सोशल मीडिया की दस सबसे अधिक लोकप्रिय माडल्स

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गोपी
दिल्ली। इंस्टाग्राम पर “सेक्सी” या “हॉटेस्ट” मॉडल्स की लिस्ट सब्जेक्टिव होती है, लेकिन 2025-2026 के ट्रेंड्स, फॉलोअर्स, सर्चेस और पॉपुलर लिस्ट्स के आधार पर यहां टॉप 10 सबसे ज्यादा चर्चित और आकर्षक Instagram मॉडल्स की प्रोफाइल्स हैं (ज्यादातर इंटरनेशनल, क्योंकि ग्लोबल लिस्ट्स में यही नाम बार-बार आते हैं):
  • 01. Kendall Jenner
    Instagram:
    @kendalljenner

    सबसे ज्यादा फॉलो की जाने वाली मॉडल, हाई-फैशन और ग्लैमरस फोटोज के लिए फेमस।

  • 02. Bella Hadid
    Instagram:
    @bellahadid

    एज्डी और बोल्ड लुक्स, बहुत से लोग इसे सबसे सेक्सी मानते हैं।

  • 03. Gigi Hadid
    Instagram:
    @gigihadid

    क्लासिक ब्यूटी और स्टाइलिश कंटेंट, फैशन आइकन।

  • 04. Emily Ratajkowski
    Instagram:
    @emrata

    बोल्ड, कॉन्फिडेंट और सेक्सी फोटोज के लिए बहुत पॉपुलर।

  • 05. Irina Shayk
    Instagram:
    @irinashayk
  • सुपरमॉडल, स्टनिंग फिगर और हाई-क्लास वाइब्स।

  • 06. Lindsey Pelas
    Instagram:
    @lindseypelas

    कर्वी और बहुत से “हॉटेस्ट” लिस्ट्स में टॉप पर।

  • 07. Abigail Ratchford
    Instagram: @abigailratchford
    कर्व मॉडल, Playboy और SI स्टाइल फोटोज।

  • 08. Jojo Babie
    Instagram:
    @jojobabie

    बॉडी-पॉजिटिव और वॉल्यूप्ट्यूअस फिगर वाली, सेक्सी कंटेंट।

  • 09. Anllela Sagra
    Instagram:
    @anllela_sagra

    फिटनेस मॉडल, अमेजिंग बॉडी के लिए फेमस।

  • 10. Yanet Garcia
    Instagram:
    @iamyanetgarcia

    “वर्ल्ड्स हॉटेस्ट वेदर गर्ल”, बहुत हॉट और पॉपुलर।

  • ये नाम हाल की पॉपुलर लिस्ट्स (जैसे Maxim, All My Friends Are Models, और अन्य 2025-2026 अपडेट्स) से लिए गए हैं।

Supreme Court Denies Bail to Umar Khalid & Sharjeel Imam as “Central Conspirators” in 2020 Delhi Riots Case, Grants Conditional Bail to Five Others Amid Victim Anger and Celebrations

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Delhi : On January 5, 2026, India’s Supreme Court delivered a significant verdict in the major conspiracy case related to the 2020 Northeast Delhi riots. A bench comprising Justice Aravind Kumar and Justice N.V. Anjaria granted bail to Gulfisha Fatima, Meeran Haider, Shifa-ur-Rahman, Mohammad Salim Khan, and Shadab Ahmed under strict conditions, while rejecting the bail pleas of Umar Khalid and Sharjeel Imam.

The court clarified that Umar Khalid and Sharjeel Imam played a ‘central and orchestrating’ role in the conspiracy, whereas the other accused had only an assisting or secondary role. This decision came amid serious charges under the Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA), where the riots were regarded as a well-planned attack on India’s sovereignty and integrity.

Prominent lawyers represented the accused during the hearings. Senior advocates Kapil Sibal and Trideep Pais argued for Umar Khalid, Abhishek Manu Singhvi represented Gulfisha Fatima, Salman Khurshid also participated in the arguments, while Siddharth Dave appeared for Sharjeel Imam. The involvement of these high-profile lawyers brought the case into the national and international spotlight.

Following the verdict, celebratory scenes erupted in some places. Sweets were distributed, slogans were raised, and festivities spread across social media. Particularly after Gulfisha Fatima’s release from Tihar Jail on January 7, 2026, crowds gathered outside the prison. Flowers, garlands, roses, and religious slogans were chanted. Women in burqas and men with long beards celebrated it as if it were a major victory.

