टैरिफ के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका से आगे निकलता शेष विश्व

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दिल्ली । दिनांक 20 जनवरी 2025 को डॉनल्ड ट्रम्प अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बनाए गए थे। वर्ष 2024 में ट्रम्प ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव “Make America Great Again” अर्थात “अमेरिका को पुनः महान बनाएं”, नारे के साथ जीता था। वर्ष 2025 का पूरा वर्ष भर पूरे विश्व ने ट्रम्प को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए देखा। लगभग पूरा 2025 का वर्ष ट्रम्प ने विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले उत्पादों के आयात पर टैरिफ लगाते हुए बिताया और मित्र देशों सहित कई देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगाए। ट्रम्प का सोचना था कि टैरिफ को बढ़ाकर वे अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात को कम करेंगे और इससे अमेरिका में ही इन उत्पादों का उत्पादन प्रारम्भ हो जाएगा। ट्रम्प का संभवत: यह सोचना था कि उनका यह प्रयास अमेरिका को महान बनाते हुए शेष विश्व को विपरीत रूप से प्रभावित करेगा। परंतु, वर्ष 2025 में अमेरिका एवं शेष विश्व के आर्थिक क्षेत्र के आंकडें देखने पर ध्यान में आता है कि अमेरिका के मित्र राष्ट्रों सहित विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ का असर अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर लगभग नहीं के बराबर पड़ा है। बल्कि, इसका खामियाजा अमेरिका के नागरिकों को भुगतना पड़ा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में बेतहाशा बृद्धि दर्ज हुई है, इससे मुद्रा स्फीति में वृद्धि तेज हुई है एवं अमेरिकी नागरिकों को विभिन्न उत्पादों को बढ़ी हुई कीमतों दरों पर खरीदना पड़ रहा है। अमेरिकी नागरिक पिछले 5 वर्षों की तुलना में आज खाद्य सामग्री पर 30 प्रतिशत अधिक खर्च कर रहे हैं। अमेरिका में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें 22 प्रतिशत से बढ़ चुकी हैं। खाद्य पदार्थों एवं मकान की कीमतों में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर भी 3 से 4 प्रतिशत के बीच बनी हुई है, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में बहुत अधिक है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ से परेशान हो रहा है अमेरिकी नागरिक, न कि अन्य कोई देश। श्री रुचिर शर्मा, भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक एवं फायनैन्शल टाइम्स के स्तम्भ लेखक, ने अपने एक साक्षात्कार में कई आंकडें दिए हैं, जिनका प्रयोग इस लेख को तैयार करने में किया गया है।

अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के पश्चात अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कम होती हुई दिखाई दे रही है। वर्ष 2024 में अमेरिका में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2.8 प्रतिशत की रही थी जो वर्ष 2025 में घटकर 2.1 प्रतिशत हो गई। जबकि वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर दोनों वर्षों, 2024 एवं 2025, में 2.8 प्रतिशत बनी रही है। वर्ष 2025 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में किसी प्रकार की कमी दृष्टिगोचर नहीं हुई है। भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2024 में वृद्धि दर, 6.5 प्रतिशत की रही थी, जो वर्ष वर्ष 2025 में बढ़कर 7.2 प्रतिशत की हो गई। वर्ष 2024 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से 52 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही थी जबकि वर्ष 2025 में 76 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति सकल उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका की तुलना में अधिक रही है। वर्ष 2025 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक विकास दर तेज गति बढ़ती हुई पाई गई है। इस प्रकार, अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के बावजूद शेष विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर अमेरिका से अधिक रही है। इस प्रकार अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ का प्रभाव अन्य देशों के विकास पर विपरीत रूप से नहीं पड़ा है।

