UGC के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, अब 19 मार्च को सुनवाई, पक्षकारों से CJI ने पूछे तीखे सवाल

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डॉ. करुणा शंकर 

दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल ही में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026′ का नियम 3 (सी) ‘गैर-समावेशी” है, जो छात्र और शिक्षक आरक्षित श्रेणियों के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई 19 मार्च को होगी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि फिलहाल यूजीसी का 2012 का रेगुलेशन ही जारी रहेगा। इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों से कई तीखे सवाल भी पूछे। सीजेआई ने पूछा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके है और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? मामले पर सनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां इस प्रकार हैं-

यूजीसी के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई।

सुनवाई के दौरान क्या हुई बहस
सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ मामले पर आज सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हम यूजीसी के रेगुलेशन के सेक्शन 3 c को चैलेंज कर रहे जिसमें जातिगत भेदभाव की बात की गई है। उन्होंने कहा कि जो परिभाषा रेगुलेशन में भेदभाव की दी गई है वो पूरी तरह से सही नहीं है। संविधान के विपरीत है। संविधान के मुताबिक भेदभाव देश के सभी नागरिकों से जुड़ा है। लेकिन यूजीसी का कानून सिर्फ विशेष वर्ग के प्रति भेदभाव की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो भी आदेश दिया है ये उस भावना के खिलाफ है। इससे समाज में वैमनस्य बढ़ेगा। ये संविधान में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा?
इस पर CJI ने पूछा कि अगर दक्षिण भारत के किसी छात्र को उत्तर भारत के विश्विद्यालय में एडमिशन मिलता है, उस पर टिप्पणी होती है तो क्या यूजीसी का रेगुलेशन से उसे न्याय मिलेगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इसके लिए अलग से प्रावधान है किसी के जन्मस्थान के आधार पर अगर भेदभाव होता है तो उस पर एक्शन लिया जा सकता है।

रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए?
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, यूजीसी के नियम से रैगिंग के रूल क्यों हटाए गए? यूजीसी का नया नियम प्रगतिवादी ने होकर हमें पीछे ले जा रहा है। कल कोई फ्रेशर लड़का जो सामान्य जाति से आता है, वो पहले ही दिन अपराधी बनकर जेल के पीछे चला जाएगा। ऐसा अंदेशा है। इसे लेकर CJI ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं.और अब क्या इस नए कानून से पीछे की ओर जा रहे हैं? याचिकाकर्ता ने यूजीसी के रेगुलेशन को समाप्त किए जाने की मांग की और इस पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की। याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर हमें इजाजत मिले तो इससे बेहतर रेगुलेशन बनाकर दें।

29 जनवरी 1528 : चंदेरी में बाबर का विध्वंस : 1500 क्षत्राणियों के साथ महारानी मणिमाला का जौहर

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-रमेश शर्मा

भोपाल । भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने रक्त से ऐसी रंजित घटनाओं से भरे हैं जिनका विवरण आज भी रोंगटे खड़े देता है । ऐसा ही एक विवरण चंदेरी का है जहाँ लाशों के ढेर लगाकर आक्रांताओं ने अट्टास किया ।

मध्यप्रदेश में ग्वालियर संभाग के अंतर्गत अशोक नगर जिले में स्थित है। यह वही चंदेरी है जो पूरे संसार में अपनी साड़ियों की शिल्पकला के लिये प्रसिद्ध है । उन दिनों भी यह वस्त्र कला निर्माण ही नहीं व्यवसाय का भी एक बड़ा केन्द्र था । चंदेरी में यह विध्वंश मुगल हमलावर बाबर ने किया था । बाबर ने चंदेरी में केवल विध्वंस ही नहीं किया था बल्कि जिन सैनिकों और नागरिकों को जान बख्शी का आश्वासन देकर समर्पण कराया था उन सब बंदियों के शीश काटकर ऊँचा पहाड़ बनाया था। फिर कटे हुये असंख्य शीश के उस पहाड़ पर अपनी जीत का झंडा फहराया था । निर्दोष स्त्री बच्चों को पकड़ कर गुलाम बनाया था, अत्याचार किये थे और कुछ को गुलामों के बाजार में बेचने के लिये खुरासान भेज दिया था और इसी विध्वंस के बीच अपने स्वत्व की रक्षा केलिये महरानी मणिमाला ने 1500 क्षत्राणियों तथा अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया था। इस जौहर की स्मृति को एक स्मारक के रूप में चंदेरी किले में सहेज लिया गया है । इस स्मारक पर पहुँचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, शरीर में सिरहन भी पैदा होती हैं ।