Some described this as a hero’s welcome, which is being seen as shameful and anti-national for individuals accused in a riot conspiracy. According to the police chargesheet, Gulfisha Fatima was involved in the Jaffrabad Metro station blockade, mobilizing women and children, inciting through WhatsApp groups, stockpiling chili powder, acid, and sticks, and funding activities. Yet, she received a hero-like reception, which highlights a certain mindset prevalent in society.

Victim families called the celebrations ‘unfortunate.’ They said it increases the threat to witnesses and could reignite violence. Hari Singh Solanki, whose 26-year-old son Rahul Solanki (an LLB student) was shot dead while going to buy milk, said emotionally, “If my son’s killers are out, who do we ask for justice? The main accused are in jail, fine, but how have those who pulled the trigger come out? If justice isn’t possible, then hang us too—at least the pain will end.”

Similarly, the family of 15-year-old Nitin Sugarth is in shock. Nitin had stepped out for fast food, but the riots took his life. Families fear that bail will increase pressure on witnesses and make justice harder.

On one side, victim families are shedding tears of blood demanding justice; on the other, a letter written by New York’s newly elected Mayor Zohran Mamdani to Umar Khalid (in December 2025) is sparking international debate. On one hand, a father’s broken heart; on the other, foreign political support.

Protests against CAA-NRC in February 2020 turned violent. In Northeast Delhi areas, 53 people were killed-including women, children, and the elderly-and hundreds were injured. Police investigations revealed it was not spontaneous but a premeditated conspiracy. WhatsApp groups, digital communications, and organized resources fueled the violence. The police described it as an ‘attack on India’s sovereignty,’ leading to hundreds of arrests under UAPA.

The court differentiated based on roles. There is a strong prima facie case against Umar Khalid and Sharjeel Imam—they were the ‘central orchestrators’ of the conspiracy. The other five were described as having an ‘assisting’ role, so they received bail with strict conditions (surrendering passports, no social media posts, no contact with witnesses). Umar Khalid and Sharjeel may file fresh pleas after one year. This decision provides some relief to victims that the main conspirators remain in jail.

The Supreme Court’s verdict is a step toward justice, but the wounds of the riots are still fresh. Those celebrating the bails are enemies of the nation’s unity. The country must condemn such elements. Victims deserve a thorough investigation, a fair trial, and strict punishment.

Those celebrating should remember—lost lives will not return, but justice can bring peace. Such celebrations must stop, otherwise division will grow. The truth of the 2020 Delhi riots is yet to fully emerge. Justice must prevail, not celebrations by conspirators. The pain of victims will continue until justice is served.

जुबिन गर्ग की रहस्यमय मौत: सिंगापुर पुलिस ने लगाया सवालिया निशान

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी: मशहूर असमिया गायक जुबिन गर्ग के लाखों प्रशंसकों के लिए सिंगापुर से आई ताज़ा खबर एक बार फिर निराशा लेकर आई है। पिछले वर्ष 19 सितंबर को सिंगापुर में हुई जुबिन गर्ग की रहस्यमय मौत को लेकर वहां की पुलिस ने अपनी जांच में इसे एक दुर्घटना (हादसा) करार दिया है। सिंगापुर पुलिस के अनुसार, जुबिन की मौत नशे की हालत में समुद्र में तैरते समय डूबने से हुई और इसमें किसी तरह की साज़िश या आपराधिक पहलू सामने नहीं आया।

दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक द स्ट्रेट्स टाइम्स (The Straits Times) ने 14 जनवरी को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया कि 53 वर्षीय जुबिन ने शराब पी रखी थी और यॉट से समुद्र में उतरने से पहले लाइफ जैकेट पहनने से इनकार कर दिया था। यह हादसा लाजरस द्वीप के पास हुआ, जहाँ तैरते समय वह डूब गए।

सिंगापुर पुलिस के जांच अधिकारी डेविड लिम ने कोरोनर की पूछताछ के दौरान गवाही देते हुए बताया कि जब जुबिन के दोस्तों ने उन्हें वापस यॉट पर लौटने के लिए मनाने की कोशिश की, तो वह अचानक अचेत हो गए। उन्हें तुरंत समुद्र से बाहर निकालकर यॉट पर लाया गया और प्राथमिक उपचार किया गया, लेकिन बाद में सिंगापुर जनरल अस्पताल में शाम 5.15 बजे (स्थानीय समयानुसार) उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने दोहराया कि मौत का कारण डूबना ही था।

