वैश्विक स्तर पर युद्ध के बदलते स्वरूप

images-7.jpeg

ग्वालियर : 21वीं सदी में शक्ति संघर्ष का स्वरूप बहुत तेजी से बदल रहा है। अब विभिन्न देशों के बीच संघर्ष, तोप, मिसाईल एवं सेनाओं के माध्यम से नहीं लड़े जा रहे हैं बल्कि तकनीकि उपलब्धता, मुद्रा नियंत्रण, पूंजी प्रवाह, खाद्य सुरक्षा, आकड़ों (डेटा) का संग्रहण, नियम निर्माण को प्रभावित करने की क्षमता एवं वैश्विक आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करना, आदि में माध्यम से लड़ा जा रहा है। यह एक ऐसा बहुपरत, निरंतर संस्थागत एवं सूक्ष्म युद्ध का स्वरूप है जो राष्ट्र की आर्थिक सामरिक स्वायत्तता को बिना पारम्परिक लड़ाई के नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह युद्ध वैश्विक बाजारी शक्तियों अर्थात बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, वॉल स्ट्रीट पर आधारित वित्तीय नेट्वर्क, डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों (विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक), रेटिंग संस्थानों, बड़े तकनीकि संस्थानों एवं निजी सैन्य परामर्श समूहों द्वारा मिलकर संचालित किया जा रहा है। यह युद्ध एक प्रणाली है एवं यह एक घटना नहीं है।

व्यवस्थित तरीके से लड़े जाने वाले उक्त वर्णित युद्ध में रणनीतिक तंत्र का उपयोग किया जाता है। इस तंत्र के माध्यम से वैश्विक बाजारवादी शक्तियां मिलकर किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, नीति संरचना, मुद्रा, पूंजी प्रवाह, तकनीकि, आपूर्ति शृंखला, खाद्य सुरक्षा एवं सामाजिक धारणा पर लम्बे समय तक अपना प्रभाव एवं नियंत्रण स्थापित कर लेती हैं। यह युद्ध अदृश्य रूप से चलता है एवं किसी को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता है। यह युद्ध विभिन्न संस्थानों के माध्यम से लड़ा जाता है एवं इस युद्ध के माध्यम से किसी भी देश की शासन व्यवस्था को भी परिवर्तित किया जा सकता है। हाल ही के समय में उक्त वर्णित अदृश्य युद्ध के माध्यम से बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों में सत्ता परिवर्तन किया गया है। भारत में भी इस तरह के प्रयोग अदृश्य रूप से किए जा रहे हैं परंतु भारतीय नागरिकों पर इस चाल को अभी तक कोई असर नहीं हुआ है क्योंकि भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठन नागरिकों के बीच अपनी प्रभावी भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रहे हैं। ।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत को कम करने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में अपना निवेश लगातार निकाला जा रहा है जिससे अमेरिकी डॉलर का भारत से बाहर प्रवाह भारी मात्रा में हो रहा है और भारतीय रुपए पर दबाव बन रहा है। भारत में विभिन्न उत्पादों के होने वाले आयात महंगे हो रहे हैं इससे अंतत: भारत में मुद्रा स्फीति की दर में वृद्धि हो सकती है और भारत के नागरिकों में वर्तमान सत्ता के विरुद्ध असंतोष का भाव जाग सकता है। परंतु केंद्र सरकार की नीतियों के चलते अभी तक मुद्रा स्फीति की वृद्धि दर पर नियंत्रण बनाए रखने में सफलता मिली है एवं भारतीय खुदरा निवेशकों, म्यूचूअल फण्ड एवं देशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में पर्याप्त मात्रा में अपना निवेश बढ़ाया है इससे भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट को सफलतापूर्वक रोका जा सका है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा फेड रेट (अमेरिकी ब्याज दर) में वृद्धि करने से भी अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत होता है क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि होने से वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में उभर रही अर्थव्यवस्थाओं से अमेरिकी डॉलर का निवेश निकल कर अमेरिका की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे भी इन देशों की मुद्राओं पर दबाव निर्मित होने लगता है। अतः ब्याज दरों में वृद्धि को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तीसरे हथियार के रूप में किसी भी देश की मुद्रा को SWIFT जैसे भुगतान नेट्वर्क से अलग कर दिया जाना है। इस निर्णय से सम्बंधित देश की मुद्रा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन विपरीत रूप से प्रभावित होने लगता है। जैसे रूस की मुद्रा रूबल के साथ हाल ही के समय में हुआ था। उक्त समस्त निर्णयों से किसी भी देश की मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर किया जा सकता है इससे उस देश में उत्पादों के आयात महंगे हो सकते हैं, उस देश पर विदेशी कर्ज का भार बढ़ सकता है एवं उस देश का आर्थिक विकास प्रतिबंधित हो सकता है। यह युद्ध संरचनात्मक अधीनता पैदा करता है।

