संस्कृति और आत्मगौरव के लिए नोएडा में दो भव्य कार्यक्रमों का आयोजन

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दिल्ली । आज दिनांक 11 जनवरी 2026 दिन रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में नॉएडा में दो भव्य हिंदू सम्मेलनो का आयोजन किया गया। 15 फरवरी तक नॉएडा में 140 हिन्दू सम्मलेनों का आयोजन होगा।

सेक्टर 12 में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता राष्ट्र स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम् सिंह के संघ के सौ वर्षो की यात्रा और समाज में पंच परिवर्तन के महत्व के बारे में बताया। कार्यक्रम के अध्यक्ष गोपी शाह जी महाराज जी ने हिंदुत्व की विशेषता एवं वर्तमान चुनौती तथा समाधान पर उद्बोधन दिया। सामाजिक संस्था नेह नीड के बच्चों द्वारा शिव तांडव , भगवान श्री राम की जीवनी तथा पर्यावरण पर नाटक प्रस्तुत किये एवं रामचरित मानस सुंदरकांड समिति द्वारा भजन कीर्तन का आयोजन किया गया। सम्मलेन समिति की अध्यक्षा श्रीमती ऋतू चौहान ने हिन्दू समाज के एकता बल दिया। कार्यक्रम का संचालन बृजेश चौहान ने किया और विश्व हिन्दू परिषद् के जिला महामंत्री दिनेश महावर ने कार्यक्रम में सहयोग के लिए प्रशाषन को धन्यवाद् दिया।


सेक्टर 56 के सामुदायिक केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े श्रीमान गुणवंत सिंह कोटारी रहे जिहोने समाज को मार्ग दर्शन देते हुए पिछले सौ वर्ष के संघर्ष के बारे में बताया।कार्य्रकम की अध्यक्ष आचार्य मिथिलेश मिश्रा जी (भागवत मर्मज्ञ) रहे एवं मुख्य अतिथि श्रीमान विजय कुमार (प्रसिद्ध उद्योगपति) एवं विशिष्ट अतिथि श्रीमान ज्ञानेन्द्र अवाना (सेवा निवृत्त पुलिस उपयुक्त) थे।

कार्यक्रम के अंतर्गत 108 कुण्डीय यज्ञ, वैदिक मंत्रोच्चार एवं धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ का भी आयोजन हुआ, जिससे क्षेत्र में आध्यात्मिक एवं सामाजिक चेतना का संचार हुआ।

जमानत मिली है, कोई युद्ध नहीं जीता गया

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अक्षय शर्मा

दिल्ली दंगों के आरोपियों के स्वागत ने फिर उन जख्मों को हरा कर दिया जो आज भी नहीं भरे

2020 का दिल्ली दंगा, एक ऐसी घटना जिसका जिक्र होते ही लोग आज भी सहम उठते हैं। यह महज एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि वह त्रासदी थी, जिसने देश की राजधानी में सामाजिक ताने-बाने को गहरे स्तर पर झकझोर दिया। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में भड़की हिंसा में 53 निर्दोष लोगों की जान चली गई, सैकड़ों घायल हुए और असंख्य परिवार ऐसे नुकसान से गुजरे, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है।

हाल ही में उसी हिंसा से जुड़े मामलों में जिन आरोपियों को अदालत से जमानत मिली है, उनके जेल से बाहर आते ही जिस तरह फूल-मालाओं से स्वागत किया गया, उसने उन तमाम सवालों को फिर सामने लाकर खड़ा किया है, जिन्हें समय ने अभी शांत नहीं किया है।