जांच में यह भी स्पष्ट किया गया कि जुबिन गर्ग पर न तो किसी तरह का दबाव था और न ही आत्महत्या जैसी कोई प्रवृत्ति सामने आई। यॉट के कप्तान ने उन्हें कई बार लाइफ जैकेट पहनने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, जुबिन के खून में प्रति 100 मिलीलीटर 333 मिलीग्राम अल्कोहल पाया गया था, जिससे उनके संतुलन और प्रतिक्रिया क्षमता पर गंभीर असर पड़ा होगा।

उल्लेखनीय है कि सिंगापुर में शराब पीकर वाहन चलाने की कानूनी सीमा मात्र 80 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर खून है। यॉट के कप्तान ने अदालत को बताया कि मरीना में लगभग 15 लोग जहाज पर सवार हुए थे, जिनमें से कई—ज्यादातर असम एसोसिएशन सिंगापुर के सदस्य—पहले से ही नशे में थे। कप्तान के अनुसार, जुबिन इतनी लड़खड़ा रहे थे कि जहाज पर चढ़ते समय उनके दोस्तों को उन्हें सहारा देना पड़ा। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी ने उन्हें शराब पीने या समुद्र में उतरने के लिए मजबूर नहीं किया था।

जुबिन 20 सितंबर को सिंगापुर के सनटेक कन्वेंशन एंड एग्ज़ीबिशन सेंटर में आयोजित चौथे नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल (NEIF) में प्रस्तुति देने के लिए सिंगापुर आए थे। 19 से 21 सितंबर 2025 तक आयोजित यह कार्यक्रम भारत–सिंगापुर राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ और भारत–आसियान पर्यटन वर्ष के उपलक्ष्य में हुआ था। 

समाचार एजेंसी PTI के अनुसार, यह फेस्टिवल ट्रेंड MMS द्वारा सिंगापुर स्थित भारतीय उच्चायोग, विदेश मंत्रालय, उत्तर-पूर्वी राज्यों की सरकारों तथा असम और नॉर्थ ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित किया गया था। इससे पहले NEIF बैंकॉक (2019, 2022) और हो ची मिन्ह सिटी (2023) में आयोजित हो चुका है। इस फेस्टिवल के प्रचार के लिए जारी एक प्रोमो वीडियो में भी जुबिन नजर आए थे, जो इंस्टाग्राम पर उपलब्ध है (https://www.instagram.com/p/DOq2U7ZgvKY/) । हालांकि सिंगापुर पुलिस की रिपोर्ट में जुबीन गर्ग की मौत को दुर्घटना बताया गया है, लेकिन असम में यह मामला एक बड़े जनआक्रोश का कारण बन गया।

जनता के दबाव में असम सरकार को मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करना पड़ा। SIT ने अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें NEIF के आयोजक श्यामकानु महंत, जुबीन के मैनेजर सिद्धार्थ शर्मा, संगीत सहयोगी शेखरज्योति गोस्वामी और अमृतप्रभा महंत, उनके चचेरे भाई संदीपान गर्ग और दो निजी सुरक्षा अधिकारी शामिल हैं।

जांच से जुड़ी अहम जानकारियाँ जुटाने के लिए असम पुलिस की एक टीम सिंगापुर भी गई। 12 दिसंबर को 2,500 से अधिक पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया गया और ट्रायल शुरू हो चुका है। सुरक्षा कारणों से सभी आरोपियों को कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) जिला सत्र न्यायालय में वर्चुअल रूप से पेश किया जा रहा है।
इस बीच, जुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने असम सरकार और केंद्र सरकार से अपील की है कि सिंगापुर में चल रही अदालती प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखी जाए, ताकि आवश्यक कूटनीतिक और कानूनी हस्तक्षेप किया जा सके। उन्होंने इस मामले में फास्ट-ट्रैक सुनवाई के लिए विशेष बेंच गठित करने की भी मांग की है, क्योंकि 300 से अधिक गवाहों की सुनवाई में वर्षों लग सकते हैं।

मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के उन बयानों की आलोचना की है, जिनमें उन्होंने जुबिन की मौत को साज़िशन हत्या बताया था। कांग्रेस का सवाल है कि जब सिंगापुर के अधिकारी लगातार इसे दुर्घटना बता रहे हैं, तो असम की जनता किस पर भरोसा करे।

