की विदेश नीति आज एक ऐसे डायमंड क्रॉसिंग पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ रास्ते एक ही दिशा में नहीं जाते, बल्कि कई ओर खुलते हैं। यहाँ रिश्ते जकड़े हुए नहीं हैं, लचीले हैं, और फैसले विचारधारा से ज़्यादा कौमी हितों पर आधारित हैं। बदलती और बेचैन दुनिया में भारत ने किसी एक खेमे में बँधने के बजाय अपने लिए खुली राह चुनी है।

जनवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद यह रणनीति और ज़्यादा अहम हो गई। उनका अनिश्चित अंदाज़, तीखी ज़बान, टैरिफ की धमकियाँ और बहुपक्षीय संस्थाओं से दूरी ने दुनिया की बेचैनी बढ़ा दी। पुराने भरोसे दरकने लगे, पारंपरिक गठबंधन कमजोर हुए और मुल्क अपने फायदे को सबसे ऊपर रखने लगे।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने बहुध्रुवीय दुनिया की वापसी को तेज़ कर दिया। “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के चलते व्यापार युद्ध फिर उभरे और जलवायु समझौतों से दूरी बनी। यूरोप ने अपनी सुरक्षा खुद मज़बूत करने की कोशिशें तेज़ कीं, क्योंकि अब वॉशिंगटन पर पहले जैसा एतबार नहीं रहा। दक्षिण पूर्व एशिया के देश अमेरिका और चीन दोनों से तालमेल बैठाने में लगे हैं। अफ्रीकी मुल्क, अपनी आबादी और संसाधनों के दम पर, अब जलवायु फंडिंग में इंसाफ़ की मांग ज़ोर से करने लगे हैं। पश्चिम एशिया में सऊदी अरब जैसे देश भी अमेरिका से आगे सोचते हुए भारत जैसे साझेदारों के साथ नए रास्ते तलाश रहे हैं।

इन हालात में यह साफ़ हो गया है कि एकध्रुवीय दुनिया का दौर खत्म हो चुका है। नाटो जैसे संगठनों के भीतर खींचतान है और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ कई बार बीते ज़माने की लगती हैं। ताक़त अब कई हाथों में बँटी हुई है।

भारत इस नई हकीकत में सहज दिखता है। वह दुश्मनों और दोस्तों, दोनों से बात करता है। इज़राइल–फिलिस्तीन के मसले पर भारत इज़राइल की सुरक्षा का समर्थन तो करता है, लेकिन साथ ही फ़िलिस्तीनी राज्य के हक़ में भी खड़ा हुआ है। 2025 में ग़ज़ा संकट के दौरान भारत ने संतुलित रवैया अपनाया। कुछ प्रस्तावों पर तटस्थ रहा, लेकिन फ़िलिस्तीन को इंसानी मदद देता रहा। इससे अरब दुनिया से रिश्ते भी बचे रहे और इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग भी कायम रहा।

रूस–यूक्रेन जंग में भी भारत की यही व्यावहारिक सोच दिखी। भारत ने संप्रभुता और बातचीत की बात की, लेकिन रूस से तेल आयात बंद नहीं किया। सस्ते रूसी तेल ने वैश्विक महँगाई के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था को राहत दी। साथ ही भारत शांति प्रयासों में शामिल रहा, बिना किसी एक पक्ष के दबाव में आए।

अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते भी अब परिपक्व हो चुके हैं। तकनीक, रक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग मज़बूत है, लेकिन व्यापार में जब अमेरिकी नीतियाँ भारत को नुकसान पहुँचाती हैं, तो दिल्ली अपनी बात साफ़ कहती है। स्टील पर टैरिफ के बावजूद भारत–अमेरिका व्यापार 200 अरब डॉलर के पार पहुँचा।

चीन के साथ रिश्ता और भी पेचीदा है। सीमा पर तनाव के बावजूद व्यापार बढ़ता रहा। भारत ज़रूरी सामान चीन से लेता है, लेकिन साथ ही आत्मनिर्भर बनने की कोशिश भी कर रहा है। कूटनीतिक बातचीत जारी है, पर भरोसा सीमित है। संतुलन बनाना यहाँ भी भारत की प्राथमिकता है।

ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की स्वतंत्र सोच दिखती है। 2026 में अध्यक्षता करते हुए भारत ने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दिया। यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत भी चलती रही। अफ़ग़ानिस्तान में कठिन हालात के बावजूद भारत ने अपने हितों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। फ्रांस के साथ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में साझेदारी को रणनीतिक दिशा दी गई। दक्षिण एशिया में भी तनाव के बावजूद पड़ोसी देशों के साथ संपर्क और ढाँचा निर्माण पर ज़ोर बना रहा।

कुल मिलाकर भारत स्थायी गुटों के बजाय मुद्दा आधारित साझेदारी को तरजीह देता है। 2025 के जी20 शिखर सम्मेलन में उसने ग्लोबल साउथ की आवाज़ बुलंद की और कर्ज़ राहत की माँग उठाई। शीत युद्ध के दौर जैसी कठोर सोच से वह दूर रहा।

यह रास्ता आसान नहीं है। अमेरिका और चीन की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की परीक्षा लेती रहेगी। घरेलू आर्थिक दबाव भी विदेश नीति को प्रभावित करते हैं। फिर भी भारत का संतुलित रवैया उसे न सिर्फ़ टिकाए हुए है, बल्कि उसकी हैसियत भी बढ़ा रहा है।

टूटी-बिखरी दुनिया में भारत का यह डायमंड क्रॉसिंग एक सबक देता है। लचीलापन, सब्र और अपने हितों की साफ़ समझ, शायद आज नारेबाज़ी और पक्के खेमों से ज़्यादा ज़रूरी हैं। बहुध्रुवीय दुनिया में भारत का यह रास्ता एक ज़्यादा इंसाफ़पसंद और हकीकतपरस्त वैश्विक व्यवस्था की तरफ़ इशारा कर रहा है, जहाँ विचारधाराओं से ऊपर मुल्कों के हित होते हैं।

इल्लूमिनाती ( डीप स्टेट), वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, फ्री मेसान और एपिस्टीन नेटवर्क एक दूसरे के पूरक

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अनुज अग्रवाल

दिल्ली । दुनिया को नियंत्रित करने वाली इल्लूमिनाती सेंट्रल कमांड है जिस पर यहूदी बैंकर समूहों का नियंत्रण है। कई अरब शेख भी अब इस नेटवर्क का हिस्सा हैं । इन दिनों बराक ओबामा और बिल गेड्स इसके प्रमुख कमांडर माने जाते हैं और अब ट्रंप इसको अपने क़ब्ज़े में लेने की कोशिश में हैं । दुनिया के हर देश में वही राजनीतिक दल काम कर सकता है जिसको यह कमांड परमिशन देती है । परमिशन मतलब इल्लूमिनाती नेटवर्क के “ मार्केट इकॉनमी “ एजेंडे का हिस्सा बनकर काम करना ।

“वर्ल्ड इकॉनमी फोरम” ,इल्लूमिनाती के मेन एजेंडे यानि दुनिया पर उनके नियंत्रण बनाए रखने की नीतियाँ तैयार करने और उनको अपने नेटवर्क वाले दुनिया के राजनीतिक दलों और कारपोरेट घरानों के सिंडिकेट को ट्रेंड करने वाली संस्था है । हर देश के एलीट क्लास यानि सत्ता , धर्म, मीडिया,उद्योग व्यापार फ़िल्म उद्योग आदि से जुड़े लोगों को “फ्री मेसान” क्लब से जोड़ा जाता है । भारत में इस क्लब से जुड़े लोगों की संख्या लगभग तीस लाख से अधिक है । यह नेटवर्क वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की नीतियों को अपने अपने देश में लागू करने के हिडन एजेंडे पर काम करता रहता है और इसके एवज में उसे अकूत धन और अय्याशी के सामान उपलब्ध कराए जाते हैं जिनका माध्यम “एपिस्टीन नेटवर्क” होता है , जहाँ जुड़े हुए लोगों के हर काम पर नज़र भी रखी जाती है और रिकार्ड भी रखा जाता है ताकि वे ग़द्दारी ना कर सकें । यह नेटवर्क समय समय पर “सेफ़्टी वॉल्व थ्योरी “ के तहत अपने पुराने कुकर्मों का भंडाफोड़ करता रहता है । पहले विकिलीक्स फाइल्स और अब एपिस्टीन फाइल के खुलासे इसी खेल का हिस्सा हैं । इस गैंग को पता है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ या उखाड़ पाएगा । चीन , रूस और ईरान तक में भी यह नेटवर्क बहुत प्रभावी हो चुका है ।

