अमरेन्द्र आर्य
देहरादून । पहाड़ों की निस्तब्धता में पूरा नगर जैसे धीरे-धीरे नींद की गहराइयों में उतर गयाथा। दूर-दूर तक फैले देवदार, बाँज और चीड़ के वृक्ष रात की ठंडी हवा के साथएक अनकहा संगीत रच रहे थे। पहाड़ों की रातों में एक अलग प्रकार कीआत्मीयता होती है। यहाँ सन्नाटा भी जीवित प्रतीत होता है। शहरों की कृत्रिमरोशनी और शोरगुल से दूर, पहाड़ों की रात मनुष्य को स्वयं से मिलाती है।रानीखेत की रात्रि केवल अंधकार नहीं होती, वह प्रकृति का विश्रामकाल होतीहै। सड़कें लगभग सूनी थीं। कहीं-कहीं किसी छोटे से ढाबे की बुझती आँचदिखाई देती थी। स्थानीय लोग जल्दी अपने घरों में लौट चुके थे। पहाड़ों मेंजीवन आज भी प्रकृति की गति से चलता है, घड़ी की गति से नहीं। यही कारणहै कि यहाँ जीवन में कृत्रिम जल्दबाज़ी कम और संतुलन अधिक दिखाई देताहै।
सुबह लगभग पाँच बजे नींद खुली। खिड़की से बाहर देखा तो आकाश हल्कीलालिमा से भर चुका था। पूर्व दिशा में सूर्योदय की आहट साफ दिखाई दे रहीथी। मैं तुरंत कमरे से बाहर निकला और होटल की छत पर पहुँच गया। वहाँखड़े होकर ऐसा अनुभव हुआ मानो प्रकृति धीरे-धीरे अपनी सबसे सुंदर कविताखोल रही हो। हिमालय की दूरस्थ चोटियाँ अंधेरे से निकलकर धीरे-धीरेप्रकाश में आकार लेने लगी थीं। पहली किरण जब पहाड़ों पर उतरती है तोलगता है मानो किसी चित्रकार ने देवदार और बाँज के जंगलों पर सुनहरी आभाउकेर दी हो। हवा में हल्की ठंडक थी, पर उसके भीतर एक अद्भुत ताजगी भीघुली हुई थी। दूर किसी मंदिर से आती घंटियों की ध्वनि और पक्षियों काकलरव वातावरण में ऐसी लय घोल रहा था, जो किसी शास्त्रीय राग की तरहधीरे-धीरे मन में उतरती जाती है। यही पहाड़ों की सांस्कृतिक आत्मा है। यहाँप्रकृति और अध्यात्म एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। पहाड़ों का जीवन सदियों सेदेवस्थलों, लोकगीतों, लोकदेवताओं और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान के साथविकसित हुआ है।
रानीखेत की सुबहों में शहरों जैसी भागदौड़ नहीं होती। यहाँ सड़कें जागती हैं, दौड़ती नहीं। छोटी-छोटी चाय की दुकानों से उठती भाप, लकड़ी की धीमीआँच, पहाड़ी लोगों की सहज मुस्कान और धीमी बातचीत दिन की शुरुआत कोआत्मीय बना देती है। स्थानीय लोग सुबह जल्दी अपने कार्यों में लग जाते हैं।कोई पशुओं के लिए चारा लेकर लौट रहा होता है, कोई खेतों की ओर जा रहाहोता है, तो कोई छोटी दुकान खोलने की तैयारी में होता है। पहाड़ों का आर्थिकजीवन आज भी श्रम और सादगी पर आधारित है। पर्यटन यहाँ की अर्थव्यवस्थाका महत्वपूर्ण आधार बन चुका है, लेकिन उसके बावजूद स्थानीय समाज नेअपनी सांस्कृतिक पहचान को काफी हद तक बचाकर रखा है। छोटे होटल, स्थानीय हस्तशिल्प, फल-बागान, ऊनी वस्त्र, पहाड़ी मसाले और घरेलू उत्पादयहाँ के लोगों की आजीविका के प्रमुख साधन हैं। सूर्योदय के बाद मैं पैदल हीकुमाऊँ रेजिमेंट मुख्य कार्यालय की ओर निकल पड़ा। रास्ते में रानीखेत काबाजार क्षेत्र भी लगभग घूम लिया। पहाड़ी बाजारों की अपनी एक विशिष्टसंस्कृति होती है। यहाँ बड़े-बड़े मॉल नहीं होते, लेकिन छोटी दुकानों मेंआत्मीयता मिलती है। दुकानदारों के चेहरे पर अपनापन दिखाई देता है। लोगजल्दी पहचान बना लेते हैं और बातचीत में औपचारिकता कम रहती है। परेडग्राउंड में अग्निवीरों की ड्रिल चल रही थी। अनुशासन, ऊर्जा और राष्ट्रभक्ति कावह दृश्य दूर से ही मन में गर्व भर देने वाला था। कुमाऊँ रेजिमेंट केवल एकसैन्य इकाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्साहै। पहाड़ों के अनेक परिवार पीढ़ियों से सेना से जुड़े रहे हैं। यहाँ सैनिक होनाकेवल रोजगार नहीं, बल्कि सम्मान और परंपरा का विषय भी है। सिविलियनको भीतर जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए बाहर खड़े होकर ही सब देखतारहा। इसी बीच दिल्ली के एक मित्र के बड़े भाई, जो कुमाऊँ रेजिमेंट में वरिष्ठअधिकारी हैं, उनके घर चाय पर आमंत्रण मिला। पहाड़ों में अतिथि-सत्कारआज भी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। उनसे औरउनके परिवार के अन्य सदस्यों से मिलना अत्यंत आत्मीय अनुभव रहा। कुछसमय वहाँ बिताने के बाद मैं पुनः शहर की दूसरी ओर निकल पड़ा। बस स्टैंडहोते हुए गांधी चौक पहुँचा। सुबह के समय वहाँ स्थानीय जीवन अपनी सहजगति से आगे बढ़ रहा था। कुछ लोग अखबार पढ़ रहे थे, कुछ चाय की दुकानोंपर बैठकर देश-दुनिया की चर्चा कर रहे थे।
होटल लौटने पर ध्यान बाइक की ओर गया। लगातार पहाड़ी मार्गों पर चलने केकारण उसमें हल्की आवाज आने लगी थी। स्थानीय मैकेनिक के पास पहुँचा।उसने बड़े धैर्य से बाइक की जाँच की और आवश्यक कार्य कर उसे अगलेसफर के लिए तैयार कर दिया। छोटे पहाड़ी नगरों की यही विशेषता है कि यहाँकाम में व्यावसायिकता से अधिक मानवीयता दिखाई देती है। इसके बाद मैंझूला देवी मंदिर पहुँचा। देवी दुर्गा को समर्पित यह मंदिर घंटियों की अनगिनतध्वनियों के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता हैमानो श्रद्धा स्वयं ध्वनि बनकर गूँज रही हो। स्थानीय मान्यता है कि यहाँ की गईमनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। हजारों घंटियाँ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, वेलोगों की आस्था, संघर्ष और आशाओं का सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं। दर्शनके बाद यात्रा आगे बढ़ी और मैं चौबटिया गार्डन पहुँचा। स्थानीय लोगों सेबातचीत में ज्ञात हुआ कि यह क्षेत्र सेब, आड़ू, खुबानी और प्लम के बागों केलिए प्रसिद्ध है। पहाड़ों की अर्थव्यवस्था में बागवानी का महत्वपूर्ण स्थान है।सीमित कृषि भूमि और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच फल उत्पादनयहाँ के लोगों के लिए आय का प्रमुख साधन बनता जा रहा है।