अमेरिका के पूंजी (शेयर) बाजार में भी वर्ष 2025 में निवेशकों को अपने निवेश पर कम आय प्राप्त हुई है। अमेरिका में निवेशकों द्वारा पूंजी (शेयर) बाजार में किए गए निवेश पर 18 प्रतिशत की आय का अर्जन हुआ है। जबकि, यूरोप में निवेशकों को 35 प्रतिशत, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में निवेशकों को 34 प्रतिशत, अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व में निवेशकों को 32 प्रतिशत एवं चीन में निवेशकों को 31 प्रतिशत की आय अर्जित हुई है। इस प्रकार, अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में पूंजी (शेयर) बाजार में निवेशकों को लगभग दुगनी आय अर्जित हुई है। अमेरिकी नागरिकों का पूंजी (शेयर) बाजार में निवेश तुलनात्मक रूप से अधिक है। अमेरिकी नागरिकों का जायदाद में निवेश 30 प्रतिशत है जबकि शेयर बाजार में 32 प्रतिशत निवेश है। चीन के नागरिकों का जायदाद में निवेश 55 प्रतिशत एवं शेयर बाजार में निवेश केवल 11 प्रतिशत है। इसी प्रकार, यूरोप के नागरिकों का निवेश क्रमश: 57 प्रतिशत एवं 16 प्रतिशत है। भारतीय नागरिकों के निवेश क्रमश: 50 प्रतिशत एवं 7 प्रतिशत है।

अमेरिका द्वारा अन्य देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर लगाए गए टैरिफ के चलते अमेरिका का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के सकल घरेलू उत्पाद के 6.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2025 में 6 प्रतिशत हो गया है। एक रीसर्च प्रतिवेदन में यह तथ्य उभरकर भी सामने आया है कि टैरिफ के कारण अमेरिका में उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हुई है एवं टैरिफ का लगभग 96 प्रतिशत भाग अमेरिकी नागरिकों द्वारा वहन किया गया है। इसके कारण अन्य देशों से अमेरिका को निर्यात कम नहीं हुए हैं। यूरोप का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 3.1 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 3.2 प्रतिशत हो गया है। उभर रही अर्थव्यवस्थाओं का राजकोषीय घाटा वर्ष 2024 के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया है। पूर्व में विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा लगभग 3 प्रतिशत तक रहता आया है जबकि वर्तमान परिस्थितियों के मध्य, विभिन्न देशों का राजकोषीय घाटा बढ़ते हुए 6 प्रतिशत के स्तर तक रहने लगा है। यह स्थिति वित्तीय क्षेत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

वर्ष 2025 में विदेशी व्यापार में वृद्धि दर भी अमेरिका की तुलना में अन्य देशों में अधिक रही है। अमेरिका को छोड़कर शेष विश्व के निर्यात में वर्ष 2019 से 2024 के दौरान औसत 5 प्रतिशत की वृद्धि रही थी जो वर्ष 2025 में बढ़कर 6.4 प्रतिशत की हो गई है। जबकि अमेरिका से निर्यात में वृद्धि दर इसी अवधि के दौरान 4.6 प्रतिशत से गिरकर 4.1 प्रतिशत रह गई है। टैरिफ का अमेरिका से अन्य देशों को होने वाले निर्यात पर विपरीत प्रभाव पड़ा है जबकि अन्य देशों ने आपस में नए बाजारों की तलाश करते हुए अपने विदेशी व्यापार, विशेष रूप से निर्यात, में वृद्धि दर्ज की है। कई देशों ने आपस में मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इससे भी विभिन्न देशों के बीच विदेशी व्यापार में वृद्धि दर्ज हुई है। अमेरिका से अन्य देशों को निर्यात के कम होने के चलते अमेरिका में चालू व्यापार खाता घाटा 1.3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका में आज भी उत्पादन की तुलना में उपभोग बहुत अधिक मात्रा में हो रहा है।