राहुल गांधी की पिच पर लुढ़कते नरेंद्र मोदी और उन की भाजपा

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दयानंद पांडेय

लखनऊ : पता नहीं क्यों कुछ लोग राहुल गांधी को पप्पू और नासमझ आदि-इत्यादि बताते रहते हैं। मेरा मानना है कि राहुल गांधी में समझ तो है l बिना समझ के तो हर बार संसद का अपहरण कर लेना आसान नहीं है l पट्ठा समूची भाजपा को नचा देता है l शीर्षासन करवा देता है। सारे योग प्राणायाम भी। फिर भी कुछ परिणाम हासिल नहीं होता। चिल्लाते रहिए संसदीय नियम , यह-वह। पर वह अपनी अराजकता के दम पर सही , समूची भाजपा को सिर के बल खड़ा कर देता है l लोकसभा में ऐन स्पीकर के सामने पूरी हेकड़ी से खड़े हो कर चाय की चुस्कियां लेते रहने का आत्मविश्वास और अभद्रता भी सोची समझी बात है। नासमझी नहीं। अभी तक किसी नेता प्रतिपक्ष को ऐसा करते देखा या सुना नहीं गया। यह मोदी की कायरता से उपजी हुई हनक है।

राहुल का चुनाव न जितवा पाना , कांग्रेस की हार का रिकार्ड बनाना , कांग्रेस को निरंतर दीमक बन कर ख़त्म करते जाना , अपनी अराजक , सामंती और नशेड़ी छवि बना लेना आदि-इत्यादि यह सब अलग विषय है।

जब तक देश की जनता राहुल गांधी को प्रधान मंत्री नहीं बनवा देती तब तक उसे यह सब देखने और बर्दाश्त कर लेने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। क्यों कि दुनिया एक बार ट्रंप को शायद समझ ले , राहुल गांधी को समझना नामुमकिन है। क्यों कि वह बहुत समझदार आदमी है। पहले के समय में लोग कहते थे कि भाजपा और मोदी की पिच पर राहुल गांधी खेलता है। लोग जाने क्या – क्या कहते थे।

अब का मंज़र यह है कि मोदी समेत समूची भाजपा राहुल गांधी की पिच पर पस्त है। हर बार मोदी को राहुल लोकसभा में घेर कर गिरा देता है। चुनाव जीतना भले मोदी को आता हो। दुनिया भर की डिप्लोमेसी आती हो। ट्रंप को झुकाना भी आता हो , पाकिस्तान की चटनी बनाना भी आता हो पर लोक सभा में राहुल से लड़ना नहीं आता। हार-हार जाता है मोदी , राहुल के आगे।

तो सिर्फ़ इस लिए कि राहुल समझदार बहुत है। यह राहुल का ही डर है कि ओ बी सी को ख़ुश करने के लिए जातीय जनगणना और यू जी सी एक्ट लाना पड़ता है मोदी को। यह राहुल गांधी की पिच है। आप होंगे 370 हटाने के उस्ताद , तीन तलाक़ को ख़त्म करने के मास्टर। सी ए ए के शौक़ीन। मुफ़्त अनाज , शौचालय , गैस जैसी लोकल्याणकारी बातें करने के बाजीगर होंगे आप। देते रहिए देश को इंफ्रास्ट्रक्चर। पर जो आत्मविश्वास राहुल गांधी के चेहरे पर मोदी को अपनी अराजकता में चित्त करने के बाद दीखता है , मोदी के चेहरे पर यह आत्मविश्वास कभी किसी ने देखा हो तो बताए भी।

इस लिए भी कि राहुल गांधी अपने कोर वोटर की पीठ में कभी मोदी की तरह छुरा नहीं घोंपता। मोदी को इस में महारत है। महारत तो ममता बनर्जी की भी देखने लायक़ है कि दिल्ली आ कर जिस तरह चुनाव आयोग में अपनी बात चुनाव आयुक्त को सुना कर बिना उस को सुने उठ गई। कपिल सिब्बल , सिंघवी जैसे वकीलों की फ़ौज को साथ ले कर सुप्रीम कोर्ट में बतौर वकील ख़ुद को उपस्थित किया , शेरनी की तरह गरज कर मोदी के चेहरे का रंग उड़ा दिया है। तो ममता बनर्जी भी यह सारी नौटंकी अपने कोर वोटर कहिए , घुसपैठिया वोटर कहिए , के लिए कर रही है। दहाड़ती हुई घूम रही है।

पर मोदी ?

