Malini Awasthi Remains Malini Awasthi

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Delhi — During the Bharat Rang Mahotsav (India Theatre Festival) held at the National School of Drama (NSD), an unforgettable incident unfolded that truly revealed the authentic power of folk music and theatre. Padma Shri awardee and renowned folk singer Malini Awasthi was scheduled to perform, but a technical failure left the stage without lights or working microphones. Officials suggested postponing the event to another day, but Malini Awasthi firmly refused. Instead of clinging to the elevated stage, she chose to step down among the audience and delivered a performance that transcended technology, reaching straight from heart to heart.

At the start, the entire auditorium was plunged into darkness. Microphones were silent, spotlights had gone out. It felt as though the very breath of the theatre had stopped. But in that precise moment, the soul of folk tradition awakened. Malini Awasthi did not ascend the stage; instead, she sat on the steps — just as someone might settle on a village chaupal to share a tale. She had no musical instruments to rely on, no lights to highlight her, only her voice, her spirit, and the earthy resonance born from the soil. The audience, too, left their chairs and sat on the floor around her, turning the moment into an informal folk gathering.

What flowed from her then was not mere music — it was tradition, memory, the very pulse of life. Every note carried the breeze across fields; every word brought ancient folk recollections vividly to life. Her songs in Awadhi, Bhojpuri, and Bundeli dialects — kajri, sohar, jhula, or thumri — poured directly into the hearts of listeners. Without any amplification or spectacle, her voice wove the entire hall into a single thread of connection. Even in the darkness, smiles spread across faces, and eyes grew moist. That instant proved that a true artist does not depend on the stage; she connects with people, heart to heart.

The event delivered a profound message: a folk artist is greater not because of the platform, but because of the people. Even when facilities are stripped away, the one whose melody never wavers, whose dedication never falters – that is the truly great one. Malini Awasthi demonstrated that the strength of folk lies not in lights or sound systems, but in empathy, simplicity, and genuine concern for what matters. This was not a technical failure; it was a triumph of theatre — where art defeated technology. This moment at NSD’s festival has become immortal, reminding us that real performance emerges from the depths of the heart, not from equipment. Malini Awasthi’s humble, unadorned presentation has infused fresh energy into the soul of Indian folk music and theatre.

भारत वसुधैव कुटुम्बकम के भाव के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है

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मुंबई : दिनांक 27 जनवरी 2026 को यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ भारत ने एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है। अब, इस समझौते की शर्तों को इन देशों की संसद द्वारा पारित किया जाएगा, इसके बाद यह मुक्त व्यापार समझौता यूरोपीय यूनियन एवं भारत के बीच होने वाले विदेशी व्यापार पर लागू हो जाएगा। इस मुक्त व्यापार समझौते को “मदर आफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। क्योंकि, यह मुक्त व्यापार समझौता विश्व के 28 देशों के उस भूभाग पर लागू होने जा रहा है, जहां विश्व की 30 प्रतिशत आबादी निवास करती है। पृथ्वी के इस भूभाग पर 200 करोड़ से अधिक नागरिकों का निवास है। इन 28 देशों की संयुक्त रूप से विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी (संयुक्त रूप से) अर्थव्यवस्था (यूरोपीय यूनियन – 22 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर) एवं चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (भारत – 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर) के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न होने जा रहा है। वैश्विक स्तर पर होने वाले विदेशी व्यापार में इन समस्त देशों की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत है। पूरी दुनिया में 33 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार होता है, इसमें से 11 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार उक्त 28 देशों द्वारा किया जाता है।

