मैं अज्ञानी !!
नहीं, हिंदी का कोई ज्ञान मुझे,
बस भाव मेरे शब्दों में हैं,
जो अंतर्मन कहता मुझसे
वही, कलम से लिखती जाती हूँ।
क्या भाषा क्या व्याकरण दोनों
का ही मुझको, कुछ ज्ञान नहीं,
जो कुछ लिखती प्रभु की मर्जी,
खुद पर मुझको अभिमान नहीं।
बस दया प्रभु की बनी रहे,
और कलम स्याही से सजी रहे,
शब्द रुपी हर पुष्प मेरा,
मां सरस्वती को चढ़ा रहे।
एक दिन ऐसा भी आयेगा,
मैं भी लेखक बन जाऊंगी,
जिस ज्ञान से वंचित हूँ अब तक,
वो ज्ञान मैं मां से पाऊंगी।
नहीं कहे, कोई अनपढ़ मुझको,
ये साबित कर दिख लाऊंगी,
टूटी फूटी इस हिंदी से
शब्दों का महल बनाऊंगी।
मां
मां ममता का सागर है
जिसमें प्यार के ढे़रो रत्न समाहित हैं।
मां जल से भरी एक गागर है
जो हर किसी की प्यास
बुझाने में सक्षम है।
मां पूर्णिमा का वो चांद है
जो अंधकार को
उजाले में बदल देता है।
मां मंदिर का वो प्रसाद है
जिसे पाने के लिए
हम सभी लालायित रहते हैं।
मां रोशनी से भरा वो दिया है
जो पूरे परिवार को
प्रकाशित करता है।
मां खुला आसमान है
जिसमें ढे़रों पंक्षी
उड़ान भर सकते हैं।
मां नदी की वो धारा है
जो निर्मल है, स्वच्छ है, प्रवाहित है।
मां अनंत है, शाश्वत है,
सत्य है, क्योंकि वो मां है
क्योंकि वो मां है।
शिव परिवार की महिमा अपार
देवों के ये महादेव हैं
भार्या इनकी पार्वती
पुत्र रूप में मिले कार्तिकेय
और मिले हैं गणपति
स्वयं वासुकी कंठ विराजे
द्वारपाल जिनके नदी
ऐसे सुंदर शिव परिवार की
छवि मन में बस बसी रहे
यही कामना प्रभु से मेरी
सब पर उनकी कृपा रहे।
मेरे भारत का तिरंगा
ले, “देश प्रेम” की ऊन का गोला,
मन मेरा भीतर से बोला,
कुछ अद्भुत सा आज बनाऊं,
भारत को मैं स्वयं पहनाऊं।
डाल दिए कुछ मोटे फंदे,
शुरू हो गई मंदे मंदे,
नीचे रंग हरा झंडे में,
हरी ऊंन से लगी तब बुनने
देश भक्ति का गीत लगाकर,
फंदों में फंदा उलझा कर,
धीरे-धीरे हाथ बढ़़ाकर,
पाई खुशी बॉर्डर बना कर।
पूर्ण हो गया बॉर्डर मेरा,
श्वेत रंग का करूं, अब फेरा,
धीरे-धीरे श्वेत बुना अब,
मध्य पेट तक पहुंच गई तब।
याद चक्र की मन में आई,
24 तिल्ली तुरंत बनाई,
गोल चक्र यह नीले रंग का,
श्वेत रंग पर लगे सुन्दर सा।
श्वेत रंग कुछ और बढ़ाया
ध्वज मेरा बनने को आया,
अब केसरिया रंग लगाया,
मुड्ढा गला तब साथ घटाया।
बारी अब सिलने की आई,
सुई में धागा डालकर लाई,
दोनों साइड करी सिलाई,
भारत को आवाज लगाई।
भारत इसे पहनकर आना,
पहन इसे तुम घर घर जाना,
देश विदेश में नाम कमाना
झण्डे को सम्मान दिलाना।
भारत पहन पहन मुस्काए.
अंदर से फुले ना समाय,
लहर लहर हरदम लहराये
हर दिन ये सम्मान है पाये।
जय हिंद, जय भारत
संध्या शर्मा मिश्रा
विश्व गौरैया दिवस पर मेरी कुछ पंक्तियां उन नन्हीं नन्हीं चिड़ियों के लिए जिनके साथ बचपन में हम सबसे पहले खेले थे।
विलुप्त होती गौरैया
मेरे उठने से पहले जो,
खुद खिड़की पर आती है,
चीं चीं की आवाज लगा जो,
मुझको स्वयं जगाती है।
दाना जब चावल का डालूं,
झठ से सब चुग जाती है,
नहीं अकेले आती है जो
सखियों को भी लाती है।
मिट्टी के बर्तन में ठंडा,
जब पानी पी कर जाती है,
फुदक फुदक कर, इधर-उधर फिर
अपनी खुशी जताती है।
लुप्त हो रहा जीवन जिनका,
ऊंची इमारतों के बन जाने से,
नाम मात्र गौरैया दिखती अब,
जंगलों के कट जाने से।
इनके बारे में सब सोचें,
ये पंछी राग सुनाते हैं,
हम सबके सूने जीवन में जो,
ढेरों खुशियां भर जाते हैं।
चलो सभी हम मिलजुलकर,
ऐसा अभियान चलाते हैं,
जहां दिखे गौरैया हमको,
जीवन हम उनका बचाते हैं।
ओजोन परत
ओजोन परत की रक्षा करना
पहला धर्म हमारा है
मिलजुल कर ये काम करेंगे
सबने मन में ठाना है ।
हुई हवा जहरीले देखो
धरती को हमें बचाना है
छोड़ पॉलीथीन अब थैला
कैनवास का घर लाना है।
सूरज और ये सफर
सूरज को साथ चलते
देखा होगा सभी ने जो
किया होगा सफर कभी
ट्रेन में या बस में
सूरज जैसा यश फैलाओ
तुम भी सबके साथ चलो
याद करेंगे सभी
जीते जी और बाद मरने के
एकता की डोर थामें
आगे बढ़ते जाओगे तो
मंजिल तुमसे कुछ पूछेगी
रास्ते शहर के
मन में एक विश्वास जगाकर
दृढ़ता को हमराज बनाकर
जो भी सोचोगे कर लोगे
आज और कल में
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र का
गर वृक्षों सा विस्तार करो,तो
देश क्या विदेशों की भी
छवि बन जाओगे।
मन में खुशियों के फूल खिलाकर
अंतर्मन सजाओगे तो
फूलों सी महकती बगिया
मन ही में पाओगे।
सूरज को साथ चलते
देखा होगा सभी न जो
किया होगा सफर कभी
ट्रेन में या बस में।
भारत को स्वच्छ बनाना है
प्रकृति की हर चीज़ बचाना,
पहला धर्म हमारा है,
पर्यावरण की श्रेष्ठ मुहीम को,
आगे तक ले जाना है।
सर्व प्रथम हमें जल स्वच्छता,
का महत्व समझाना है,
स्वच्छ जल उपयोग में लाकर,
रोगों को दूर भगाना है।
आस पास की जमा गंदगी,
का भी ध्यान दिलाना है,
जल्दी ही फैले कचरे को,
सड़कों से हटवाना है।
तत्पश्चात नालियों को भी,
ऊपर से ढकवाना है,
खुले हुए गर कहीं गटर हों,
उन्हें फ़ौरन बंद कराना हैं।
शौचालयों के निर्माण में भी
सबको सहयोग दिखाना है,
खुद पहले आगे आएं,
फिर औरों को आगे लाना है।
एक छोटे सहयोग की आशा,
हर जन से करते जाना है,
इस अभियान की सरल भावना,
का परिचय करवाना है।
फल सब्जी का बचे जो छिल्का,
उसे पशुओं तक पहुंचाना है,
एक स्वच्छ आहार रूप में,
उन सबको उपलब्ध कराना है।
वनों को अपनी मान धरोहर,
कटने से रुकवाना है,
कुछ छोटे योगदानों से ही,
इस मुहीम को श्रेष्ठ बनाना है।
सब नदियों को स्वच्छ बनाकर,
उनका भी मान बढ़ाना है,
गंगा तट पर जमा गंदगी,
को भी साफ कराना है।
भारत के सुंदर आँगन में,
स्वच्छता का दीप जलाना है,
जिसके प्रकाश की किरणों को,
हमें दूर देश ले जाना हैं।
गर, सब ही मिलकर करें पहल,
तो देश लगेगा एक महल,
इस महल के चारों ओर हमें,
फिर वृक्षों को लगवाना है।
पर्यावरण बचाना है।
हमें पर्यावरण बचाना है।
भारत को स्वच्छ बनाना है,
हमें पर्यावरण बचाना है।
उड़ान
सपनों की तुम भरो उड़ान…
खुला हुआ सारा आसमान,
नील गगन में पंख फैलाकर,
मन में एक उत्साह जगाकर,
अंतर्मन को करो प्रणाम।
सपनों कि तुम,……
कुछ ऐसा करने की ठानो,
बात स्वयं के हृदय की मानो,
करो कोई अदभुद सा काम,
बन जाओ मानुष महान।
सपनों कि तुम……..
