दयानंद पांडेय
लखनऊ । संविधान निर्माताओं ने दलित और वंचित समाज के लिए दस वर्ष के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था कि यह लोग भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर बराबरी में आ जाएं l देश के विकास में योगदान दें l बाद में मंडल की सिफारिशों के तहत पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण मिल गया l आज़ादी के इन आठ दशक में आरक्षण ने आरक्षणधारियों को इतना सबल बना दिया है कि अब वह इसे सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार बना चुके हैं l मरने-मारने पर आमादा हैं l
वोट बैंक के चक्कर में सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने आरक्षणधारियों को भस्मासुर बना दिया है l हिंसक और अराजक बना दिया है l होता रहे देश प्रतिभाहीन, होता रहे प्रतिभा पलायन, वह तो माइनस चालीस वाले डाक्टर भी बना कर रहेंगे l देश में सामाजिक समता के नाम पर गहरी सामाजिक खाई बन गई है तो उन की बला से l यह आरक्षण जेहाद का ज़हर है l
आरक्षणधारी अब सवर्ण समाज के ख़िलाफ़ आक्रमणकारी बन कर उपस्थित हैं l इस्लाम के शरिया क़ानून से भी ज़्यादा ख़तरनाक और जहरीला हो चला है यह आरक्षण l यू जी सी आदि ने इस आग में घी का काम किया है l आप एक बार कैंसर और एड्स का इलाज कर सकते हैं l आरक्षण प्राप्त जहरीले लोगों का नहीं l राजनीतिज्ञों और सरकारों ने तो इसे इस हद तक पहुंचाया ही है l पता नहीं किसी सामाजिक विज्ञानी को इस का भान है कि नहीं l
सुप्रीम कोर्ट को इस ज़हर और जहरीले समाज का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए l आरक्षण पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए l बहुत दया आए तो आरक्षण को दलितों और पिछड़ों के ई डब्लू एस तक सीमित कर देना एक उपाय हो सकता है l नहीं जातीय और राजनीतिक दुकानदारों को जो विष बोना था बो चुके हैं l फ़सल कटने को तैयार है l
ग़नीमत है कि सवर्ण समाज संयम से काम ले रहा है l नहीं आरक्षणधारी तो जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के लिए पूरी तरह तैयार हैं l देश एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़ा है l हिंदू , मुसलमान से भी बड़ी आपदा सामने उपस्थित है l