उक्त वर्णित मुक्त व्यापार समझौता विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता है। इसके पूर्व, सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते के रूप में चीन एवं 10 आशियान देशों के बीच सम्पन्न हुए मुक्त व्यापार समझौते को माना जाता है। यह केवल एक मुक्त व्यापार समझौता नहीं बल्कि यूरोपीय यूनियन के 27 देशों एवं भारत के बीच साझा समृद्धि का एक ब्लूप्रिंट है। इस समझौते में पूरी दुनिया की आर्थिक दशा एवं दिशा बदलने की क्षमता है। उक्त व्यापार समझौता को सम्पन्न करने के प्रयास पिछले 18 वर्षों से हो रहे थे। परंतु, कुछ विपरीत परिस्थितियों के चलते इस समझौते को सम्पन्न होने में इतना लम्बा समय लग गया है, अतः यह अब भारत एवं यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के बीच एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। उक्त मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के पश्चात वर्ष 2032 तक यूरोपीयन यूनियन के सदस्य देशों एवं भारत के बीच विदेशी व्यापार के दुगना होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके पूर्व भारत एवं यूनाइटेड किंगडम के बीच भी मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न किया जा चुका है। अब कनाडा के प्रधानमंत्री भी संभवत: मार्च माह में भारत के दौरे पर आने वाले है और भारत एवं कनाडा के बीच भी कुछ क्षेत्रों में व्यापार समझौता सम्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। अमेरिका मुक्त व्यापार समझौतों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जबकि भारत मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है ताकि भारत एवं अन्य समस्त देशों में निवासरत नागरिकों को इन समझौतों से लाभ मिले। यह भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुम्बकम के भाव को दर्शाता है। भारत की इस नीति के चलते ही विश्व के कई देश अब भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते शीघ्र ही सम्पन्न करना चाह रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हाल ही के समय में आर्थिक क्षेत्र में भारी उथल पुथल दिखाई दे रही है। भारत एवं यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के बीच सम्पन्न हुए मुक्त व्यापार समझौते से इस उथल पुथल में कुछ सुधार आता हुआ दिखाई देगा।

भारत में कृषि एवं डेयरी क्षेत्र अतिसंवेदनशील है। क्योंकि, भारत की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत भाग आज भी ग्रामीण इलाकों में उक्त क्षेत्रों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है। अतः उक्त दोनों क्षेत्रों को मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है। हां, भारत के समुद्री उत्पाद उद्योग, वस्त्र एवं परिधान उद्योग, जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग, चमड़ा उद्योग, खिलौना उद्योग जो श्रम आधारित उद्योग हैं, को उक्त मुक्त व्यापार समझौते से अधिकतम लाभ होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों द्वारा भारत से उक्त उत्पादों के आयात पर आयात ड्यूटी को शून्य किया जा रहा है। वर्तमान में भारत से समुद्रीय उत्पादों के निर्यात पर 26 प्रतिशत का आयात कर लगाया जाता है, जिसे मुक्त व्यापार समझौता के लागू होने के पश्चात शून्य कर दिया जाएगा। इसी प्रकार, वस्त्र एवं परिधान के आयात पर वर्तमान में लागू 12 प्रतिशत के आयात कर को शून्य किया जा रहा है, खिलौना पर लागू 4.7 प्रतिशत के आयात कर को शून्य, जेम्स एवं ज्वेलरी के आयात पर 4 प्रतिशत से शून्य, केमिकल उत्पादों के आयात पर 12.8 प्रतिशत से शून्य, चमड़ा से निर्मित उत्पादों के आयात पर 17 प्रतिशत से शून्य, फर्नीचर उत्पादों के आयात पर 10.7 प्रतिशत से शून्य आयत कर किया जा रहा है।

यूरोपीय यूनियन के 27 देश, जो विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं, में जन्म दर पिछले कई वर्षों से लगातार गिर रही है एवं कुछ देशों में तो यह शून्य के स्तर पर पहुंच गई है जिससे इन देशों में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले नागरिकों का इन देशों में नितांत अभाव दिखाई देता है। अतः इन देशों में श्रमबल की भारी कमी है। उक्त मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के पश्चात भारतीय नागरिकों को यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों में तकनीकी क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, आदि में रोजगार के भारी मात्रा में अवसर प्राप्त होंगे। इन समस्त देशों द्वारा भारतीय नागरिकों को वीजा प्रदान करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा। युनाईटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रान्स आदि जैसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जैसे देशों में भारतीय इंजिनीयरों एवं डाक्टरों की भारी मांग है। उक्त देशों द्वारा भारतीयों के परिवार के सदस्यों को रोजगार प्रदान करने के अवसर भी प्रदान करने सम्बंधी प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा। भारतीय विद्यार्थियों द्वारा यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों के विश्वविद्यालयों में अपनी शिक्षा समाप्त करने के उपरांत 9 माह से 12 माह तक का समय रोजगार तलाशने के लिए प्रदान किया जाएगा। इस समयावधि तक भारतीय युवाओं को इन देशों में प्रवास की अनुमति प्रदान की जाएगी।