यह युद्ध वर्ष 1528 जनवरी के अंतिम सप्ताह में हुआ था । किसी विश्वासघाती द्वारा चंदेरी दरबाजा खोलने की तिथि 28 और 29 जनवरी के बीच की रात है । रात भर वीरों का खून बहा, स्त्रियों की चिता जली, इसलिये कुछ इतिहासकारों ने विध्वंस की तिथि 28 जनवरी मानी और कुछ ने 29 जनवरी 1528 माना ।

उन दिनों चंदेरी पर प्रतिहार वंशीय शासक मेदनीराय का शासन था । अंतराष्ट्रीय रेशम के व्यापार का बड़ा केन्द्र के रूप में भी चंदेरी की ख्याति रही है । मेदिनीराय अपनी सेना लेकर चितौड़ के शासक राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने के लिये खानवा के मैदान में गये थे। चित्तौड से कुछ रिश्तेदारियाँ भी थीं। राणा साँगा मेदनीराय को पुत्रवत् मानते थे । दुर्योग से खानवा के युद्ध में राणाजी की पराजय हुई । इस युद्ध में राणा जी की हार के दो कारण रहे एक तो उनकी सेना में

विश्वासघात और दूसरा बाबर ने अपने तोपखाने के आगे गायों को बाँध कर खड़ा कर दिया था । गायों को सामने देखकर राणाजी का तोपखाना रुक गया । बाबर की रणनीति काम आई । बाबर का तोपखाना गरज उठा और युद्ध का नक्शा ही बदल गया । राणा जी के घायल होकर निकल जाने के बाद बाबर ने अपनी जीत का जश्न मनाया । बाबर ने उन सभी राजपूत राजाओं के दमन का अभियान चलाया जो राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने खानवा पहुँचे थे । इनमें मेदिनीराय का नाम प्रमुख था । खानवा युद्ध के बाद मेदिनी राय चंदेरी लौट आये और राणा जी के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करने लगे ।

चंदेरी अभियान के लिये बाबर 9 दिसम्बर 1527 को सीकरी से रवाना हुआ । इसकी खबर मेदिनी राय को लग लग गयी थी उन्होंने सहायता के लिये मालवा के अन्य राजाओं को संदेश भेजे और आवश्यक सामग्री एकत्र करके स्वयं को किले में सुरक्षित कर लिया था। चंदेरी का यह किला पहाड़ी पर बना है । इसकी गणना देश के अति सुरक्षित किलों में की जाती है । बाबर और उसकी फौज रास्ते भर लूट हत्याएँ और बलात्कार करती हुई आगे बढ़ी और 20 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुँची ।

बाबर ने रामनगर तालाब के पास अपना कैंप लगाया और दो संदेश वाहक शेख गुरेन और अरयास पठान को राजा मेदिनी राय के पास भेजा । संदेश वाहकों ने तीन संदेश दिये एक मुगलों की आधीनता स्वीकार करो और मुगलों के सूबेदार बनों दूसरा चंदेरी का किला खाली करदो इसके बदले कोई दूसरा किला ले लो और तीसरा रनिवास एवं मालखाने का पूर्ण समर्पण । स्वाभिमानी मेदनी राय ने शर्तों को अस्वीकार कर दिया । मेदिनी राय को लगता था कि बाबर की फौज पहाड़ी न चढ़ पायेगी । लेकिन बाबर के पास तोपखाना और बारूद का पर्याप्त भंडार था । उसने पहाड़ी काटकर रास्ता बना लिया था और किले के दरबाजे तक आ गया । दूसरी तरफ राजपूतों के पास न बारूद था न तोपखाना । उनके पास तीर कमान, तलवार, भाला या आग के गोलों के अतिरिक्त कुछ नहीं था । वह 26 जनवरी 1528 की तिथि थी जब समर्पण के लिये बाबर का अंतिम संदेश राजा मेदिनीराय को मिला । संदेश पाकर राजा ने रणभेरी बजाने का आदेश दिया । 27 जनवरी से युद्ध आरंभ हुआ पर मुगलों के तोपखाने के सामने राजपूत सेना कमजोर पड़ी । बाहर घेराबंदी भी तगड़ी थी । राजा घायल हो गये उन्हे किले के भीतर लाकर पुनः किले के द्वार बंद कर दिये गये । 28 जनवरी को दिन भर बाबर का तोपखाना चंदेरी किले दीवार पर गरजता रहा । दीवार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी ।

