अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

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दिल्ली । अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है। साथ ही, इसी क्रम में डेनमार्क द्वारा शासित ग्रीनलैंड द्वीप पर भी अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है। सोचनीय विषय है कि डेनमार्क नाटो का सदस्य देश होने के चलते वह अमेरिका का मित्र राष्ट्र है और मित्र राष्ट्र की सीमाओं में घुसकर उसके आधिपत्य वाले क्षेत्र को अमेरिका द्वारा बलपूर्वक अपने देश की सीमा में शामिल करने का प्रयास करना उचित कदम नहीं कहा जा सकता है। कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कनाडा के राष्ट्रपति को धमकी दी थी कि अमेरिका कनाडा को अपना 51वां राज्य बनाना चाहते हैं। ध्यान रहे कनाडा भी अमेरिका के मित्र राष्ट्र के देशों की सूची में शामिल है। परंतु, जब अमेरिका जैसा देश साम्राज्यवादी सोच के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं, तो मित्र राष्ट्र का ध्यान भी नहीं रह पाता है।

अमेरिका द्वारा हाल ही में ब्रिक्स के सदस्य देशों (भारत, रूस, चीन एवं ब्राजील) पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी देना केवल अमेरिका की व्यापार नीति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की सीधी कोशिश है। 500 प्रतिशत का यह टैरिफ रूस, चीन, ब्राजील और भारत पर नहीं बल्कि ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा डीडोलराईजेशन की ओर अपने कदम बढ़ाने को रोकने का एक प्रयास है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में किए जाने वाले विदेश व्यापार का एक दूसरे को भुगतान अब स्थानीय मुद्रा में करते दिखाई दे रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर पर दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा हैं। ब्रिक्स की मुद्रा व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा व्यापार सम्बंध एवं डॉलर मुक्त भुगतान व्यवस्था अमेरिका के लिए एक रणनीतिक खतरे के रूप में उभर रही है। इसीलिए अमेरिका छोटे देशों की तरह ही बड़े देशों को भी अनुशासित करना चाहता है। परंतु, यहां अमेरिका यह भूल जाता है कि वेनेजुएला, डेनमार्क, क्यूबा, मेक्सिको आदि छोटे देश हैं जो अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं परंतु भारत, चीन, रूस एवं ब्राजील जैसे बड़े देशों पर अमेरिका का दबाव काम नहीं कर पाएगा। ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान विदेश नीति को 20वीं सदी की “हस्तक्षेपवाद.2” की नीति कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले 250 वर्षों में अमेरिका ने विश्व के अन्य देशों में 400 बार हस्तक्षेप किया है। अमेरिका के लिए यह एक पैटर्न है आश्चर्य में डालने वाली घटना नहीं है। अमेरिका ने पूर्व में भी आर्थिक दबाव डालकर एवं सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन कराने में भी सफलता हासिल की है। और, यह पैटर्न आज भी जारी है। अमेरिका भारत एवं चीन पर केवल इस कारण से भी 500 प्रतिशत टैरिफ लगाना चाहता है क्योंकि ये देश रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। आज के इस युग में अब अमेरिका निर्णय लेगा कि किस देश को कच्चा तेल किस देश से खरीदना है। यह साम्राज्यवाद अथवा अधिनायकवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है?

इसी प्रकार, ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व के 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका की सदस्यता को समाप्त करना भी वैश्विक व्यवस्था का पुनर्निर्माण नहीं बल्कि अमेरिका का विश्व में एक छत्र राज्य स्थापित करने की सोच का नतीजा हो सकता है। अमेरिका किसी भी अन्य ब्लाक अथवा देश के साथ मिलकर विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता है बल्कि अमेरिका केवल अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इस रणनीति के अंतर्गत वैश्विक संगठनों एवं संस्थाओं को कमजोर करने के एकपक्षीय अमेरिकी शक्ति मॉडल को लागू करना ही मुख्य लक्ष्य हो सकता है।