अमेरिका की टैरिफ नीति के चलते अमेरिका पुनः महान (MAGA) बनता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। परंतु, विश्व के अन्य कई देश जरूर महान बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अतः टैरिफ का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभवित करता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि विश्व में अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार, ट्रम्प इस धरा को महान बनाने (Make Earth Great Again – MEGA) में अपना योगदान करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर विपरीत परिस्थितियों के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। भारत का राजकोषीय घाटा प्रति वर्ष लगातार कम हो रहा है। यह वर्ष 2024 में 5.5 प्रतिशत था, जो वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत हो गया एवं अब वर्ष 2026 में घटकर 4.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत को यदि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बनाना है तो हमें भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 12 से 14 प्रतिशत वृद्धि के स्तर को प्राप्त करना होगा, जैसा कि चीन ने लम्बे समय तक अपनी अर्थव्यवस्था को इस दर पर आगे बढ़ाने में सफलता अर्जित की थी। सकल घरेलू उत्पाद में यह महत्वाकांक्षी वृद्धि दर हासिल करना कोई असम्भव कार्य नहीं है। अमेरिका यदि भारत का सहयोग करने को तैयार नहीं है तो भारत को अन्य बाजार तलाशते हुए विभिन्न उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना होगा। आज भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है, जबकि उत्पादों के निर्यात को भी आज तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत द्वारा निर्यात के सामर्थ्य का उपयोग बहुत कम स्तर पर किया है।

भारत निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर

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दिल्ली । भारत को निम्न आय श्रेणी में से वर्ष 2007 में निम्न मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने में 60 वर्ष का समय लगा था। भारत में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) वर्ष 1962 में 90 अमेरिकी डॉलर थी जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी प्रकार, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के वर्ष 2007 में एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 60 वर्ष लग गए थे। आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2014 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। पुनः आगामी 7 वर्षों में अर्थत वर्ष 2021 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। परंतु, आगामी केवल 4 वर्षों में अर्थत वर्ष 2025 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। एक अनुमान के अनुसार, आगामी केवल 2/3 वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा। वर्ष 2009 में भारत को प्रति व्यक्ति आय 1,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 62 वर्षों का समय लगा था। परंतु, आगामी केवल 10 वर्षों में, अर्थात वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2,000 अमेरिकी डॉलर हो गई। अब आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2026 में भारत में प्रति व्यक्ति आय के 3,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके भी आगे जाकर, केवल 4 वर्ष पश्चात अर्थात वर्ष 2030 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 4,000 अमेरिकी डॉलर हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसी के चलते वर्ष 2030 तक भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस श्रेणी में आज चीन एवं इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं।

किसी भी देश को उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने के लिए उस देश में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 13,926 अमेरिकी डॉलर (आज की परिभाषा के अनुसार) के स्तर पर पहुंच जानी चाहिए। इसके बाद उस देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में भी शामिल कर लिया जाता है। इस दृष्टि से भारत को यदि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो भारत में सकल घरेलू उत्पाद में संयुक्त रूप से 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होना चाहिए, यह वृद्धि दर हासिल करने योग्य है क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में औसत संयुक्त वृद्धि दर पिछले 23 वर्षों के दौरान (वर्ष 2001 से वर्ष 2024 के बीच) 8.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही है। इससे स्पष्ट है कि भारत आगामी कुछ वर्षों में ही प्रति व्यक्ति औसत आय 4,500 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए उच्च मध्यम आय श्रेणी के क्लब में शामिल हो जाएगा। इसके बाद भारत को वर्ष 2047 में उच्च आय श्रेणी के क्लब में शामिल होने के लिए प्रति व्यक्ति आय को 18,000 अमेरिकी डॉलर (उस समय की परिभाषा के अनुसार) के स्तर को पार करना होगा, इसके लिए आगामी 23 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय के स्तर में संयुक्त रूप से 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। यह लक्ष्य भी बहुत कठिन नहीं हैं, यदि इस संदर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मिलकर इस प्रकार की आर्थिक नीतियां बनाई जाती हैं जिससे गरीब से गरीब नागरिक तक इन आर्थिक नीतियों के लाभ को पहुंचाया जा सकता हो ताकि इस वर्ग के नागरिकों का आर्थिक विकास भी सम्भव हो सके।