 

महारानी मणिमाला को भविष्य का अंदाजा हो गया । उन्होंने जौहर करने का निर्णय लिया । वे किले के भीतर विराजे महाशिव के मंदिर में चली गई । उनके साथ राज परिवार और किले एवं नगर की अन्य स्त्रियाँ भी थीं। जिनकी संख्या 1500 से अधिक लिखी है । सभी स्वाभिमानी स्त्रियों ने पहले शिव पूजन किया फिर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया । यह जौहर 28 और 29 जनवरी की मध्य रात्रि से आरंभ हुआ । जिस समय ये देवियाँ जौहर कर रहीं थी तभी किसी विश्वासघाती ने किले का दरबाजा खोल दिया । मुगलों की फौज भीतर आ गयी । किले के भीतर यूँ भी मातम जैसा माहौल था । जिसके हाथ में जो आया उससे मुकाबला करने लगा । पर यह युद्ध नाममात्र का रहा । रातभर मारकाट हुई । हमलावरों ने किले के भीतर किसी पुरूष को जीवित न छोड़ा । जो स्त्रियाँ जीवित मिलीं उन्हें और बच्चों बंदी बना लिया गया । 29 जनवरी की सुबह बाबर ने किले में प्रवेश किया । जौहर की लपटें तेज थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ीं थीं । सारी लाशे एकत्र की गयीं । उनके के शीश काटे गये, सिरों का ढेर लगाया गया और उस पर मुगलों का ध्वज फहराया गया । बाबर चंदेरी में पन्द्रह दिन रुका । किले में खजाना खोजा गया । आसपास जहाँ तक बन पड़ा लूटपाट की गयी । लाशों के ढेर किले और नगर में ही नहीं गांवो में भी लगे । मकानों को ध्वस्त किया गया । यातनायें देकर छुपा हुआ धन वसूला गया । अपने एक जमादार अय्यूब खान को चंदेरी का सूबेदार बनाकर बाबर लौट गया

(इस युद्ध और जौहर का वर्णन “प्रतिहार राजपूतों का इतिहास” लेखक देवी सिंह पुस्तक में विस्तार से है । जबकि युद्ध वर्णन ग्वालियर और गुना जिले के गजट में भी है । चंदेरी में जौहर स्थल भी बना है वहां महिलाएं पूजन करने भी जातीं हैं)