आज अमरीका में ट्रम्प प्रशासन इससे भी परेशान है कि आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिमी देशों से पूर्वी देशों की ओर खिसकता जा रहा है। इससे ट्रम्प को पूरे विश्व में अमेरिका का आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति को धक्का लगता हुआ दिखाई दे रहा है। संख्या, जनसंख्या, संसाधन एवं बाजार के आधार पर आगे आने वाला भविष्य पूर्व के आस पास दिखाई देता है, अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता है। अमेरिका आज नहीं चाहता कि चीन, रूस एवं भारत मिलकर विश्व में शक्ति की एक धुरी बनें। साथ ही, ट्रम्प यह भी नहीं चाहता कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक स्वायतत्ता बढ़ाने में सफल हो तथा डीडोलराईजेशन की व्यवस्था गति पकड़े और यूरोपीय यूनियन के देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए। यूरोपीय यूनियन के देशों पर अमेरिका अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। परंतु, अब तो यूरोपीय यूनियन के देश भी अपने सुरक्षा बजट में अतुलनीय वृद्धि करते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि अमेरिका पर इन देशों का विश्वास कम हो गया है। ट्रम्प चूंकि बहुध्रुवीय व्यवस्था में विश्वास नहीं करते है और यह व्यवस्था उनके लिए असहनीय है अतः ट्रम्प समस्त देशों पर टैरिफ युद्ध छेड़कर उन्हें दबाव में लाना चाहते है ताकि अमेरिका पूरे विश्व में अपना एक छत्र राज्य स्थापित कर सके। इसीलिए ट्रम्प आज पूरे विश्व में नियंत्रित अशांति चाहता है। दरअसल, आज अमेरिका की आक्रामक साम्राज्यवादी टैरिफ नीति भी वैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी जड़ के रूप में उभर रही है।

इसी क्रम में, अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्यवाही कर ग्रीनलैंड पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कार्यवाही नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान को तोड़ सकती है। नाटो के सदस्य देशों ने स्पष्ट रूप से कहा भी है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड पर हमला नाटो के सदस्य देशों पर किया गया हमला माना जाएगा। इससे यूरोपीयन देशों एवं अमेरिका के बीच दुर्लभ एवं खतरनाक तनाव दिखाई दे रहा है।

वैश्विक स्तर पर वर्तमान में उभर रही परिस्थितियों को सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध में कच्चे तेल की उपलब्धता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना, डॉलर पर अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने के प्रयास ताकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका का मुद्रा पर नियंत्रण लगातार आगे भी बना रहे, समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना, तकनीकी सम्पदा को अपने कब्जे में रखना, वैश्विक सप्लाई चैन को प्रभावित करना एवं आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स आदि के माध्यम से ट्रम्प अन्य देशों पर दबाव बनाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए आज प्रत्यक्ष युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संरचना को पुनर्गठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस रचना में ट्रम्प अपने आप को वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में अमेरिका चाहता है कि दुनिया फिर से उसी मोड में लौट आए, जहां वित्त, व्यापार, सैन्य गठबंधन और तकनीक सब उसकी चौखट पर खड़े हों। आज अमेरिका का लक्ष्य सम्भवत: तीसरा विश्व युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका के प्रभुत्व में पुनर्गठित करना है।