सपनों की कोई उम्र ना मानो,
जब सोंचों करने की ठानो,
क्षेत्र कोई भी तुम अपना लो,
वक़्त को तुम अनमोल बनालो।
सपनों कि तुम …..
बनो कोई सैनिक या जवान,
या पायलट बन भरो उड़ान,
बस बढ़े देश कि जिससे शान,
ऐसा करना कोई कार्य महान।
सपनो की तुम……….
गायक या लेखक का सपना,
लगे हृदय को जो भी अपना,
जिस भी विषय पर कोशिश करना,
रखना अर्जुन जैसा ध्यान।
सपनों कि तुम भरो उड़ान …
घर
घर को मिले अनेकों नाम
गृह, निवास या कहें, मकान।
झोपड़, कुटिया, या झुग्गी कह लो,
चौल, सराय कहीं भी रह लो,
पेड़ तले या सड़क किनारे,
स्टेशन, मंदिर के द्वारे,
गिरिजा, मस्जिद या गुरुद्वारे,
जहां साथ होता परिवार,
मिलता घर जैसा एहसास।
बसंत सत्र — फूलों की सभा
फूलों ने एक सभा बुलाई,
बाट निमंत्रण खुशबू फैलाई,
देख निमंत्रण रंग बिरंगा,
तितली मन ही मन मुस्काई।
सर्वप्रथम भंवरों ने आकर,
गुनगुन का एक राग सुना कर,
हरे भरे नव पल्लव वाले,
उपवन में हलचल सी मचाई।
रंग-बिरंगे परिधानों में,
साड़ी, सूट, घागरो में,
एक, दो तीन…. नहीं पूरी ही,
टोली में सब तितली आईं।
सर सर सर सर मस्त पवन ने,
आसपास के भी उपवन में,
धूल उड़ा कर शोर मचा कर,
अपनी भी उपस्थिति दर्शाई।
कोयल ने मीठी वाणी संग
तोतो ने पहना धानी रंग
और झुंड में कुछ चिड़ियों ने,
चीं चीं की आवाज लगाई।
कौआ, बत्तख और गिलेहरी,
बगुला सारस बने थे प्रहरी,
दोनों ने सबकी, की अगुवाई,
सत्र की शोभा और बढ़ाई।
सत्र चला ये देर शाम तक,
जमा सभी थे खास, आम तक
सबने मिलकर धूम मचाई,
एक दूजे से पहचान कराई।
चांद भी खुद को रोक न पाया
तारों को अपने संग लाया,
शाम भी कुछ-कुछ अब गहराई
निशा को भी आवाज लगाई।
देख सभी की खुशी अनूठी,
निशा रहे क्यूं छूटी-छूटी?