गाली, घमंड और ग्लोबल गिरावट के बाद अब दुनिया है आगे, और अमेरिका छूटेगा पीछे

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दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट अब साफ झलक रही है। यूरोपीय संघ पर उनकी कैप्स-लॉक वाली, बचकानी और अपमानजनक टिप्पणियाँ कोई साधारण बयान नहीं। ये भारत-यूरोपीय संघ के ऐतिहासिक “मदर ऑफ ऑल डील्स” पर झुंझलाहट का नतीजा हैं। लेकिन असल में ये उससे कहीं गहरी हैं, एक व्यक्ति और उसके पीछे के पूरे राजनीतिक आंदोलन का एक खौफनाक आत्मचित्र, जो पश्चिमी सभ्यता की उन बुनियादों को ही तोड़ रहा है, जिन पर अमेरिका खड़ा है।
यह नीति नहीं, एक दबंग की आदिम दहाड़ है। आवाज़ को विज़न समझ बैठना, और बेइज्जती को ताकत। यूरोप को “कंगाल”, “बच्चा” या “नकारा” कहना महाद्वीप का अपमान ही नहीं, यह उस इतिहास पर थूकना है, जिससे अमेरिका की पहचान बनी। ज्यादातर अमेरिकी उसी यूरोप की संतान हैं: वही यूरोप, जिसने एन्लाइटनमेंट की रौशनी दी, वैज्ञानिक सोच को मजबूती, साहित्य-कला को नई ऊँचाइयाँ, और लोकतंत्र को दर्दनाक मगर परिपक्व रास्ता। अमेरिका का संविधान, संस्थाएँ, विचार, सब पर यूरोप की गहरी छाप है। ऐसे में यूरोप का मजाक उड़ाना आत्म-अपमान से कम नहीं।
हकीकत ये कि यूरोप कोई खेल का मैदान नहीं, जहाँ “डैडी टैक्स” जैसे जुमलों से तालियाँ बटोरी जाएँ। यूरोपीय संघ का €15 ट्रिलियन का सिंगल मार्केट दुनिया का सबसे परिष्कृत, नियम-आधारित आर्थिक ढांचा है। अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर: हर साल 600 अरब डॉलर से ज्यादा अमेरिकी सामान-सेवाएँ यूरोप खरीदता है। लाखों अमेरिकी नौकरियाँ इसी पर टिकीं। ऐसे साझेदार का उपहास आर्थिक आत्महत्या है और अमेरिका के अपने आंकड़े ये चीख-चीखकर बता रहे हैं।
अमेरिका आज ट्रेड डेफिसिट से जूझ रहा: बाजार अस्थिर, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही। ट्रंप के टैरिफ, जिन्हें वे ताकत का प्रतीक बताते हैं, असल में अमेरिकी उपभोक्ताओं पर छुपा टैक्स। ये सच्चाई भाषणों से नहीं बदलती।
इस तमाशे में सबसे डरावनी है खामोशी। अमेरिका की तथाकथित लिबरल अंतरात्मा कहाँ? यूनिवर्सिटियाँ, थिंक-टैंक्स, एडिटोरियल बोर्ड्स, मानवाधिकार संगठन, क्यों चुप हैं? जो दुनिया भर में लोकतंत्र की खामियाँ तलाशते हैं, वे अपने घर की सांस्कृतिक-कूटनीतिक आगजनी पर क्यों मौन हैं? ये चुप्पी कायरता नहीं, मानसिक जड़ता का संकेत। ऊपर आइवरी टावरों में बहस, नीचे नींव जल रही है। और फायर ब्रिगेड वाले सो रहे हैं!!
ट्रंप की “रणनीति” डिप्लोमेसी के सर्व मान्य सिद्धांतों को चुनौती देती है। न भाषा का सबूर, न ही तथ्यों का सम्मान, जसपाल भट्टी का उलटा शो चल रहा है। उपनाम गढ़ना, कैप्स-लॉक ट्वीट, स्कूली गालियाँ, ये राज्यकला नहीं। 70 साल के वैश्विक गठबंधन मयखानों की तकरार, बार-फाइट में बदल रहे। ये ताकत नहीं, असुरक्षा बताती है। नियम-आधारित व्यवस्था, जिसने युद्ध रोका, समृद्धि फैलाई, गरिमा की बात की, क्या अहंकार, सौदेबाजी और धमकी से बदली जा सकती है?
असल खतरा इसी सोच में है: संस्थाओं का धीमा, मुस्कुराता क्षरण। यूरोप को संदेश साफ, तुम्हारा इतिहास बेकार, साझेदारी मुफ्त, परिपक्वता कमजोरी। लेकिन ये रणनीतिक भूल है। गठबंधन स्थायी नहीं। बाजारों की याददाश्त लंबी होती है। सब्र, सदियों पुरानी सभ्यताओं का भी, सीमा पर है। सवाल तैर रहा है, कब तक यूरोप ऐसे “सहयोगी” की बेरुखी या दुश्मनी सहेगा?
भारत-ईयू डील कोई तंज नहीं, भविष्य का खाका है। दुनिया की दूसरी लोकतांत्रिक ताकतें जुड़ेंगी, नवाचार करेंगी। अमेरिका जोकर बने तो उसकी मर्जी। यूरोप निर्भरता बदल रहा है; मार-ए-लागो के अपमान इसे तेज कर रहे हैं।
ट्रंप की बौखलाहट अमेरिकी पतन का मील का पत्थर साबित होगा। देश उस ताकत के हाथों हाइजैक हो रहा है, जो विरासत से नफरत करती है, आपसी निर्भरता न समझे, पुल जला दे। ये “अमेरिका को महान” नहीं, अप्रासंगिक बना रहा, हर बचकानी गाली के साथ।
दुनिया आगे बढ़ रही है। लोग गंभीर कमरों में फ्यूचर के सौदे कर रहे हैं। अमेरिका जहरीली छाया में चिल्लाता, खुद को शर्मिंदा करता, सबको खतरे में डालता, पीछे छूट रहा है।