यहीं से हैड़ाखान मंदिर जाने की योजना बना रहा था कि भोजपुरी जनजागरणअभियान के अध्यक्ष डॉ. संतोष पटेल का फोन आया। बातचीत के दौरानउन्होंने मझखाली स्थित एक ऐसे विद्यालय के बारे में बताया जहाँ बिहार केआर्थिक एवं सामाजिक रूप से वंचित परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। यह सुनते हीवहाँ जाने की इच्छा हुई। रानीखेत से लगभग सत्रह किलोमीटर की यात्रा केबाद मैं मझखाली पुलिस चौकी पहुँचा। वहाँ से भीतर जाती संकरी सड़कपहाड़ों के बीच बसे छोटे गाँवों की ओर जाती थी। ग्राम पंचायत रणखिलापहुँचने के बाद कुछ दूरी पर शांत वातावरण में स्थित था “द प्लीजेंट वैलीस्कूल”। विद्यालय पहाड़ों की हरियाली के बीच स्थित था। वहाँ का वातावरणअत्यंत शांत और अनुशासित था। बिहार के मुंगेर निवासी अश्विन मिले, जोवहाँ गणित पढ़ाते हैं। उनके माध्यम से विद्यालय के व्यवस्थापक और प्राचार्यासे भेंट हुई। बातचीत में ज्ञात हुआ कि विद्यालय में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चेआर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत कमजोर परिवारों से आते हैं। उनकीशिक्षा पूर्णतः निःशुल्क है और सभी बच्चे बोर्डिंग में रहते हैं। शिक्षकों के साथविभिन्न कक्षाओं में गया। नया विद्यालय होने के कारण वर्तमान में केवलआठवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। बच्चों से मिलना इस यात्रा का सबसेभावनात्मक अनुभव रहा। उनमें लगभग बारह बच्चे बिहार के बेतिया क्षेत्र से थे।छोटे-छोटे बच्चे, जो अपने घरों और परिवारों से दूर पहाड़ों में रहकर शिक्षाप्राप्त कर रहे थे। उनसे बातचीत के दौरान अनेक बातें सामने आईं। कोई घरकी याद आने की बात कर रहा था, कोई अपने गाँव का वर्णन कर रहा था।किसी ने बताया कि यहाँ पहली बार पहाड़ देखे हैं। बच्चों ने बताया कि किताबें, कॉपियाँ और रहने की व्यवस्था विद्यालय की ओर से उपलब्ध कराई जाती है।उनके चेहरे पर अभाव भी था और सपने भी। यह दृश्य भारतीय समाज की दोसच्चाइयों को एक साथ सामने लाता है। एक ओर आर्थिक विषमता औरशैक्षिक असमानता है, दूसरी ओर ऐसे लोग और संस्थाएँ भी हैं जो शिक्षा कोसामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना रहे हैं। पहाड़ों के शांत वातावरण में बिहारके वंचित बच्चों का पढ़ना भारत की विविधता और सामाजिक सहकार कासुंदर उदाहरण लगा।
विद्यालय में लगभग अट्ठाईस विद्यार्थियों के लिए पाँच शिक्षक कार्यरत हैं। मेरेवहाँ पहुँचने की सूचना मिलने पर स्थानीय पंचायत के प्रधान श्री महेंद्र जी भीअपने साथियों के साथ मिलने आए। शिक्षा, पलायन, पहाड़ी जीवन औरग्रामीण समस्याओं पर लंबी चर्चा हुई। उत्तराखंड के पहाड़ आज भी पलायन कीसमस्या से जूझ रहे हैं। रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में बड़ीसंख्या में युवा मैदानों की ओर चले जाते हैं। गाँवों में बुजुर्ग और महिलाएँअधिक दिखाई देती हैं। यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिकऔर सांस्कृतिक भी है। इसके बाद मैं उपट गोल्फ कोर्स पहुँचा। चारों ओरफैली हरियाली और खुले आकाश के बीच स्थित यह स्थान अत्यंत मनोहारी है।