कोलकाता में नदी उत्सव के विशेष खंड का आयोजन

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कोलकाता : संस्कृति मंत्रालय का स्वायत्त संस्थान इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) कोलकाता में अपने प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम ‘नदी उत्सव’ का एक विशेष खंड आयोजित कर रहा है। आईजीएनसीए की नदी संस्कृति परियोजना के अंतर्गत परिकल्पित ‘नदी उत्सव’ एक राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित पहल है। इसका उद्देश्य भारत की नदियों को जीवंत सांस्कृतिक इकाइयों के रूप में समझना और प्रस्तुत करना है। बीते वर्षों में इस कार्यक्रम के माध्यम से गोदावरी, कृष्णा, गंगा और यमुना जैसी प्रमुख नदियों के तटों पर आयोजित संगोष्ठियों, प्रदर्शनियों और सार्वजनिक संवादों के जरिए विद्वानों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों और स्थानीय समुदायों को एक साझा मंच मिला है।

हुगली नदी के तट पर स्थित होने के कारण, कोलकाता इस संस्करण के लिए एक विशिष्ट और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध पृष्ठभूमि प्रदान करता है। सदियों से यह नदी विविध समुदायों, जैसे- आर्मेनियाई, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और ब्रिटिश बस्तियों के निवासियों के आपसी संपर्क का महत्वपूर्ण मार्ग रही है। इन समुदायों की उपस्थिति ने बंगाल की वास्तुकला, शिक्षा, व्यापार, भाषा, खान-पान, जीवनशैली और कलात्मक परम्पराओं को गहराई से प्रभावित किया है।

कोलकाता में नदी उत्सव के अंतर्गत, 31 जनवरी से 1 फरवरी 2026 तक ब्रिटिश डिप्टी हाई कमीशन (ब्रिटिश क्लब) में दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वान, शोधकर्ता और संस्कृति विशेषज्ञ नदियों के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों पर विचार-विमर्श करेंगे तथा नदी-केंद्रित भारतीय परम्पराओं के विविध पक्षों को उजागर करेंगे।
इसके बाद, 2 फरवरी से 11 फरवरी 2026 तक, विक्टोरिया मेमोरियल हॉल के सहयोग से, वहीं के दरबार हॉल में दुर्लभ छायाचित्रों एवं चित्रों की एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। इस प्रदर्शनी में विख्यात कलाकारों और छायाकारों की शताब्दी पुरानी दुर्लभ कृतियां प्रस्तुत की जाएंगी, जिनमें नदी भूगोल, प्राकृतिक दृश्य और सांस्कृतिक जीवन को विषयगत रूप से दर्शाया गया है। इसका उद्देश्य आगंतुकों को गंगा नदी प्रणाली के भारतीय सभ्यता, विरासत और कलात्मक कल्पना पर पड़े स्थायी प्रभाव की समझ प्रदान करना है, जिससे दर्शकों को नदी और संस्कृति के गहरे अंतर्संबंधों का अनुभव हो सके।

इस कार्यक्रम के माध्यम से आईजीएनसीए नदियों को इतिहास, स्मृति और जीवित परम्पराओं के महत्वपूर्ण संवाहक के रूप में देखते हुए जनसहभागिता, विद्वत् संवाद और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहित करना चाहता है। संगोष्ठी और प्रदर्शनी दोनों आम जनता के लिए खुली हैं। सभी इच्छुक नागरिकों का इस कला, इतिहास और नदीय संस्कृति के अनूठे संगम का अनुभव करने के लिए स्वागत है।

प्रतिभा पलायन के बीच ईयू ट्रेड डील का लाभ लेने हम कितने तैयार हैं!

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को परिवर्तनकारी समझौता कहा है। वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से हर साल करीब 4 अरब यूरो (43 हजार करोड़ रुपए) के टैरिफ कम होंगे और लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए मौके बनेंगे। इस वक्‍त भारत और ईयू मिलकर वैश्विक जीडीपी का करीब 25% और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अपने पास रखते हैं।

कहा जा रहा है कि यह समझौता व्यापार संबंधों में विविधता लाने और अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा, इससे हर साल ड्यूटी में चार अरब यूरो की बचत होगी। अब ये बचत वास्‍तव में कितनी सच होगी ये आनेवाला वक्‍त बताएगा, किंतु आज बड़ा सवाल है कि हम चीन की तुलना में ईयू को अपना सामान बेचने के लिए कितने तैयार हैं। इसके लिए जो कुशल ब्रेन चाहिए, क्‍या वह हमारे भारत में रुक पा रहे हैं?

आंकड़ें आज बता रहे हैं कि पिछले एक वर्ष (2024-25) में भारत का ईयू के साथ व्यापार अधिशेष लगभग अमेरिकी डॉलर 15.2 बिलियन रहा। इसके हिसाब से संतुलन लाभ लगभग +11% से +13% अनुमानित है। जबकि चीन के ईयू के साथ व्यापार में बहुत बड़ा सरप्‍लस है– यूरोस्टाट के आंकड़ों के मुताबिक ईयू ने चीन को लगभग यूरो 513-€517 बिलियन के माल इंपोर्ट किया और लगभग यूरो 213 बिलियन के एक्‍सपोर्ट किए, जिससे लगभग यूरो 300+ बिलियन का ‘ट्रेड डेफिसिट’ (यानी चीन को अधिशेष) रहा। इसे प्रतिशत में देखें तो लगभग +58% से +60% के आसपास चीन का बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट के कारण लाभ माना जा सकता है। तुलनात्‍मक रूप से एक वर्ष में यदि भारत का लाभ +12% है तो चीन हमसे कई गुना आगे है, उसका लाभ +58% पर है।

ग्‍वालियर के रहनेवाले दो भाइयों की कहानी हमारे सामने है, सनू और मनू । मनू ने पढ़ाई पूरी की और वो आज सैन फ्रांसिस्को में गूगल के साथ है। आनेवाले समय में हो सकता है, वो हमेशा के लिए वहीं बस जाए! उसका छोटा भाई सनू जिसका हाल ही में इसरो से जुड़े अध्‍ययन संस्‍थान में सिलेक्‍शन हुआ, किंतु उसने वहां जाना उचित नहीं समझा। घरवालों ने लाख समझाया, मां तो इस बात से दुखी है, बेटा सुन नहीं रहा। भविष्‍य में इसरो का वैज्ञानिक बनता बेटा, कितने गर्व की बात होती! किंतु दूसरी ओर सिस्‍टम का नकारापन और व्‍यवस्‍था का दोष भारत की युवा पीढ़ी के सिर चढ़कर बोल रहा है!