इसी तरह का दबाव कुछ देशों पर तब डाला जाता है जब वे किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (विश्व बैंक, अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रेटिंग संस्थान) से ऋण लेने का प्रयास करते हैं। इन संस्थानों द्वारा इन देशों पर टैक्स की दरें बढ़ाने, अपने खर्चों पर नियंत्रण स्थापित करने, राजस्व सम्बंधी निर्णयों पर अपनी नीति थोपने, उस देश के ऊर्जा, बंदरगाह एवं खनन क्षेत्रों का निजीकरण करने के प्रयास करना एवं इसके मध्यम से उस देश में चुपचाप शासन परिवर्तन के प्रयास करना भी शामिल हैं। इन संस्थानों से कर्ज लेना आधुनिक गुलामी का सबसे व्यवस्थित मॉडल बन पड़ा है। इसके साथ ही, विभिन्न देशों के साथ व्यापार युद्ध भी छेड़ा जाता है। जैसे, अमेरिका द्वारा ब्रिक्स (भारत, चीन, रूस, ब्राजील) पर 500 प्रतिशत का टैरिफ लगाने के प्रयास करना भी इन देशों के विरुद्ध एक शद्म युद्ध छेड़ने जैसा ही निर्णय है। इन्हीं उपायों में कुछ देशों को निर्यात प्रतिबंधित करना भी इसी नीति का एक हिस्सा है। जैसे, अमेरिका एवं चीन द्वारा अन्य देशों को सेमीकंडक्टर, चिप एवं 5G के उपकरण के निर्यात करने पर रोक लगाई गई थी ताकि प्रभावित किये जाने वाले देशों में इन तकनीकी का उपयोग असम्भव हो सके और इन देशों का विकास रुक जाए। इसी प्रकार के प्रयासों में किसी देश के कृषि क्षेत्र की नीतियों को प्रभावित कर उस देश में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को कम करना भी शामिल है ताकि उस देश के नागरिक अपने देश की सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों। जैसे हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते को सम्पन्न करने के लिए भारत पर दबाव बनाया जा रहा है कि भारत अपने कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दे। इससे अमेरिकी उत्पाद सस्ती दरों पर भारत में उपलब्ध हो जाएंगे एवं भारत के किसानों द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थ सस्ते अमेरिकी उत्पादों की स्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे। इससे भारतीय कृषि एवं डेयरी क्षेत्र बर्बादी के कगार पर पहुंच जाएगा और भारतीय किसान, सरकार के विरुद्ध उठ खड़ा होगा। कुल मिलाकर इस तरह के प्रयास उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित करने के लिए भी किए जाते हैं ताकि यह देश विभिन्न उत्पादों का उत्पादन अपने देश में नहीं कर सकें एवं इसके लिए अन्य देशों से आयात पर इनकी निर्भरता बढ़ जाए।