नेशन फर्स्ट, रिलिजन लास्ट — यही भारत का सच्चा राष्ट्रधर्म है: डॉ. इंद्रेश कुमार

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लखनऊ, 27 जनवरी। विकसित भारत के संकल्प काल में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक समरसता और नागरिक कर्तव्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए लखनऊ के एरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज में “एक क़ौम, एक वतन – हिंदुस्तान” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार ने कहा कि “नेशन फर्स्ट, रिलिजन लास्ट और वतन की मुहब्बत जन्नत पहुंचाती है”—यही भारत की आत्मा और सच्चा राष्ट्रधर्म है। उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में हर नागरिक की जिम्मेदारी निर्णायक है। संगोष्ठी में राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर विमर्श हुआ।

कार्यक्रम में इंद्रेश कुमार और उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ एवं हज राज्यमंत्री दानिश अंसारी के साथ साथ एनसीएमईआई के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर, आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल, जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक सैयद रज़ा रिज़वी और डॉ. शालिनी अली, एरम ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर ख्वाजा फैज ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम में शौकत अली, ठाकुर राजा रईस, आलोक चतुर्वेदी, जियारत बाबा मलंग, ताहिर शाह, कारी अबरार जमाल, मज़ाहिर खान, पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद, पूर्व कुलपति माहरुख मिर्ज़ा, समाजसेवी सहर बानो, सुन्नी वक्फ बोर्ड की सदस्य सबिहा अहमद समेत बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, समाजसेवी और छात्र-छात्राएं मौजूद रहीं।

डॉ. इंद्रेश कुमार ने नफरत, अलगाव और कट्टरता की राजनीति करने वालों को समाज और देश दोनों का दुश्मन बताते हुए सभी समुदायों से आपसी भाईचारा, संविधान के सम्मान और राष्ट्र निर्माण में एकजुट होकर योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में एकता है और इसी भावना के साथ आगे बढ़कर ही देश विश्वगुरु बनेगा।

इंद्रेश कुमार ने कहा कि बांग्लादेशी मुसलमान जो घुसपैठिए हैं वो भारतीय मुसलमानों का हक खा रहे हैं। भारतीय मुसलमान बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं जबकि घुसपैठिए नौकरी कर रहे हैं, रोजगार में लगे हैं, व्यापार कर रहे हैं, सड़कों पर ठेले लगा रहे हैं। हज पर जाने वाले मुसलमान वहां आवाज उठाएं कि बांग्लादेश के मुसलमानों को कुछ कुछ लाख सभी 59 मुस्लिम देश रख लेंगे तो ये सबका भला होगा। भारतीय मुसलमानों को उनका हक मिल सकेगा।

राज्यमंत्री दानिश अंसारी ने इस अहम मुद्दे पर आयोजित संगोष्ठी को वक्त की मांग बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत’ का संकल्प पूरे देश को साथ लेकर आगे बढ़ने की सोच है। उन्होंने कहा कि यह सरकार दल से ऊपर उठकर पूरे देश को एकजुट कर भारत को आगे बढ़ाने में लगी है। विकसित भारत का संकल्प बहुत बड़ा है और इसके लिए पूरे देश में इंद्रेश कुमार और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की विकसित भारत की सोच पूरे देश को विकसित करने की सोच है, जिससे भारत दुनिया के बड़े देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होगा, जो हर भारतीय के लिए गर्व की बात है।

