कांग्रेस की मुस्लिम-ईसाई पिच पर मंत्रिमंडल का फंदा

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आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । केरल में कम्युनिस्टों की सत्ता गई तो कांग्रेस नेतृत्व की सरकार आयी पर हिन्दुओं के लिए कुछ भी नहीं बदला है। कम्युनिस्टों की तरह ही कांग्रेसी ने भी सेक्युलरिज्म का नंगा नाच शुरू कर दिए हैं। हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का कार्य कांग्रेसी सरकार ने शुरू कर दिया है। कांग्रेसी सरकार के लिए पहले नम्बर पर मुस्लिम हैं, दूसरे नंबर पर ईसाई है, आखिरी नम्बर पर हिंदू है। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि कांग्रेसी सरकार हिंदुओं को अपना दुश्मन और संघ बीजेपी के समर्थक मानकर काम करेगी। इसलिए आने वाले समय में हिंदुओं के साथ उपेक्षा बढने वाला है, विकास में भेदभाव बढेगा, भागीदारी कमजोर होगी, सुरक्षा की चुनौतियां खतरनाक और हिंसक होने वाली है, लव जिहाद की घटनाएं बढने वाले है, धर्मांतरण की मार भी पडेगी। कहने का अर्थ यह है कि हिंदुओं के लिए कांग्रेस, कम्युनिस्टों से भी ज्यादा खतरनाक और जहरीला साबित होगी।

केरल कांग्रेस सरकार द्वारा सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात सच है या फिर कोरी कल्पना है? अभी अभी तो कांग्रेस की सरकार बनी है फिर सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात कहा से आ गई? यह कोरी कल्पना नहीं है, सौ आने सही बात है। साक्षात प्रमाण है। साक्षात प्रमाण देखिए फिर आपको सेक्युलरिज्म का नंगा नाच भी दिखेगा और कांग्रेस की हिंदुओं के साथ दुश्मनी भी दिखेगी और भेदभाव भी दिखेगा। प्रमाण तो कांग्रेस का मंत्रिमंडल है। मंत्रिमंडल में हिंदुओं को सर्वश्रेष्ठ भागीदारी मिलने की उम्मीद थी, पर उचित भागीदारी भी नहीं मिली। हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले सिर्फ छह लोगों को कांग्रेस सरकार में जगह मिली है जबकि मुस्लिम और ईसाई वर्ग से सात सात लोगो को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। जनसंख्या की कसौटी पर भी यह न्यायसंगत नहीं है और अत्याचार है। केरल की जनसांख्यिकी परिधि और परिस्थितियों को देखना जरूरी ही नहीं है बल्कि अनिवार्यता भी है। केरल में अभी भी हिंदू सर्वश्रेष्ठ है, जनसंख्या इनकी मुस्लिम और ईसाई आबादी से बडी है, मुस्लिम आबादी से तो दुगनी है। हिंदुओं की आबादी 55 प्रतिशत से ही ज्यादा है, मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत, ईसाई आबादी 18 प्रतिशत है। मंत्रिमंडल में मुस्लिम आबादी और ईसाई आबादी को तरजीह देने और हिंदू आबादी को सीमित रखने का संदेश क्या है? जबकि केरल की सत्ता परिवर्तन में हिंदुओं की भूमिका अग्रणी रही है, हिंदुओं ने परिवर्तन के पक्ष में वोट किया, कांग्रेस गठबंधन की किस्मत चमकाई, कम्युनिस्ट गठबंधन की कब्र खोदी। अगर 55 प्रतिशत आबादी एक साथ कम्यूनिस्टों को वोट कर दिया होता तो फिर क्या केरल में कांग्रेस की सरकार बनती?