अमेरिका का 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपने आप को अलग करने के क्रम में अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस से बाहर निकलना पूरे विश्व को स्पष्ट संदेश देता है कि अमेरिका की अब पर्यावरण के क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों में भी कोई दिलचस्पी नहीं है तथा वह इस अलायंस को दी जाने वाली अमेरिकी मदद को रोकना चाहता है और वैश्विक स्तर पर केवल अपने प्रभाव को बढ़ाने में ही अपनी पूरी शक्ति लगाना चाहता है। विश्व के भले की बात भी अब अमेरिका को नागवार गुजर रही है। जबकि आज जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट को कम करने अथवा दूर करने में समस्त देशों का आपसी सहयोग अति आवश्यक है। भारत एवं फ्रान्स के संयुक्त नेतृत्व में बनाया गया यह मंच विकासशील देशों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है। विश्व के अन्य देशों में यह भावना विकसित हो रही है कि आज वैश्विक स्तर पर एक ऐसी दुनिया विकसित होती दिखाई दे रही है जिसमें अमेरिका अकेला खड़ा हो एवं विश्व के अन्य समस्त देश आपस में तालमेल रखते हुए अपने विकास को गति दें। वैसे भी, विश्व पहिले से ही इस मुहाने पर आकार खड़ा है जहां अकेले चलना बहुत मुश्किल है हर पग पर विभिन्न देशों को अन्य देशों के सहायता की अति आवश्यकता है। एक दूसरे के सहयोग के बिना सम्भवत: कोई भी देश आज आर्थिक विकास के पथ पर अपनी दौड़ को गति प्रदान नहीं कर पाएगा। इसीलिए वैश्विक स्तर पर आज नए नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर ये देश आपस में मुक्त व्यापार समझौते तेजी से सम्पन्न कर रहे हैं ताकि ये, अपने देश के आर्थिक विकास की गति को तेज कर सकें।

Yamuna – The Lifeline of Delhi: Pollution vs Solution

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New Delhi | Recognising the Yamuna River as the lifeline of Delhi and the urgent need for collective action to address its pollution, the 1st Annual Conference – “Yamuna: Pollution vs Solution” was organised today as a half-day, stakeholder-driven and action-oriented platform.

The conference was convened under the concept of “Yamuna Sangam”, envisioned as a collaborative platform to connect SMEs, government representatives, scientists, environmental experts, authors, media professionals, NGOs, educators, youth and community members actively engaged in the conservation and rejuvenation of the Yamuna River. The initiative brought together a true sangamof ideas, expertise and on-ground experience to deliberate on sustainable solutions.

The event was organised in collaboration with Bal Bharati Public School, Ganga Ram Hospital Marg, and was supported by the National Mission for Clean Ganga (NMCG), Ministry of Jal Shakti. The conference aimed to strengthen the transition from Jal Bhagidari to Jan Bhagidari, reinforcing river conservation as a Jan Andolan.

A key highlight of the conference was the address by Mohd Najeeb Ahsan, who shared valuable insights into the Namami Gange Mission and ongoing initiatives for river rejuvenation. Dr Gladbin Tyagihighlighted the health impacts of Yamuna pollution on communities, underlining the urgent need for integrated environmental and public health interventions. The event was graced by Capt Vikas Gupta, Chairman, UPCAR (MoS).

The conference witnessed the participation of a diverse audience, including Gen Z participants, students, NGOs and community volunteersworking across various Yamuna ghats. Beyond discussions, the conference successfully facilitated networking, dialogue and collaboration among stakeholders to enhance collective impact.

As a key outcome, working groups were formed for individual Yamuna ghats, enabling stakeholders to collaborate regularly on solution-oriented, on-ground initiatives at their respective locations. This approach was envisaged to ensure continuity, coordination and sustained engagement for the rejuvenation of the Yamuna.

Through Yamuna Sangam, the conference moved beyond dialogue to promote collective ownership, coordinated action and long-term partnerships, reaffirming a shared commitment to restoring the Yamuna River and safeguarding the ecological and public health future of Delhi.

A.R. Rahman’s Revelation: Less Work in Bollywood Over 8 Years, But Not Due to Discrimination

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Mumbai : In a recent interview, A.R. Rahman mentioned receiving less work in Bollywood over the past 8 years, linking it to changes in power structures, the influence of non-creative people, and possibly a communal atmosphere. However, directly attributing this to “not getting work because he is Muslim under the Modi government” is factually incorrect and exaggerated.