वैश्विक स्तर पर कुल 139 विकासशील एवं उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से केवल 6 देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत की तुलना में तेज गति से आर्थिक विकास करने में सक्षम हुई हैं। परंतु, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर आज भी सबसे अधिक बनी हुई है। दरअसल, छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा होता है अतः प्रतिशत के आकलन में यह देश भारत की आर्थिक विकास की दर से कुछ आगे निकल जाते हैं परंतु जैसे जैसे सकल घरेलू उत्पाद का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कुछ कम दिखाई देने लगती है।

विश्व बैंक द्वारा समय समय पर विश्व के समस्त देशों को इन देशों में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के स्तर के आधार पर निम्न आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय एवं उच्च आय के श्रेणी में विभाजित किया जाता है। वर्ष 1990 में पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में 51 देश शामिल किए गए थे, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में 56 देश शामिल थे, प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में 29 देश शामिल थे एवं प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में 39 देश शामिल थे। विश्व बैंक द्वारा ही वर्ष 2024 में किए गए एक आंकलन के अनुसार पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 26 हो गई एवं प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में देशों की संख्या में भी गिरावट दृष्टिगोचर हुई है और इस श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 50 हो गई है। जबकि प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल देशों की संख्या बढ़कर 54 हो गई है। परंतु प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में तो देशों की संख्या और भी तेज गति से बढ़कर 87 के स्तर पर पहुंच गई है। इस संदर्भ में 2 उदाहरण दिये जा सकते हैं कि किस प्रकार प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने वाले देशों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

चीन, वर्ष 1990 में 330 अमेरिकी डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न आय श्रेणी के देशों में शामिल था, परंतु वर्ष 1999 में चीन में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 860 अमेरिकी डॉलर हो गई एवं चीन निम्न मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। आगे चलकर वर्ष 2010 में, चीन के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 4,410 अमेरिकी डॉलर हो गई और इस प्रकार चीन उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। वर्ष 2007 में चीन में प्रति व्यक्ति आय 2,555 अमेरिकी डॉलर की रही थी, जबकि भारत में प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2023 में 2580 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच सकी है। दरअसल, भारत में आर्थिक विकास की लगातार तेज गति वास्तविक रूप में वर्ष 2014 से ही प्रारम्भ हुई है। इसी प्रकार, गयाना जैसे छोटे राष्ट्र में वर्ष 1997 में प्रति व्यक्ति आय 390 अमेरिकी डॉलर की थी और गयाना निम्न आय श्रेणी में शामिल था, वर्ष 2015 में गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 5,530 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई और गयाना उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल हो गया। परंतु इसमें बाद वर्ष 2022 में तो गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 20,140 के स्तर पर पहुंच गई और आज गयाना उच्च आय श्रेमी में शामिल हो चुका है। अतः भारत को उच्च आय श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनी आर्थिक विकास दर को और अधिक गति देनी होगी।

जैसा कि ऊपर के पैरा में वर्णन किया गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया ही नहीं गया था। सकल घरेलू उत्पाद के स्तर की दृष्टि से वर्ष 1990 में पूरे विश्व में भारत का 14वां स्थान था, जबकि वर्ष 2025 में भारत पूरे विश्व में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है एवं शीघ्र ही आने वाले 2/3 वर्षों भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसी प्रकार भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार भी वर्ष 2027/28 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा तथा वर्ष 2035/36 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय नागरिकों को इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज को दिए गए पंच परिवर्तन कार्यक्रम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पंच परिवर्तन कार्यक्रम में जिन 5 बिंदुओं को शामिल किया गया है, वह निम्नप्रकार हैं – प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए अनुशासन में रहना, ताकि पुरे विश्व में भारत की साख को बढ़ाया जा सके। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की दृष्टि से स्वदेशी के उपयोग को बढ़ावा देना एवं अपने आप में “स्व” के भाव को विकसित करना। समाज के समस्त वर्गों को आपस में भाईचारा स्थापित करना ताकि वे भारत के विकास में शांतिपूर्वक अपना प्रबल योगदान दे सकें। भारत में पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने की महती आवश्यकता है, प्रकृति का शोषण नहीं करते हुए प्रकृति का पोषण करना भी सीखें। पूरे विश्व में केवल भारत में ही बहुत बड़े स्तर पर संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है और यह व्यवस्था केवल भारत को ही ईश्वर का वरदान माना जाता है। इस व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने के लिए कुटुम्ब प्रबोधन की गतिविधियों को समस्त परिवारों में बढ़ावा देना होगा। कुल मिलाकर, भारतीय समाज यदि एकजुट होकर देश को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाना चाहता है तो यह कार्य कोई मुश्किल भी नहीं है। संघ द्वारा दिए गए उक्त वर्णित पंच परिवर्तन के कार्यक्रम को लागू कर मां भारती को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