अपने वोटर का दुःख-दर्द नहीं जानता। अपने वोटर को चूस कर सिर्फ़ सत्ता का शहद जानता है। अपने वोटर को इमोशनली ब्लैकमेल करता रहता है। टेकेन फॉर ग्रांटेड लिए रहता है। अपने वोटरों को जातियों के खाने में बांट कर आपस में लड़ा देता है। आरक्षण अस्सी से पचासी प्रतिशत करने के मंसूबे पाले हुए है ताकि 2029 में फिर सत्ता का शहद चखे। इसी लिए कभी राहुल गांधी तो कभी ममता बनर्जी अपनी ही पिच पर ला कर मोदी को लुढ़का देती है। अब आप ही बताइए कि नासमझ कौन है ?

राहुल गांधी कि नरेंद्र मोदी ?

दिग्विजय सिंह की अमृता राय के साथ की अंतरंग फ़ोटो कंप्यूटर पर हैक करवा कर दिग्विजय सिंह की थू-थू करवा दी। संजय जोशी की अंतरंग वीडियो निकलवा ली। सार्वजनिक जीवन ख़त्म हो गया संजय जोशी का। प्रणव पांड्या पागल बने घूम रहे। गोविंदाचार्य पता नहीं कहां धूल फांक रहे हैं। एक से एक सूरमा सांस नहीं ले पा रहे। हार्दिक पटेल की अय्याशी भी दिखा दी सब को। सब जानते हैं राहुल गांधी भी अय्याश है। विदेश यात्राओं के लिए बदनामी इसी लिए है राहुल की। पर एक फ़ोटो भी नहीं निकाल पाए ? वीडियो तो बहुत दूर की बात है। राहुल तो ललकार रहा है कि एप्स्टीन फ़ाइल के कारण मोदी ट्रंप से कंप्रोमाइज कर गए। अभी बहुत माल है उस के पास।

यह भी राहुल की पिच है जहां वह मोदी को लुढ़का रहा है। कौन सा खेत चर रहे हैं भाजपा के चाणक्य लोग ? क्यों भैंस बन गए हैं। और यह भैंस भी किस पानी में थाह ले रही है। नक्सली देश से ख़त्म करने की गर्जना करने वाले लोग इस अराजक की चिकित्सा करने में अक्षम क्यों हैं भला !

सोचिए कि जो एक समझदार राहुल गांधी का इलाज नहीं कर पा रहा , वह देश का , देश की समस्याओं का क्या इलाज करेगा ? फिर तमन्ना ग्लोबल लीडर बनने की है।

भारत और अमेरिका के मध्य हुआ ऐतिहासिक समझौता, झूमा बाजार

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दिल्ली । भारत और अमेरिका के मध्य अप्रैल 2025 से प्रारंभ हुआ टैरिफ वॉर अब समझौते के साथ समापन की ओर अग्रसर हो रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प की ओर से भारत पर टैरिफ घटाने के ऐलान के साथ ही शेयर बाजार में उछल आया और निवेशकों के चेहरे खिल उठे। डॉलर के मुकाबले रुपए में भी मजबूती दिखी।

यूरोपियन यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते के बाद से अनुमान लगाया जा रहा था कि अमेरिका दबाव में आ गया है और उसे भारत की व्यापार चिंताओं के सम्मान करना ही पड़ेगा और अंतत: ऐसा हुआ भी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने हमसे बात की । वह मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैं और अपने देश के शक्तिशाली नेता हैं। हमने एक नहीं कई मुद्दों पर बात की जिसमें व्यापर और रूस -यूक्रेन युद्ध को समाप्त करना भी शामिल था। मोदी के लिए दोस्ती और उनके सम्मान के चलते और उनकी मांग पर तत्काल प्रभाव से हम अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसमें अमेरिका भारत पर लगाए गए टैरिफ को 25 से घटाकर 18 प्रतिशत कर रहा है। भारत के साथ हमारा अद्भुत संबंध आगे और मजबूत होगा। जैसे ही सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान आया वैसे ही भारत में भी हलचल तीव्र हो गई। एन डी ए संसदीय दल की बैठक में अमेरिका के साथ हो रहे समझौते पर प्रधानंमत्री मोदी ने कहा कि हमने बहुत समय तक धैर्य रखा जिसका परिणाम हम सभी के सामने है । अमेरिका की ओर से की गई इस घोषणा से दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच व्यापारिक तनाव को कम करने में सहायता मिलेगी।