यह कांग्रेसी की केंद्रीय कृत राजनीति का ही प्रकटीकरण है। मुस्लिम तुष्टिकरण करण और ईसाई तुष्टिकरण का लोमहर्षक प्रदर्शन है। हिंदूद्रोह तो कांग्रेस की जन्मजात रीती नीति रही है। जवाहरलाल नेहरू ने इसे अपना राजनीतिक हथियार बनाया था। जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि हम गलती से हिंदू धर्म में जन्म लिया हूँ, स्वभाव और मन से हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम हूं, इस्लाम के नजदीक हूँ, क्योंकि इस्लाम मुझे प्रभावित करता है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने संविधान में भी विशेष व्यवस्थाएं कराई थी। मुसलमानों को चार शादियां करने का सौगात दिया था। इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी तक यह कडी टूटी नहीं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने मिलकर हिंदुओं के संहार करने का सपना देखा था। दंगा रोधी विधेयक के माध्यम से हिंदुओं के अस्तित्व को ही कुचलने का सपना देखा था। नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर विजय प्राप्त नहीं की होती तो फिर हिंदुओं के अस्तित्व संहार का इनका सपना पूरा भी हो सकता था। प्रचंड हिंदुत्व के प्रवाह ने राहुल गांधी को हारने के लिए बाध्य कर दिया। स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को अमेठी से खदेड दिया था। राहुल गांधी ने मुस्लिम बहुलता वाली लोकसभा सीट वायनाड चुनी। मुस्लिम आबादी ने बहुलता की शक्ति का प्रदर्शन कर लोकसभा भेज दिया, वायनाड से अभी सांसद राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी है। राहुल गांधी ने वायनाड सीट इसीलिए चुनी थी कि क्योंकि वह सीट मुस्लिम बहुल थी, मुस्लिम बहुल होने के कारण उनकी जीत की गारंटी थी। कांग्रेस के हिंदू आतंक की थ्योरी भी कुख्यात रही है। मुस्लिम आतंकवाद को कभी भी इस्लाम से नहीं जोडा, पर प्रत्यारोपित हिंदू आतंक को हिन्दू धर्म से जरूर जोड दिया। जबकि हिंदू आतंक एक फर्जी और हिंदू लक्षित सोच से निकला हुआ कांग्रेसी शब्द था। हिंदू आतंक पर बोलने वाले कांग्रेसी नेता और मनमोहन सरकार में गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि हिंदू आतंक नाम की कोई चीज ही नहीं थी, मेरी पार्टी यानी कांग्रेस ने मुझे हिंदू आतंक को स्थापित करने के लिए कहा था, इसीलिए मैने पार्टी फरमान का पालन करते हुए हिंदू आतंक को स्थापित कर दिया। केरल मे कांग्रेस हमेशा से मुस्लिम समर्थक पार्टी मानी जाती है।

एक बडा प्रश्न यह है कि केरल में मुस्लिम आबादी कांग्रेस को समर्थन क्यों करती है और इनके प्रति सहानुभूति क्यों रखती है, मुस्लिम आबादी को कम्यूनिस्टों का साम्यवाद और धर्म एक अफीम है कि थ्योरी क्यों नहीं पसंद आई?हालांकि कम्युनिस्टों ने भी चुनाव राजनीति की सफलता के लिए अपने निर्धारित सिद्धांत से समझौता किया था और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति खेली थी। तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री विजयन की बेटी ने मुस्लिम से शादी की थी, विजयन ने इसका लाभ उठाने की भी कोशिश की थी। लेकिन कम्युनिस्टों का विकल्प मुस्लिम आबादी के सामने था, क्योकि कम्युनिस्ट सिर्फ सीमित स्तर पर तुष्टिकरण कर सकते थे पर कांग्रेस परिधि मुक्त तुष्टिकरण करने की लिए तैयार थी। इसी कारण मुस्लिम आबादी कांग्रेस को चुनी। जहा तक ईसाई समुदाय के झुकाव की बात है तो फिर कम्युनिस्टों के विकासहीन नीति ने उन्हें विरोधी बनाया और कांग्रेस के लिए लाभकारी बन गये। लेकिन मुस्लिम और ईसाई एकता ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं है। लव जिहाद और धर्मातंरण तथा मुस्लिम आतंकवाद को लेकर ईसाइयों और मुस्लिम आबादी के बीच जिहाद छिड सकता है, शह मात का खेल शुरू हो सकता है। लव जिहाद को लेकर ईसाई समुदाय भी वही सोच रखती है जो सोच हिन्दू वर्ग रखता है। मुस्लिम आतंकवादियों ने केरल में एक ईसाई प्रोफेसर का हाथ काट देने का दुस्साहस किया था जिन्होंने इस्लाम के प्रेरणा पुरूष के खिलाफ कोई असुविधाजनक प्रश्न पत्र बनाये थे।

