कलमा नहीं पढ़ पाने पर हिंदुओं पर हमले धर्मांतरण के कुचक्र का नया जाल तो नहीं?

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दिल्ली । गत 27 अप्रैल, 2026 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के मीरा रोड इलाके में 31 साल के जुबैर अंसारी नाम के व्यक्ति ने दो सिक्योरिटी गार्डों राजकुमार मिश्रा और सुब्रतो सेन पर चाकू से हमले की घटना क्या षड्यंत्र के किसी नए ट्रेंड की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है? आरोपित ने पहले गार्डों का धर्म पूछा। धर्म हिंदू बताने के बावजूद उनसे ‘कलमा’ पढ़ने को कहा गया। स्वाभाविक था कि दोनों कलमा नहीं पढ़ पाए, तो उसने उन पर तुरंत ही चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। उल्लेखनीय है कि हमला मीरा रोड के मुस्लिम बहुल नया नगर की रिहायशी इमारत के सुरक्षा गार्डों पर किया गया। मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस कर रही है और इसे आईएसआईएस के ऑनलाइन प्रोपेगेंडा से जोड़ कर ‘लोन वुल्फ’ हमला कहा जा रहा है।

जुबैर मूल रूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला है। मीडिया रिपोर्टो में अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वह साइंस ग्रेजुएट है और ऑनलाइन कोचिंग के माध्यम से गणित और रसायन विज्ञान विषयों की पढ़ाई कराता था। उसके माता-पिता, बहन और पत्नी अमेरिकी नागरिक हैं। वर्क परमिट समाप्त होने के बाद जुबैर 2019 में अमेरिका से भारत लौटा और मीरा रोड क्षेत्र में अकेले रह रहा था। जांच अधिकारियों को उसके मकान से आईएसआईएस विचारधारा और ‘लोन वुल्फ’ अटैक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं।

क्या है लोन वुल्फ अटैक?
लोन वुल्फ हमले का चलन पश्चिमी देशों में भी देखने को मिल चुका है। इसमें आतंकी सोच वाला कोई कट्टरपंथी जिहादी अकेले ही लोगों पर हमला करता है। देखने में आया है कि इस तरह के हमले हथियारों के अलावा निर्दोष राहगीरों पर गाड़ी चढ़ा कर भी किए जाते रहे हैं। इस तरह के हमलों को लोन वुल्फ अटैक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भेड़िए आमतौर पर झुंड में ही शिकार पर हमले करते हैं। लेकिन कभी-कभी यह भी देखने में आया है कि किसी कारण से झुंड से अलग हुआ कोई भेड़िया भूख लगने पर अकेले भी शिकार पर झपट पड़ता है।

पहलगाम के एक साल बाद हमला
क्या यह मात्र संयोग ही है कि कश्मीर के पहलगाम में ठीक एक साल पूरा होने के पांच दिन बाद मुंबई में इस तरह का हमला किया गया है? हम जानते हैं कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने कम से कम 26 हिंदुओं की हत्या की थी। उस जघन्य आतंकी बर्बरता के पीड़ितों ने बताया था कि हमले से पहले उनके संबंधियों से धर्म पूछा गया और हिंदू सुन सुन कर गोली मार दी गई। मीडिया रिपोर्टों में यह जानकारी भी सामने आई कि धर्म सुनिश्चित करने के लिए हिंदू पर्यटकों के पैंट तक उतरवाए गए।

कलमा सुना कर बचाई जान
पता यह भी चला कि आतंकियों ने हिंदुओं की पहचान करने के बाद कुछ सैलानियों से कलमा सुनाने को कहा। कुछ लोगों ने कलमा पढ़ कर अपनी जान बचाई भी। असम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य ऐसे ही सैलानी थे। उन्होंने कलना सुनाया और आतंकियों ने उन्हें नहीं मारा, जबकि वे हिंदू थे। बड़ा प्रश्न यह है कि पहलगाम के हमलावर आतंकियों का उद्देश्य यह संदेश देना भी था कि जो हिंदू कलमा पढ़ सकते हैं, उन्हें आतंकी बर्बरता का शिकार नहीं बनाया जाएगा? दूसरे शब्दों में कहें, तो क्या संदेश यह भी था कि जो हिंदू कलमा याद कर लेंगे, वे इस तरह की आतंकी वारदात की चपेट में आने से बच सकते हैं?