हर साल देश छोड़कर जानेवाली तमाम प्रतिभाओं की तरह उसका भी कहना है कि भारत में योग्‍यता के साथ न्‍याय नहीं होता, किसी ओर का नहीं अपने परिवार में मैं ऐसे कई उदाहरण देख चुका हूं। इसलिए मैं भी विदेश ही जाऊंगा, जहां व्‍यक्‍ति का चयन उसकी योग्‍यता और प्रतिभा के आधार पर होता है! निश्‍चित ही मनू जैसे भारत छोड़ चुके और सनू जैसे युवा जो भारत छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं, इन तमाम प्रतिभाओं के पलायन के आंकड़े आज हमें डरा रहे हैं।

विदेश मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2020 में 85 से 94 हजार भारतीयों ने विदेशों में नागरिकता या दीर्घकालिक रेजिडेंसी ली थी, तीन साल बाद 2023 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 3.98 लाख हो गई। 2024 में 19 नवम्बर तक ही यह आंकड़ा 3.48 लाख पार करता दिखा। 2024 में 2.06 लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी, जो भले ही 2023 के 2.16 लाख से थोड़ा कम है, किंतु दो लाख से ऊपर बने रहना इस संकट की गंभीरता को दिखाता है। पिछले 14 वर्षों में 20 लाख से अधिक भारतीय स्थायी रूप से विदेश बस चुके हैं और इनमें से अधिकांश उच्च-शिक्षित तथा कुशल पेशेवर हैं।

नीति आयोग की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट इस तस्वीर को और साफ करती है। इसके अनुसार भारत से हर एक विदेशी छात्र के आने के मुकाबले 25 भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं। 2024 में 13.36 लाख भारतीय छात्र विदेश गए, जबकि भारत आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या नगण्य रही। यह असंतुलन बताता है कि भारत वैश्विक शिक्षा और शोध का केंद्र बनने के बजाय प्रतिभा निर्यातक देश बन गया है।

आईआईटी के टॉप 1000 रैंकर्स में से कम से कम एक-तिहाई आगे चलकर विदेश चले जाते हैं। 67 प्रतिशत उच्च-योग्य प्रोफेसर भारत के बजाय विदेश में नौकरी को अधिक महत्‍व देते हैं। पी-एचडी के बाद पोस्ट-डॉक के लिए अमेरिका और यूरोप जाने वाले युवा वैज्ञानिक अक्सर वहीं स्थायी नागरिक बन जाते हैं। उनकी लैब, उनकी खोजें और उनके स्टार्टअप स्पिन-ऑफ भारत के स्‍थान पर विदेशों में जन्म लेते हैं। रही सही कसर नीट-पीजी में मिस्‍टर माइनस 40 को भी योग्‍य मानेजाने वाले हमारे सिस्‍टम ने पूरी कर दी है! ऐसे में यही कहना होगा कि यह सिर्फ ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि नॉलेज ड्रेन है।

भारत की शिक्षा-प्रणाली से निकले कई लोग आज वैश्विक सत्ता और अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर हैं। जिसमें कि सुंदर पिचाई, सत्या नडेला, शांतनु नारायण, अरविंद कृष्णा, अजय बंगा जैसे कई नाम गिनाए जा सकते हैं, ये सभी कायदे से भारत की ताकत बनना चाहिए किंतु आज इनकी रिसर्च, पेटेंट, टैक्स और रोजगार सृजन का लाभ भारत के बजाय अमेरिका और अन्य विकसित देशों उठा रहे है। भारत ने दिमाग तैयार किए, लेकिन उनसे पैदा होने वाली समृद्धि दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है।

मीटस्ट्रीम.एआई के को-फाउंडर और डायरेक्टर सिद्धार्थ शिवसुब्रमण्यम का कहना है कि अमेरिका में चीजे बहुत तेज चलती हैं, निवेशक और ग्राहक जल्दी फैसले लेते हैं और इससे कंपनी की ग्रोथ की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। भारत से प्रतिभा पलायन की असल वजह इकोसिस्टम की कमी और तेजी से आगे बढ़ने की चाह है।

सिद्धार्थ की तरह भारत की आंतरिक स्‍थ‍ितियों को लेकर जब युवा और पेशेवर अपने अनुभव साझा करते हैं, तो एक जैसी समस्याओं का ही जिक्र करते हैं। भ्रष्टाचार, धीमी और जटिल नौकरशाही, प्रदूषण, ट्रैफिक, असुरक्षित भोजन और हवा, ओवरवर्क कल्चर और सम्मान की कमी। कई लोग यह भी कहते हैं कि वे सिर्फ ज्‍यादा सैलरी नहीं, सामान्य और सुरक्षित जीवन की चाह रखते हैं। उनके लिए महिलाओं की सुरक्षा, बेहतर हेल्थकेयर और साफ वातावरण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना करियर।

आज भारत हर साल 35 से 50 अरब डॉलर की उत्पादकता खो रहा है। एआई और इनोवेशन में पेटेंट और रिसर्च बाहर जा रही हैं। भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड, जिसे उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, धीरे-धीरे बर्बाद हो रहा है। इसलिए सामाजिक असमानता भी बढ़ रही है। ऐसे में चिंता यही है कि हमारा सिस्‍टम अपने आप को वैश्‍विक प्रतिस्‍पर्धा के लिए कितना तैयार कर रहा है? निश्‍चित ही यूरोपीय संघ से भारत का सौदा छप्पर-फाड़ अवसर है।

