यूजीसी के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ का उद्देश्य महत्वपूर्ण, परंतु विनियमों में स्पष्टता और संतुलन आवश्यक : अभाविप।

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दिल्ली । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी अधिसूचना “विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026” का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, परंतु इन विनियमों में स्पष्टता और संतुलन अत्यंत आवश्यक है।अभाविप मानती है कि यूजीसी तथा सभी शैक्षणिक संस्थानों को लोकतंत्र में अंतर्निहित भावना को अक्षुण्ण रखना चाहिए, जहाँ प्रत्येक नागरिक के पास समान अधिकार हों और भारत भेदभाव मुक्त तथा समता युक्त बने।

अभाविप सदैव ही शैक्षिक परिसरों में सकारात्मक और समतायुक्त परिवेश बनाने की दिशा में कार्य करती रही है और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन की पक्षधर रही है। आगामी वर्षों में ‘विकसित भारत’ की संकल्पना को सिद्ध करने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है। यूजीसी के इस समता संबंधी विनियम के कुछ प्रावधानों और शब्दावली को लेकर समाज, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों के बीच जो अस्पष्टता और भ्रांतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, इनपर यूजीसी को त्वरित संज्ञान लेते हुए तत्काल कार्यवाही करनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की विभाजनकारी स्थिति उत्पन्न न हो सके। ध्यातव्य हो, यह विषय वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है अतः अभाविप मानती है कि यूजीसी को इस संदर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए न्यायालय में शीघ्र हलफनामा दाखिल करना चाहिए।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि, “शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द एवं समानता सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है, जिसके लिए अभाविप ने सदैव प्रयास किए हैं। शैक्षणिक परिसरों में सभी वर्गों के लिए सामाजिक समानता होनी चाहिए तथा परिसरों में किसी भी प्रकार के भेदभावों के लिए कोई स्थान नहीं हैं। इस विनियम को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं हितधारकों के मध्य भ्रांतियाँ व्याप्त हैं, जिन पर यूजीसी को सभी हितधारकों से संवाद करते हुए संबंधित भ्रांतियों को दूर करने हेतु तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए। लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने तथा सभी विद्यार्थियों के लिए भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करने हेतु समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।”

उत्तराखंड में यूसीसी लागू हुए एक साल पूरा, जानिए क्या हैं फायदे?

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 रवि पाराशर

देहरादून । उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू हुए एक साल पूरा हो गया है। पिछले साल 27 जनवरी को राज्य में यूसीसी लागू किया गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद उत्तराखंड ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बन रहा है। मंगलवार, 27 जनवरी को संहिता लागू होने के एक साल पूरा होने के मौके पर राज्य में यूसीसी दिवस मनाया गया।

समान नागरिक संहिता के तहत उत्तराखंड में शादियों का रजिस्ट्रेशन अब पहले के मुकाबले ज्यादा सरल और पारदर्शी हो गया है। आर्थिक कारणों से राज्य का कोई भी नागरिक अधिकार से वंचित न हो, इसके लिए 26 जुलाई 2025 तक शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए कोई फीस वसूल नहीं की गई। अब तक करीब चार लाख 75 हजार शादियों का रजिस्ट्रेशन यूसीसी के प्रावधानों के तहत किया जा चुका है। साफ है कि देश में पहली बार यूसीसी लागू कर उत्तराखंड दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन गया है।

उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता संशोधन अध्यादेश 2026 लागू कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अध्यादेश तत्काल रूप से प्रभावी हो गया है। इसके जरिए यूसीसी एक्ट 2024 के कई प्रावधानों में प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक सुधार किए गए हैं, ताकि इसे असरदार, पारदर्शी और सुचारू रूप से लागू किया जा सके।

यूसीसी अध्यादेश के अनुसार नए नियमों के तहत शादी के वक्त पहचान छिपाना या झूठी जानकारी देना विवाह को रद्द करने का आधार बना दिया गया है। इसके साथ ही शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में जबरदस्ती, दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कृत्य करने वालों को कड़ी सजा के प्रावधान किए गए हैं। संशोधन में यह भी प्रावधान किया गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने पर रजिस्ट्रार टर्मिनेशन सर्टिफिकेट जारी करेगा। इसके अलावा कानून में “विधवा” शब्द की जगह अब “पति/पत्नी” शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।

