Marital Rape : कानून से आगे का सामाजिक औरसांस्कृतिक प्रश्न

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बी कृष्णा

दिल्ली । “हमें शब्दों की ठीक-ठीक समझ होनी चाहिए, उनके वास्तविक अर्थ औरभाव को जानना चाहिए।”

यह वाक्य केवल भाषाई सावधानी का आग्रह नहीं है; यह एक गहरीबौद्धिक चेतावनी है। क्योंकि शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं होते, वेविचारों की दिशा तय करते हैं, समाज की चेतना गढ़ते हैं और धीरे-धीरेसभ्यताओं की संरचना तक को प्रभावित करने लगते हैं।

आज भारत में “Marital Rape” को लेकर जो बहस चल रही है, वहकेवल एक कानूनी संशोधन का प्रश्न नहीं है। यह भाषा, संस्कृति, विवाहसंस्था, परिवार व्यवस्था और राज्य की सीमाओं से जुड़ा हुआ एक गहरासभ्यतागत विमर्श है। इस विषय पर न्यायालयों में याचिकाएँ दायर हैं औरसरकार पर भी दबाव है कि “Marital Rape” को एक पृथक आपराधिकश्रेणी के रूप में मान्यता दी जाए। परंतु इस पूरी बहस में सबसे पहले यहसमझना आवश्यक है कि हम किन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं और उनशब्दों के पीछे कौन-सी वैचारिक संरचनाएँ कार्य कर रही हैं।

“Marital” शब्द “Marriage” से आया है। “Marriage” की आधुनिकअवधारणा मुख्यतः पश्चिमी विधिक चिंतन की उपज है, जहाँ विवाह कोमूलतः एक कानूनी अनुबंध के रूप में देखा गया। यह अधिकारों, दायित्वोंऔर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित संरचना है। इसके विपरीत भारतीयपरंपरा में “विवाह” कभी मात्र अनुबंध नहीं रहा; यह संस्कार है। ऐसासंस्कार जिसमें केवल दो व्यक्ति नहीं जुड़ते, बल्कि दो परिवार, दो वंश, दोजीवन-दृष्टियाँ और दो उत्तरदायित्व जुड़ते हैं। यहाँ संबंध का आधारकेवल अधिकार नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, संयम, सह-अस्तित्व और कर्तव्यभी है।

यही कारण है कि “Marriage” और “विवाह” को बिना संदर्भ के समानमान लेना एक गंभीर बौद्धिक भूल हो सकती है। क्योंकि जब शब्द बदलतेहैं, तो उनके साथ समाज की संबंध-दृष्टि भी बदलने लगती है। संस्कारधीरे-धीरे अनुबंध में बदल जाता है और संबंध साझेदारी से अधिकअधिकार-आधारित कानूनी संरचना बन जाते हैं।

“Marital Rape” की आधुनिक अवधारणा इसी पाश्चात्य वैधानिक ढाँचेसे उत्पन्न हुई है, जहाँ “Consent” अर्थात् स्पष्ट सहमति को सर्वोच्च तत्वमाना गया। इस दृष्टिकोण में यदि वैवाहिक संबंध के भीतर भी किसी पक्षकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध स्थापित किया जाता है, तो उसेअपराध माना जाता है। यहाँ संबंध की प्रकृति गौण हो जाती है और केंद्र मेंव्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता आ जाती है।

निस्संदेह किसी भी प्रकार की हिंसा, जबरदस्ती या अमानवीय व्यवहार कोउचित नहीं ठहराया जा सकता। विवाह किसी भी प्रकार की क्रूरता कालाइसेंस नहीं हो सकता। परंतु भारत में प्रश्न केवल इतना नहीं है कि“सहमति” आवश्यक है या नहीं। प्रश्न इससे कहीं बड़ा है – क्या भारतीयविवाह संस्था को उसी वैचारिक ढाँचे में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है, जिसमें पश्चिमी समाजों ने अपने संबंधों को देखा?

यहीं यह विमर्श केवल कानूनी नहीं, बल्कि सभ्यतागत बन जाता है।

भारतीय भाषिक परंपरा में “बलात्कार” शब्द केवल यौन हिंसा का द्योतकनहीं है। यह किसी की इच्छा, स्वतंत्रता और गरिमा के विरुद्ध किया गयाहस्तक्षेप है ; चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक।भारतीय चिंतन संबंधों को केवल शरीर तक सीमित करके नहीं देखता; वहमन, धर्म, मर्यादा और सामाजिक संतुलन को भी साथ लेकर चलता है।