वरिष्‍ठ पत्रकार हरिशंकर व्‍यास के शब्‍दों में “यदि प्रधानमंत्री मोदी गंभीरता से अपने सचिवों से 27 यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड आदि के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों के मुताबिक बाज़ार खुलवाएं, प्रक्रिया-कायदे आसान बनवाएं तो भारत के लिए अवसर ही अवसर हैं।”…यूरोपीय संघ के साथ करार हो चुका है लेकिन अमल में ढेरों बाधाएं हैं। दिल्ली के नौकरशाहों और क्रोनी पूंजीपतियों की लालफीताशाही व स्वार्थों की नीति व नीयत अंडगे वाली है। दूसरी ओर यूरोपीय संघ के नेता चीन से भी सौदा पटा रहे हैं।

आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी नौकरशाही फुर्ती से ट्रंप के बनवाए अवसरों का लाभ उठा रहे हैं। फिर भारत के बाजार में चीन जैसा छाया है उसके आगे कैसे पश्चिमी कंपनियों के धंधे, पूंजी निवेश के रास्ते निकलें? निश्‍चित ही इन प्रश्‍नों के जवाब हमें जरूर ढूंढने चाहिए, अन्‍यथा एक महान अवसर हम खो देंगे, चीन ईयू पर सर्वत्र छाया हुआ दिखाई देगा! चीन इन दिनों अपने यहां विशेष प्रोग्राम और आर्थि‍क पैकेज देकर दुनिया भर से प्रतिभाओं को वापिस बुला रहा है, ऐसे में भारत की क्‍या योजना है? अभी तक कुछ पता नहीं है!

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘वेदों की ओर चलो’ का बजाया था बिगुल

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चंडीगढ़। स्वामी दयानंद का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था। इनका बचपन का नाम मूलशंकर था। परिवार सम्पन्न एवं प्रभावशाली था और पिता के मार्गदर्शन में मूलशंकर ने नीतिशास्त्र, साहित्य एवं व्याकरण का अध्ययन किया। उन्होंने 14 वर्ष की आयु में ही सम्पूर्ण यजुर्वेद संहिता को कंठस्थ कर लिया था।

बचपन में ही मूलशंकर की बहन और चाचा का निधन हो गया, जिसके चलते उनका मन गहरे संताप में डूब गया। इसके उपरांत, जीवन और मृत्यु के जटिल प्रश्नों को समझने के लिए उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी। साथ ही, उन्हें सांसारिक कार्यों से भी विरक्ति होने लगी। उनकी इस मनःस्थिति को देखकर पिता चिंतित रहने लगे और उन्होंने सोचा कि क्यों न मूलशंकर का विवाह कर दिया जाये, जिससे वह सांसारिक कार्यों में पुनः रूचि लेने लगेंगे। मगर मूलशंकर इन सब में बंधने को तैयार नहीं थे। अतः उनके पिता द्वारा निश्चित की गई विवाह की तिथि से कुछ दिन पूर्व ही वह घर त्यागकर ज्ञान की खोज में निकल पड़े और साधु बन गये।[1]

वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह गुरु की खोज करने लगे, स्वामी विरजानंद के सानिध्य में पहुंचे। जहां उन्हे अनुभव हुआ कि जिस गुरु की वे खोज कर रहे हैं, वह उन्हें मिल गये हैं। यहाँ उन्हे नया नाम – दयानंद सरस्वती दिया गया।

स्वामी विरजानंद के शिष्यत्व में उनके ज्ञान का परिमार्जन हुआ। दयानंद समाज के उत्थान में वेदों के ज्ञान को आधार मानतें थें। उन्होंने वेदों के प्रचार के लिए देशव्यापी अभियान चलाया। समाज उत्थान और राष्ट्र प्रगति के उद्देश्य से 1875 को बंबई में दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की।

आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने समाज में प्रचलित अंधविश्वासों एवं रुढियों का विरोध किया। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा पर बल देते हुए ‘वेदों की ओर लौटने’ का संदेश दिया। इसके अलावा, स्वामी जी ने वेदों को हिन्दू धर्म का मूल स्रोत माना और वैदिक मान्यता के अनुसार हिन्दू धर्म की उदार व्याख्या प्रस्तुत की।

30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के अवसर पर जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने महर्षि दयानंद को अपने महल में आमंत्रित किया और गुरु का आशीर्वाद मांगा। दयानंद ने जब राजा को दरबार की नृत्यांगना का परित्याग करने और धर्म के जीवन पाठ पर आगे बढ़ने की सलाह दी तो इससे नृत्यांगना दयानंद पर क्रुद्ध हो गयी। उसने रसोइए के साथ महर्षि के दूध में कांच के टुकड़े मिलाने का षड्यंत्र रचा जिससे महर्षि को कष्टदायी पीड़ा के साथ मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा। हालांकि, उन्होंने दीपावाली के दिन अजमेर में अपनी मृत्यु होने से पूर्व इस षड्यंत्र में सम्मिलित रसोइए को क्षमा कर दिया।

महर्षि दयानंद कहते हैं –“जब मनुष्य धार्मिक होता है तब उसका विश्वास और मान्य शत्रुभी करते हैं और जब अधर्मी होता है तब उसका विश्वास और मान्यमित्र भी नहीं करते। इससे जो थोड़ी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षापाकर सुशील होता है उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता”।[2]

आज आर्य समाज भारत ही नहीं बल्कि विश्‍व के अन्य भागों में भी पर्याप्त रूप से सक्रिय है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, त्रिनिदाद, मेक्सिको, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, केन्या, तंजानिया, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका, मलावी, मॉरीशस, पाकिस्तान, बर्मा, थाईलैंड, सिंगापुर, हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया कुछ ऐसे देश हैं जहां आर्य समाज की शाखाएं हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती – विभिन्न विद्वानों के कथन