प्रौद्योगिकी क्षेत्र को प्रभावित करते हुए भी कुछ देश उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को दबाव में लाने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। दरअसल, तकनीकी आज का नया परमाणु हथियार है। आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स, क्वांटम, सेमीकंडक्टर, साइबर आदि भी आज, युद्ध के क्षेत्र बन चुके हैं। अमेरिका ने चीन को किए जाने वाले चिप के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, इससे जिन उत्पादों के निर्माण में चिप का प्रयोग होता है उन उद्योगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इसी प्रकार, अमेरिका द्वारा भारत पर डाटा नियंत्रण हेतु दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पैटेंट एवं लायसेंसिंग पर नियंत्रण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी कम्पनियों द्वारा नागरिक डाटा का दुरुपयोग किया जाना भी इसी युद्ध कला का एक हिस्सा है। पूरे विश्व में फैली कोविड महामारी के पश्चात वैश्विक आपूर्ति शृंखला एक भूराजनैतिक हथियार बन चुकी है। उदाहरण के लिए फार्मा क्षेत्र में उपयोग होने वाले कच्चे माल को चीन नियंत्रित करता है। इसी प्रकार, मूल्यवान खनिज पदार्थों के 90 प्रतिशत भाग के उत्पादन पर चीन का कब्जा है। खाद्य तेल की आपूर्ति पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नियंत्रण है। समुद्री मार्गों पर कुछ देशों का कब्जा है, जो कई बार इस सम्बंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानने से इंकार कर देते हैं। इस तरह के व्यवहार से तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाएं निर्भरता की कैद में धकेल दी जाती हैं।

आजकल झूठे विमर्श गढ़ने का कार्य भी बड़े जोरों पर किया जा रहा है। इसे बौद्धिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है, जो प्रायः वैश्विक मीडिया द्वारा लड़ा जा रहा है। गैरसरकारी संस्थान (NGO) एवं थिंक टैंक, एक संगठित नरेटिव इको सिस्टम बनाते हैं। जैसे, भारत के संदर्भ में गढ़े जाने वाले कुछ झूठे विमर्शों में शामिल हैं – भारतीय किसान अक्षम हैं, भारत के स्थानीय बीज पोषणहीन हैं, भारत का देशी खाद्य मॉडल पिछड़ा है, ब्रिक्स राजनैतिक रूप से अस्थिर देशों का संगठन है, डीडोल्लराईजेशन एक असम्भव कार्य है।

कुल मिलाकर उक्त वर्णित शद्म युद्ध का प्रमुख उद्देश्य अन्य देशों का मानसिक एवं बौद्धिक उपनिवेशीकरण करना है। इसके अंतर्गत, इन देशों के नीति निर्धारण पर अपना आधिपत्य स्थापित करना है। इन देशों द्वारा किस प्रकार के उत्पादों का उत्पादन किया जाएगा (बीज से लेकर दवा तक) एवं इसके आपूर्ति बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है। साथ ही, देश के मुद्रा बाजार पर नियंत्रण स्थापित करना है ताकि उस देश की मुद्रा अमेरिकी डॉलर पर निर्भर हो जाए।

टैरिफ के बावजूद वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर छू सकती है नई ऊचाईयां

