आगरा को मिलेगा बहुप्रतीक्षित युद्ध स्मारक: नगर निगम की साहसी पहल

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लखनऊ : ताज के शहर आगरा को आखिरकार एक युद्ध स्मारक मिलने जा रहा है – एक ऐसी श्रद्धांजलि जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा थी। आगरा नगर निगम ने शहर में एक भव्य युद्ध स्मारक बनाकर भारत के वीर सैनिकों के बलिदान का सम्मान करने के अपने निर्णय की घोषणा की है। यह ऐतिहासिक निर्णय नागरिकों के प्रयासों के बाद आया है। रिवर कनेक्ट कैंपेन ने वार मेमोरियल की मांग को लेकर एक ज्ञापन पहली बार जनवरी 2023 में नगर आयुक्त को सौंपा था।

यह युद्ध स्मारक केवल एक और स्मारक नहीं होगा; यह एक पवित्र स्थान होगा जहाँ भारत के योद्धाओं के साहस, बलिदान और देशभक्ति को अमर किया जाएगा। अपने वास्तुशिल्प चमत्कारों के लिए जाने जाने वाले शहर में, यह श्रद्धांजलि उन लोगों के नामों के साथ खड़ी होगी जिन्होंने भारत को मजबूत बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

आगरा केवल ताजमहल का घर नहीं है; यह सदियों की लड़ाइयों और विजयों का गवाह रहा है। मुगल काल से लेकर ब्रिटिश राज और उसके बाद तक, इस भूमि ने योद्धाओं को उठते और गिरते देखा है, उनका खून इसकी मिट्टी में समाया हुआ है। आज भी, शहर और इसके आस-पास के क्षेत्र कई सैन्य प्रतिष्ठानों और सेवारत और सेवानिवृत्त सैनिकों के एक गौरवशाली समुदाय का घर हैं।

फिर भी, अब तक, देश के सम्मान के लिए लड़ने वालों के बलिदान को याद करने के लिए आगरा में कोई समर्पित स्थान नहीं था। आगामी युद्ध स्मारक आखिरकार इस अंतर को पाट देगा, जो हमारे नायकों के लिए कृतज्ञता की एक शाश्वत लौ के रूप में काम करेगा।

प्यार का एक स्थायी प्रतीक ताजमहल दुनिया भर से लाखों लोगों को आकर्षित करता है। एक और तरह के प्यार को याद करने के लिए आगरा से बेहतर जगह और क्या हो सकती है – अपने देश के लिए प्यार? जिस तरह ताज अमर प्रेम का प्रमाण है, उसी तरह यह युद्ध स्मारक भारतीय सैनिकों की अदम्य भावना का प्रमाण होगा।

युद्ध स्मारक सिर्फ़ पत्थर और शिलालेखों से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ कहानियाँ जीवित रहती हैं, जहाँ हर खुदा हुआ नाम बेजोड़ बहादुरी की कहानी कहता है। यह एक ऐसी जगह होगी जहाँ छात्र, पर्यटक और नागरिक अपना सम्मान देने आएंगे और उन बलिदानों के बारे में जानेंगे जिन्होंने भारत को सुरक्षित रखा है।

यह स्मारक एक शैक्षिक मील का पत्थर होगा, एक ऐसी जगह जहाँ स्कूल छात्रों को लाकर उनमें सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना पैदा कर सकते हैं। यह हर आगंतुक को याद दिलाएगा कि स्वतंत्रता कभी भी मुफ़्त नहीं होती है – यह उन लोगों के साहस के माध्यम से अर्जित की जाती है जो अपने जीवन के साथ राष्ट्र की रक्षा करते हुए अग्रिम पंक्ति में खड़े होते हैं।

शहीदों के परिवारों के लिए, यह स्मारक एक संरचना से कहीं अधिक होगा – यह यादों का एक मंदिर होगा। एक ऐसी जगह जहाँ वे आ सकते हैं, फूल चढ़ा सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं, और यह जानकर सांत्वना पा सकते हैं कि उनके प्रियजनों को भुलाया नहीं गया है।

यह समुदाय के लिए एक रैली स्थल भी होगा। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और कारगिल विजय दिवस जैसे अवसरों पर, नागरिक शहीदों को सम्मानित करने के लिए इकट्ठा होंगे, जिससे राष्ट्रवाद और एकता की भावना फिर से जागृत होगी। दिग्गजों के पास एक ऐसी जगह होगी जहाँ वे गर्व के साथ खड़े हो सकते हैं, उनकी सेवा को उनके शहर द्वारा स्वीकार और याद किया जाएगा।