सबसे पहले यह तथ्य स्पष्ट होना चाहिए कि इन आरोपियों को बरी नहीं किया गया है। अदालत ने स्वयं जमानत देते समय यह टिप्पणी की है कि जमानत का अर्थ यह नहीं है कि आरोपों की गंभीरता कम हो गई है। न्यायिक प्रक्रिया जारी है, आरोप कायम हैं और अंतिम निर्णय आना अभी बाकी है। अदालत ने जमानत देते समय स्पष्ट किया कि आरोपी किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सभा, प्रदर्शन या राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे।
उन्हें सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से मामले से जुड़े तथ्यों पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं होगी।
अदालत के अनुसार आरोपी ट्रायल में पूरा सहयोग करेंगे और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएंगे।
किसी भी शर्त के उल्लंघन की स्थिति में जमानत रद्द की जा सकती है। इसके बावजूद सार्वजनिक स्तर पर ऐसा संदेश गया, जैसे कि किसी लंबे संघर्ष का अंत हो गया हो या किसी बड़ी जीत का उत्सव मनाया जा रहा हो।

जिन पांच आरोपियों को जमानत मिली है, उनमें गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। अदालत ने प्रत्येक मामले को तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर परखा, लेकिन कहीं भी यह संकेत नहीं दिया गया कि आरोप समाप्त हो चुके हैं। इसके बावजूद स्वागत के दृश्य यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या न्यायिक राहत और सार्वजनिक महिमामंडन के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

फरवरी 2020 की हिंसा उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, करावल नगर, भजनपुरा, चांद बाग, खजूरी खास, गोकुलपुरी और सीलमपुर जैसे इलाकों में फैली थी। इन इलाकों में न केवल संपत्तियों को नुकसान पहुंचा, बल्कि आम नागरिकों का जीवन असुरक्षित हो गया। 53 मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं, वे 53 परिवारों की टूटी हुई दुनिया हैं, जिनके लिए समय वहीं थम गया।

दंगे में अपनी जान गवाने वालों में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा भी शामिल थे। उनकी हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यह हिंसा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने राज्य और समाज दोनों को चुनौती दी। ऐसे में जब इसी हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपियों का स्वागत होता है, तो यह स्वाभाविक है कि पीड़ित परिवारों के मन में पीड़ा और असहजता पैदा हो।

जमानत भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे दोष या निर्दोष के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाता। यह केवल यह सुनिश्चित करने का माध्यम है कि ट्रायल के दौरान आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थित रहें। लेकिन जमानत को विजय के प्रतीक के रूप में पेश करना उस संतुलन को बिगाड़ देता है, जिस पर न्यायिक प्रणाली टिकी होती है।

दिल्ली दंगों के बाद के वर्षों में यह भी देखा गया कि कुछ आरोपी लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहे। कानूनी सहायता, सामाजिक अभियानों और वैचारिक समर्थन के माध्यम से उन्हें व्यापक मंच मिला। इस पूरे विमर्श में दंगों में मारे गए निर्दोष लोगों और उनके परिवारों की आवाज अपेक्षाकृत कमजोर पड़ती दिखाई दी। जिन लोगों ने अपने बेटे, पति या पिता को खोया, उनके लिए न्याय एक लंबी और थकाऊ प्रतीक्षा बन गया।

आज जब वे परिवार टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर यह देखते हैं कि दंगों से जुड़े मामलों में आरोपी व्यक्ति फूल-मालाओं के बीच खड़े हैं, तो यह केवल एक खबर नहीं होती, बल्कि उनके लिए उस दर्द की पुनरावृत्ति होती है, जिससे वे कभी बाहर नहीं आ पाए। उनके लिए यह दृश्य यह सवाल खड़ा करता है कि क्या न्याय की प्रक्रिया के बीच मानवीय संवेदनशीलता कहीं पीछे छूट रही है।

अदालत का संदेश संयमित और स्पष्ट है। आरोप गंभीर हैं, ट्रायल जारी रहेगा और अंतिम फैसला साक्ष्यों के आधार पर होगा। इसके विपरीत, सार्वजनिक स्तर पर जिस तरह की प्रतिक्रिया दिखाई देती है, वह भ्रम पैदा करती है और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को कमजोर करती है। यही वह बिंदु है जहां समाज को ठहरकर सोचने की जरूरत है।

दिल्ली दंगों की पीड़ा अभी समाप्त नहीं हुई है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए न्याय केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि सम्मान और संतोष का प्रश्न है। जब तक अदालतें अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंचतीं, तब तक ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार का उत्सव उन जख्मों को और गहरा ही करता है।

फिल्मों से प्रभावित राजनीति के प्लॉट में सस्पेंस बरकरार है!!