उसने भी उपस्थिति दिखाई,
चरण को अंतिम साथ ले आई।
सत्र में सब ने धूम मचाई,
ढेरों खुशियां सबके मन भाईं,
खुशी-खुशी इस सत्र से सबको
देते हैं सब फूल विदाई।
सरल और लयबद्ध भाषा में लिखी गई मेरी ये कविता उन गांव, देहात और कस्बों के लिए है जहां बच्चे आज भी टोली बनाकर जागरूकता फैलाने का काम कर सकते हैं। आशा है मेरी इस छोटी सी कविता के द्वारा की गई मेरी ये कोशिश उन तक पहुंचेगी।
पर्यावरण और कोरोना
काट कोरोना की जड़ को,
अब पर्यावरण बचाना है।
वातावरण में घुला कोरोना,
उसको शीघ्र भगाना है।
स्वच्छ्ता का पेड़ लगाना,
जन-जन को सिखलाना है।
मास्क पहनकर बचे रहोगे,
सबको ये बतलाना है।
जितना हो सब पेड़ लगायें,
सैनिटाइजर भी घर लायें,
आम, आँवला नीबू पानी,
हर दिन पीते रहना है।
काट कोरोना की जड़ को,
हमें पर्यावरण बचाना है।
जयहिंद, जय भारत
संध्या शर्मा मिश्रा
मंजिल
मंजिल की गर तलाश है
तो राहों को ना देखो कभी,
राहों में कांटों का होना,
कोई नामुमकिन नही।
कांटों से उलझने के बाद ही
फूलों का मिल पाना है मुमकिन
कांटों के बिन फूलों का
मिल पाना मुमकिन नहीं।
नामुमकिन को मुमकिन करें
मंजिल तभी मिल पाएगी
गर मिल गई मंजिल हमें,
तो जिंदगी बन जाएगी।
इसलिए मंजिल की तलाश में
आगे बढ़ता चल ए मेरे दिल
ए मेरे मन है मेरे हर कदम…
मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी
हिंदी माथे की बिंदी है,
भारत के माथे पर सजती है,
यह गौरव है मेरे देश का,
हर देश में जानी जाती है।
क्यों कहते हैं कुछ लोग इसे?
अनपढ़ लोगों की भाषा है
अज्ञानी हम कहें उन्हें,
यह सबसे मेरी आशा है।
हिंदी दिल हिंदुस्तानियों का,
इस दिल को दिल में रखना है,
इसको ना खोने दें हम सब,
यह सबसे मेरा कहना है।
हिंदी से एम.ए करने का
मुझको भी सौभाग्य मिला
केवल हिंदी के कारण ही,
हर दिन मुझको सम्मान मिला।
जय हिंद जय हिंदी
जय हिंदुस्तानियों
कविता मेरी भी गीत बनें
कविता मेरी भी गीत बनें
संगीत का उसको साथ मिले
कोई तो होगा इस जग में
जिसकी इसको आवाज मिले।
कविता मेरी भी गीत बनें…
नहीं सुरों का कोई ज्ञान मुझे
बस लिखना थोड़ा जानू मैं
पर दिल मेरा भी करता है
कविता को सुर और ताल मिले।
कविता मेरी भी गीत बनें।
जिसके मन को जो भा जाए
वो उस कविता को गा जाए
एक बार तो गाकर के देखे
मैं रोज़ एक आवाज़ लिखूं।
कविता मेरी भी गीत बनें….
सूनापन इसके कम कर दें
संगीत की इसमें धुन भर दे
हैं स्वरों के तो सरताज़ कई
कोई मेरी कविता में, स्वर भर दे।
कविता मेरी भी गीत बनें।
मेरा प्यारा भारत
मेरे प्यारे भारत की
हर देश में शान निराली है
इसने अपनी उपलब्धियों से
एक अद्भुत छवि बना ली है,
जो ना ही मिटी है ना ही मिटेगी,
हर दिन अब यह और बढ़ेगी,
हर भारतवासी की कोशिश से
युग युगांतर तक चलने वाली है,
इसकी पावन मिट्टी की खुशबू
भीनी और मतवाली है,
हर वीर के दिल में यह खुशबू
नए जोश को भरने वाली है,
मेरे प्यारे भारत की
हर देश में शान निराली है।
जय हिंद, जय भारत
समुन्द्र सी बन जाओ तुम
समुन्द्र सी बन जाओ तुम,
अंदर गहराई लाओ तुम,
ऊंची लहरों सी उठकर, अब,
अपना मान बढ़ाओ तुम।
समुन्द्र सी बन जाओ तुम…
सागर की लहरों के जैसा,
कुछ करतब दिखलाओ तुम।
कभी शांत होकर दिखलाओ,
कभी रौद्र हो जाओ तुम।
समुन्द्र …..