कांग्रेस ने केरल में पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से कुछ भी नहीं सीखा है। अगर पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से सबक लिया होता तो फिर निश्चित तौर पर केरल मे मुस्लिम और ईसाई सर्वश्रेष्ठता वाली रणनीति नहीं बनायी होती और मंत्रिमंडल का आकार संतुलित होता। ममता बनर्जी भी ऐसी ही रणनीति के वाहक और अभियानी थी। ममता बनर्जी ने सोच लिया था कि पश्चिम बंगाल की 29 प्रतिशत मुस्लिम आबादी उनकी सत्ता को अपराजित बनाते रहेगी। मुस्लिम आबादी के खिलाफ प्रतिक्रिया हुई, हिन्दुत्व की गोलबंदी हुई। हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ममता बनर्जी की सरकार बह गयी। कांग्रेस हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ही केन्द्रीयकृत सरकार से बाहर हुई थी, कई राज्यों में कांग्रेस की हार के पीछे हिन्दुत्व का प्रचंड प्रवाह ही माना जाता है। हिन्दुओं की एकता के सामने असम में भी कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी। केरल में भाजपा आक्रामक तौर पर खडी है। भाजपा ने स्वयं के बल पर दो विधान सभा सीटों पर जीत हासिल की थी, कई विधान सभा सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा है। अगर भाजपा थोडी सी भी मजबूत होती तो फिर कांग्रेस के लिए उम्मीद ना उम्मीदी में तब्दील हो जाती। भाजपा भी जनाधार के आधार पर तीसरी शक्ति जरूर है। त्रिपुरा में भी भाजपा ने जीरो से शुरू कर कम्युनिस्ट सरकार की कब्र खोद डाली थी और त्रिपुरा में अपनी सरकार बनायी थी। केरल में भाजपा के पास लोकसभा सीट भी है। केरल की राजधानी त्रिवनतपुरम नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। ये सभी राजनीतिक परिस्थितियां यह साबित करने के लिए काफी हैं कि भाजपा उतनी कमजोर तो कतई नहीं जितनी कमजोर कांग्रेस मानती है। भाजपा ने कांग्रेस मंत्रिमंडल को ईसाई और मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता को लेकर प्रश्न भी उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने विशेष अभियान भी चलाया है। सोशल मीडिया पर इसकी बडी चर्चा हुई और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी पार्टी घोषित कर दिया गया है। केरल के हिन्दुओ में इसकी नाराजगी देखी जा रही है। अगर केरल की 55 प्रतिशत हिन्दू आबादी भाजपा के वोटर बन जायेगी तो फिर क्या कांग्रेस की सरकार स्थायी रह सकती है?, कांग्रेस सरकार गतिशील रह सकती है? निश्चित तौर पर भाजपा केरल में अपनी सरकार बनाने की संभावनाएं बनायेगी, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम की तरह अपनी सरकार बना सकती है, कांग्रेस की सरकार की कब्र खोद सकती है। कांग्रेस ने आत्मघाती राजनीति खेल कर अपनी मौत का फंदा ही बनाया है।

( यह लेख जागरूकता एवं ज्ञानार्जन के लिए प्रेषित है, इसका व्यवसायिक उपयोग प्रतिबंधित है और कॉपी राइट एक्ट के दायरे में है )

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