कलमा रटवाने का षड्यंत्र?
पहलगाम नरसंहार के समय तो यह प्रश्न इस तरह के दृष्टिकोण से उभर कर सामने नहीं आया था। लेकिन अब मुंबई में हिंदुओं के कलमा नहीं सुना पाने पर हमले के बाद यह प्रश्न मुखर हो जाता है। हिंदुओं से कलमा सुनाए जाने की अपेक्षा किसी आतंकी सोच वाले व्यक्ति या किसी भी व्यक्ति को करनी ही क्यों चाहिए? यदि उसकी सोच हिंदुओं पर सिर्फ जानलेवा हमला करने भर की थी, तो हिंदू बताए जाने के बाद उसने गार्डों से कलमा सुनाने को कहा ही क्यों? अब एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि दोनों गार्ड कलमा सुना देते, तो क्या उन पर हमला नहीं किया गया होता?

लोन वुल्फ अटैक की पड़ताल
अब कुछ और पहलुओं की पड़ताल कर लेते हैं। प्रथम दृष्टया मुंबई का हमला अचानक सनक में आ कर नहीं किया गया, यह कहा जा सकता है। आरोपित जुबैर के घर से आतंक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। उसने अप्रैल के महीने में ही हमले के षड्यंत्र को जमीन पर उतारा। वह महीना, जब एक साल पहले विश्व के जघन्यतम आतंकी हमलों में से एक को कश्मीर के पहलगाम में अंजाम दिया गया! अब अगर पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर मुंबई में उस तर्ज पर ही हमला किया गया है, तो प्रश्न यह भी है कि भले ही आरोपित अभी एक ही है, लेकिन क्या अंतत: यह लोन वुल्फ अटैक है भी या नहीं?

मुंबई एटीएस मामले की जांच कर रही है। आश्चर्य नहीं होगा कि यह पता लगे कि इस हमले का षड्यंत्र आरोपित जुबैर ने अकेले नहीं रचा था, बल्कि पूरी संस्थागत आतंकी सोच के साथ इसे रचा गया। हमले का उद्देश्य भी एक ही दिखाई देता है कि हिंदुओं को दिमागी तौर पर कलमा याद करने के लिए विवश किया जाए। उन्हें यह संदेश दिया जाए कि यदि ऐसे किसी हमले में इतने भर से ही जान बचाई जा सकती है, तो कलमा याद करने में बुराई क्या है? क्या एक तरह से यह षड्यंत्र धर्म परिवर्तन की जिहाद के ही प्रमुख साधन के रूप में नहीं रचा जा रहा है?

कलमा क्या है?
अब बात कर लेते हैं इस्लाम में कलमा के महत्व की। इस्लाम में छह तरह के कलमों से आस्था की नींव रखी गई है। पहला कलमा है तैयब। सभी छह कलमों में प्रकारांतर से यही कहा गया है कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत नहीं की जा सकती और हजरत मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इस्लाम स्वीकारने वालों के लिए कलमा तैयब पढ़ना पहली आवश्यक शर्त है। वैश्विक मंच पर बहुसंख्य मानव समाज आज विकास के जिस प्रस्थान बिंदु पर खड़ा है, उस वातावरण में सिर्फ कुछ शब्द बोल देने भर से किसी व्यक्ति की आस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो सकता है, यह विचार ही हास्यास्पद लग सकता है। किंतु मध्यकालीन भारत में सनातन समाज के लोगों के धर्म परिवर्तन के लिए तलवार की ताकत के अलावा तरह-तरह के दकियानूसी तरीके भी अपनाए जाते थे, यह सच है।