अध्यादेश के तहत रजिस्ट्रार जनरल को शादी, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप और उत्तराधिकार से जुड़े रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार भी दिया गया है। साथ ही अगर सब-रजिस्ट्रार तय समय में कार्रवाई नहीं करता है, तो मामला अपने आप रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार जनरल के पास भेज दिया जाएगा।

सजा के प्रावधानों में भी बदलाव कर दिया गया है। अब दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय दंड संहिता 1860 की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 को लागू किया गया है। लगाए गए जुर्माने के खिलाफ अपील का अधिकार भी दिया गया है और जुर्माने की वसूली भू-राजस्व की तरह की जाएगी।

यूसीसी लागू होने से पहले राज्य में शादियों का रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम 2010 के तहत किया जाता था। इसकी पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन थी। लेकिन यूसीसी के तहत अब करीब-करीब 100 प्रतिशत विवाह पंजीकरण ऑनलाइन किए जा रहे हैं। आंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं।

समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 44 में किया गया है। यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसमें कहा गया है कि है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता यानी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में एक जैसे अधिकार सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 44 में दिए गए सुझाव का मुख्य मकसद निजी कानूनों में एकरूपता लाकर सभी नागरिकों को एक जैसे अधिकार देना है, ताकि धर्म, संप्रदाय या लिंग के आधार पर भेदभाव खत्म हो सके।

लेकिन आजादी के बाद उत्तराखंड को छोड़ कर किसी भी राज्य ने इस ओर कोई पहल ही नहीं की। हालांकि गोवा में 1867 के पुर्तगाली कानून के तहत समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है। अब गौर करने वाली बात यह भी है कि देश के कई हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहुत बार अपने ऐतिहासिक निर्णयों में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत प्रमुख रूप से रेखांकित की है, लेकिन राज्यों ने यूसीसी लागू करने की कोई जरूरत अभी तक क्यों नहीं समझी है, इस बड़े प्रश्न का एक मुख्य उत्तर तो यही है कि वोट बैंक की राजनीति या कहें कि तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से पार्टियों या गठबंधनों की सरकारों ने इसे लागू करने के बारे में किसी भी स्तर पर विचार ही नहीं किया।

उत्तराखंड में भी समान नागरिक संहिता लागू किए जाने पर कई कट्टरपंथी संगठनों ने इसका भरपूर विरोध किया, लेकिन महिलाओं, खास कर मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने की बात समझ में आने के बाद वे इसका विरोध नहीं कर रही हैं। यूसीसी लागू होने के बाद अब हलाला, इद्दत और तलाक जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लग गया है। इसने संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं के लिए समान अधिकार तय किए हैं। शादी और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। जो जोड़े विवाह या तलाक का पंजीकरण नहीं कराएंगे, उन्हें सरकारी फायदे नहीं मिलेंगे। लिव-इन रिश्तों का रजिस्ट्रेशन भी जरूरी कर दिया गया है। ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को भी यूसीसी के तहत वैधता दी गई है।

उत्तराखंड सरकार ने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया है। पोर्टल पर अपनी परेशानी की शिकायत भी की जा सकती है। सीमित इंटरनेट पहुंच वाले दूरदराज या ग्रामीण इलाकों में लोगों की मदद के लिए कॉमन सर्विस सेंटर यानी सीएससी को रजिस्ट्रेशन के लिए अधिकृत किया गया है। सीएससी एजेंट जरूरी रजिस्ट्रेशन के लिए पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में घरों का दौरा कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों को इस प्रक्रिया में मदद0 के लिए उप-रजिस्ट्रार के तौर पर नामित किया गया है।
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वामपंथी लेखकों से अब विमर्श करना, दीवार में सिर मारना है

