-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । राहुल गांधी को अब शायद हर अंतरराष्ट्रीय मुलाकात में भी भारत के लिए संकट नजर आने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इटली दौरे पर क्या गए, वहां इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भारतीय कंपनी पारले की ‘मेलोडी’ चॉकलेट क्या भेंट कर दी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे भी राजनीतिक व्यंग्य और कटाक्ष का विषय बना डाला। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि “आर्थिक तूफान सर पर है और हमारे प्रधानमंत्री इटली में टॉफी बांट रहे हैं।” इतना ही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री पर “रील बनाने” और “नौटंकी” करने जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया। सवाल यह है कि क्या विपक्ष की राजनीति अब इतनी सतही हो चुकी है कि भारत के प्रधानमंत्री की हर विदेश यात्रा और हर कूटनीतिक संवाद भी उपहास का विषय बना दिया जाए?
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने राजनीतिक मर्यादा और शब्दों की सीमा को लांघा हो। वस्तुत: राहुल गांधी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा विवादित बयानों और उत्तेजक टिप्पणियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। कभी वे विदेशों में जाकर भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं, कभी देश की संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करते हैं और कभी प्रधानमंत्री के लिए अमर्यादित शब्दों का प्रयोग कर बैठते हैं। यही कारण है कि उनके बयान अक्सर कांग्रेस पार्टी के भीतर भी असहजता पैदा कर देते हैं।
रायबरेली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “गद्दार” कहने तक की भाषा इस्तेमाल की, उसने राजनीतिक बहस को और विषाक्त बना दिया है। लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, वैचारिक संघर्ष भी हो सकता है, किंतु देश के प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए इस तरह की भाषा क्या किसी जिम्मेदार नेता को शोभा देती है? भाजपा ने स्वाभाविक रूप से इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने इसे न सिर्फ प्रधानमंत्री का अपमान बताया, बल्कि देश की जनता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी करार दिया है और यह सही भी है ।
राहुल गांधी की यह शैली नई नहीं है। याद कीजिए, उन्होंने कभी प्रधानमंत्री मोदी को “चौकीदार चोर है” कहा था। कभी “पनौती” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। विदेशों में जाकर उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है और संस्थाएं कब्जे में हैं। ब्रिटेन के कैम्ब्रिज और अमेरिका में दिए गए उनके भाषणों ने भी राजनीतिक विवाद खड़े किए थे। तब भी सवाल उठा था कि क्या देश के अंदर की राजनीतिक लड़ाई को विदेशी मंचों पर ले जाकर भारत की छवि को धूमिल करना उचित है?
विडंबना यह है कि राहुल गांधी हर मुद्दे में नकारात्मकता खोजने लगे हैं। प्रधानमंत्री किसी वैश्विक मंच पर भारत की बात करें तो उन्हें समस्या दिखती है। किसी विदेशी नेता से आत्मीय संबंध बनाएं तो उसमें भी उन्हें “रील” और “नौटंकी” दिखाई देती है। जबकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में व्यक्तिगत संबंधों और सांस्कृतिक प्रतीकों का अपना महत्व होता है। मेलोनी को ‘मेलोडी’ चॉकलेट देना कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय सॉफ्ट पावर और आत्मीयता का प्रतीक था। दुनिया के बड़े नेता ऐसे अनौपचारिक पलों के जरिए ही संबंधों को सहज और मजबूत बनाते हैं।
राहुल गांधी के बयान पर दिलचस्प प्रतिक्रिया राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार की ओर से आई है । वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने साफ कहा कि प्रधानमंत्री मोदी विदेशों में भारत की प्रतिष्ठा को मजबूत करने का काम कर रहे हैं और जब बात राष्ट्रहित की हो, तब राजनीतिक मतभेदों को आड़े नहीं आना चाहिए। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परिपक्व राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत करता है। विपक्ष का काम आलोचना करना है, किंतु राष्ट्रीय सम्मान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को लेकर एक मर्यादा भी होनी चाहिए।
भाजपा ने राहुल गांधी की बयानबाजी को उनकी राजनीतिक हताशा से जोड़कर देखा है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि राहुल गांधी सत्ता नहीं मिलने की निराशा में देश को ही गाली देने लगे हैं। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने उनकी भाषा की तुलना पाकिस्तान समर्थित तत्वों से कर दी। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अनादर बताया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने तो यहां तक कह दिया कि राहुल गांधी “देश की राजनीति के राहु” बन चुके हैं, जो लगातार राजनीतिक वातावरण को दूषित कर रहे हैं।
असल सवाल यही है कि राहुल गांधी आखिर किस दिशा में अपनी राजनीति को ले जाना चाहते हैं? क्या सिर्फ आक्रामक भाषा और विवादित बयान ही अब उनकी पहचान बनकर रह गए हैं? लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष बेहद जरूरी होता है, लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता उसके तर्क, दृष्टि और संयम से बनती है, कटाक्ष और कटुता से नहीं। यदि हर राष्ट्रीय उपलब्धि, हर कूटनीतिक पहल और हर वैश्विक संवाद को केवल व्यंग्य और उपहास में बदल दिया जाएगा, तो स्वभाविक है कि इससे सबसे अधिक नुकसान विपक्ष की गंभीरता को ही होगा।
राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री पद किसी व्यक्ति तक सीमित न होकर देश का प्रतिनिधित्व करता है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, किंतु जब भारत का प्रधानमंत्री किसी विदेशी धरती पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, तब शब्दों की मर्यादा और राष्ट्रीय सम्मान का ध्यान रखना हर जिम्मेदार नेता का कर्तव्य है। दुर्भाग्य यह है कि राहुल गांधी बार-बार इसी कसौटी पर चूकते नजर आते हैं। शायद यही वजह है कि उनके बयान जितनी सुर्खियां बटोरते हैं, उतने ही सवाल उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर भी खड़े कर जाते हैं।अब बड़ा सवाल यही है कि वे कभी परिपक्व होंगे या नहीं !!!