यदि हम भारतीय शास्त्रीय परंपरा को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँविवाह को कभी निरंकुश अधिकार नहीं माना गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्रमें पति-पत्नी के व्यवहार, संसर्ग और दायित्वों को लेकर स्पष्ट मर्यादाएँनिर्धारित की गई थीं। वहाँ यह भी कहा गया कि किन परिस्थितियों में पतिका व्यवहार दंडनीय हो सकता है और किन स्थितियों में स्त्री पति कापरित्याग कर सकती है। अर्थात् भारतीय परंपरा ने संबंधों के भीतरसंतुलन, मर्यादा और उत्तरदायित्व की आवश्यकता को स्वीकार किया था।

भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी मामला नहीं रहा; यह सामाजिक स्थिरता की मूल इकाई रहा है। दाम्पत्य जीवन कीजटिलताओं को सुलझाने के लिए यहाँ एक सामाजिक-सांस्कृतिकव्यवस्था विकसित हुई थी, जहाँ पति-पत्नी, परिवार, बुज़ुर्ग और समुदायअनेक स्तरों पर संवाद और समाधान की प्रक्रिया का हिस्सा होते थे।संबंधों को केवल दंड और अपराध की दृष्टि से नहीं, बल्कि संतुलन, समझऔर सामाजिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से भी देखा जाता था।

यहीं आधुनिक विमर्श का सबसे बड़ा प्रश्न उभरता है – क्या हर वैवाहिकजटिलता का समाधान केवल आपराधिक कानून है?

क्या राज्य धीरे-धीरे व्यक्ति के सबसे निजी क्षेत्र, उसके परिवार और उसकेbedroom तक हस्तक्षेप का अधिकार प्राप्त कर रहा है?

और यदि ऐसा होता है, तो इसका प्रभाव केवल न्यायिक प्रक्रिया तकसीमित रहेगा या भारतीय परिवार व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक औरसांस्कृतिक संरचना को भी बदल देगा?

इसी संदर्भ में “Marital Rape” का वर्तमान विमर्श केवल एक कानूनीबहस नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की उस वैचारिक पृष्ठभूमि सेजुड़ा हुआ दिखाई देता है, जो परिवार, विवाह और परंपरा जैसी संस्थाओंको सहयोग और सह-अस्तित्व के आधार पर नहीं, बल्कि संघर्ष औरशक्ति-संतुलन के ढाँचे में देखती है। इसी दृष्टिकोण में पति-पत्नी कासंबंध भी आत्मीयता, कर्तव्य और मर्यादा का संबंध न रहकर “power dynamics” अर्थात् अधिकार और नियंत्रण के संघर्ष के रूप में प्रस्तुतकिया जाने लगता है। परिणामस्वरूप विवाह जैसी सामाजिक-सांस्कृतिकसंस्था धीरे-धीरे विश्वास और संतुलन की इकाई से संदेह और वैधानिकहस्तक्षेप की इकाई में परिवर्तित होने लगती है। सांस्कृतिक मार्क्सवाद कायह रूप इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह परिवार और विवाह जैसीसंस्थाओं को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। परिणामस्वरूप वे संस्थाएँ, जो लंबे समय तक सामाजिक स्थिरता और भावनात्मक सुरक्षा का आधारथीं, धीरे-धीरे वैधानिक निगरानी और वैचारिक संघर्ष का क्षेत्र बनने लगतीहैं। यही कारण है कि “Marital Rape” को कानून के अंतर्गत लाने केलिए चल रहा आंदोलन केवल महिला अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्किविवाह संस्था की पुनर्व्याख्या का प्रश्न भी बन गया है।

यहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज स्त्री की गरिमा, उसकीसुरक्षा और उसकी इच्छा की पूर्ण रक्षा सुनिश्चित करे। परंतु समाधानखोजते समय भारत अपनी सभ्यतागत संरचना, सांस्कृतिक मनोविज्ञानऔर संबंध-आधारित सामाजिक व्यवस्था को न भूले।

भारत की परंपरा केवल कानून-आधारित समाज नहीं रही; यहसंबंध-आधारित समाज रही है। यहाँ अधिकारों के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रताके साथ मर्यादा और व्यक्तिवाद के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भीसमान महत्व दिया गया। यदि हम केवल आयातित शब्दावली औरपाश्चात्य वैचारिक ढाँचों के आधार पर भारतीय संबंधों को पुनर्परिभाषितकरेंगे, तो संभव है कि हम समस्या का समाधान खोजने के साथ-साथअपनी सामाजिक संरचना की जड़ों को भी कमजोर कर दें।

इसलिए आवश्यकता केवल कानूनी निर्णय की नहीं है। आवश्यकता इसबात की है कि भारत इस पूरे विषय पर अपनी सभ्यतागत चेतना, अपनीभाषा और अपने सामाजिक अनुभवों के आधार पर गंभीर पुनर्विचार करे।क्योंकि अंततः यह केवल “Marital Rape” का प्रश्न नहीं है; यह इस बातका प्रश्न है कि आने वाले भारत में विवाह को संस्कार माना जाएगा याकेवल अनुबंध।

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