भारत ने अपने नायकों को कभी नहीं भुलाया है, लेकिन अक्सर, हम उन्हें वह पहचान नहीं दे पाते जिसके वे हकदार हैं। आगरा में यह युद्ध स्मारक एक अनुस्मारक होगा कि राष्ट्र उन लोगों के सामने झुकता है जिन्होंने इसके सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी। यह एक बयान होगा कि आगरा में – जहाँ इतिहास किलों और महलों की दीवारों के माध्यम से फुसफुसाता है – भारत के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों की आवाज़ कभी नहीं मिटेगी।
वर्षों से, आगरा के लोग इस स्मारक की मांग कर रहे हैं, और अब, उनकी आवाज़ सुनी गई है। जल्द ही, एक भव्य स्मारक खड़ा होगा, न केवल पत्थर में, बल्कि आने वाले हर नागरिक के दिल में।

यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं है; यह एक वादा है – जिसे भारत हमेशा याद रखेगा। कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। कि देशभक्ति की लौ जो उन्होंने उठाई थी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग को रोशन करते हुए प्रज्वलित होती रहेगी।

पुस्तक मेले के आख़िरी दिन विष्णु शर्मा की नई किताब ‘कांग्रेस प्रेसिडेंट्स फ़ाइल्स’ का शानदार विमोचन

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लेखक पत्रकार विष्णु शर्मा की नई किताब ‘कांग्रेस प्रेसिडेंट फ़ाइल्स’ यूँ तो आते ही चर्चा में थी लेकिन उसका औपचारिक लोकार्पण नहीं हुआ था जो विश्व पुस्तक मेले के आख़िरी दिन यानी 9 फ़रवरी को हुआ और इस कार्यक्रम में तीन विशेष अतिथि मंच पर थे ‘नेताजी मिशन’ के लिए मशहूर लेखक अनुज धर, गांधीजी हत्याकांड की पड़ताल पर लिखी किताब ‘हे राम’ के लेखक प्रखर श्रीवास्तव और ‘मोदी Vs ख़ान मार्केट गैंग’ के लेखक अशोक श्रीवास्तव. तीनों की ही ये किताबें धूम मचा चुकी हैं.

सबसे दिलचस्प बात है कि कार्यक्रम के संचालन की बागडोर अपनी वन लाइनर के लिए मशहूर नीरज बधवार को सौंपी गई थी. जिनकी व्यंग्य पर लिखी गई किताबें ‘हम सब फ़ेक हैं’ और ‘बातें कम स्कैम ज़्यादा’ बेस्ट्सेलर रह चुकी हैं.

नेताजी बोस के ग़ायब होने में रहस्य पर कई किताबें लिख चुके अनुज धर की एक किताब ‘इंडियाज़ बिगेस्ट कवर अप’ तहलका मचा चुकी है, उनकी एक किताब शास्त्री जी की मौत के रहस्य पर भी आ चुकी है. देश विदेश के बड़े संस्थानों में उनको बोलने के लिये बुलाया जाता है तो श्रीवास्तव ब्रदर्स के नाम से मशहूर प्रखर और अशोक डीडी एंकर व लेखक हैं.

इस अवसर पर अनुज धर ने कहा कि, ‘’विष्णु शर्मा अपनी किताबों में इतिहास के पन्नों से ऐसी दिलचस्प कहानियाँ ढूँढ कर लाते हैं, जो आपको हैरान कर देंगी. उदाहरण के लिए उन्होंने बताया कि इस किताब में उन्होंने ऐसे कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में लिखा है जो ना केवल भारतीय कॉल गर्ल्स की चिंता करता था बल्कि चीनी नागरिकों के लिए भी चिंतित था. प्रखर श्रीवास्तव ने भी उनकी ये कहकर तारीफ़ की कि “मैंने केवल इस किताब से जाना कि सावरकर को फाँसी की सजा देने वाला जज भी कांग्रेस का अध्यक्ष रह चुका था. विष्णु शर्मा फैक्ट्स के मामले में काफ़ी मेहनत करते हैं और न्यूट्रल संदर्भ ग्रंथ से ही फैक्ट्स लेते हैं”.

अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि, “आज इस तरह की किताबें नई पीढ़ियों के लिए वो सब लेकर आ रही हैं, जो अब तक छुपाया जा रहा था. और ये सब काम विष्णु शर्मा जैसे वो लोग कर रहे हैं, जो मूल रूप से पत्रकारिता करियर में थे.

इस मौक़े पर इस किताब को छापने वाले प्रकाशन संस्थान प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार और पीयूष कुमार ने उन चुनौतियों का ज़िक्र किया, जो इस तरह की किताबों को छापने में आती हैं. उन्होंने कहा कि, “हम केवल ये चेक करते हैं कि फैक्ट्स का संदर्भ सही जगह से, सही तरीक़े से लिया गया है कि नहीं, फिर हम पूरी तरह लेखक का साथ देते हैं”.

लेखक विष्णु शर्मा भी अपनी किताबों इंदिरा फ़ाइल्स, इतिहास के 50 वायरल सच, गुमनाम नायकों की गौरवशाली गाथाओं के लिए जाने जाते हैं. उनकी सारी किताबें इस तरह की हैं कि कहीं से भी, किसी भी चैप्टर से पढ़ी जा सकती हैं, हर चैप्टर एक अलग कहानी है. नीलेश मिश्रा के रेडियो शो के लिए महावीर चक्र विजेताओं पर कहानियाँ भी लिख चुके हैं. फ़िल्म समीक्षक भी हैं, राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर जी म्यूजिक से आये उनके गीत को अनु मलिक ने कंपोज़ किया था, जिस पर 10 हज़ार रील्स बनी थीं.

2025 की शुरुआत भी विष्णु शर्मा ने 26 जनवरी को अपना नया गीत रिलीज़ करके की है. संविधान के 75 साल पूरा होने पर ‘ये संविधान है ‘ गीत ज़ी म्यूजिक ने रिलीज़ किया, इसे भी अनु मलिक ने कंपोज किया है और आवाज़ दिव्य कुमार व अनु मलिक ने दी है.

उनकी किताब ‘कांग्रेस प्रेसिडेंट फ़ाइल्स’ गांधीजी से पहले के कांग्रेस अध्यक्षों के बारे में है, जिसकी टैग लाइन है “तथ्यों का खाना जो कांग्रेस के बारे में आपकी राय बदल देगा”. ये किताब अमेज़ोन, फ़्लिपकार्ट आदि सभी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर ऑनलाइन उपलब्ध है.

Goa CM Dr Pramod Sawant Launched ‘Goa State Amrit kaal Agriculture Policy 2025’

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Panaji, Goa, – Goa Chief Minister Dr. Pramod Sawant launched ‘Goa State Amrit Kaal Agriculture Policy 2025’ aimed at transforming the agriculture sector of Goa, integrating women farmers and youth in agriculture through targeted programs and incentives. The policy emphasizes on climate-resilient farming practices to protect agriculture in Goa from the effects of climate change. It also introduced ‘New Goa Farmers Welfare Act’, that would be enacted to provide guaranteed livelihood security and incorporate sustainable practices, while simplifying the government procedures for the farmers.

Aligned with Hon’ble Prime Minister Narendra Modi’s vision of “Viksit Bharat 2047”, the policy reinforces the Goa government’s commitment to cater to the Annadata (farmers), Yuva (youth), Nari (women) and Gareeb (Poor). Building self-reliance, sustainability, and innovation in farming.

The policy vision is dedicated to creating an ecosystem that supports farmer welfare, ensures fair labour conditions, and calls for more women and youth to engage in agriculture. CM Sawant highlighted this policy framework’s call for innovation in agriculture, assuring support to the ideators. For the farm workers, CM Sawant announced that there will be skill development programs to incorporate specific subjects relevant to agricultural practices. The Chief Minister reiterated the significance of ₹1.38 lakh crore allocated to agriculture in the Union Budget 2025-26 and how Goa’s agriculture can reap maximum benefits from this.

Iterating climate-resilient farming practices to protect agriculture in Goa from the effects of climate change, CM Sawant highlighted the importance of using modern techniques like hydroponics, integrated farming, and other sustainable methods. The policy also introduces initiatives to facilitate the farmers to cultivate new cash crops like avocado, rambutan, grapefruit, and pomelo using high yielding seed varieties.

Further, the Agriculture policy focuses on strengthening farmer collectives, enhancing access to markets, credit, insurance, diversifying income through value addition, and agro-tourism.The policy also aims to pave the way to creating a robust supply chain infrastructure to reduce post-harvest losses and ensure better market access for farmers.