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। वामपंथी लेखकों से जो लोग विमर्श की चोंच लड़ाते हैं , उन को देख कर तरस आता है। [ गो कि बहुत संभलने के बावजूद कभी-कभार मैं भी यह ग़लती कर जाता हूं। ] क्यों कि अब उन के यहां विमर्श का मतलब या तो डिक्टेशन सुनना है या हां में हां मिलाना है। जो उन का डिक्टेशन यानी इमला नहीं सुन सकता है , वह भाजपाई , संघी , हिंदुत्ववादी आदि-इत्यादि होता है। तो विमर्श के नौसिखियों से पूछता हूं कि आप लोग कहां फंस गए हैं। गो कि कुछ पके और तजुर्बेकार दोस्तों को भी इस विमर्श के दलदल में फंसे देखता हूं तो हंसी आती है। कुछ मित्र तो इन दिनों सफाई पर सफाई का झंडा भी फहरा रहे हैं, नित्य-प्रति।

तो फिर से पूछता हूं कि आप लोग कहां फंस गए हैं। क्यों कि वामपंथी लेखकों से अब विमर्श करना, दीवार में सिर मारना है। इस्लामिक कट्टरपंथ से , कठमुल्लों से भी ज़्यादा कट्टर वामपंथी लेखक हो चले हैं। बल्कि कट्टरपंथ से भी बड़ा इन का अहंकार होता है। हिमालय से बड़ा अहंकार। तो इन से विमर्श करना सिर्फ़ और सिर्फ़ वक्त बरबाद करना है। इन की चुनी हुई चुप्पी, चुने हुए विरोध किसी बैल की तरह इन्हें अपने जुआठ में बांधे रहते हैं। तेली के बैल की तरह यह लोग अपनी परिधि नहीं छोड़ सकते। किसी सूरत नहीं छोड़ सकते। यह बीमार लोग हैं। बहुत बीमार।

तिस पर अधिकांश वामपंथी लेखक एन जी ओ चलाने वाले लोग हैं।कभी मानव संसाधन मंत्री रहे अर्जुन सिंह ने इन लोगों के एन जी ओ को विपुल धनराशि दे-दे कर इन की आदतें बिगाड़ दीं । मनबढ़ बना दिया। कहूं कि अपना कुत्ता बना लिया। यह एन जी ओ अनुदान का काकस मोदी राज ने तोड़ दिया है। किताबों की सारी सरकारी खरीद, सारी विदेश यात्राओं पर ग्रहण लगा दिया है। तो यह बिन पानी की मछली बन गए हैं। छटपटा रहे हैं। हर असहमत को संघी , हिंदुत्ववादी , भाजपाई कहने की मिर्गी का दौरा रह-रह कर पड़ रहा है।

हालत यह हो गई है कि अगर आप कह दीजिए कि सूरज पूरब से उगता है तो यह कहेंगे कि अरे, यह तो दक्षिणपंथी है। संघी है। हिंदुत्ववादी है । जैसे भी हो , इन्हें सच सुनना किसी सूरत गवारा नहीं है। तथ्य से नहीं, विचारधारा के थर्मामीटर से हर बात को नापने की बीमारी है।

इन की विचारधारा अगर इन्हें बता देती है कि सूरज पश्चिम से निकलता है तो यह इसी को मानेंगे। ठीक वैसे ही जैसे जब तक अरब में चांद नहीं दिखा तो भारत में नहीं दिखा मान लेने की परंपरा है। अरब में चांद दिखा तब ही ईद मनेगी , वरना नहीं। खुदा न खास्ता अगर आप ने टोक दिया कि नहीं, सूरज तो पूरब से ही निकलता है। तो यह फौरन आप को संघी आदि का सर्टिफिकेट थमा कर खुश हो लेंगे। गोया पूरा देश ही संघी हो गया हो। सो, कुतर्क की इन्हें लत है। तो इन्हें बिन पानी के छोड़ दीजिए। इन की चर्चा होती है तो इन्हें लगता है, यह अभी भी ताकतवर हैं। तो इन्हें बेदम ही छोड़ दीजिए। इन की सांस उखड़ चुकी है।

इसी लिए यह लोग अब लिखना छोड़ कर ऐक्टिविस्ट बन गए हैं। इन के पास अब रचना नहीं, सिर्फ़ फतवा है। भौ-भौ और कांव-कांव ही शेष रह गया है इन के हिस्से। तो दोस्तों , इन्हें इन के हाल पर छोड़ कर आगे बढ़ लिजिए। कुछ अप्रतिम, कुछ सार्थक रचिए।