भारत सर्वाधिक लाभ में- भारत और अमेरिका के बीच जो व्यापार समझौता हुआ है उसका सर्वाधिक लाभ भारत को ही मिलने जा रहा है। ट्रंप की भारत को लेकर की गए इस बड़ी टैरिफ घोषणा के बाद भारत अब इस मामले में पडोसी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले से अधिक लाभ मे आ गया है । चीन और पाकिस्तान की तुलना में भी भारत पर अब कम टैरिफ है। इंडोनेशिया, बांग्लादेश और वियतनाम भारत से अधिक टैरिफ वाले देश बन चुके हैं। वर्तमान समय में बांग्लादेश और वियतनाम पर 20, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड और पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लगा हुआ है । समाचार यह भी है कि अब भारत भी अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ और गैर टैरिफ बाधाओं को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है । कहा जा रहा है कि इसे संभावित रूप से शून्य तक ले जाया जा सकता है। यह भारत की वर्तमान व्यापार नीति में बाजार पहुंच के सबसे बड़े बदलावो में से एक है। जैसे ही भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलेगा कई अमेरिकी वस्तुएं भारतीय उपभोक्ताओं के लिए काफी सस्ती हो जाएंगी।

भारतीय बाजार में लैपटाप, गैजेट्स और अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरण की कीमतें कम हो सकती हैं । घरेलू उपकरणों की पहुंच आसान हो जाएगी।निर्यात के मोर्चे पर भी भारत को बहुत लाभ होने जा रहा है।अमेरिका से टैरिफ कम हो जाने के बाद हमारे टैक्स्टाइल, आभूषण और रत्न निर्यात पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इन सेक्टर्स के अलावा भारत का चमड़ा और फुटवियर उद्योग अमेरिका को हर वर्ष 1.18 अरब, केमिकल उद्योग 2.34 अरब और इलेंक्टिक और मशीनरी उद्योग 9 अरब डॉलर का निर्यात करता है।

विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत और अमेरिका के मध्य द्विपक्षीय व्यापार अगले कुछ वर्षों में 500 अरब डॉलर की ओर 5 गुना गति से बढ़ेगा ओैर नए व्यापार समझौते से भारी आर्थिक लाभ प्राप्त होंगे।अमेरिका के साथ डील फाइनल हो जाने के कारण अब एक नई सप्लाई चेन मिल गई है जिसका लाभ भी भारत को मिलेगा।

भारत -अमेरिका व्यापार समझौते के बाद भारत की जीडीपी वृद्धि बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो सकती है। टैरिफ कटौती से भारत की आर्थिक वृद्धि निवेश, वातावरण और वाह्य संतुलन को समर्थन मिलेगा। गोल्डमैन एक्स का मानना है कि अगर यह टैरिफ लागू रहता है तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को व्यापक लाभ होगा। अब ट्रेड पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता कम हो जाएगी । उद्योग जगत इसे भरोसा बढ़ाने वाला कदम मान रहा है ओैर एफआईआई की वापसी से बाजारों में सकारात्मक वातावरण बनने की संभावना बताई जा रही है।

भारत और अमेरिका के मध्य हुआ समझौता इंगित करता है कि अब पूरी दुनिया भारत में व्यापार के माध्यम से निवेश के नए अवसर खोज रही है। यह समझौता न सिर्फ भारत की विकास आकांक्षाओं को गति देगा बल्कि देश को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और नवाचरण का केंद्र बनाने के लक्ष्य को भी मजबूती देगा। भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत विकास पथ पर है और यह डील विकास को अतिरिक्त गति देगी। यह कदम भारत -अमेरिका आर्थिक संबंधों में भरोसा बढ़ाने वाला है और विकसित भारत – 2047 के विजन के अनुरूप दिख रहा है। इस समझौते के लागू हो जाने के बाद अब निवेश और रोजगार के नए अवसर भी सामने आयेंगे।

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