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दिल्ली । अमित शाह की कथित “मास्टरस्ट्रोक” राजनीति ने बिहार में झंडा गाड़ दिया, अब सवाल यह है कि क्या वही हिंदुत्व की आंधी तमिलनाडु के द्रविड़ दुर्ग की मोटी दीवारों में दरार डाल पाएगी? या यह किला, हर बार की तरह, बाहरी हमलों को ठंडे आत्मविश्वास से झेल लेगा?

2026 का तमिलनाडु चुनाव किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, बस फर्क इतना है कि यहाँ हीरो तय नहीं, विलेन भी साफ़ नहीं। भाजपा पूरी ताकत से मैदान में है, लेकिन जमीन अभी भी डीएमके की है। एम.के. स्टालिन सत्ता में हैं, पर आराम में नहीं। गठबंधन मजबूत दिखता है, पर भीतर ही भीतर दरारों की आवाज़ भी सुनाई दे रही है।

चेन्नई के सत्ता गलियारों में फुसफुसाहटें तेज़ हैं, लोग पूछ रहे हैं, क्या अमित शाह की चुनावी मशीनरी पहली बार दक्षिण में हांफेगी? क्या बिखरा हुआ विपक्ष मजबूरी में एकजुट होगा? और क्या कोई नया चेहरा, शायद कोई चमकता सितारा, राजनीति के इस थके हुए मंच पर अचानक स्पॉटलाइट चुरा लेगा?

तमिलनाडु 2026 में लड़ाई सीधी नहीं है। यह विचारधाराओं की कुश्ती है, पहचान की राजनीति है, और अहंकारों का टकराव है। यहाँ जीत उसी की होगी जो खुद को कम आँके, क्योंकि इस चुनाव में आत्मविश्वास से ज़्यादा ख़तरनाक है, आत्ममुग्धता।और यही वजह है कि यह चुनाव जितना रोमांचक है, उतना ही अनिश्चित भी। 

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की डीएमके गठबंधन कागज़ पर सबसे मज़बूत ताकत है। धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) में कांग्रेस, विग्नान केन्द्र चीफ कोऑर्डिनेशन (वीसीके) और लेफ्ट पार्टियाँ मिलाकर 158 सीटें हैं। सिर्फ़ नंबर्स देखें तो स्टालिन का दोबारा लौटना आसान लगता है। लेकिन सियासत इतनी सीधी कहाँ?

पाँच साल की सत्ता के बाद डीएमके पर साफ़ एंटी-इनकंबेंसी का दबाव है। शासन की शिकायतें, भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम, वादों की सुस्त रफ्तार, और नीट (NEET) हटाने में नाकामी से बेचैनी फैल रही है।

मुख्य चैलेंजर है एआईएडीएमके, जो अब फिर से बीजेपी के साथ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) में। 2024 लोकसभा के छोटे झगड़े के बाद पुराने साथी फिर एकजुट हो गए, ताकि एंटी-डीएमके वोट लामबंद हो सकें। बीजेपी के साथ पीएमके और डीएमडीके भी हैं।

अगर ये गठबंधन मज़बूती से चला तो भारी वोट शेयर हासिल कर सकता है। लेकिन एकजुटता ही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। जयललिता युग के बाद एआईएडीएमके अपनी पुरानी ताकत वापस पाने में जूझ रहा है। बीजेपी बढ़ रही है, लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ और समाजिक न्याय की जड़ें रुकावटें हैं। पीएमके के घरेलू झगड़े गठबंधन को और कमज़ोर करते हैं। हिसाब अच्छा है; तालमेल नहीं।