भारतीय कारीगरों के लिए अब वैश्विक बाजार खुल रहा है। साथ ही, भारत अब विनिर्माण इकाईयों का वैश्विक केंद्र बन सकता है। क्योंकि, यूरोपीयन यूनियन के समस्त देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं एवं वे अपनी सम्पत्ति/पूंजी का निवेश भारत में विनिर्माण इकाईयों में कर सकते हैं एवं कुछ लाभप्रद क्षेत्रों में वे अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना भी कर सकते हैं। अधिक उत्पादन इकाईयों की स्थापना से भारत में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित होंगे। इससे भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल भी निकलता हुआ दिखाई दे रहा है।

भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को इस दृष्टि के साथ सम्पन्न किया जा रहा है ताकि इससे भारत के किसान, मजदूर, कारीगर, पेशेवर नागरिकों एवं सूक्ष्म, छोटे एवं मध्यम उद्योगों को विशेष लाभ हो। यूरोपीयन यूनियन के समस्त 27 देशों में वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र का आकार 26,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है, इससे भारत से वस्त्र एवं परिधान का निर्यात वर्तमान में 64,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसी प्रकार, चमड़ा उत्पादों का बाजार 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है एवं जेम्स एवं ज्वेलरी का बाजार 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। 27 देशों में इस विशाल क्षेत्र में भारतीय वस्त्र एवं परिधान उद्योग एवं अन्य उत्पादों को प्रवेश मिलने से भारत में श्रम आधारित कई सूक्ष्म, छोटी एवं मध्यम इकाईयों को लाभ होने जा रहा है। लगभग इसी प्रकार का लाभ अन्य क्षेत्रों यथा, समुद्री उत्पाद, चमड़ा उत्पाद, खिलोना उत्पाद, जेम्स एवं ज्वेलरी उत्पाद, केमिकल उत्पाद, फर्नीचर उत्पाद आदि, में कार्यरत इकाईयों की भी होने जा रहा है। इन क्षेत्रों में कार्यरत विनिर्माण इकाईयों के व्यापार में वृद्धि का आश्य सीधे सीधे अधिक श्रमबल की आवश्यकता होना भी है, जिसकी पूर्ति आज विश्व में केवल भारत ही कर सकता है।

रक्षा के क्षेत्र में भारत बहुत तेज गति से विकास कर रहा है। इस क्षेत्र में भारत का अंतिम लक्ष्य आत्मनिर्भरता हासिल करने का है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों को सुरक्षा के सम्बंध में अमेरिका पर निर्भर नहीं रहते हुए अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह दी है। अतः यूरोपीय देश अपने सुरक्षा बजट में अत्यधिक वृद्धि करने का विचार कर रहे हैं। भारत के लिए ऐसे समय पर उक्त मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जाना एक सुनहरे अवसर के रूप में सामने आया है। इससे सुरक्षा के क्षेत्र में उत्पादन कर रही भारतीय कम्पनियों को यूरोपीय यूनियन का अति विशाल बाजार मिलने जा रहा है। इसी के साथ ही यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों से सुरक्षा के क्षेत्र में उच्च तकनीकी का हस्तांतरण भारतीय कम्पनियों को सम्भव हो सकेगा। कुल मिलाकर यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों के साथ सम्पन्न किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौते से भारत के लिए अतिलाभप्रद स्थिति बनने जा रही है।

क्या गर्भ में पलने वाला बच्चा अभिमन्यु की तरह संस्कार सीख सकता है?

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आगरा । आगरा शहर इन दिनों एक अनोखा उदाहरण पेश कर रहा है, जहां गर्भ संस्कार को जीवंत रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। क्या मां के गर्भ को संस्कारित करने का मतलब सिर्फ आस्था है, या विज्ञान भी इसे समर्थन देता है? हाल में आयोजित कार्यक्रमों में क्लेम किया गया है कि गर्भ में ही बच्चे को अच्छे संस्कार दिए जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे महाभारत में अभिमन्यु ने अपनी मां सुभद्रा के गर्भ में चक्रव्यूह भेदने की विद्या सीखी थी। समाजसेवी अशोक गोयल की पहल पर चल रहे ये प्रयास लोगों में जागरूकता फैला रहे हैं।