धर्म परिवर्तन के पुराने षड्यंत्र
भारत में मुगल काल के प्रामाणिक ग्रंथों में हिंदुओं के बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की बहुत सी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आक्रांताओं के अधिकृत लेखकों ने ऐसी बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं। इतिहास बताता है कि जिन हिंदुओं ने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया, उन्हें पूरी निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन सामाजिक मान्यताओं के जाल में फंसा कर बहुत से हिंदुओं को धर्मांतरित घोषित कर दिया गया, यह भी सच है। छलपूर्वक धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिए गए हिंदुओं को अपने ही समाज से बहिष्कृत कर दिया गया और आखिरकार उन्हें इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने को विवश होना पड़ा। बहुत से ऐतिहासिक सुबूतों और लोक कथाओं में ऐसे उल्लेख मिलते हैं।

ऊंच-नीच की जातीय व्यवस्था और कथित अतार्किक धार्मिक कु-मान्यताओं के अनुसार नीची जाति या दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति यदि कुएं में पैर डाल दे या किसी और तरह से जल का स्पर्श कर ले, तो वह जल अपवित्र मान लिया जाता था। ऐसा पानी यदि कोई हिंदू पी ले या पीने के लिए विवश कर दिया जाए, तो उसे धर्म भ्रष्ट और फिर अंतत: धर्मांतरित घोषित कर दिया जाता था। छल या बल पूर्वक मांस से जुड़ा कोई खाद्य पदार्थ या दूसरे धर्म से जुड़ी कोई वस्तु खिला कर भी लोगों को धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिया जाता था। आर्थिक सुरक्षा और पद इत्यादि का लालच दे कर भी धर्म परिवर्तन करा दिया जाता था।

लाउडस्पीकर जिहाद!
कुचक्र आज भी जारी हैं, लेकिन अब विश्व हिंदू परिषद समेत बहुत से जन-समूह सतर्क हो कर काम कर रहे हैं। फिर भी धर्मांतरण के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आज यदि हिंदुओं को कलमा स्मरण कराने का षड्यंत्र रचा गया हो, तो इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रसंगवश, विचारणीय यह भी है कि नमाज के समय पर लाउडस्पीकरों पर अजान के प्रसारण का उद्देश्य भी क्या परोक्ष धर्म परिवर्तन से ही जुड़ा हुआ मसला तो नहीं है?

लाउडस्पीकर के प्रयोग को ले कर कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर निर्णय सुना चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लाउडस्पीकर का उपयोग कर लोगों को जबरन श्रोता बनाना निजता के अधिकार का उल्लंघन है। इससे आगे जा कर, अजान के लिए लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर प्रतिबंध के आग्रही लोगों ने अदालतों में यह तर्क भी दिया है कि उनकी आस्था अनेक देवी-देवताओं में है, इसलिए उन्हें अल्लाह की सर्वोच्चता की घोषणा क्यों सुननी चाहिए, वह भी दिन में कई-कई बार? अजान सुनने से उनकी धार्मिक भावनाओं को आघात लगता है। अगर इस तर्क को मान लिया जाए, तो क्या अजान को ऊंची आवाज में सुनाए जाने को ‘लाउडस्पीकर जिहाद’ कह सकते हैं?

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रवि पाराशर

रवि पाराशर

रवि पाराशर वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में उन्हें लगभग 35 साल का अनुभव है। रवि पाराशर ने नवभारत टाइम्स, टीवीआई, जी न्यूज, आजतक, सहारा इंडिया टीवी में विभिन्न पदों पर सेवाएं दी हैं। वे पीटीआई हिंदी वीडियो सर्विस के लॉन्चिंग एडीटर रहे हैं। रवि पाराशर के लगभग 2500 लेख, रिपोर्ट और समालोचनाएं धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, दैनिक जागरण, पांचजन्य, हिंदू विश्व, राजस्थान पत्रिका, दैनिक ट्रिब्यून इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

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