Overall, the “Goa Amrit kaal Agriculture Policy 2025” reflects the state government’s vision of transforming Goa’s agriculture sector into a modern, productive, sustainable, and inclusive pillar of its economy.

नमो बुद्धाये और अंबेडकरवाद की राजनीति निरर्थक क्यों बन गई ?

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आचार्य श्रीहरि

दिल्ली विधान सभा चुनावों के दौरान नमो बुद्धाए और अंबेडकरवाद की राजनीति का बहुत शोर था, एनजीओ टाइप के नमो बुद्धाए और अंबेडकरवाद की राजनीति ने बहुत बवाल काटा था, सक्रियता और अभियान बहुत ही शोरपूर्ण था, इनका दावा था कि नमो बुद्धाए और अंबेडकर को मानने वाले लोग ही जीत तय करेंगे, किसकी सरकार बनेगी यह निर्धारण करेंगे। लेकिन ये दोनों की विसंगतियां यह थी कि इनमें एक मत नहीं था, वे कनफ्यूज भी थे और विभाजित भी थे। नमो बुद्धाए और अंबेडकरवादी दो धु्रवों पर सवार थे। इनके एक वर्ग अरिवंद केजरीवाल को समर्थन दे रहा था जबकि दूसरे वर्ग कांग्रेस को समर्थन दे रहा था। दोनों वर्गो का समर्थन देने के तर्क बहुत ही विचित्र थे और फर्जी थे। अरविंद केजरीवाल ने दलित छा़त्रवृति और दलित कल्याण की योजनाओं का बंदरबांट किया था, ईमानदारी पूर्वक लागू नहीं किया था, कोई विशेष सुविधाएं नहीं लागू की थी फिर अरविंद केजरीवाल को समर्थन देने की घोषणा की थी जबकि दूसरे वर्ग उस कांग्रेस को समर्थन दिया और जीत की कामना की थी जिस कांग्रेस ने भीमराव अंबेडकर को लोकसभा में एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार नहीं पहुंचने दिया था और अंबेडकर के सपनों का संहार किया था, नेहरू की दलित और संविधान विरोधी भावनाओं से आहत अंबेडकर की पीडा को भी दरकिनार कर दिया। कांग्रेस का समर्थन देते समय नमो बुद्धाए और अबेडकर वादियों ने यह याद तक नहीं किया कि अंबेडकर ने भारतीय संविधान को खुद ही जलाने की इच्छा या विछोह क्यों प्रकट की थी। सबसे बडी बात यह थी कि नमो बुद्धा और अंबेडकरवादियों के निशाने पर भाजपा थी और ये भाजपा के खिलाफ में खडे थे, भाजपा को किसी भी परिस्थिति में दिल्ली नहीं जीतना देना चाहते थे, इसलिए भाजपा के खिलाफ वोट डालने के लिए आह्वाहन भी किया था, इनका एक गुप्त एजेंडा दलित और मुस्लिम समीकरण के बल पर भाजपा का संहार करने के था।

दिल्ली विधान सभा का चुनाव परिणाम क्या कहता है? नमोबुद्धाए और अंबेडकर वादियों की केजरीवाल और कांग्रेस को जीताने की इच्छाए नहीं पूरी हुई। जाहिर तौर पर नमो बुद्धाए और अंबेडकरवादियों की इच्छाएं पूरी तरह असफल साबित हुई, और इनकी राजनीति शक्ति कमजोर होने का प्रमाण भी मिला। न तो अरविंद केजरीवाल जीत पाया और न ही कांग्रेस अपनी खोयी हुई राजनीतिक शक्ति हासिल कर सकी। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की जबरदस्त पराजय हुई है। भाजपा को अरविंद केजरीवाल से दोगुनी से भी ज्यादा सीटें मिली हैं। जबकि कांग्रेस को मात्र दो प्रतिशत वोटो की वृद्धि हुई है। साढे चार प्रतिशत वोट से बढकर साढे छह प्रतिशत वोट कांग्रेस के हुए हैं। लेकिन कांग्रेस के वोट प्रतिषत बढने के कारण जाति है। खासकर कांग्रेस के जाट प्रत्याशियों ने कांग्रेस के वोट प्रतिशत बढाने का काम किया है। कांग्रेस ने जहां-जहां पर जाट प्रत्याशी उतारे थे वहां-वहां पर कांग्रेस को ठीक-ठाक और इज्जत बचाने लायक वोट मिले हैं। जबकि आरक्षित सीटो पर भी भाजपा की सफलता दर अप्रत्याशित है और आश्चर्यचकित करने वाले हैं। कहने का अर्थ यह है कि दिल्ली मे भी दलितों का एक बडा भाग भाजपा को समर्थन दिया है और उनके सामने नमो बुद्धाए या अबेडकरवाद की राजनीतिक पैंतरेबाजी काम नहीं आयी और उन्हें भाजपा को समर्थन देने से रोक भी नयी पायी।