Announcements at Wings India 2026 in the presence of Hon’ble Minister of Civil Aviation Shri Rammohan Naidu

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1. Air India – Boeing

Air India, India’s leading global airline with an Indian heart which is taking big, bold steps to not only build an airline that India deserves, but also building the Indian aviation ecosystem. You can see the brand new B787-9 right outside.
Today Air India is announcing that it has ordered 30 more fuel-efficient narrowbody jets from Boeing, expanding its total aircraft order to 600 aircraft.

In addition to this, Air India has also signed a multi-year agreement with Boeing Global Services for its Component Services Program, encompassing the airline’s entire Boeing 787 fleet, both existing aircraft and those on order.

2. Air India – Airbus

Air India and Airbus have signed a contract whereby, Airbus will convert 15 A321neo aircraft ordered by Air India to the advanced Airbus A321 XLR, which is the Extra Long Range variant of the A320 family. These fuel efficient aircraft will enable Air India to open new non-stop international routes, benefitting passengers from India and those wanting to travel to India and beyond. We request Campbell Wilson, CEO & MD, Air India and Juergen Westermeier, President & MD of Airbus India & South Asia to exchange the documents for the same.

3. Sakthi Group and Omnipol MoU exchange
Sakthi Group and Omnipol are pleased to announce the signing of a Memorandum of Understanding to bring the globally proven L410 NG 19-seater aircraft to India, including the assessment of modalities for setting up a final assembly line in the country.

4. PHL – HAL
A proud and significant milestone for the Indian civil aviation industry as we are delighted to announce that HAL has successfully executed a contract with Pawan Hans for the supply of 10 Dhruv Next Generation (NG) helicopters, an achievement that heralds a new chapter in the growth and evolution of the Indian helicopter industry.

By demonstrating confidence in indigenous platforms for critical civil aviation roles, the partnership between HAL and Pawan Hans sets a strong precedent and paves the way for expanded acceptance of Indian-built helicopters both at home and internationally.

This marks a proud moment for two CPSEs of the Government of India, with the agreement being exchanged by their respective CMDs.

5. AAI MoU

Today marks a defining moment in India’s nation-building journey. With 1,400 International Aviation Professionals across 120 countries and 173 IAPs in India, we’re proud to be part of the global aviation community. The Airports Authority of India has signed a significant agreement with Airports Council International (ACI) for the Airports Management Professional Accreditation Program (AMPAP). This program will empower aviation leaders with the coveted International Aviation Professional (IAP) salutation upon completion.

Over the next five years, AAI will impart AMPAP training to over 115 more aviation professionals, creating a talent pipeline of globally deployable professionals who will drive innovation and excellence in the industry. This initiative will position India as a trusted leader in global aviation, shaping the future of our nation.

Shri Vipin Kumar IAS, Chairman AAI, and Shri Gurjit Gill, Director Global Airports Council International & ICAO exchangedcopies of the agreement.