Rahman’s statement pertains to Bollywood (a private industry), not government jobs or projects assigned by the Modi government. The government does not directly provide work in the film industry.

01. Rahman’s comment is about Bollywood (private industry), not government employment or projects given by the Modi government. The government does not directly assign work in films.

2. During the Modi government’s tenure, Rahman has received 3 National Awards (out of his total 7), which are government honors—this counters any claim of discrimination.

3. In Bollywood, Muslim superstars like Shah Rukh Khan, Salman Khan, and Aamir Khan remain at the top even today; many Muslim artists continue to work actively.

4. Rahman himself is busy with South Indian films and global projects (such as Ramayana)—the reduction is only in Hindi films, which appears linked to industry changes (corporatization, influence of music labels), not religion.

5. Associates like Javed Akhtar and others have stated there is no communal angle; work depends on talent and networks.

This claim, when given a political color, becomes exaggerated, while the facts point in the opposite direction.

रोजा से रामायण तक: एआर रहमान क्यों कहते हैं बॉलीवुड ने दूरी बनाई?

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मुम्बई। एआर रहमान के हालिया इंटरव्यू में बॉलीवुड में काम कम मिलने की बात ने चर्चा बटोरी है, लेकिन इसे सीधे मोदी सरकार या धार्मिक भेदभाव से जोड़ना अतिरंजित और तथ्यों से परे है।

रहमान ने बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में कहा कि पिछले 8 सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उनके लिए काम कम हुआ है। उन्होंने इसे पावर स्ट्रक्चर में बदलाव से जोड़ा, जहां अब नॉन-क्रिएटिव लोग फैसले ले रहे हैं। उन्होंने “कम्यूनल थिंग” का जिक्र किया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह उनके सामने नहीं, बल्कि “चीनी व्हिस्पर्स” की तरह सुना गया है। वे इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेते और कहते हैं कि वे परिवार के साथ समय बिताने में खुश हैं, काम की तलाश नहीं करते।

यह बयान प्राइवेट इंडस्ट्री (बॉलीवुड) के बारे में है, न कि सरकारी नीतियों या मोदी सरकार द्वारा दिए प्रोजेक्ट्स का। फिल्म इंडस्ट्री में सरकार डायरेक्ट काम नहीं देती। उल्टा, मोदी सरकार के दौरान रहमान को 3 नेशनल अवॉर्ड्स मिले हैं (उनके कुल 7 में से), जो सरकारी सम्मान हैं और किसी भेदभाव की बात को खारिज करते हैं।

बॉलीवुड में आज भी शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान जैसे मुस्लिम सुपरस्टार्स टॉप पर हैं और कई मुस्लिम कलाकार सक्रिय हैं। जावेद अख्तर और शान जैसे सहयोगी भी कहते हैं कि कोई कम्यूनल एंगल नहीं है—काम प्रतिभा, नेटवर्क और उपलब्धता पर निर्भर करता है।

रहमान खुद साउथ फिल्मों में व्यस्त हैं और ग्लोबल प्रोजेक्ट्स पर फोकस कर रहे हैं। वे रामायण (नितेश तिवारी की फिल्म) के लिए हंस जिमर के साथ संगीत बना रहे हैं, जो हिंदू-मुस्लिम-यहूदी कलाकारों का सहयोग है। अंतरराष्ट्रीय सफलता (ऑस्कर, ग्रैमी) और एआई जैसे विषयों पर भी वे खुलकर बोलते हैं।

कुल मिलाकर, बॉलीवुड में कमी इंडस्ट्री के बदलावों (कॉर्पोरेटाइजेशन, म्यूजिक लेबल्स का प्रभाव) से जुड़ी लगती है, न कि धर्म से। रहमान का बयान राजनीतिक रंग देकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है, जबकि तथ्य उनके करियर की विविधता और सरकारी सम्मानों से विपरीत दर्शाते हैं।

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