यह भारत के सबसे ऊँचे गोल्फ कोर्सों में गिना जाता है। हालांकि मोबाइलडिस्चार्ज होने के कारण तस्वीरें नहीं ले पाया, लेकिन कुछ दृश्य कैमरे सेअधिक स्मृतियों में सुरक्षित रहते हैं। इसके बाद कुमाऊँ रेजिमेंट म्यूज़ियमपहुँचा। समयाभाव के कारण भीतर नहीं जा सका, लेकिन बाहर लगे विवरणोंसे ही स्पष्ट था कि यह संग्रहालय भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान कीमहत्वपूर्ण गाथाओं को संजोए हुए है।
दोपहर लगभग बारह बजे मैं कालिका देवी मंदिर पहुँचा। कैंट क्षेत्र के शांतवातावरण में स्थित यह मंदिर सैनिकों और स्थानीय निवासियों दोनों की आस्थाका अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण में एकअलग प्रकार की गंभीर शांति महसूस होती है। यहाँ आने वाले लोगों के चेहरोंपर श्रद्धा के साथ एक आत्मिक विश्वास भी दिखाई देता है पहाड़ों में धर्म केवलपूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सामाजिक और सांस्कृतिकजीवन की धुरी बन जाता है। मंदिर केवल आराधना के स्थल नहीं होते, बल्किसामुदायिक संवाद, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक एकता के भी केंद्र होते हैं।गाँवों और पहाड़ी कस्बों का सामाजिक जीवन इन मंदिरों से गहराई से जुड़ाहुआ है। पर्व, मेले, लोकगीत, सामूहिक अनुष्ठान और सामाजिक निर्णय, सबकिसी न किसी रूप में इन देवस्थलों के इर्द-गिर्द ही विकसित होते रहे हैं।कालिका देवी मंदिर में कुछ समय शांत बैठा रहा। पहाड़ों की हवा में घुलीदेवदार की सुगंध, मंदिर की घंटियों की मध्यम ध्वनि और दूर तक पसरीहरियाली मन को भीतर तक स्थिर कर रही थी। शहरों में मनुष्य अक्सर शांतिखोजता है, जबकि पहाड़ों में शांति स्वयं चलकर मनुष्य के भीतर उतरती प्रतीतहोती है।
इसके बाद दिल्ली लौटने की यात्रा आरम्भ हुई। वापसी के मार्ग में घने देवदारऔर चीड़ के जंगलों के बीच स्थित बिनसर महादेव मंदिर भी पड़ा। ऊँचे वृक्षों सेछनकर आती धूप और पहाड़ों की निस्तब्धता के बीच स्थित यह प्राचीन शिवमंदिर प्रकृति और अध्यात्म के अद्भुत संगम का अनुभव कराता है। वहाँ कुछक्षण रुककर लगा मानो समय की गति धीमी पड़ गई हो। पहाड़ों में मंदिरकेवल स्थापत्य नहीं होते, वे प्रकृति के साथ मनुष्य के सह-अस्तित्व की जीवितअभिव्यक्ति होते हैं। इसके बाद यात्रा जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की दिशा वालेमार्ग से आगे बढ़ी। सड़कें अब धीरे-धीरे पहाड़ों की ऊँचाइयों से उतरकर तराईकी ओर बढ़ने लगी थीं। रास्ते में तारिखेत, भातरैखान, मछोह और ढिकुली जैसेछोटे-छोटे पहाड़ी और तराई क्षेत्र के कस्बे मिले। कहीं सड़क के किनारे छोटेढाबे दिखाई देते, तो कहीं