मातृत्व ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है। यह न सिर्फ एक महिला को मां बनाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को संस्कारी और स्वस्थ बनाने का अवसर भी देता है। गर्भ संस्कार प्राचीन भारतीय परंपरा है, जिसमें गर्भस्थ शिशु को ही सकारात्मक प्रभाव दिए जाते हैं। प्रसिद्ध पेंटर, आर्टिस्ट, शिक्षाविद डॉ. चित्रलेखा सिंह कहती हैं, “मां का गर्भ बच्चे की पहली पाठशाला है।” विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान शिशु का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है। गर्भधारण के 3-4 हफ्तों में न्यूरल ट्यूब बनती है, जो मस्तिष्क का आधार होती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क में लगभग 100 अरब न्यूरॉन्स होते हैं, और गर्भ में ही ये 2.5 लाख प्रति मिनट की दर से बढ़ते हैं। जन्म के समय मस्तिष्क वयस्क आकार का 25 प्रतिशत होता है, जो पहले साल में दोगुना हो जाता है। गर्भ में ही 18-20 हफ्तों से शिशु सुन सकता है, और मां की आवाज या संगीत पर प्रतिक्रिया देता है।

हाल ही में प्रताप नगर के गर्भाधान संस्कार एवं मेटरनिटी होम में एक अनोखा कार्यक्रम हुआ। चित्रलेखा द विलेज ऑफ आर्ट सोसाइटी और श्री चंद्रभान साबुन वाले सेवा ट्रस्ट के सहयोग से गर्भ संस्कार पर संभवत: दुनिया की पहली लाइव पेंटिंग वर्कशॉप और चित्र प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें 11 चित्रकारों ने भाग लिया। इनमें डॉ. त्रिलोक शर्मा, डॉ. मंजू बघेल, डॉ. मधु गौतम, डॉ. त्रिगुणातीत जैमिनी, कमलेश्वर शर्मा, नरेश कुमार, सौम्य देव मंडल, राहुल, विपिन उपाध्याय और सुदेश शामिल थे। उन्होंने लाइव पेंटिंग्स बनाकर गर्भ संस्कार और मातृत्व की चेतना का सुंदर संदेश दिया। विभिन्न संस्थानों से आए 100 से ज्यादा चित्रों में गर्भ संस्कार की महत्वपूर्णता को रेखांकित किया गया था।

गर्भ संस्कार का उद्देश्य बच्चे को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाना है। जब मां सकारात्मक सोच रखती है, शांत रहती है, पौष्टिक भोजन करती है, मंत्र जपती है, भक्ति गीत सुनती है या अच्छी कहानियां सुनाती है, तो शिशु इनका प्रभाव ग्रहण करता है। अभिमन्यु की कथा इसका प्रतीक है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि मां के भाव और वातावरण से शिशु का मस्तिष्क प्रभावित होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भावस्था में मां का तनाव (जैसे चिंता या अवसाद) शिशु में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ाता है, जो समय से पहले जन्म या कम वजन (5 पौंड से कम) का कारण बन सकता है। ऐसे बच्चे बाद में ADHD, व्यवहार संबंधी समस्याओं या मानसिक स्वास्थ्य विकारों का शिकार हो सकते हैं। वहीं, सकारात्मक उत्तेजना से शिशु का मस्तिष्क बेहतर विकसित होता है, जैसे बाएं हिप्पोकैंपस की मात्रा बढ़ती है, जो स्मृति से जुड़ी है।

एपिजेनेटिक्स के शोध बताते हैं कि मां का तनाव शिशु के जीनों को बदल सकता है, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था में तनाव शिशु के तंत्रिका तंत्र और संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है। संगीत या मां की आवाज से शिशु 34 हफ्तों में लय सीखता है और जन्म के बाद याद रखता है। इससे संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास बेहतर होता है। मां का तनाव कम होता है, बच्चे से जुड़ाव बढ़ता है और संतान श्रेष्ठ बनती है। यह परंपरा सिर्फ हिंदू धर्म की नहीं, बल्कि आज के तनावपूर्ण जीवन में सभी के लिए जरूरी है।
लेकिन सवाल है , क्या गर्भ संस्कार ज्ञान की खोज है या सिर्फ आस्था? मध्य प्रदेश सरकार के अस्पतालों में गर्भ संस्कार कक्ष बन रहे हैं, जहां भ्रूण को ‘मन शिक्षित’ करने की कोशिश की जा रही है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा का मिश्रण अच्छा है : पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच। मां का तनाव और आहार शिशु पर असर डालता है, यह सिद्ध है। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भ संस्कार जैसी प्रथाएं गर्भपात की जटिलताएं कम करती हैं और जन्म परिणाम सुधारती हैं।
फिर भी, “भ्रूण के मन को पढ़ाना”, इस पर पर वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने होंगे। अगर यह मां को बेहतर देखभाल मिले, तो बेहतर परिणाम आएंगे। अभिमन्यु की कहानी भी बताती है कि आधा ज्ञान घातक हो सकता है।
मध्य प्रदेश सरकार की प्राथमिकताएं सोचने लायक हैं। मातृ मृत्यु दर (भारत में 113 प्रति लाख जन्म), कुपोषण (35% बच्चे कम वजन के) और डॉक्टरों की कमी जैसी चुनौतियां हैं, तब ऐसे कक्षों पर फोकस सही है, या कुछ और? आयुर्वेद और एलोपैथी साथ चलें, लेकिन प्रमाणों पर आधारित। गर्भ संस्कार को आस्था का आदेश न बनाएं, ज्ञान की राह बनाएं। मां को सशक्त करें, निर्देशित न करें। वैज्ञानिक जांच, स्वैच्छिक भागीदारी और सरल भाषा से ही यह सफल होगा। जैसा बीज, वैसा वृक्ष , गर्भ से ही अच्छे संस्कार डालें, ताकि पीढ़ियां स्वस्थ, बुद्धिमान और तेजस्वी बनें।