दिल्ली विधान सभा चुनाव से पूर्व महराष्ट्र और झारखंड में विधान सभा चुनाव हुए थे। महाराष्ट्र भीमराव अंबेडकर की संघर्षभूमि है। अबेडकर ने महाराष्ट्र के नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया था। इसलिए कहा जाता है कि महाराष्ट्र में अबेडकर वादियों और नमोबुद्धावाद की उर्वरक भूमि है जहां पर दलितों के अंदर राजनीतिक जागरूकता भी आसमान छूती है। महराष्ट्र विधान सभा चुनावो के दौरान भी दिल्ली विधान सभा की तरह ही उबाल और बवाल की राजनीतिक गर्मी पैदा की गयी थी और भाजपा के खिलाफ न केवल आक्रमकता उत्पन्न की गयी थी बल्कि भाजपा का संहार करने की भी कसमें खायी गयी थी। भाजपा विरोधी गठबंधन के साथ नमो बुद्धाएं और अंबेडकरवादी खडे थे। यह घोषणा भी की गयी थी कि दलित किसी भी स्थिति में भाजपा को सत्ता हासिल नहीं करने देंगे, भाजपा की सत्ता को उखाड फेकेंगे, भाजपा की सत्ता का संहार होना निश्चित है। कांग्रेस भी दलितों के समर्थन से उचक-कूद कर रही थी और जोश में थी। महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव परिणाम आया तब इन सभी के उछल-कूछ करने और बवाल की राजनीति पर कुठराघात हो गया, जनता ने इन्हें नकार दिया और भाजपा की जोरदार और अतुलनीय जीत भी दिला दी। झारंखड में भाजपा का रथ जरूर रूका पर भाजपा के रथ को रोकने वाले कोई दलित नहीं थे बल्कि पिछडे थे जो भाजपा के पिछडे विरोधी राजनीति से खफा थे और भाजपा ने पिछडों के आरक्षण का संहार कर दिया था। हालांकि यह करतूत भाजपा का नहीं बल्कि दलबदलू बाबूलाल मरांडी की थी जिसका दुष्परिणाम भाजपा को झेलना पडा था। हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मिल्कीपुर की कहानी भी उल्लेखनीय है।

अब आइये , काशी राम और मायावती की अंबेडकरवाद और नमो बुद्धाएं राजनीति की शक्ति को देख लें और इस कसौटी पर तुलना कर लें। नमो बुद्धाएं और अंबेडकरवाद की राजनीति को सफलता की चरमसीमा पर पहुंचाने का श्रेय मायावती और काशीराम को जरूर है। एक बार पूर्ण बहमुत और कई बार गठबंधन की सरकार बना कर इसका सत्ता सुख भी मायावती और काशीराम ने लिया है। लेकिन इनकी राजनीति शक्ति स्थायी नहीं रह सकी है। आज उत्तर प्रदेश विधान सभा में बसपा का एक मात्र सदस्य है और वह भी राजपूत जाति का है। संसद में बसपा का प्रतिनिधित्व नहीं है। पिछले लोकसभा चुनावों में बसपा की उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कोई भी सफलता नहीं मिली थी।