6. FICCI – KPMG Knowledge Report Release

India’s aviation is in a remarkable phase of growth, one that will fuel economy, strengthen trade and tourism, and create high‑value employment on the path to Viksit Bharat @ 2047. The KPMG‑FICCI thought leadership report, Paving the Future of Aviation in Viksit Bharat @ 2047, outlines how India can seize this moment and transform from being one of the world’s largest aviation markets to becoming a global leader across the entire aviation ecosystem.

The report outlines nine strategic themes that will convert India’s scale into lasting global competitiveness.

Shri Sandeep Paidi, Managing Partner (Hyderabad) and Shri Jodhbir Sachdeva, Associate Partner (Aviation) from KPMGwere present

गांधी की ‘अंतिम इच्छा’ को क्या साकार कर रहा है आरएसएस

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दिल्ली। क्या आप जानते हैं, स्वतंत्र भारत के निर्माण के समय महात्मा गांधी ने एक ऐसा सपना देखा था, जो आज भी अधूरा है। 27 जनवरी 1948 को, अपनी हत्या से महज तीन दिन पहले, उन्होंने एक नोट में लिखा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। अब इसे राजनीतिक संगठन के रूप में भंग कर देना चाहिए और यह ‘लोक सेवक संघ’ हो जाए-एक ऐसा संगठन जो सत्ता की प्रतिस्पर्धा से दूर रहकर जनसेवा, सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता और नैतिक उत्थान पर केंद्रित हो। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कांग्रेस ” It must be kept out of unhealthy competition with political parties and communal bodies. For these and other similar reasons, the A.I.C.C. resolves to disband the existing Congress organization and flower into a Lok Sevak Sangh under the following rules with power to alter them as occasion may demand. . “। उन्होंने इसे ‘His Last Will and Testament’ के रूप में प्रस्तुत किया, जो उनकी हत्या से एक दिन पहले 29 जनवरी 1948 को हरिजन में प्रकाशित हुआ। अगले दिन 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या के बाद यह इच्छा अनसुनी रह गई। कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी संभाली और गांधीजी के सपने को राजनीतिक महत्वाकांक्षा में बदल दिया।

आज, जब हम गांधीजी के इस अंतिम संदेश को याद करते हैं, तो एक सवाल उठता है—क्या कोई संगठन उनके लोक सेवक संघ के विचार को वास्तविकता में जमीन पर उतार सकता है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यों पर नजर डालें तो कई पहलुओं में यह गांधीजी के उस सपने से मेल खाता नजर आता है।

आरएसएस एक गैर-राजनीतिक, स्वयंसेवी संगठन है, जो अनुशासन, राष्ट्रसेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आपदा राहत पर जोर देता है। कोरोना महामारी के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवकों ने बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के लाखों लोगों को भोजन, ऑक्सीजन और चिकित्सा सहायता पहुंचाई। प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, स्वच्छता अभियान, सामाजिक सद्भाव और युवाओं में राष्ट्रभक्ति का प्रसार-ये सभी प्रयास गांधीजी के उस विचार से जुड़ते हैं जिसमें उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से अलग कर एक सेवा-केंद्रित सामाजिक संगठन बनाने की बात कही थी।

गांधीजी ने लोक सेवक संघ को स्वयंसेवी आधारित, गांव-केंद्रित और नैतिक मूल्यों पर टिका हुआ बताया था। आरएसएस की शाखाएं, सेवा कार्य और संगठनात्मक संरचना इस दिशा में एक व्यावहारिक रूप दिखाती है। हालांकि गांधीजी और आरएसएस के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं—खासकर अहिंसा, अल्पसंख्यक सुरक्षा और समावेशिता पर—लेकिन उनके अंतिम नोट को यदि मूल रूप से देखें, तो आरएसएस जैसा संगठन सत्ता-मुक्त सेवा के उनके सपने के करीब दिखता है। जहां कांग्रेस ने गांधीजी की इच्छा को नजरअंदाज कर परिवार-केंद्रित राजनीति अपनाई, वहीं आरएसएस ने सत्ता से दूरी बनाकर लोक-सेवा का मार्ग चुना।