j2h0uk18_gdp-generic_625x300_21_November_22.jpg.webp
मुंबई : दिनांक 1 फरवरी 2026 को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले बजट के पूर्व वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के आर्थिक विकास से सबंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़े 7 जनवरी 2026 को जारी किए गए है। इस अनुमान के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल हुई थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। सकल घरेलू उत्पाद से सम्बंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़ों के आधार पर ही वर्ष 2026-27 के बजट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। आर्थिक विकास से सम्बंधित द्वितीय अग्रिम अनुमान 27 फरवरी 2026 को जारी किए जाने हैं। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान भी 7.3 प्रतिशत की वृद्धि का ही है परंतु भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग का अनुमान 7.5 प्रतिशत अथवा इससे अधिक का है। भारत की आर्थिक विकास दर विश्व के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे अधिक रहने की सम्भावना विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियन विकास बैंक (7.2 प्रतिशत), फिच नामक रेटिंग संस्थान (7.4 प्रतिशत) आदि संस्थानों ने भी व्यक्त की है।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2024-25 में हासिल की गई 6.5 प्रतिशत की वृद्धि से आगे बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने के कुछ मुख्य कारणों में शामिल हैं – (1) केंद्र सरकार के स्थिर उपभोग खर्च (Govt Fixed Consumption Expenditure) में वृद्धि दर जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में 2.3 प्रतिशत की रही थी, वह बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 5.2 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (2) विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.5 प्रतिशत की रही थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.0 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (3) सकल मान योग (Gross Value Addition) में वृद्धि दर का 6.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है; (4) सकल स्थिर पूंजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation) में वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत से बढ़कर 7.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है; (5) सेवा एवं कृषि क्षेत्र में क्रमश: 9.1 प्रतिशत एवं 3.1 प्रतिशत की सम्भावना व्यक्त की गई है; (6) भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर का 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 6.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना होना भी शामिल है। अप्रेल 2025 से नवम्बर 2025 के खंडकाल में राजकोषीय घाटा 9.8 लाख करोड़ का रहा है जो वित्तीय वर्ष 2025-26 के कुल अनुमान का 62.3 प्रतिशत है, अतः बजटीय घाटा भी अभी तक नियंत्रण में ही रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा 15.69 लाख करोड़ रहने का अनुमान लगाया गया था, जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत होगा। इस प्रकार केंद्र सरकार की आय एवं व्यय से सबंधित स्थिति भी पूर्णत: नियंत्रण में है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के 7.4 प्रतिशत के अनुमान को उत्साहवर्धक माना जाना चाहिए क्योंकि यह वृद्धि दर ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद रहने वाली है। दरअसल ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ को वित्तीय बाजार में बहुत गम्भीरता से लिया जाकर इसके भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है। परंतु, वास्तव में भारत के आर्थिक विकास दर पर इसका प्रभाव लगभग नहीं के बराबर रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण अमेरिका को भारत से होने वाले निर्यात की कम मात्रा भी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत से अमेरिका को 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर के विभिन्न वस्तुओं के निर्यात हुए थे, जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। अतः भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात भारत के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.85 प्रतिशत ही रहे हैं। वैसे भी भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है ही नहीं (चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है, इसीलिए चीन पर अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव अधिक हो सकता है), भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है। यदि भारत के नागरिक स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक सेवन करते हैं तो ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को शून्य भी किया जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी भारतीय समाज को लगातार प्रेरणा दी जा रही है कि वे भारत में निर्मित उत्पादों का ही उपयोग करें ताकि भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। संघ ने पंच परिवर्तन नामक एक कार्यक्रम को प्रारम्भ किया है, जिसमें पांच बिंदु शामिल किए गए हैं – स्वदेशी का उपयोग, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन। भारत में समस्त नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन सुनिश्चित करें। इन संस्कारों में भारत के नागरिकों में “देश प्रथम” के भाव का जागरण भी शामिल है। लोकतंत्र की सफलता और स्थिरता नागरिकों की भागीदारी और कर्तव्यों के प्रति सजगता पर निर्भर करती हैं। जब नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील होते हैं और उनका ईमानदारी से पालन करते हैं तो समाज में सकारात्मक बदलाव आते हैं और देश की प्रगति होती हैं। समाज की प्रगति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए नागरिकों की अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशीलता तथा कटिबद्धत्ता आवश्यक है। करों का समय पर और सही राशि का भुगतान करना नागरिकों का कर्तव्य है। देश की आर्थिक प्रगति के लिए करों का उचित प्रबंधन आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज की भलाई के लिए स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास जैसी सामाजिक सेवाओं में भाग लें।