इस माहौल में अनप्रेडिक्टेबल तत्व हैं नए सियासी उखाड़ू। एक्टर विजय का तमिलागा वेट्री कझगम (टीवीके) ने जेन ज़ेड को जोश भर दिया है, जो मतदाताओं का पाँचवाँ हिस्सा हैं। उनकी अपील है साफ़ इमेज, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बयानबाज़ी, और फिल्मों से बनी भावनात्मक कनेक्शन।

लेकिन विजय का सफर पहले ही उलझन भरा रहा। 2025 में कुरूर रैली में भगदड़ से कई मौतें हुईं, जो जांच़ के घेरे में है। समर्थक उन्हें एमजीआर जैसा हीरो मानते हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि करिश्मा नीति की गहराई और संगठन की ताकत की जगह नहीं ले सकता।

सीमेन की नाम तमिल (एनटीके) भी एक फैक्टर है, जो तमिल राष्ट्रवाद और गुस्सैल मतदाताओं को लुभाती है। टीवीके और एनटीके मिलकर 15-20% वोट काट सकते हैं, ज्यादातर एंटी-डीएमके से, जिससे कई सीटों पर नतीजे प्रभावित होंगे।

तमिल सियासत में सिनेमा का असर पुराना है। एमजीआर से जयललिता तक, सिल्वर स्क्रीन के सितारे सत्ता तक पहुँचे। विजय भी वही रास्ता अपना रहे हैं , फैन क्लब को पार्टी यूनिट बनाकर, फिल्मों में राजनीतिक संदेश डालकर। लेकिन कमल हासन की नाकाम कोशिश याद दिलाती है कि शोहरत को विचारधारा और एडमिन विज़न चाहिए।

इधर बीजेपी सांस्कृतिक-धार्मिक मुद्दों से अपनी जादुई पहचान फैला रही है। डीएमके को एंटी-हिंदू , मंदिर प्रथाओं और सनातन धर्म के खिलाफ बताया जा रहा है। लेकिन तमिलनाडु ने धार्मिक ध्रुवीकरण को हमेशा ठुकराया है। समाजिक न्याय, क्षेत्रीय गर्व और तर्कवादी सियासत हिंदुत्व से भारी पड़ते रहे हैं।

जाति का खेल फैसला करेगा। दलित, थेवर, गाउंडर, वन्नियार और देवेंद्रकुला वेल्लालर इलाकों में अलग-अलग असर डालेंगे। गठबंधन इन्हीं समीकरणों पर बने हैं, जो टाइट मुकाबले में जीत दिला सकते हैं।

शासन के मसलों पर बेरोज़गारी, महंगाई और कल्याण योजनाएँ हावी हैं। डीएमके ने पोंगल पर नकद मदद, मुफ्त लैपटॉप और औरतों की स्कीमों में इज़ाफा जैसे ताज़ा कदम उठाए हैं। नाम समाजिक सहायता का, मकसद वोटर वफादारी का।

एक और विवादास्पद मसला है वोटर लिस्ट का बड़ा संशोधन, जिसमें करीब एक करोड़ नाम कटे। डीएमके को डर अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के बहिष्कार का, विपक्ष कहता है नकली वोटर साफ़ हो रहे। टाइट रेस में ये फर्क डाल सकता है।
तो तमिलनाडु कहाँ खड़ा है?

डीएमके के पास संगठन की ताकत और गठबंधन की अनुशासन है। लेकिन विपक्ष की बिखरी-फिर भी जोशीली चुनौती, एक्टर विजय की वाइल्ड कार्ड एंट्री और मतदाता थकान इसे अनप्रेडिक्टेबल बनाते हैं। लटका हुआ सदन (त्रिशंकु) या इकतरफा सरप्राइज़ शिफ्ट मुमकिन है।

आखिरकार, पटकथा तमिलनाडु के मतदाताओं के हाथ है, खासकर युवा पहली बार वोट डालने वालों के। क्या वे द्रविड़ ढांचे पर टिकेंगे, या नई आवाज़ें आज़माएँगे? जवाब तय करेगा कि 2026 स्थिरता लाएगा या सियासी हलचल की शुरुआत।

साप्ताहिकअखबार ‘असम वाणी’ की अनचाहे मौत: असमिया पत्रकारिता के एक स्वर्णिम दौर पर विराम!

