दिल्ली। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में युवा केवल परीक्षाओं से नहीं जूझ रहा, वह अपने भीतर चल रहे द्वंद्व से भी संघर्ष कर रहा है। एक ओर अथाह जानकारी, कोचिंग, टेस्ट-सीरीज, रणनीतियाँ और संसाधन हैं;दूसरी ओर मन का थक जाना, आत्म-संदेह और यह मौन प्रश्न कि “क्या मैं सच में कर पाऊँगा?” यही वह बिंदु है जहाँ तैयारी केवल अकादमिक नहीं रह जाती, वह मानसिक और भावनात्मक परीक्षा बन जाती है।
हर वर्ष लाखों विद्यार्थी UPSC, SSC, Banking, Railway, NET, JEE, NEET जैसे प्रतिस्पर्धात्मक
क्षेत्रों में प्रवेश का स्वप्न लेकर आगे बढ़ते हैं। प्रारंभ में उत्साह होता है, ऊर्जा होती है, परंतु जैसे-जैसे समय बीतता है, असफलताओं की चोट, तुलना का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ मन को थका देती हैं। यहीं से हताशा जन्म लेती है,और यहीं यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल परिश्रम पर्याप्त है? क्या केवल बुद्धि ही सब कुछ है? या केवल इच्छाशक्ति?
रामचरितमानस की सीख (मार्गदर्शन):
रामचरितमानस की एक अत्यंत सूक्ष्म चौपाई इस स्थिति को अद्भुत स्पष्टता से पकड़ती है:
“जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥”
यह पंक्ति केवल हनुमान के समुद्र-लांघन की कथा नहीं है, बल्कि किसी भी बड़े लक्ष्य की मनोवैज्ञानिक
संरचना को उजागर करती है। “नाघइ सत जोजन सागर” केवल शारीरिक बल का संकेत नहीं है,यह अपने मन, भय, आलस्य और अस्थिरता को पार करने की क्षमता का प्रतीक है। वहीं “मति आगर” केवल बुद्धि नहीं, वह विवेक है, दिशा है, यह समझ है कि ऊर्जा को कहाँ और कैसे लगाया जाए।
आज के युवाओं में प्रायः इन दोनों में से एक की कमी नहीं है, समस्या संतुलन की है। कोई दिन-रात पढ़ रहा है, पर भीतर से टूट चुका है। कोई अत्यंत बुद्धिमान है, विश्लेषण में दक्ष है, पर निर्णय लेने का साहस खो बैठा है। केवल बल आ जाए,तो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है, अनुशासन में रह सकता है, पर यदि बुद्धि नहीं है तो श्रम दिशाहीन हो जाता है। और केवल बुद्धि आ जाए, तो योजनाएँ बनती हैं, विचार होते हैं, पर यदि भीतर का बल नहीं है तो वही योजनाएँ कागज पर ही रह जाती हैं।
हनुमान जी में ये दोनों गुण पूर्ण रूप से विद्यमान थे। उन्हें “अतुलितबलधामं ज्ञानिनामग्रगण्यं” कहा
गया,अर्थात वे अद्वितीय बल के धनी भी थे और ज्ञान में अग्रणी भी। इसके बावजूद, जब माता सीता की
खोज के लिए समुद्र पार करने का समय आया, तो वे एक क्षण के लिए ठिठक गए।
यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि केवल योग्यता का होना ही पर्याप्त नहीं होता, उस योग्यता का निरंतर भान बना रहना भी उतना ही आवश्यक है। जीवन में ऐसा क्षण किसी के भी सामने आ सकता है, जब व्यक्ति भीतर से सक्षम होने के बावजूद स्वयं पर संदेह करने लगता है। संभव है कि आप अत्यंत कुशल हों, परिश्रमी हों, भीतर पर्याप्त बल और क्षमता भी हो, फिर भी किसी चुनौती के सामने खड़े होकर यह भावना घेर ले कि “शायद यह मुझसे नहीं हो पाएगा।” यह आत्म-संदेह अयोग्यता का प्रमाण नहीं होता, बल्कि उस मनोदशा का संकेत होता है जहाँ व्यक्ति अपनी वास्तविक शक्ति से अस्थायी रूप से कट जाता है। ऐसे क्षणों में आवश्यकता किसी नई क्षमता अर्जित करने की नहीं, बल्कि अपनी मौजूदा क्षमता को पहचानने और उस पर पुनः विश्वास स्थापित करने की होती है।यही स्थिति आज के प्रतिस्पर्धी परीक्षार्थियों की है।