किसी भी देश के नागरिक यदि स्वदेशी उत्पादों को अपनाना प्रारम्भ करते हैं तो इससे देश में उद्योगों को बढ़ावा मिलता है, अन्य देशों में उत्पादित वस्तुओं का आयात कम होता है और देश में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं। स्वदेशी का मतलब विदेशी सामान इस्तेमाल नहीं करना है परंतु यह कार्य इतना आसान नहीं है क्योंकि आज विश्व के समस्त देश एक वैश्विक गांव में परिवर्तित हो गए हैं, जिसके चलते उत्पादों का एक देश से दूसरे देश में आयात एवं निर्यात बहुत आसान बन पड़ा है। आचार्य श्री विनोबा भावे जी कहते हैं स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा। संघ ने इसमें एक बिंदु जोड़ दिया: आत्मनिर्भरता, अहिंसा और सादगी। प्रत्येक भारतीय नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह मितव्ययिता से जिए ताकि संसाधनों के दुरुपयोग को रोका जा सके। परंतु, इसका आश्य कंजूसी करना कदापि नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठनों के साथ ही केंद्र सरकार ने भी आर्थिक क्षेत्र में कई प्रयास किए हैं जिसके चलते हाल ही के समय में भारत की आर्थिक विकास दर में वृद्धि दर में लगातार सुधार दिखाई दिया है। विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ के प्रभाव को लगभग शून्य करने के उद्देश्य से भारत ने विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इनमे विशेष रूप से शामिल हैं यूनाइटेड किंगडम, ओमान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आदि। यूरोपीयन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता शीघ्र ही सम्पन्न होने जा रहा है। सम्भवत 27 जनवरी 2026 को इस मुक्त व्यापार समझौते पर यूरोपीयन यूनियन एवं भारत द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। साथ ही, अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों के आयात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ से प्रभावित होने वाले उत्पादों के लिए भारत ने अन्य देशों के रूप में बाजार तलाश लिए हैं एवं इन देशों को विभिन्न उत्पादों का निर्यात प्रारम्भ हो चुका है जिससे नवम्बर 2025 एवं दिसम्बर 2025 माह में भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर हासिल की जा सकी है। वैसे, भारत और अमेरिका के बीच भी मुक्त व्यापार समझौते को लगभग अंतिम रूप दिया जा चुका है एवं शीघ्र ही इसकी घोषणा की जा सकती है। इसके बाद तो भारतीय उत्पादों के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत को भी कम अथवा समाप्त किया जा सकता है, इससे अन्य देशों के साथ साथ अमेरिका को भी भारत से होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात में और अधिक वृद्धि हासिल की जा सकेगी।

नेपाल में चुनाव की घंटियां, क्या ओली वापस आ सकते हैं?