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी के असम ट्रिब्यून ग्रुप के अखबारों में कोविड-19 महामारी के बाद जो संकट और बढ़ गया, उसके बीच एक लोकप्रिय असमिया साप्ताहिक अखबार 2025 के आखिर में बंद हो गया। ‘असम वाणी’, जो दशकों तक असमिया रीडर्स के लिए मेनस्ट्रीम वीकली थी , पिछले साल सितंबर से बंद हो गई , क्योंकि मैनेजमेंट ने हर शुक्रवार को इसकी प्रिंटिंग जारी रखने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। भले ही सात दशक पुराना असमिया भाषा का वीकली अखबार की स्टॉल से खो गया, लेकिन मैनेजमेंट ने ‘असम वाणी’ के बारे में कोई बयान नहीं दिया। इसके पहले, वीकली अखबार को मीडिया हाउस के जाने-माने असमिया डेली ‘दैनिक असम’ के साथ शुक्रवार के सप्लीमेंट के तौर पर मर्ज कर दिया गया था।

कभी सतीश चंद्र काकती, तिलक हज़ारिका, फणी तालुकदार, निरोद चौधरी, होमेन बरगोहेन, चंद्रप्रसाद शैकिया जैसे जाने-माने असमिया पत्रकार-लेखकों द्वारा एडिट किए जाने वाले इस वीकली के आखिरी एडिटर दिलीप चंदन थे, जिन्होंने लगभग तीन दशकों तक ‘असम वाणी’ में काम किया। 1 जुलाई 1955 को मशहूर असमिया एंटरप्रेन्योर राधा गोविंद बरुआ ने इसे शुरू किया था। इस वीकली ने असमिया मीडियम (स्कूलों में पढ़ाई का) मूवमेंट, असम में घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन, अलगाववादियों के असर वाली बगावत का अचानक बढ़ना, सामाजिक अशांति, क्षेत्रीय राजनीति का उभरना और स्थानीय आबादी के बीच इसकी घटती लोकप्रियता सहित कई ज़रूरी सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों को देखा और रिपोर्ट किया।

जैसे ही महामारी ने असम ट्रिब्यून ग्रुप द्वारा पब्लिश किए जाने वाले सभी अखबारों के सर्कुलेशन पर बुरा असर डाला, इसका असर कमर्शियल कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापन रेवेन्यू में कमी के रूप में देखा गया। पूरे भारत में कई दूसरे मीडिया संस्थानों की तरह, असम ट्रिब्यून ग्रुप को भी गंभीर फाइनेंशियल संकट का सामना करना पड़ा, जिसका असर वर्किंग जर्नलिस्ट समेत कर्मचारियों को अनियमित सैलरी मिलने में दिखने लगा। कर्मचारी यूनियन रिटायर्ड कर्मचारियों के बकाया पेमेंट समेत कई मुश्किलों को लेकर जनता के सामने आई। यूनियन नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि उनके ग्रुप को स्टेट इन्फॉर्मेशन एंड पब्लिक रिलेशन्स डायरेक्टरेट से (पब्लिश किए गए विज्ञापनों के बदले) भारी रकम नहीं मिल रही थी।