· एनी बेसेंट ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया ए नेंशन’ में लिखा है -स्वामी दयानंद जी ने सर्वप्रथम घोषणा की थी कि भारत भारतीयों के लिए है।
· श्रीमती एनीबीसेंट ने कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में कहा था –जब स्वराज मंदिर बनेगा तो उस में बड़े-बड़े नेताओं कि मूर्तियां होंगी और सबसे ऊँची मूर्ति दयानंद की होगी।
· महान क्रान्तिकारी स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने कहा था–“महपि दयानन्द स्वाधीनता संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा, हिन्दू जाति के रक्षक थे 1”[3]
· इन्दिरा गांधी – “हमारे देश ने बहुत-से महान पुरुषों और सुधारकों को जन्म दिया, इनमें महर्षि दयानंद हैं। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज में फैले अंधविश्वास को और विशेष रूप से ऊँच-नीच के भेदभाव को मिटाने में लगाया। जिस प्रकार महर्षि दयानंद ने यह उपदेश दिया कि प्राचीन ग्रंथों का फिर से अध्ययन किया जाये, उसी प्रकार यह आवश्यक है कि हम उनके उपदेशों को फिर से सही संदर्भ में रखकर देखें”।[4]
· जगजीवनराम- “आर्य समाज का समाज सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान है। महर्षि दयानंद के सिद्धांतों, आदर्शों और उपदेशों का प्रचार आर्यसमाज द्वारा किया जाता है, इससे जनता में समानता पर आधारित जाति-पांति विहीन समाजवादी समाज के निर्माण की भावना उद्बोधित होने में सहायता मिलती है”।[5]
· प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी – “ऐसे समय में जब हमारी परम्पराएँ और आध्यात्मिकता लुप्त हो रही थीं, तब स्वामी दयानंद ने ‘वेदों की ओर लौटने’ का आह्वान किया। महर्षि दयानंद केवल वैदिक ऋषि ही नहीं बल्कि राष्ट्र ऋषि भी थे”।[6]

स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रमुख रचनाएँ

1. सत्यार्थप्रकाश
2. संस्कृत वाक्य प्रबोध
3. ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका
4. व्यवहारभानु
5. आर्योद्देश्यरत्नमाला
6. गोकरुणानिधि
7. यजुर्वेदभाष्य

आर्य-समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद

आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती हैं जिनकी गणना संसार के महानतम शिक्षकों और उद्धारकों में होती है जिन्होंने संसार के लोगों की अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर जाने में सहायता की। आर्य समाज कोई नया पन्थ, सम्प्रदाय अथवा धर्म नहीं है। उसके प्रवर्तक महषि दयानन्द ने स्पष्टतः कहा है कि आर्य समाज की स्थापना करके उन्होंने कोई नवीन पन्थ नहीं चलाया अपितु प्राचीन वैदिक धर्म, वैदिक संस्कृति, सभ्यता और परम्परा की पुनः स्थापना की है।

उनका उद्देश्य केवल यह था कि समय बीतने के साथ-साथ सच्चे सनातन धर्म और उसके अनुयायियों में जो अवैदिक बातें, अन्ध परम्पराएं, रूढ़ियां और सामाजिक कुरीतियां आ गई हैं उन्हें दूर किया जाय और विशुद्ध वैदिक धर्म जन-साधारण के समक्ष रखा जाय।

इसी कार्य की पूर्त्यर्थमहर्षि दयानन्द ने 1875 ई० में बम्बई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की। उसके बाद स्वयं स्वामी जी ने लाहौर, फ़रूखाबाद, मेरठ, रुड़की, लखनऊ, दिल्ली, अजमेर, आदि में आर्य समाजों की स्थापना की। वह जहां जाते, व्याख्यान देते ओर शास्त्रार्थं करते थे वहीं समाज की स्थापना हो जाती थी। उनके निर्वाण के पश्चात्‌ तो समाजों की स्थापना का तांता ही लग गया|

महर्षि दयानन्द की एक बड़ी विशेषता यह थी कि वह प्रत्येक व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी उन्नति चाहते थे। वह चाहते थे कि व्यक्ति ओर समष्टि केशरीर, मन और आत्मा सब स्वस्थ हों और सब एक ही परिवार के सदस्यों के रूप में प्रभु की छत्रच्छाया में मिलकर प्रेमपूर्वक रहें और एक-दूसरे की उन्नति योगक्षेत्र और रक्षा में योगदान करते रहें। उन्होंने स्वयं इस बात पर बल दिया और बाद में आर्य समाज ने अपने धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक सभी प्रकार के कार्यक्रमों में और सुधारों में इस बात का ध्यान रखकर उसे मूर्तरूप देने का यत्न किया। इस प्रकार आर्यसमाज को विश्व आन्दोलन का रूप मिला। स्वामी जी महाराज मुख्यतः देशवासियों को अपनी तथा देश की हर प्रकार की उन्नति और योगक्षेत्र के लिए आर्य समाज में प्रविष्ट होने और उसके साथ मिलकर काम करने की प्रेरणा दिया करते थे। उन्हें आर्य समाज का भविष्य बड़ा उज्ज्वल दीख पड़ता था और उससे बड़ी-बड़ी आशाएं थीं।

आर्य समाज की आधार-शिला वेद, वैदिक शिक्षाएं शाश्‍वत, वैज्ञानिक, दार्शनिक, सार्वभौम, उदात्त वैदिक सिद्धान्तो से समन्वित सत्यार्थप्रकाश तथा स्वामी जी के उपदेश व मन्तव्य हैं।महर्षि ने वेदों की ओर चलो” का बिगुल बजाया था।