127834410_eaff8694-45d4-4627-bab1-3c3421d19cdb.jpg
नव ठाकुरीया
गुवाहाटी: नेपाल एक बार फिर राष्ट्रीय चुनाव की दहलीज़ पर खड़ा है। 5 मार्च को होने वाले ये चुनाव उस राजनीतिक उथल-पुथल के बाद ज़रूरी हो गए, जब सितंबर 2025 में युवा विद्रोह अपने चरम पर पहुंचा और केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई। हिमालयी राष्ट्र नेपाल में पिछला आम चुनाव वर्ष 2022 में हुआ था और अगला चुनाव सामान्यतः 2027 में प्रस्तावित था। लेकिन पिछले साल संसद भंग होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में गठित अंतरिम सरकार की निगरानी में चुनावी प्रक्रिया शुरू की गई।
करीब 2.9 करोड़ की आबादी वाले हिंदू-बहुल इस देश में इस बार चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है। चार पूर्व प्रधानमंत्री चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं, वहीं तीन मौजूदा मेयर भी अपनी राजनीतिक किस्मत आज़माने की उम्मीद कर रहे हैं। पद से हटाए गए पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के नेता केपी शर्मा ओली झापा-5 संसदीय सीट से चुनाव लड़ेंगे। उनका मुकाबला काठमांडू मेट्रोपॉलिटन सिटी के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह से होगा, जिन्होंने हाल ही में मेयर पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का दामन थामा है।
इंजीनियर से रैपर और फिर राजनेता बने बालेन्द्र शाह, पिछले साल सरकार-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चार बार प्रधानमंत्री रह चुके ओली के लिए यह मुकाबला आसान नहीं होगा। ओली ने हाल ही में आरोप लगाया था कि काठमांडू में उनकी सरकार गिराने के पीछे कुछ विदेशी ताकतों की भूमिका रही, जिन्होंने नेपाली नागरिकों को उकसाया। उनका दावा है कि जिस विद्रोह में 77 नागरिकों की मौत हुई और लगभग 84 अरब नेपाली रुपये की सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, वह स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि सुनियोजित था।
उन्होंने यह भी कहा कि श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद नेपाल को भी दक्षिण एशिया में लोकतंत्र को अस्थिर करने वाले तत्वों ने निशाना बनाया। विभिन्न मौकों पर ओली भारत-विरोधी टिप्पणियां करते रहे हैं और नेपाल के प्रति नई दिल्ली की विदेश नीति की आलोचना भी की है—जबकि नेपाल की सीमाएं तिब्बत (अब चीन के अधीन) से भी लगती हैं। इस चुनाव में मैदान में उतरने वाले अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के अध्यक्ष पुष्पकमल दहल उर्फ़ प्रचंड, प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी के बाबूराम भट्टराई और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के माधव कुमार नेपाल शामिल हैं।
हालांकि, दो पूर्व प्रधानमंत्री—नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और एनसीपी के झाला नाथ खनाल—ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। देउबा को पार्टी के भीतर विभाजन के कारण चुनावी राजनीति से दूरी बनानी पड़ी। मेयर पद से चुनावी राजनीति में उतरने वालों में बालेन्द्र शाह के अलावा धरान उप-महानगरपालिका के मेयर हरका संपंग और भरतपुर महानगरपालिका की मेयर रेणु दहल भी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि रेणु दहल, माओवादी आंदोलन के नेता प्रचंड की बेटी हैं।
कट्टर कम्युनिस्ट नेता प्रचंड ने 2008 में नेपाल की सदियों पुरानी हिंदू राजशाही को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। नेपाल के अंतिम राजा ज्ञानेंद्र शाह, जो अब एक आम नागरिक की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ने हाल ही में नेपाली राजनीतिक नेतृत्व की विदेश नीति पर तीखी टिप्पणी की है। अपने पूर्वज पृथ्वी नारायण शाह की 304वीं जयंती और राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए, पूर्व राजा ने कहा कि बीते दो दशकों में राजनीतिक नेतृत्व ने देश को लगातार संकट में डाला है और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध असंतुलित विदेश नीति अपनाई है।
इस बीच, नेपाल सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के अनुरोध पर भारत लगातार चुनावी सहायता प्रदान कर रहा है। हाल ही में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने काठमांडू को चुनाव तैयारियों के लिए 60 से अधिक वाहन और अन्य सामग्री सौंपी। नेपाल के गृह मंत्री ओम प्रकाश आर्यल ने यह सहायता भारतीय राजनयिक राकेश पांडे से औपचारिक रूप से ग्रहण की। प्रमुख नेपाली दैनिक द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, मंत्री आर्यल ने इस सहयोग के लिए भारत का आभार जताते हुए कहा कि यह दोनों पड़ोसी देशों के बीच विश्वास और मित्रता की गहराई को दर्शाता है। गौरतलब है कि वर्ष 2008 से भारत नेपाल को चुनावी सहायता देता आ रहा है और इस बार 600 से अधिक वाहन उपलब्ध कराने की योजना है।
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रख्यात लेखिका नीरजा माधव का वामपंथी छात्रों द्वारा घेराव और प्रदर्शन

2-17.jpeg

प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने कहा “यह घोर असहिष्णुता”