दानिश अंसारी ने कहा कि यदि भारत का एक-एक नागरिक अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभा ले तो देश खुद-ब-खुद विकसित हो जाएगा। गांव में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक की जिम्मेदारी उतनी ही है जितनी सरहद पर खड़े सैनिक की है। आज़ादी के लिए हमने बड़ी कीमत चुकाई है और लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। उन्होंने कहा कि हम सब भारतीय हैं और हमें एकजुट होकर सोचना और आगे बढ़ना है, तभी एक भारत, सशक्त भारत और श्रेष्ठ भारत का सपना साकार होगा।

एनसीएमईआई (NCMEI) के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि 140 करोड़ लोगों के इस देश में विविधता के बीच एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और बहुलतावाद में बसती है, और यही मूल्य हमें विश्व में एक अनूठी पहचान देते हैं।

प्रो. अख्तर ने नफरत फैलाने वाली सोच और विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के हर वर्ग की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों को संवाद, समझ और सकारात्मक मार्गदर्शन के जरिए सही रास्ते पर लाया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कानून या सरकार ही नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षण संस्थान, धार्मिक नेता और सामाजिक संगठन मिलकर ही सौहार्दपूर्ण वातावरण बना सकते हैं।

उन्होंने सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और एक-दूसरे के त्योहारों में सहभागिता को राष्ट्रीय एकता की मजबूत नींव बताते हुए कहा कि जब हम एक-दूसरे की खुशियों और परंपराओं में शामिल होते हैं, तो आपसी अविश्वास और दूरी अपने आप कम हो जाती है।

प्रो. डॉ. शाहिद अख्तर ने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि वे सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार नागरिक की तरह व्यवहार करें, अफवाहों और नफरत भरे संदेशों से दूर रहें तथा सद्भाव, शांति और राष्ट्रीय एकता के संदेश को आगे बढ़ाएं।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि भारत तभी सशक्त और समृद्ध बनेगा, जब हर नागरिक, चाहे वह किसी भी धर्म, भाषा या क्षेत्र से हो, खुद को इस देश का समान भागीदार महसूस करे और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के संकल्प को व्यवहार में उतारे।

आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति राज कुमार मित्तल ने युवाओं की शक्ति को शिक्षा, राष्ट्रहित और रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि गरीबी, बेरोजगारी और भेदभाव से मुक्त, सौहार्द और समरसता से भरा भारत ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

डॉ. शालिनी अली ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में एकता है। उन्होंने कहा, “हम सब एक हैं। हमारी पूजा-पद्धतियाँ भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हमारा संविधान एक है और हमारा डीएनए भी एक है। यही भारतीयता की पहचान है।” उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्माण बच्चों की सही तालीम और संस्कारों से होता है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, राष्ट्रप्रेम और जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा भी दें।

डॉ. अली ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि बिना सत्यापन के किसी भी प्रकार की सामग्री साझा करना समाज में भ्रम, नफरत और वैमनस्य फैलाने का कारण बन सकता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे किसी भी खबर, वीडियो या संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सच्चाई की जांच अवश्य करें और अफवाहों का हिस्सा न बनें।

उन्होंने “मोमिन” और “मुसलमान” के फर्क को समझाने पर भी जोर दिया और कहा कि सिर्फ नाम या पहचान से नहीं, बल्कि अपने आचरण, चरित्र और कर्म से ही कोई सच्चा मोमिन बनता है। उन्होंने कहा कि सच्चा मुसलमान वही है जो देश के कानून का सम्मान करे, समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखे और इंसानियत की सेवा को अपना धर्म माने। उनके विचारों ने उपस्थित लोगों को आत्ममंथन और सकारात्मक सोच के लिए प्रेरित किया।

कर्नल ताहिर मुस्तफा ने कहा कि “एक कौम, एक वतन हिंदुस्तान” हमारा मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने एपीजे अब्दुल कलाम के विचारों का उल्लेख करते हुए श्रेष्ठ भारत और विकसित भारत की मुहिम को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और देश में नफरत फैलाने वालों का समाज को मिलकर मुकाबला करने की जरूरत बताई।

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