भारत की भाषा, धर्म, संस्कृति, साहित्य, इतिहास, देश-भक्ति आदि को समाप्त करने की दृष्टि से बनाई लार्ड मैकाले की शिक्षा-योजना को विफल कर देश के छात्र-छात्राओं में अपनी भाषा, धर्म, संस्कृति आदि के प्रति अगाध श्रद्धा व स्वाभिमान भरने के लिए महषि की योजनानुसार आर्य समाज ने उत्तर भारत के लगभग सभी प्रान्तों में गुरुकुलों, स्कूलों, कालेजों की स्थापना की। प्रमाण-स्वरूप जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में वहां की गोरी सरकार की रंग-भेद नीति के विरुद्ध सत्याग्रह कर रहे थे तो गुरुकुल कांगड़ी के विद्यार्थियों ने अपने नित्य का घी-दूध त्याग कर और दूधियां बांध पर मजदूरी करके धन जमा किया और गांधी जी की सहायतार्थं भेजा | यही कारण था कि भारत आने पर गांधी जी सर्वप्रथम गुरुकुल कांगड़ी में उन देश भक्त बच्चों को आशीर्वाद देने गये|[7]

आर्य समाज पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध और कट्टरपंथियों के हमलें

कई स्थानों विशेषकर मस्जिदों के सामने आर्य समाज के नगर-कीर्तनों पर ब्रिटिश सरकार ने पाबंदी लगाई हुई थी। साल 1926 में मुरादाबाद और 1930 में पानीपत में इस प्रकार की अन्यायपूर्ण पाबंदियाँ थोपी गई थी।

22 नवंबर 1930 को सहारनपुर के बहादुराबाद में आर्य समाज मंदिर में एक ब्रिटिश अफसर ने जूते पहने कुछ सिपाहियों के साथ जबरदस्ती घुसकर वेदी का अपमान किया और ॐ ध्वज को फाड़ डाला।

ब्रिटिश कालखंड में राजनैतिक और धार्मिक आंदोलनों में जेल गए आर्य सत्याग्रहियों के लिए कारावास में हवन पर प्रतिबंध लगाया हुआ था।

23 दिसंबर 1926 को स्वामी श्रद्धानंद की दिन के चार बजे दिल्ली में अब्दुल रशीद नाम के एक उन्मादी ने हत्या कर दी।

1927-1942 के बीच मुस्लिम षड्यंत्रों के चलते लाहौर में माननीय राजपाल की हत्या और उसके बाद लाहौर में दो अन्य आर्य बंधुओं की हत्या, 1934 में बहराइच के साहू बद्रीशाह की हत्या, कराची के आर्य नेता पंडित नाथुराम की हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने की। अतः आत्मरक्षा के लिए आर्य वीर दल और आर्य रक्षा समिति का गठन किया गया।

हिसार जिले की लौहरु रियासत का शासक एक मुस्लिम था जबकि जनता अधिकांश हिन्दू। साल 1936 और 1940 में दो बार मुस्लिम कट्टरपंथियों ने आर्य समाज के नगर-कीर्तनों पर हमला किया।

सिंध की मुस्लिम लीग सरकार ने 26 अक्टूबर 1944 को सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया।

महर्षि दयानंद के सामाजिक सुधार

स्वामी दयानंद के समय समाज आडम्बरों और विकृतियों से घिरा हुआ था। एक तरफ ब्रिटिश काल की पराधीनता से संघर्ष चल रहा था तो दूसरी ओर समाज को व्यापक सुधार की आवश्यकता थी। स्वामी जी ने सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों का विरोध किया एवं समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया। अपने इस उद्देश्य के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

वैदिक और बौद्धकाल तक भारतीय महिलाओं में पर्दे की प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता।मुगलकाल में पर्दे की प्रथा का चलन हुआ जिसके परिणामस्वरूप महिलायें धीरे-धीरे घर की चार दिवारी में सीमित हो गई। स्वामी जी ने इस समस्या की ओर ध्यान दिया। इसके लिए उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम एवं समारोहों में महिलाओं की भागीदारी पर बल दिया। स्वामी जी के प्रयत्नों से धीरे-धीरे पर्दे की प्रथा से भी स्त्रियों को मुक्ति मिलने लगी।

‘पर्दा प्रथा’ की भाँति ही सती प्रथा के विरुद्ध भी स्वामी दयानंद सरस्वती ने आवाज उठाई। उन्होंने विधवा महिलाओं के जीवन मे प्रकाश की ज्योति जलाई। इसके लिए उन्होंने पुनर्विवाह की व्यवस्था की जिससे विधवा महिलाओं को नवजीवन मिला।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘बाल विवाह’के विरुद्ध भी अभियान चलाया, जिससे समाज को इस कुरीति से मुक्ति मिल सके। सेन्ट्रल असेम्बली में राजस्थान के प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता दीवान बहादुर हरविलास जी शारदा ने तो इसके लिए कानून भी बनवाया था। स्वामी दयानंद का मानना था कि ‘बाल्यावस्था में विवाह से जितनी हानि पुरुष की होती है उससे अधिक महिला की होती है। जैसे कच्चे खेत को काट लेने से अन्न नष्ट हो जाता है, ठीक उसी तरह छोटी आयु में जो अपनी संतानों का विवाह कर देते हैं उनका वंश बिगड़ जाता है’।

स्वामी दयानंद सरस्वती में ‘बहुविवाह’ का भी विरोध किया और एक विवाह के आदर्श सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

महर्षि दयानंद कहते हैं-“जिससे मनुष्य विद्या आदि शुभगुणों की प्राप्ति औरअविद्यादि दोषों को छोड़ के सदा आनन्दित हो सकें, वह शिक्षा कहलाती है”।[8]

गोरक्षा सत्याग्रह

आर्यसमाज के प्रवर्तक महषि दयानन्द ने धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से गोरक्षा पर बड़ा बल दिया है। अपने जीवन काल में उन्होंने तत्कालीन वायसराय और कमाण्डर-इन-चीफ से मिलकर गोवध रोकने की विशेष मांग की थी। “गोकरुणानिधि” पुस्तक लिखकर महर्षिने अपने इस कार्यक्रम के विषय की व्याख्या और पुष्टि की है। आर्यसमाज के विशाल कार्यक्रम में गोरक्षा का विशेष स्थान है।