कई युवा वास्तव में सक्षम हैं;उनके अंक, उनकी समझ, उनका परिश्रम इसका प्रमाण है। फिर भी वे स्वयं पर विश्वास खो देते हैं। लगातार असफलताएँ, तुलना की संस्कृति, सोशल मीडिया पर दूसरों की “सफलता कथाएँ”, यह सब मिलकर मन में एक ऐसा मौन डर पैदा करता है, जो व्यक्ति को भीतर से रोक देता है।
यहाँ समाधान किसी चमत्कार में नहीं, बल्कि मानवीय संवाद में है। मानस में इसका उत्तर जामवंत के रूप में आता है। जामवंत कोई अलौकिक शक्ति नहीं हैं, वे वह भूमिका हैं, जो जीवन में कोई गुरु, माता-पिता, बड़ा भाई-बहन, मित्र या मार्गदर्शक निभा सकता है। कोई ऐसा, जो हमारी चुप्पी को पढ़ सके और समय पर कह सके;
“का चुप साधि रहेहु बलवाना”
यह प्रश्न डाँट नहीं है, यह झकझोरना है। इसके बाद जामवंत हनुमान को उनका परिचय कराते हैं, उनकी शक्ति, उनकी बुद्धि, उनका विवेक याद दिलाते हैं।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
यही वह क्षण है, जब व्यक्ति को बाहरी स्वीकृति नहीं, बल्कि आत्म-स्मरण मिलता है। आज के युवाओं के लिए यह अत्यंत प्रासंगिक है। कई बार समस्या यह नहीं होती कि हम योग्य नहीं हैं, समस्या यह होती है कि कोई हमें हमारी योग्यता याद दिलाने वाला नहीं होता। और कभी-कभी हम स्वयं
भी अपने सबसे कठोर आलोचक बन जाते हैं।
जब किसी युवा को यह भरोसा मिलता है कि ‘तुम कर सकते हो’, तब उसके भीतर एक सूक्ष्म परिवर्तन
प्रारम्भ होता है। आत्म-संदेह धीरे-धीरे आत्म-विश्वास में रूपांतरित होने लगता है।
रामचरितमानस कहती है;
“सुनतहिं भययु पर्वताकारा।”
यह वह आंतरिक स्पंदन है, जो व्यक्ति को अपनी ही संभावनाओं से परिचित कराता है और उसे सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यही वह निर्णायक क्षण होता है, जब व्यक्ति अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर अपनी वास्तविक शक्ति का
साक्षात्कार करता है।और तब दृष्टि बदल जाती है। जो कार्य असंभव लग रहा था, वह अब चुनौती बन जाता है।
हनुमान कहते हैं;
“लीलहिं नाघहुं जलनिधि खारा।”
अर्थात जिस समुद्र को पार करना असंभव लग रहा था, वह अब खेल जैसा प्रतीत होता है।
आज की प्रतियोगी परीक्षाएँ भी वैसी ही हैं। समस्या परीक्षा में नहीं, बल्कि उस मानसिक भार में है जिसे
हम स्वयं अपने ऊपर लाद लेते हैं। जब तैयारी भय से संचालित होती है, तब हर प्रश्न भारी लगता है। जब
तैयारी आत्म-विश्वास से संचालित होती है, तब वही प्रश्न अवसर बन जाता है।
हर युवा को कभी न कभी अपने जीवन में जामवंत की आवश्यकता होती है। और कभी-कभी, वह जामवंत हमें स्वयं बनना पड़ता है,अपने ही भीतर की आवाज बनकर, जो कह सके; “तुम इस योग्य हो।” आत्म-विश्वास के साथ कोई भी समुद्र असाध्य नहीं रहता।
(लेखिका ज्योतिषी,योग की जानकार और आध्यात्मिक चिंतक हैं)