नमो बुद्धाए और अबंडेकरवाद क्या-दोनों अलग-अलग राजनीतिक श्रेणियां हैं? नमो बुद्धाए की अभिव्यक्ति रखने वाले लोग पूरी तरह से बौद्ध धर्म मे दीक्षित और शीक्षित हो चुके है और उन्हें हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि अंबेडकरवादी पूरी तरह से हिन्दू धर्म से मुक्त नहीं हुए हैं, कुछ न कुछ संबंध हिन्दू धर्म के साथ उनका हैं। पर दोनों हिन्दू धर्म के खिलाफ बोलने और राजनीतिक शक्ति फैलाने में साथ ही साथ हैं। अंबेडकरवादियों को हिन्दू धर्म से विछोह तो समझ आता है, क्योंकि उन्हें प्रताडित किया गया और आज भी कुछ न कुछ प्रताड़ना का वे शिकार हैं। जबकि नमो बुद्धाए कहने वाले लोगों का हिन्दू धर्म से विछोह समझ में नहीं आता है? नमो बुद्धाएं कहने वाले हिन्दू धर्म को गालियां क्यों बकते हैं, हिन्दू धर्म की आलोचना का शिकार क्यों बनाते हैं? नमो बुद्धाए हो या फिर अंबेडकरवादी हमेशा हिन्दुओं की आलोचना और अपमान का शिकार बनाने से पीछे नहीं रहते हैं। उग्र हिन्दू विरोधी की मानसिकता इनकी आत्मघाती हो गयी, ये राजनीति से अलग-थलग पडने लगे। मायावती आज की राजनीति में असहाय और निरर्थक हो गचल। नेश्राम और प्रकाश अंबेडकर जैसे नेता भी अप्रासंगिक हो गये, आज की राजनीति मेे इनकी कोई गिनती तक नहीं है। दलित इन्हें एनजीओ छाप, गिरोहबाज और मुस्लिम समर्थक मान कर खारिज करते हैं? अनसुना करते हैं।

संविधान समाप्त होने का डर फैलाना भी दलितों की संपूर्ण एकता सुनिश्चित नहीं कर सका। मोदी विरोध में संविधान को हथकंडा बनाया गया और नरेन्द्र मोदी को अंबेडकर विरोधी कहने और साबित करने के सभी प्रयास विफल हो गये। लोकसभा चुनावों में धक्का खाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी और भाजपा की शक्ति बढी है और वे अनिवार्य तौर पर अपनी शक्ति बनायें रखने की कोशिश की है। इनमें इन्हें सफलता भी मिली है। इसके अलावा भाजपा ने दलितों को कल्याणकारी योजनाओं से जोड कर और आरक्षण मे सिर्फ एक जाति के विकास का प्रश्न बना कर भी अपनी जगह बनायी है।

यादव और मुस्लिम समीकरण का हस्र से नमो बुद्धाए और अंबेडकरवादियों ने कुछ नहीं सीखा है। बिहार में लालू का परिवार पिछले 20 सालों से सत्ता से बाहर है, अखिलेश यादव पिछले दस सालों से सत्ता से बाहर है। यादव और मुस्लिम समीकरण अब सत्ता से बाहर होने का राजनीतिक प्रमाण बन गया है। दलित और मुस्लिम समीकरण भी कैसे जीवंत और शक्तिशाली बन सकता है? मुस्लिम कभी भी अपनी कीमत पर दलित को समर्थन दे नहीं सकते हैं। मुस्लिम संस्थानों जैसे अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया में दलितों का कोई आरक्षण नहीं है। कोई मुस्लिम नेता यह प्रश्न नहीं उठाता कि दलितों और पिछडों को मुस्लिम संस्थानों में आरक्षण क्यों नहीं मिलता है। मुस्लिम वर्ग उसी को समर्थन देते हैं जो भाजपा को हराने के लिए शक्ति रखते हैं। रावन इसीलिए सांसद चुना गया क्योंकि समाजवादी पार्टी का समर्थन था। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का समर्थन नहीं होता तो फिर मुस्लिम कभी भी रावण का समर्थन नहीं करते।

डग्र हिन्दू विरोधी गोलबंदी से एनजीओ छाप दलित राजनीति को नुकसान ही है। मुस्लिमों के साथ समीकरण बनाना नमो बुद्धाए और अबंडकरवादियों के लिए नुकसानकुन और घाटे का सौदा है। जब तक पिछडे मुस्लिम समर्थक नहीं बनेंगे तब तक इनके लिए कोई संभावना नहीं है। पिछडा वर्ग अपने धर्म और भाजपा में समर्थन बनाये रखे हुए हैं। पिछडों की राजनीति का सफल प्रबंधन भाजपा ने किया है। हिन्दू विरोध के उग्र वाद को ये छोडेंगे नहीं और मुस्लिमों के साथ समीकरण की मानसिकता भी छोडेंगे नहीं फिर भारत की सत्ता राजनीति मे इनके निरर्थक रहने की ही उम्मीद बनती है। आज की सत्ता राजनीति में ये निरर्थक ही तो हैं।

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