महर्षि दयानंद लिखते हैं- “देखिये, जो पशु निःसार घास तृण पत्ते फल फूल आदि खावेऔर सार दूध आदि अमृतरूपी रत्न देखें, हल गाड़ी प्रादि में चल केअनेक विध अन्न आदि उत्पन्न कर सबके बुद्धि बल पराक्रम को बढाके नीरोगता करे, पुत्र पुत्री और मित्र आदि के समान मनुष्यों केसाथ विश्वास और प्रेम करें, जहाँ बांधे वहाँ बंधे रहें, जिधर चलावेंविधर चलें, जहां से हटावें वहां से हठ जावे, देखने और बुलाने परसमीप चले आवे, जब कभी व्याघ्रादि पशु वा मारने वाले को देखेअपनी रक्षा के लिये पालन करनेवाले के समीप दौड़ कर आवें कियह हमारी रक्षा करेगा। जिनके मरे पर चमड़ा भी कंटक आदि सेरक्षा करे, जङ्गल में चर के अपने बच्चे और स्वामी के लिये दूध देनेको नियत स्थान पर नियत समय चले आवे, अपने स्वामी की रक्षाके लिये तन मन लगावें, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदिमनुष्यों के सुख के लिये है, इत्यादि शुभगुणयुक्त, सुखकारक पशुओं केगले छुरों से काट कर जो मनुष्य अपना पेट भर, सब ससार कीहानि करते हैं, क्या संसार में उनसे भी अधिक कोई विश्वासघाती,अनुपकारक, दुःख देने वाले और पापी मनुष्य होगे“।[9]महर्षि दयानंद ने ‘गोरक्षकसभासद’ के नियम भी बनाए जिनको उन्होंने अपनी पुस्तक ‘गोकरुणानिधि’ में बताया है।

स्त्री शिक्षा पर बल

स्वामी दयानंद सरस्वती, महिलाओं को शिक्षित करने के प्रबल पक्षधर थे। वैदिक काल में स्त्रियों का स्थान बहुत सम्मानजनक था और उन्हें भी शिक्षा का पूर्ण अधिकार था। हिन्दू धर्म में कोई भी यज्ञ स्त्रियों के बिना पूर्ण नहीं माना जाता था। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में देवताओं के साथ-साथ देवियों का भी उल्लेख मिलता है, जिन्होंने समय-समय पर अपने ज्ञान और शक्ति का परिचय दिया है। बाद में स्त्रियों को बाहर जाने एवं पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे स्त्रियों की स्थिति बदल गई। स्वामी जी ने स्त्रियों को शिक्षा के समान अवसर देने की बात कही। वे स्त्रियों को पुरुषों की भांति सक्षम बनाने के पक्षधर थे। स्वामी दयानंद का मानना है कि वेदाभ्यास एवं शिक्षा द्वारा ही स्त्रियाँ गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियां बन समाज को प्रगति के पथ पर ले जा सकती हैं। महर्षि दयानंद के अनुसार-“विद्या चार प्रकार से आती है आगम, स्वाध्याय, प्रवचन औरव्यवहारकाल”।[10]

‘शुद्धि आंदोलन’ और ‘घर वापसी’ का कार्य

इस्लाम और ईसाइ धर्म मे मतांतरित हिंदुओं का अपने मूल धर्म और समाज मे वापस आने की प्रक्रिया ‘घरवापसी’ के नाम से जानी जाती है। इसी प्रक्रिया को शुद्धि भी कहा जाता है। भारत में रहने वाले अधिकांश मुस्लिमों और ईसाइयों के पूर्वज हिन्दू ही थे। किसी समय भय या धोखे से उन्हें मतांतरित किया गया था। स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज के इस वर्ग की घर वापसी का कदम उठाया और इसके लिए उन्होंने ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया। शुद्धि आंदोलन से समाज को एकजुट करने में व्यापक बल मिला। महर्षि दयानंद ‘धर्म’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं-“धर्म- जिसका स्वरूप ईश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन, पक्षपातरहित न्याय सर्वहित करना है, जो कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों सेसुपरीक्षित और वेदोक्त होने से सब मनुष्यों के लिये एक और माननेयोग्य है, उसको ‘धर्म’ कहते हैं।“[11]

ईसाइयों के षड्यन्त्र का मुकाबला

ब्रिटिश काल में ईसाइयों का घातक अराष्ट्रीय प्रचार प्रछन्न रूप में था पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ कांग्रेस सरकार की तथाकथित धर्म निरपेक्ष नीति का अनुचित लाभ उठाते हुए ईसाई पादरियों ने भारत को “ईसाईस्थान” बनाने का स्वप्न लेना शुरू कर दिया| यूरोप और अमेरिका के साम्राज्यवादी राष्ट्रों ने उन्मुक्त हाथों से इन ईसाई मिशनों की सहायता करनी प्रारम्भ की। इन मिशनों ने भारत के उत्तर-पूर्व प्रदेश, असम, नागालण्ड, मणिपुर, त्रिपुरा और मध्यप्रदेश के भीलों, छोटा नागपुर, उड़ीसा, बिहार व राजस्थान की जन-जातियों तथा अन्य प्रदेशों के पिछड़े वर्गों कोसामूहिक रूप से विधर्मी बनाने पर अपनी शक्ति केन्द्रित करनी प्रारम्भ कर दी। देश में केवल आयंसमाज ही ऐसी संस्था थी जिसने ईसाइयों को इस चनौती का मुकाबला करने का निश्चय किया।