खेतों के बीच अकेले खड़े घर। ढिकुली के आसपासका क्षेत्र जंगलों और प्रकृति की हरियाली से भरा हुआ था। जिम कॉर्बेट क्षेत्र केआसपास पर्यटन ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को काफी बदल दिया है। छोटेरिसॉर्ट, होम-स्टे, चाय की दुकानें और स्थानीय हस्तशिल्प से जुड़े अनेक लोगइसी पर्यटन व्यवस्था से अपनी आजीविका चला रहे हैं। फिर भी इस पूरे क्षेत्र मेंप्रकृति का मूल स्वरूप अब भी काफी हद तक जीवित दिखाई देता है। रामनगरऔर काशीपुर के बाहरी क्षेत्रों से गुजरते हुए पहाड़ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगे।सड़क अब लंबी और सीधी होती जा रही थी। नयागांव चौहान, धर्मपुरऔलिया, मालधन, ठाकुरद्वारा और पीपलसाना होते हुए यात्रा उत्तराखंड से उत्तरप्रदेश के मैदानी इलाकों में प्रवेश कर चुकी थी। पहाड़ों की ठंडी हवा अबधीरे-धीरे गर्म मैदानों की तपिश में बदलने लगी थी। अमरोहा, जोया औरगजरौला तक पहुँचते-पहुँचते रात गहरा चुकी थी। लेकिन आश्चर्य यह था किरात में भी गर्म हवाएँ किसी लू की तरह चेहरे को झुलसा रही थीं। कुछ घंटेपहले तक जहाँ देवदारों की ठंडी हवा शरीर और मन को स्पर्श कर रही थी, वहींअब मैदानों की गर्मी लगातार थकान बढ़ा रही थी।
लगभग चार सौ किलोमीटर की लंबी बाइक यात्रा के बाद शरीर थक चुका था।हाथों में कंपन महसूस होने लगा था और आँखों में भी दिन भर की यात्रा कीथकान उतर आई थी। लेकिन भीतर कहीं एक अलग प्रकार की प्रसन्नता भीबनी हुई थी। पहाड़ों की शीतलता, वहाँ के लोगों का अपनापन, सैनिकअनुशासन, मंदिरों की आध्यात्मिकता और बच्चों की निश्छल मुस्कान मन केभीतर अब भी जीवित थी। रात्रि लगभग साढ़े दस बजे दिल्ली स्थित अपने डेरेपहुँचा। महानगर की हलचल फिर सामने थी, लेकिन भीतर अब भी पहाड़ों कीनिस्तब्धता बनी हुई थी। शरीर थकान से लगभग टूट रहा था। कपड़ों और चेहरेपर पूरी यात्रा की धूल जमा थी, पर मन विचित्र रूप से शांत और प्रफुल्लितथा। मेरे कुक बिहारी जी रात्रि का भोजन बनाकर रख गए थे। नहाने के बादजब भोजन करने बैठा तो लंबे सफर के बाद साधारण भोजन भी किसी प्रसादजैसा लग रहा था। पहाड़ों की यात्रा मनुष्य को यह एहसास कराती है किजीवन की वास्तविक संतुष्टि विलासिता में नहीं, बल्कि सादगी में छिपी होतीहै। भोजन के बाद जैसे ही बिस्तर पर लेटा, पूरा शरीर विश्राम माँग रहा था।लेकिन आँखें बंद होते ही फिर वही दृश्य सामने आने लगे। रानीखेत की सुबह, देवदारों के जंगल, मंदिरों की घंटियाँ, अग्निवीरों की ड्रिल, पहाड़ी बच्चों कीमुस्कान और हिमालय की दूर चमकती चोटियाँ। रानीखेत केवल एक पर्यटनस्थल नहीं लगा। वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, सैनिक परंपरा, ग्रामीणजीवन, सामाजिक संघर्ष, प्राकृतिक संतुलन और मानवीय आत्मीयता काजीवंत दस्तावेज प्रतीत हुआ। पहाड़ पीछे छूट गए थे, लेकिन सच तो यह था किपहाड़ अब भीतर बस चुके थे।