Bangladesh scribes attacked by extortionists, PEC demands probe

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Nava Thakuria

Geneva (Switzerland): At least 12 Bangladeshi journalists were injured in an attack by extortionists and terrorists in Narsingdi locality of the south Asian nation on 26 January 2026 as the media professionals were returning to Dhaka by bus after attending a leisurely program of Crime Reporters Association of Bangladesh. According to Bangladesh Sangbad Sangstha, the Dhaka-based government sponsored news agency, reported that the wounded scribes were rushed to Narsingdi Sadar Hospital. The bus carrying the media persons was parked by the roadside when a group of local extortionists demanded money as tolls. As the journalists protested, an altercation ensued, after which the attackers assaulted them with locally made weapons, added the BSS report. The attackers even threatened to burn their accompanying wives and children.

The global media safety and rights body Press Emblem Campaign (PEC) condemned the attack and urged the interim government in Dhaka to bring the group of extortionists to justice. “It’s so unfortunate that the poll-bound Bangladesh remains in media headlines for a number of events revealing media atrocities in the last few weeks. In Narsingdi of Bangladesh, the journalists protested against an extortion bid by some unruly individuals and had to face the attacks, which is unacceptable by any means,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.net).

PEC’s south Asia representative Nava Thakuria informed that the Bangla police have already arrested two accused continuing search operations for the rest of the gang. The Muslim majority nation of over 170 million people is preparing for its 13th national election on 12 February under the patronage of an interim regime led by Nobel laureate Dr Muhammad Yunus. Recently, the caretaker government chief assured the countrymen of a free, fair and festive polling with a truly democratic spirit. The country on 5 January reported the murder of journalist Rana Pratap Bairagi (45), who incidentally became the first journo-victim across the world this year.

बांग्लादेश: नरसिंगदी में पत्रकारों पर हमला, PEC ने अंतरिम सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग

जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड), 27 जनवरी 2026: बांग्लादेश के नरसिंगदी ज़िले में 26 जनवरी को रंगदारों और आतंकवादी तत्वों के एक समूह ने कम से कम 12 बांग्लादेशी पत्रकारों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। ये सभी पत्रकार बांग्लादेश क्राइम रिपोर्टर्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद बस से ढाका लौट रहे थे। सरकारी समाचार एजेंसी बांग्लादेश संवाद संस्था (Bangladesh Sangbad Sangstha—BSS) के अनुसार, घायल पत्रकारों को नरसिंगदी सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रकारों को ले जा रही बस सड़क किनारे खड़ी थी, तभी स्थानीय रंगदारों के एक समूह ने टोल के नाम पर अवैध वसूली की मांग की। पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने पर हमलावरों ने हथियारों से उन पर हमला कर दिया। BSS ने यह भी बताया कि हमलावरों ने पत्रकारों के साथ मौजूद उनकी पत्नियों और बच्चों को जान से मारने की धमकी दी।

इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए वैश्विक मीडिया सुरक्षा और अधिकार संगठन प्रेस एम्बलम कैंपेन (Press Emblem Campaign-PEC) ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने की मांग की है। PEC के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव की तैयारी कर रहा बांग्लादेश बीते कुछ हफ्तों में मीडिया पर हमलों की कई घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। नरसिंगदी में पत्रकारों ने जबरन वसूली की कोशिश का विरोध किया और इसके जवाब में उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।”

PEC के दक्षिण एशिया प्रतिनिधि नव ठाकुरीया ने बताया कि बांग्लादेश पुलिस ने अब तक दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि शेष गिरोह की तलाश के लिए अभियान जारी है। 170 मिलियन से अधिक आबादी वाले मुस्लिम-बहुल देश बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की निगरानी में 12 फरवरी को 13वें राष्ट्रीय चुनाव कराए जाने हैं। हाल ही में, कार्यवाहक सरकार के प्रमुख और नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस ने देशवासियों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक भावना से परिपूर्ण चुनाव कराने का आश्वासन दिया था। उल्लेखनीय है कि इसी महीने 5 जनवरी को बांग्लादेश में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी (45) की हत्या की खबर सामने आई थी, जो संयोगवश इस वर्ष दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा का पहला दर्ज मामला बताया गया।

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