जल्द ही पूरे मीडिया ग्रुप के शहर के किसी दूसरे टेलीविज़न हाउस को बेचे जाने की अफवाहें फैल गईं। लेकिन असम ट्रिब्यून मैनेजमेंट ने इसे गलत बताते हुए इसका कड़ा खंडन किया। एक ऑफिशियल बयान में, मैनेजमेंट ने ‘अपनी एडिटोरियल इंडिपेंडेंस, जर्नलिस्टिक इंटीग्रिटी और अपने रीडर्स, एडवरटाइजर्स और स्टेकहोल्डर्स को लगातार सर्विस देने’ का पक्का वादा किया। मैनेजमेंट ने सभी संबंधित लोगों से ‘ऐसी बेबुनियाद अटकलों पर ध्यान न देने और गलत जानकारी फैलाने से बचने’ की भी अपील की। यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि इसका मेन न्यूज़ आउटलेट द असम ट्रिब्यून, जो 4 अगस्त 1939 को शुरू हुआ (पहले एडिटर लक्ष्मीनाथ फुकन थे) और आज भी नॉर्थ-ईस्ट इलाके में सबसे ज़्यादा सर्कुलेट होने वाला इंग्लिश डेली है।

लेकिन प्रफुल्ल गोविंद बरुआ (RG बरुआ के दूसरे बेटे, जिनकी हाल ही में 14 दिसंबर को 93 साल की उम्र में मौत हो गई) की लीडरशिप वाले मैनेजमेंट के भरोसे ने उन्हें ‘दैनिक असम’ की ज़िम्मेदारी, जो अब छह दशक से ज़्यादा पुराना पब्लिकेशन है, सौंपने से नहीं रोका। युवा उद्यमी किशोर बोरा के मीडिया ग्रुप, जो एक असमिया न्यूज़ चैनल ND24 चलाता है, अब ‘दैनिक असम’प्रकाशित कर रहे हैं । यह डील पिछले साल 17 सितंबर को पब्लिक हुई, जिसके बाद नए मैनेजमेंट ने ‘दैनिक असम’ को पब्लिश करने की उत्तरदायित्व ली, लेकिन ‘असम वाणी’की ज़िम्मेदारी लेना पसंद नहीं किया। ‘दैनिक असम’ के सप्लीमेंट के तौर पर, ‘असम वाणी’ 12 सितंबर को आखिरी बार मुद्रित किया गया।

मीडिया जानकारों का मानना है कि ट्रिब्यून हाउस आमतौर पर जानकारी, संपादकीय विचारों और दूसरे लेखों को फैलाते समय अपनी विश्वसनीयता बनाए रखता था, लेकिन हाल के दिनों में उन्हीं सिद्धांतों से काफी हद तक समझौता किया। उनके मुख्य अखबार (द असम ट्रिब्यून) ने 2019 में शुरू हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, जहाँ उसने उस जन आंदोलन को बहुत ज़्यादा जगह दी। इसने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले सताए हुए हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई परिवारों को समर्थन देने की केंद्र सरकार की पहल की निंदा की। इस अराजकता ने असम की ब्रह्मपुत्र घाटी को हफ्तों तक अपनी चपेट में ले लिया।

इसके अलावा, असम के लोगों को याद है कि असम ट्रिब्यून ने पांच साल पहले गुवाहाटी प्रेस क्लब चुनाव की पृष्ठभूमि पर खराब रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जहाँ संपादकीय फोकस पक्षपाती, गैर-जिम्मेदार और प्रेस क्लब के पूर्व सचिव के चरित्र हनन से भरा हुआ था, जिससे इसकी ईमानदारी दांव पर लग गई। असम ट्रिब्यून मीडिया हाउस की मौजूदा वित्तीय स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, लेकिन यह पूरी तरह से महामारी के कारण नहीं हुआ, बल्कि स्थिति को कुछ घमंडी मीडिया पेशेवरों ने जटिल बना दिया, जिन्होंने मीडिया हाउस में सभी उचित लाभों का आनंद उठाया, लेकिन अव्यवस्था पैदा करने की पूरी कोशिश की, और चौंकाने वाली बात यह है कि प्रबंधन टीम मूक दर्शक बना रहा।

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