विपक्ष की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री शर्मा ने अपना रुख बरकरार रखा और कहा कि असम पुलिस की जांच सिंगापुर पुलिस से अधिक गहन है। भले ही सिंगापुर जांच एजेंसियों को कोई आपराधिक पहलू न मिला हो, लेकिन असम पुलिस ने सात में से चार आरोपियों पर हत्या का आरोप लगाया है।

एक कानूनी जानकार के अनुसार, यदि सिंगापुर की अदालत का फैसला पहले आ जाता है, तो उसका असर भारत में चल रही न्यायिक प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। ऐसे में न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लाखों प्रशंसकों में गहरी निराशा फैलने की आशंका है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस संवेदनशील मामले का राजनीतिक इस्तेमाल भी जुबिन के लिए न्याय की लड़ाई को कमजोर कर सकता है।

बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या सिंगापुर पुलिस की रिपोर्ट असम की SIT जांच और अदालत की प्रक्रिया पर निर्णायक असर डालेगी, या जुबिन के लिए न्याय की मांग यूँ ही उलझी रह जाएगी?

(पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

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दिल्ली । सुबह का अलार्म बजता है। प्राइवेट स्कूल के चपरासी बाबू लाल के मोबाइल की स्क्रीन पर “गुड मॉर्निंग” चमकती है, लेकिन उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं। घर के आंगन में पड़े अख़बार के पहले पन्ने पर भारत की तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी की सुर्ख़ियाँ हैं, GDP, ग्रोथ, स्टार्टअप, ग्लोबल रैंक। घर के अंदर पत्नी ऊषा, रसोई में उबलता दूध भरोसे के साथ नहीं, शक के साथ देखती है। यह वही भारत है, जहाँ सपनों की उड़ान और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई हर दिन चौड़ी हो रही है।

सवाल यह नहीं कि देश आगे बढ़ रहा है या नहीं; सवाल यह है कि क्या इस दौड़ में “बाबू लाल” साथ चल पा रहा है, या वह बस आँकड़ों की परछाईं बनकर रह गया है?

डिजिटल इंडिया के इस दौर में आप एक इंसान नहीं, बल्कि नंबरों का जोड़ हैं, आधार, पैन, मोबाइल OTP, क्रेडिट स्कोर और वोटर ID, यानी आपकी ज़िंदगी से ज़्यादा क़ीमती आपका डेटा है। सिस्टम आपको पहचानता नहीं, स्कैन करता है। सुविधा मिली है, लेकिन साथ में यह एहसास भी कि आप हर पल देखे जा रहे हैं, नापे जा रहे हैं।

हर मंच से ‘विकसित भारत’ का नारा गूंज रहा है। मैक्रो आँकड़े वाक़ई दमदार हैं, 2024 में औसत GDP वृद्धि 6.3%, 2025–26 की दूसरी तिमाही में 8.2% की छलांग। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, स्टार्टअप इकोसिस्टम में तीसरे स्थान पर। 2047 तक “हाई-इनकम कंट्री” बनने के लिए 7.8% की औसत वृद्धि चाहिए, यह सब प्रेज़ेंटेशन की स्लाइड्स में आकर्षक लगता है ।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तरक़्क़ी आम आदमी की थाली, उसकी सेहत, उसकी सड़क और उसकी सांस तक पहुँची है ?

बाबू लाल टाइप आम आदमी की सुबह मोटिवेशनल कोट से नहीं, मिलावट के डर से होती है। दूध का पैकेट खोलते वक़्त भरोसा नहीं कि उसमें दूध है या केमिकल। मसाले रंगीन हैं, मगर स्वाद से ज़्यादा बीमारी परोसते हैं। मछली ताज़ा दिखती है, लेकिन ज़हर साबित होती है। 2025 में हर चार में से एक खाद्य पदार्थ सेफ्टी टेस्ट में फेल पाया गया। पिछले दस साल में 25% सैंपल नॉन-कन्फ़ॉर्मिंग निकले, 50% घटिया और 15% सीधे असुरक्षित। 2022 में 4,300 से ज़्यादा मिलावट के मामले दर्ज हुए, असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है। इंदौर जैसे “स्वच्छता मॉडल” शहर भी इस विडंबना से अछूते नहीं। यह कैसा विकास है, जहाँ हर कौर के साथ डर भी निगलना पड़े?