सुबह तुम्हारी अलग चमक हो,
रात को एक दम अलग दमक हो।
अंदर जो बहुमूल्य खजाना,
उसको अब बाहर लाओ तुम।
समुद्र ……
कुछ न कहकर भी सबसे, अब
सब कुछ, बस कह जाओ तुम,
समुन्द्र सी बन जाओ तुम…
बस समुन्द्र सी बन जाओ तुम।
नारी एक शक्ति
नारी को शक्ति का नाम मिला
पर पास नहीं शक्ति कोई
वह क्यों इतनी आसक्त रहे?
क्यों होती वह सशक्त नहीं?
मन और अंतर्मन दोनों ही
भरते हर पल विश्वास यही
बढ़ो चलो तुम डरो नहीं
अब पीछे-पीछे चलो नहीं
आगे बढ़कर दिखलाओ तुम,
अब दुर्बल न कहलाओ तुम
तुम शक्ति का एक रूप ही हो
खुद की शक्ति बन जाओ तुम।
मौसम
कल तक जो तप रहा था मौसम,
गर्मी बनकर छाया था,
रात हुई तो रौद्र रूप में
आंधी बनकर आया था।
घोर कड़कती उस बिजली से
सबका मन घबडाया था
अश्रु रूप में फिर बारिश ने,
कुछ अपना दुख दर्शाया था।
शीत पवन के उन झोंकों ने,
सबका मन हर्षाया था ।
मिला-जुलाकर देखें तो
मौसम का मेल सुहाना था।
कई दिनों के बाद अचानक
ऐसा मौसम आया था।
कई दिनों के बाद अचानक
ऐसा मौसम आया था।
सूरज और बादल
सूरज ने छिप-कर झांका जब
नीले अंबर के आंचल से,
तब भोर हुई चिड़ियां चहकी
बिखरी लाली उस बादल में,
नील गगन तब, लगा चमकने
जब भानू भी आगे आया
तभी क्षितिज में रवि बढ़ा
और तेज उजाला फैलाया
जगमग सब हो गया आसमाँ
उस दिनेश की लाली से
कुछ क्षण पहले जो केवल
बस झांक रहा था बादल से।
चिड़िया रानी (बालगीत)
चिड़िया रानी बड़ी सयानी
दाना कहां से लाती हो?
किस पल तुम किस डाल पे बैठी
किसे बताकर जाती हो?
चिड़िया रानी….
सुबह सवेरे नील गगन का
चक्कर लगा के आती हो
किस घर तुमने दाना खाया
किस घर पानी पाती हो?
चिड़िया रानी……
हरे भरे बागों में जाकर
मीठा गीत सुनाती हो
या ऊंची डाली पर जाकर
चुपके से सो जाती हो।
चिड़िया रानी…
प्यारी सी एक जगह ढूंढकर
घर क्यों नहीं बनाती हो?
कहां रहोगी बारिश में ये
सोच नहीं क्यों पाती हो?
चिड़िया रानी…. ओ चिड़िया रानी
सुनकर करोगी, सदा अनसुना
क्या बात समझ न आती है
पंखों का गहना, तुम्हें मिला
क्या इस वजह से, तुम इतराती हो?
या ऊंचा उड़ने की प्रेरणा
हम सब में भर जाती हो
फुर्र से उड़कर या सबको
कोई संदेश सुनाती हो।
चिड़िया रानी… चिड़िया रानी.
एक कबूतरी दो अण्डे
एक कबूतरी दो अंडों संग
मेरे छज्जे पर रहती है,
सर्दी, गर्मी, या बारिश हो
अपने अंडों को सेती है ।
फिर दो बच्चे बाहर आकर
मां की ममता बन जाते हैं,
उस छज्जे पर, मां के संग वो
खूब मजे से रहते हैं।
हरी मूंग, पीली मक्का, और
चावल के भी कुछ दाने,
बहुत पसंद हैं उनको तीनों
को, ठंडे पानी के संग खाने।
सुबह सबेरे ची ची की
आवाज लगाने लगते हैं,
अगर आँख से ओझल हो मां
तुरंत बुलाने लगते हैं।
आंगन तो अब नहीं घरों में
पर छज्जे, हर घर में होते हैं,
तभी तो देखो अब छज्जों पर
चिड़ियों के बच्चे रहते हैं।
हो सके अगर, कोशिश करना
आंगन वाले घर बन जाएं,
एक, दो, तीन नहीं टोली में
चिड़ियों के, बच्चे, पल जायें।