अराष्ट्रीय प्रचार के निरोध का चतु: सूत्री कार्यक्रम

ईसाइयों की अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने और जनमत को जागृत करने के लिए सभा ने बडे पैमानेपर कार्य प्रारम्भ किया। आर्य नेताओं ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, हजारों, लाखों की संख्या में ईसाइयों के कुचक्र से देश को सावधान करने के सम्बन्ध में ट्रेकट हिन्दी अंग्रेजी के अतिरिक्त प्रादेशिक भाषाओं में बांटे गये। इसके अतिरिक्‍त सभा ने निम्न चतुः सूत्री कार्यक्रम निश्चित किया था :-(1) प्रत्येक ग्राम और नगर में आर्य हिन्दुओं की ऐसी समितियां बनाई जाएं जो ईसाइयों की अवांछनीय प्रवृत्तियों पर दृष्टि रखे औरउनके निराकरण का उपाय करें, (2) समूचे देश में उत्तम प्रचारकों का जाल बिछा दिया जाय और ईसाई प्रचार निरोध का संदेश प्रत्येक भारतीय तक पहुंचाया जाय, (3) हिन्दू धर्म के प्रति ईसाइयों के अनर्गल प्रचार का निराकरण और साथ-साथ अस्पृश्यता का निवारण किया जाये, (4) आदिवासी कही जाने वाली जातियों, अरण्यवासी पिछड़ी जातियों में समाज-सुधार, शिक्षा प्रसार, सेवा सहायता के कार्य बड़े प॑माने पर प्रारम्भ किये जाएं और निर्धन बालकों की शिक्षा के लिये मुफ्त पुस्तकें, फीस की छूट, छात्रवृत्ति इत्यादि के रूप में विशेष सहायता दी जाए। स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, वनिता आश्रम आदि की व्यवस्था की जाये| सभा इस कार्यक्रम को क्रियान्वित कर रही है। इस काम पर 40 प्रचारक लगे हुए हैं जिन पर सहस्रों रुपया मासिक व्यय हो रहा है। लगभग 4 लाख शुद्धियां हो चुकी हैं और हजारों भाई विधर्मी बनने से रुक गये हैं। उड़ीसा के पानपोष राउर केला केन्द्र में श्री स्वामी ब्रह्मानन्दजी बड़ा शानदार कार्य कर रहे हैं।[12]

संदर्भ-ग्रन्थ

1. स्मारिका, अन्तर्राष्ट्रीय आर्य समाज स्थापना शताब्दी समारोह, नई दिल्ली
2. विष्णु प्रभाकर, भारतीय साहित्य के निर्माता : स्वामी दयानंद सरस्वती
3. महर्षि दयानंद, आर्योद्देश्यरत्नमाला
4. महर्षि दयानंद, अथ व्यवहारभानुः
5. महर्षि दयानंद, गोकरुणानिधिः

[1]भारतीय साहित्य के निर्माता, स्वामी दयानंद सरस्वती, विष्णु प्रभाकर, साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली, पुनर्मुद्रण, 2002, पृष्ठ 19

[2]महर्षि दयानंद, अथ व्यवहारभानुः, भूमिका से उद्धृत
[3]अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समारोह, स्मारिका दिसम्बर 1975, नई दिल्ली, पृष्ठ 38
[4]अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समारोह, स्मारिका दिसम्बर 1975, नई दिल्ली, शुभकामना संदेश, इन्दिरा गांधी, प्रधान मंत्री भवन, नई दिल्ली
[5]अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समारोह, स्मारिका दिसम्बर 1975, नई दिल्ली, शुभकामना संदेश, जगजीवनराम, कृषि तथा संचाई मंत्री, भारत सरकार
[6]महर्षि दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती पर प्रधानमंत्री जी का सम्बोधन

[7]अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समारोह, स्मारिका दिसम्बर 1975, नई दिल्ली, पृष्ठ 35
[8]महर्षि दयानंद, अथ व्यवहारभानुः, पृष्ठ 126
[9]महर्षि दयानंद, गोकरुणानिधिः, पृष्ठ 25
[10]महर्षि दयानंद, अथ व्यवहारभानुः, पृष्ठ 128
[11]महर्षि दयानंद, आर्योद्देश्यरत्नमाला, पृष्ठ 3
[12]अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समारोह, स्मारिका दिसम्बर 1975, नई दिल्ली, पृष्ठ 19

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में अम्बेडकर आर्ट वर्कशॉप का सफल समापन, उभरते युवा कलाकारों को किया गया सम्मानित

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रायपुर (छत्तीसगढ़): रंगों में उतरे डॉ. अंबेडकर के जीवन-दर्शन और विचारों को रंगों में उतारने के लिए अम्बेडकर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (अम्बेडकर चैंबर) द्वारा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (आई.के.एस.वी.), खैरागढ़ के चित्रकला विभाग के सहयोग से अम्बेडकर आर्ट (पेंटिंग) वर्कशॉप का सफलता आयोजन किया गया। यह कलात्मक पहल 19 जनवरी 2026 को हुई जिसे संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती से जुड़े शैक्षणिक एवं रचनात्मक आयोजनों के अंतर्गत आयोजित किया गया।

इस विशिष्ट कला कार्यशाला में चित्रकला विभाग के 52 विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। विद्यार्थियों ने डॉ. अंबेडकर के जीवन, संघर्ष, दर्शन और संवैधानिक दृष्टि को सशक्त दृश्य अभिव्यक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किए। समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, शिक्षा, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता जैसे विषय को चित्रों में उकेरा गया।

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी और यह एशिया का पहला ऐसा विश्वविद्यालय माना जाता है जो पूर्णतः संगीत, नृत्य, ललित कला और रंगमंच को समर्पित है। अपनी विशिष्ट पहचान और कला शिक्षा में अग्रणी भूमिका के लिए यह विश्वविद्यालय व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है।

प्रतिष्ठित शैक्षणिक एवं संस्थागत नेतृत्व की उपस्थिति

यह कार्यक्रम प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, माननीय कुलपति, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के संरक्षण में आयोजित हुआ, जिन्होंने मुख्य संरक्षक के रूप में उद्घाटन समारोह की शोभा बढ़ाई।

अम्बेडकर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के राष्ट्रीय अध्यक्ष रुसेन कुमारविशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। साथ ही, विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सौमित्र तिवारी ने कार्यक्रम को संस्थागत सहयोग प्रदानकिए।