हैदराबाद, 21 जनवरी। सनातन संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रति घृणा की एक अफसोसनाक मिसाल विगत दिनों 20 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित सेमिनार में देखने को मिली, जहां प्रख्यात लेखिका नीरजा माधव को विरोध और हिंसक नारेबाजी का सामना करना पड़ा। उल्लेखनीय है कि डॉ. नीरजा माधव को थर्ड जेंडर विमर्श पर व्याख्यान देने हेतु हैदराबाद विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया था। वहां पहुंचने पर आयोजकों ने भारतीय संस्कृति की प्रखर चिंतक नीरजा माधव से अनुरोध किया कि वे भारतीय संस्कृति पर भी अपना एक व्याख्यान दें। ‘भारतीय संस्कृति और थर्ड जेंडर’ विषय पर व्याख्यान देने के बाद प्रश्न उत्तर काल में उपस्थित कुछ छात्रों ने होमो सेक्सुअल और लेस्बियन पर आधारित प्रश्न करते हुए कहा कि मनुस्मृति में समलैंगिकता का संदर्भ है जिसके आधार पर उन्हें कानूनी मान्यता मिली है। उनके प्रश्न का जवाब देते हुए नीरजा माधव ने जब कहा कि लेस्बियन और होमोसेक्सुअलिटी किसी की मानसिक आवश्यकता हो सकती है और आपकी अपनी इच्छा भी हो सकती है लेकिन यह थर्ड जेंडर जैसी समस्या नहीं है। थर्ड जेंडर प्रकृति के एक क्रूर मजाक के कारण अभिशप्त जीवन जीते हैं। नीरजा माधव ने सभागार में उपस्थित छात्रों से यह भी पूछा कि आप लोगों में से ओरिजिनल मनुस्मृति को किसने पढ़ा है, कृपया हाथ उठाएं। कोई हाथ नहीं उठा। किसी ने नहीं पढ़ा था। नीरजा माधव ने कहा कि किसी भी पुस्तक, ग्रंथ या शास्त्र का खंडन करने से पहले उसका अध्ययन करना आवश्यक होता है।

सत्र समाप्त होने के 1 घंटे के भीतर ही विश्वविद्यालय के आइसा और एसएफआई संगठन के सैकड़ो छात्रों ने हाथों में बैनर लहराते हुए नारे लगाते हुए नीरजा माधव की कार को घेर लिया और उनसे माफी मांगने की जिद करने लगे। नीरजा माधव ने कार से निकलकर उनकी इस मांग का प्रतिरोध किया और कहा कि जब मैंने कोई गलत बात कही ही नहीं तो फिर किस बात के लिए माफी? यह तो संभव ही नहीं है कि मैं माफी मांगू। मैंने जो भी बातें कही हैं ,वह सत्य कहीं है। आपकी असहमति हो सकती है। इस पर छात्र उग्र होकर मोदी विरोधी , संघ विरोधी नारे लगाने लगे ।

15-20 मिनट के अंदर वहां विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मी बड़ी संख्या में आए और नीरजा माधव की कार को सुरक्षित निकलवाया।
यह भी ज्ञातव्य है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रायःकिसी भी भारतीय संस्कृति के लेखक या वक्ता को वामपंथी विचारधारा के लोगों ने मंच से कुछ बोलने नहीं दिया है। यह पहला अवसर था जब नीरजा माधव ने डंके की चोट पर वहां मंच से आइसा और एसएफआई के छात्रों के बीच भी भारतीय संस्कृति की बातें पुरजोर ढंग से रखीं। इतना ही नहीं, प्रश्न काल के दौरान एक छात्रा ने जब उनसे अंग्रेजी में प्रश्न करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि आप हिंदी की विद्यार्थी हैं तो मुझसे हिंदी में बात करिए। इस पर भी उस छात्रा ने प्रतिरोध किया। **निंदनीय घटना** घटना की निंदा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रो.संजय द्विवेदी ने कहा कि यह घोर असहिष्णुता का परिचायक है कि एक लेखक की अभिव्यक्ति की आजादी भी छीन ली जाए। भारतीय विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की मानसिकता को पनपने देना यानी राष्ट्र को कमजोर करना है। उन्होंने कहा संविधान की बात करना और उसका पालन करना दो भिन्न बातें हैं। वामपंथियों से सच हजम नहीं होता इसलिए वे हिंसा पर उतर आते हैं।

scroll to top