मुस्लिम लीग, केरलम और बहुत कुछ…

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– प्रशांत पोळ

दिल्ली । 1947 मे भारत के विभाजन के जो अनेक कारक (factors) रहे, उनमे मुस्लिम लीग प्रमुख हैं। मुस्लिम लीग ने ही अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग रखी। उसे ‘पाकिस्तान’ नाम दिया। पाकिस्तान के लिए हिंसक आंदोलन किए। ‘डाइरेक्ट एक्शन डे’ जैसा खुंखार कदम उठाया। उस दिन (16 अगस्त 1946 को) कलकत्ता मे 5,000 हिंदुओं की हत्या करके खून की नदियां बहाई। इस पर भी विभाजन की मांग नही मानी गई, तो दो महिने बाद नोआखाली मे दस हजार हिंदुओं का नरसंहार किया। कांग्रेस नेताओं को झुकाया और पाकिस्तान की बात मनवा ली।

लेकिन 15 अगस्त 1947 के बाद, इस मुस्लिम लीग का क्या हुआ..?

पाकिस्तान मे तो वो सत्तारुढ पार्टी बनी। जैसे अपने यहां कांग्रेस थी, वैसे पाकिस्तान मे मुस्लिम लीग। किंतू जिन्ना और लियाकत अली खान की मृत्यु के पश्चात, मुस्लिम लीग मे मतभेद बढने लगे। जनरल अयूब खान शासक बनने के पश्चात, मुस्लिम लीग 3 धडों मे बट गई। तब तक पूर्व पाकिस्तान अलग देश नही बना था। वहां मुस्लिम लीग से टूटकर अलग पार्टी बनी – अवामी लीग, जिसके नेता थे शेख मुजीब रहमान। अवामी लीग के नेतृत्व मे ही 1971 के संघर्ष के बाद, बांग्लादेश की निर्मिती हुई।

संक्षेप मे, भारत से टूटकर बने दोनो मुस्लिम देशों को, मुस्लिम लीग के नेताओं ने ही बनाया और प्रारंभ के कुछ वर्षों मे उन्ही ने इन दोनों देशों पर राज किया।

स्वतंत्रता के बाद भारत मे मुस्लिम लीग का क्या हुआ?

शुरुआत के दिनों मे तो, भारत मे रह गए मुस्लिम लीग के नेता बडे अवसादग्रस्त थे। उन्हे उनका राजनैतिक भविष्य अंधकारमय दिख रहा था। इनमे से अनेक, कांग्रेस मे चले गए। कांग्रेस ने उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया। प्रारंभ मे मुस्लिम नेताओं को लगा कि अब चुंकी पाकिस्तान अलग हो गया हैं, तो भारत मे, भारत की परंपरा, पध्दति और व्यवस्था के अनुरुप ही रहना पडेगा। वैसी उनकी मानसिकता भी बन रही थी। किंतू उन्होने देखा कि कांग्रेस, मुसलमानों को ज्यादा महत्व दे रही हैं। साथ ही महात्मा गांधीजी की हत्या के बाद, हिंदू हित की बात करनेवाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया। अगले दस – बारह वर्ष, हिंदू संगठनों को कुचला गया। स्वाभाविक था कि मुस्लिम संगठनों को खुली छूट मिली।

भारत मे लस्त-पस्त पडी मुस्लिम लीग मे जान आने लगी। गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद, भारत का विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग के भारतीय धडे ने अपना चेहरा थोडासा बदल लिया। अब उनका नाम हुआ – ‘इंडियन युनियन मुस्लिम लीग’। विशेषतः केरल मे इनका प्रभाव बढता गया। मलप्पुरम, कोझिकोड, कन्नूर, कासरगोड यह जिले मुस्लिम बहुल बनते गए, तो मुस्लिम लीग यहां की प्रमुख पार्टी बनती गई। मोहम्मद इस्माईल, आईयुएमएल (Indian Union Muslim League) के संस्थापक रहे, तो मोहम्मद कोया, 1979 मे 3 महिनों के लिए केरल के मुख्यमंत्री भी रहे।

कांग्रेस ने केरल मे हमेशा से मुस्लिम लीग को साथ लिया हैं। यूपीए की सरकार मे, मुस्लिम लीग के ई. अहमद केंद्रीय मंत्री थे। वे जब रेल राज्यमंत्री थे, तब नई प्रारंभ होनेवाली ट्रेनों मे इंजिन की पूजा वगैरह करने की सख्त मनाई थी।

अभी इस महिने केरलम विधानसभा के जो परिणाम निकले, उनमे कांग्रेस – मुस्लिम लीग गठबंधन को 100 से उपर सीटें और पूर्ण बहुमत मिला। इसमे मुस्लिम लीग को 22 सीटें मिली हैं। गठबंधन मे कांग्रेस के बाद दुसरे नंबर पर। मुस्लिम लीग के दबाव के चलते, कांग्रेस को मुख्यमंत्री का नाम घोषित करने मे इतना विलंब हुआ।

आज जिस मंत्रिमंडल ने शपथ ली हैं, उनमे मुस्लिम लीग के 5 मंत्री हैं। 1. P. K. Kunhalikutty, 2. P. K. Basheer 3. K. M. Shaji 4. N. Shamsudheen 5. V. E. Abdul Gafoor.

*दुर्भाग्य देखिये.. जिस मुस्लिम लीग के नेता खुर्रम ने 1946 मे नेहरु जी को जिंदा गाड देने की धमकी दी थी, जिस मुस्लिम लीग ने गांधीजी की तौहीन की थी, जिस मुस्लीम लीग ने डाइरेक्ट एक्शन डे के नाम पर हिंदुओं के खून से बंगाल की सडकों को पाट दिया था, जो मुस्लिम लीग आज भी केरलम की सडकों पर सरे आम हिंसक प्रदर्शन करती हैं, ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाती हैं…*

*ऐसे धर्मांध मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस गठबंधन करती हैं, उनके साथ मंत्रीपद साझा करती हैं, उनको सम्मान देती हैं..*

*और देश के तमाम कांग्रेसी, तमाम सेक्युलर, तमाम ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार, चुप बैठते हैं, खामोशी ओढ लेते हैं…*

ये देश का दुर्भाग्य हैं..!

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