कार्यक्रम का शैक्षणिक मार्गदर्शन एवं विभागीय समन्वय प्रो. मानस साहू, डीन, दृश्य कला संकाय तथा डॉ. विकास चंद्र, चित्रकला विभाग द्वारा किया गया। विजिटिंग प्रोफेसर संजय कुमार एवं चंदन पी. डेकाटे ने सक्रिय सहयोग किया।

निर्णायक मंडल ने सराही गहराई, मौलिकता और सामाजिक चेतना

चित्रकृतियों का मूल्यांकन प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल द्वारा किया गया, जिसमें डॉ. रवि नारायण गुप्ता, डॉ. छगेंद्र उसेंडी, संदीप किंडो एवं कपिल सिंह वर्मा शामिल थे।

निर्णायक मंडल ने चित्रों में निहित विचारों की गहराई, मौलिकता, तकनीकी दक्षता और विषयगत प्रासंगिकता की सराहना की। मेरिट के आधार पर पाँच विद्यार्थियों का चयन पुरस्कार हेतु किया गया।

अम्बेडकर आर्ट वर्कशॉप के विजेता

1. प्रथम स्थान – श्रेयश त्रिपाठी (एमएफए, प्रथम वर्ष)
2. द्वितीय स्थान – श्रुति साहू (एमएफए, द्वितीय वर्ष)
3. तृतीय स्थान – पुष्पेंद्र कुमार केवट (एमएफए, द्वितीय वर्ष)
4. चतुर्थ स्थान – अनमोल गोयल (एमएफए, प्रथम वर्ष)
5. पंचम स्थान – अंकित कुमार साहू (बीएफए, चतुर्थ वर्ष)
विजेताओं को नकद पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। प्रथम पुरस्कार ₹10,000, द्वितीय ₹7,000, तृतीय ₹5,000, चतुर्थ ₹3,000 तथा पंचम पुरस्कार ₹2,000 का रहा।

कुलपति ने छात्रों से अंबेडकर के मार्ग पर चलने का आह्वान किया

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, माननीय कुलपति, आई.के.एस.वी. ने कहा कि निरंतर प्रयास, अनुशासन और ईमानदारी सफलता की अनिवार्य शर्तें हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने कला क्षेत्र के प्रति समर्पित रहते हुए समाज के लिए सार्थक योगदान देने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा कि अम्बेडकर आर्ट वर्कशॉप केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक गहन शैक्षणिक और सामाजिक पहल है, जो युवा मनों को डॉ. अंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि से जोड़ती है। कला के माध्यम से अंबेडकर को समझने पर छात्र समानता, न्याय, गरिमा और बंधुत्व जैसे मूल्यों को गहराई से आत्मसात करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से शिक्षा को अपनाने, नैतिक साहस विकसित करने, सत्य के पक्ष में खड़े होने और अपनी कला के माध्यम से समाज की आवाज़ बनने का आह्वान किया।

कला, सामाजिक चेतना और आर्थिक सशक्तिकरण का संगम

अम्बेडकर चैंबर के राष्ट्रीय अध्यक्ष रुसेन कुमार ने अपने संबोधन में कला की सामाजिक जिम्मेदारी और डॉ. अंबेडकर के आर्थिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “कला केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं है, यह सामाजिक चेतना की भाषा भी है। यह कार्यशाला युवा कलाकारों को रंगों के माध्यम से डॉ. अंबेडकर के विचारों को समझने और समाज तक पहुँचाने का अवसर देती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि आज के युवा कलाकारों को केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि ‘आर्ट एंटरप्रेन्योर’ बनने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहिए, ताकि वे अपनी कला के माध्यम से पहचान, आजीविका और आर्थिक स्वतंत्रता अर्जित कर सकें। डॉ. अंबेडकर का सपना सामाजिक उत्थान के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण का भी था, क्योंकि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना समानता और गरिमा अधूरी रहती है।

रुसेन कुमार ने कहा कि जब कलाकार अपने कार्य का मूल्य समझता है, उसे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है और नेटवर्क, प्रदर्शनी एवं बाजार के अवसर विकसित करता है, तब वह न केवल अपनी आय बढ़ा सकता है, बल्कि डा. अम्बेडकर के जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाता है।

सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम बनी कला

रुसेन कुमार ने बताया कि अम्बेडकर आर्ट वर्कशॉप को डॉ. अम्बेडकर के प्रति रचनात्मक और बौद्धिक श्रद्धांजलि के रूप में परिकल्पित किया गया था। इसका उद्देश्य युवा कलाकारों को उन विचारों से जोड़ना था, जिन्होंने आधुनिक भारत की मजबूत नींव रखी।

रुसेन कुमार ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन केवल एक ऐतिहासिक यात्रा है जिसमें समानता, न्याय और मानव गरिमा के लिए संघर्ष का जीवंत दर्शन मिलता है। जब उनके विचार शब्दों से आगे बढ़कर रंगों और रेखाओं में उतरते हैं, तब कला एक सामाजिक चेतना का माध्यम बन जाती है। रंगों में उतरे जीवन दर्शन और विचार इसी भावना को अभिव्यक्त करता है, जहाँ युवा कलाकारों ने चित्रकला के माध्यम से अंबेडकर के संघर्ष, संविधान निर्माण की दृष्टि और सामाजिक परिवर्तन के संदेश को सशक्त रूप से प्रस्तुत किए। यह कार्यशाला रचनात्मकता का शानदार मंच बनी और साथ में नई पीढ़ी को अंबेडकर के मूल्यों से जोड़ने वाली एक प्रेरक पहल भी सिद्ध हुई।

उत्साहजनक सहभागिता और उच्च गुणवत्ता को देखते हुए रुसेन कुमार ने कहा कि अम्बेडकर आर्ट वर्कशॉप का आयोजन नियमित रूप से कियाजाना चाहिए, ताकि सामाजिक चेतना से युक्त कला को प्रोत्साहन मिले और उभरते कलाकारों को मंच, पहचान और सम्मान प्राप्त हो सके।

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