घर से बाहर कदम रखते ही दूसरी जंग शुरू होती है, सड़कों की। गड्ढे, खुले मैनहोल, उलटी दिशा में दौड़ते वाहन और ट्रैफिक नियमों का खुलेआम मज़ाक। पैदल चलना अब रोज़ का जोखिम बन चुका है। 2024 में सड़क हादसों में 1.77 लाख लोगों की मौत हुई, यानी रोज़ औसतन 485 जानें। साल-दर-साल 2.3% की बढ़ोतरी। उत्तर प्रदेश में 2025 के पहले 11 महीनों में ही 24,776 मौतें, 14% का उछाल। एक्सप्रेसवे की तस्वीरें होर्डिंग्स पर चमकती हैं, लेकिन मोहल्ले की सड़क आज भी टूटी है। यही है मैक्रो-डेवलपमेंट और माइक्रो-पेन का सबसे बेरहम टकराव, हर नागरिक अनजाने में ‘खतरों के खिलाड़ी’ बन चुका है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत और भी अफ़सोसनाक है। सरकारी अस्पतालों में लंबी लाइनें, कम बेड और उससे भी कम संवेदनशीलता। भारत में प्रति 10,000 आबादी पर सिर्फ़ 20.6 हेल्थकेयर वर्कर हैं, जबकि WHO का मानक 44.5 का है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च GDP का महज़ 1.3%। दवा मिल जाए तो किस्मत, इलाज मिल जाए तो करिश्मा। निजी अस्पताल हैं, लेकिन आम आदमी के लिए वे इलाज नहीं, आर्थिक सज़ा हैं। बीमारी सिर्फ़ शरीर नहीं तोड़ती, जेब और आत्मसम्मान भी छीन लेती है।

कामकाजी ज़िंदगी में भी राहत नहीं। औसतन 46.7 घंटे का वर्क-वीक, लेकिन 51% कर्मचारी 49 घंटे से ज़्यादा खटते हैं। 58% वर्कफ़ोर्स बर्नआउट का शिकार है। थकान को देशभक्ति का तमगा दे दिया गया है, 70 घंटे काम करो, सवाल मत पूछो। मेहनत से ज़्यादा चमचागिरी का मोल है। सम्मान योग्यता से नहीं, ओहदे और बैंक बैलेंस से तय होता है। असमानता की दीवार हर दिन ऊँची हो रही है।

डिजिटल इंडिया ने सुविधा दी, लेकिन नया डर भी। 60% भारतीयों को रोज़ कम से कम तीन स्पैम कॉल आते हैं। 2025 में डिजिटल ठगी से ₹26 अरब का नुकसान हुआ। बुज़ुर्गों के लिए यह दुनिया भूलभुलैया है, एक ग़लत क्लिक और जीवनभर की कमाई ग़ायब। तकनीक किसके लिए है, आम आदमी के लिए या उसे ठगने वालों के लिए?

और पर्यावरण, जिसे हमने विकास की वेदी पर कुर्बान कर दिया। 2025 में कई शहरों में AQI 500 के पार चला गया, दिल्ली समेत। देश की 27.77% ज़मीन बंजर होती जा रही है। 4.07 करोड़ लोग चरम मौसम की मार झेल रहे हैं। हवा ज़हर बन चुकी है, नदियाँ नाले, गर्मी जानलेवा और बारिश तबाही। यह प्रकृति का बदला नहीं, हमारी अपनी नीतियों का नतीजा है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि हालात खराब हैं, बल्कि यह कि हमने उन्हें “नॉर्मल” मान लिया है। गड्ढों से बचकर चलना, मिलावट से डरकर खाना, इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, स्पैम कॉल्स को गालियाँ देना, सब रूटीन बन चुका है। शिकायत अब ग़ुस्से में नहीं, थकी हुई बेबसी में होती है।
‘विकसित भारत’ का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आम आदमी सिर्फ़ “सहन” करता रहेगा, “जीएगा” नहीं। असली विकास वही है जो सड़क पर दिखे, अस्पताल में महसूस हो, थाली में भरोसे के साथ परोसा जाए और हवा में सांस लेने लायक हो। वरना यह चमकता नारा एक दिन धुंध में खो जाएगा, और पीछे रह जाएगा एक थका, ख़ामोश समाज, जो बस यही पूछता रहेगा: अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

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