मालिनी अवस्थी ठहरी मालिनी अवस्थी

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दिल्ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में आयोजित भारतीय रंग महोत्सव (भारत रंग महोत्सव) के दौरान एक अविस्मरणीय घटना घटी, जिसने लोक संगीत और रंगमंच की सच्ची शक्ति को उजागर कर दिया। पद्मश्री सम्मानित लोक गायिका मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति निर्धारित थी, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण मंच पर न लाइटें जलीं और न ही माइक्रोफोन काम कर रहे थे। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि कार्यक्रम किसी अन्य दिन स्थगित कर दिया जाए, लेकिन मालिनी अवस्थी ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने मंच की ऊंचाई को ठुकराकर श्रोताओं के बीच उतरना चुना और एक ऐसी प्रस्तुति दी जो तकनीक से परे, दिल से दिल तक पहुंच गई।

घटना की शुरुआत में पूरा सभागार अंधेरे में डूबा हुआ था। माइक खामोश थे, स्पॉटलाइट्स थम चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे रंगमंच की सांस रुक गई हो। लेकिन ठीक उसी पल लोक की आत्मा जाग उठी। मालिनी अवस्थी मंच पर नहीं चढ़ीं, बल्कि सीढ़ियों पर बैठ गईं—ठीक वैसे जैसे कोई गाँव की चौपाल में अपनी कथा सुना रही हो। उनके पास न कोई वाद्य यंत्र का सहारा था, न प्रकाश का, बस उनका कंठ था, मन था और मिट्टी से उपजा स्वर। श्रोता भी अपनी कुर्सियां छोड़कर आसपास जमीन पर बैठ गए, जैसे कोई अनौपचारिक लोक-संगोष्ठी चल रही हो।

फिर जो गान बहा, वह महज संगीत नहीं था—वह संस्कार था, स्मृति थी, जीवन की धड़कन थी। हर तान में खेतों की हवा महसूस हुई, हर बोल में लोक की पुरानी यादें जीवंत हो उठीं। अवधी, भोजपुरी और बुंदेली बोलियों में गाए गए उनके गीत-कजरी, सोहर, झूला या ठुमरी—सीधे हृदय में उतरते चले गए। बिना किसी शोर-शराबे, बिना दिखावे के, उनकी आवाज ने पूरे सभागार को एक सूत्र में बांध दिया। अंधेरे में भी चेहरों पर मुस्कान फैल गई, आंखें नम हो गईं। वह पल साबित कर गया कि सच्चा कलाकार मंच पर निर्भर नहीं होता, वह जन-जन से जुड़ता है।

इस घटना ने एक गहरा संदेश दिया-लोक कलाकार मंच से नहीं, जन से बड़ा होता है। सुविधाएं छिन जाएं तो भी जिसका सुर न डगमगाए, जिसकी साधना न रुके, वही महान होता है। मालिनी अवस्थी ने यह जता दिया कि लोक की शक्ति रोशनी और ध्वनि में नहीं, बल्कि संवेदना, सादगी और सच्चे सरोकार में बसती है। यह प्रस्तुति तकनीकी असफलता नहीं, बल्कि रंगमंच की जीत थी-जहां कला ने तकनीक को मात दे दी। एनएसडी के इस महोत्सव में यह क्षण अमर हो गया, जो याद दिलाता है कि असली प्रदर्शन दिल की गहराइयों से निकलता है, न कि उपकरणों से। मालिनी अवस्थी की यह सादगी भरी प्रस्तुति भारतीय लोक संगीत और रंगमंच की आत्मा को नई ऊर्जा प्रदान करती है।

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