दूसरी ओर, कांग्रेस की यात्रा गांधीजी के सपने से पूरी तरह विपरीत रही। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता की लालसा में आंतरिक लोकतंत्र और नैतिकता को ताक पर रख दिया। गांधीजी की हत्या के बाद सुरक्षा में लापरवाही के सवालों पर कोई गंभीर जांच नहीं हुई। 20 जनवरी 1948 को उन पर पहले हमला हुआ था, फिर भी 30 जनवरी को सुरक्षा इतनी ढीली क्यों रही-इस पर मीडिया और कांग्रेस ने चुप्पी साध ली। महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों पर हुए हमलों और नरसंहार पर भी कांग्रेस सरकार से कोई सवाल जवाब नहीं हुआ। आरएसएस पर गांधी हत्या की सारी जिम्मेवारी डाल कर, केन्द्र में मौजूद उस समय की कांग्रेस सरकार को सभी तरह की जवाबदेही से मीडिया ने मुक्त कर दिया।

कांग्रेस शासनकाल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के संरक्षण में रहा। इमरजेंसी (1975-77) के दौरान सेंसरशिप के बावजूद कांग्रेस-अनुकूल पत्रकारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। नीरा राडिया टेप्स कांड में प्रमुख पत्रकारों के नाम आए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 1984 के सिख नरसंहार में कांग्रेस सरकार थी, लेकिन मीडिया ने पार्टी नेताओं से कड़े सवाल नहीं पूछे। बोफोर्स घोटाले में भी कई पत्रकारों ने इसे दबाने की कोशिश की। राजीव शुक्ला जैसे पत्रकारों ने स्वीकार किया कि कांग्रेस की आलोचना करने पर राजीव गांधी ने तारीफ की, क्योंकि इससे एक कांग्रेसी पत्रकार, निष्पक्ष दिखता था और उसकी विश्वसनीयता बढ़ती थी- और पार्टी को भी उनकी कांग्रेस-निष्ठा पर कभी संदेह नहीं हुआ। सुप्रिया श्रीनेत जैसे उदाहरण भी इसी इकोसिस्टम को दर्शाते हैं, जहां राजनीतिक कनेक्शन से पत्रकारिता में अच्छी नौकरी आसानी मिलती रही।

2014 के बाद कई पत्रकार खुद को ‘विपक्ष की भूमिका’ में देखने पर जोर देते दिखाई देते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया को सत्ता के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस की सरकारों के समय से आज तक ये पत्रकार महात्मा गांधी की अंतिम इच्छा या उनकी सुरक्षा में हुई लापरवाही पर कोई सवाल नहीं उठा पाते हैं? फिर भी चाहते हैं कि इन्हें निष्पक्ष माना जाए!

भाजपा के खिलाफ तो दशकों से एक मजबूत विरोध की दीवार खड़ी की गई थी। उसकी साम्प्रदायिक और बनिया ब्राम्हणों की पार्टी की छवि देश भर में मीडिया ने ही बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ ‘नियंत्रित आलोचना’ की नीति पर मीडिया काम कर रहा था। इसलिए सोनिया गांधी को लेकर मीडिया में आलोचना के तेवर हमेशा सुस्त रहे। याद है ना, कैसे जेवियर मोरो की द रेड साड़ी भारत में प्रतिबंधित कर दी गई लेकिन मीडिया ने इसकी खबर कानों कान किसी को नहीं होने दी।

आज पूरे देश के सामने यह बड़ा सवाल है—क्या महात्मा गांधी का सपना राजनीतिक दलों की सत्ता की लालच में कहीं खो गया? या फिर लोक-सेवा के रास्ते पर कोई संगठन आज भी उस सपने को जिंदा रख सकता है?

आरएसएस का कामकाज इस दिशा में एक संभावना जरूर दिखाता है। ऐसे समय में कांग्रेस को गंभीर आत्मचिंतन करना होगा-क्या वह वाकई महात्मा गांधी के सच्चे उत्तराधिकारी है, या उनके सपनों को अनदेखा करने वाली राजनीतिक पार्टी?

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