भारतीय संविधान पर पू. सरसंघचालक मोहन भागवत जी के विचार

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• हमारे देश के मूर्धन्य लोगों ने, विचारवान लोगों ने एकत्रित आकर विचार करके संविधान का निर्माण किया है, वह ऐसे ही नहीं बना। जिन विचारवान लोगों ने इस संविधान का निर्माण किया उन्होंने उसके एक-एक शब्द पर बहुत मंथन किया और सर्वसहमति उत्पन्न करने के पूर्ण प्रयास के बाद बनी सहमति के बाद यह संविधान बना। (भारत का भविष्य, पृष्ठ 56)

• भारतीय संविधान की एक प्रस्तावना (प्रियम्बल) है। उसमें नागरिक कर्तव्य बताए गए हैं, उसमें ‘डायरेक्टिव प्रिंसीपल्स’ हैं और नागरिक अधिकार भी हैं। (भारत का भविष्य, पृष्ठ 56)

• मैं केवल प्रियम्बल पढ़ देता हूँ- “WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR, DEMOCRATIC REPUBLIC (ये सोशलिस्ट सेक्यूलर शब्द बाद में आया है सबको पता है लेकिन अभी है। इसलिए मैंने उसको भी पढ़ा है।) and secure to all its citizens JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship; EQUALITY of status and of opportunity; (अब आगे एक महत्त्व की बात डॉक्टर आम्बेडकर साहब ने संविधान सभा के अपने भाषण में कही थी।) and to promote among them all FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था कि हमारी आपस की लड़ाई के कारण विदेशी जीते और हमको गुलाम बनाया। (भारत का भविष्य, पृष्ठ 57)

• हमने अपने प्रजातांत्रिक देश में एक संविधान को स्वीकार किया है। यह संविधान हमारे लोगों ने तैयार किया और यह संविधान हमारा देश का consensus है इसलिए संविधान के अनुशासन का पालन करना सबका कर्तव्य है। संघ इसको पहले से ही मानता है। (भारत का भविष्य, पृष्ठ 56)

• प. पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहन जी भागवत विजयादशमी उत्सव 2014 के अवसर पर कहते हैं- “देश के अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम मनुष्य के जीवन की स्थिति ही इस देश के विकास की निर्णायक कसौटी होगी तथा आत्मनिर्भरता देश की सुरक्षा व समृद्धि का अनिवार्य घटक है यह ध्यान में रखकर चलना पड़ेगा। जीवन का भिन्न दृष्टि से विचार करने वाला तथा उस विचार के आधार पर विश्‍व का सिरमौर देश बनकर सदियों तक जगत का नेतृत्व करने वाला अपना देश रहा है , इस तथ्य को निरंतर स्मृति में रखकर चलना पड़ेगा। उस दृष्टि में भारत में ही समस्त विश्‍व के कल्याण का सामर्थ्य विद्यमान है। उसका युगानुकूल आविष्कार नीतियों में प्रकट करना पड़ेगा। ऐसी नीतियॉं चलाकर देश के जिस स्वरूप के निर्माण की आंकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की है उस ओर देश को बढ़ाने का काम होगा, इस आशा और विश्‍वास के साथ सत्ता अपना कार्य करे इसके लिये उनको समय तो देना पड़ेगा”।

• प.पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहन जी भागवत ने विजयादशमी उत्सव दिनांक 11 अक्टूबर, 2016 के अवसर पर दिए गए उद्बोधन में कहा कि “देश की व्यवस्था के नाते हमने अपने संविधान में संघराज्यीय कार्यप्रणाली का स्वीकार किया है। ससम्मान व प्रामाणिकता पूर्वक उसका निर्वाह करते समय हम सभी को विशेषकर विभिन्न दलों द्वारा राजनीतिक नेतृत्व करने वालों को यह निरन्तर स्मरण रखना पडे़गा कि व्यवस्था कोई व कैसी भी हो, सम्पूर्ण भारत युगों से अपने जन की सभी विविधताओं सहित एक जन, एक देश, एक राष्ट्र रहा है, तथा आगे उसको वैसे ही रहना है, रखना है। मन, वचन, कर्म से हमारा व्यवहार उस एकता को पुष्ट करने वाला होना चाहिए, न कि दुर्बल करने वाला”।

• प. पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहन जी भागवत विजयादशमी उत्सव (रविवार दि. 25 अक्तूबर 2020) के अवसर पर अपनेउद्बोधन में कहते हैं कि “शासन-प्रशासन के किसी निर्णय पर या समाज में घटने वाली अच्छी बुरी घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देते समय अथवा अपना विरोध जताते समय, हम लोगों की कृति, राष्ट्रीय एकात्मता का ध्यान व सम्मान रखकर, समाज में विद्यमान सभी पंथ, प्रांत, जाति, भाषा आदि विविधताओं का सम्मान रखते हुए व संविधान कानून की मर्यादा के अंदर ही अभिव्यक्त हो यह आवश्यक है। दुर्भाग्य से अपने देश में इन बातों पर प्रामाणिक निष्ठा न रखने वाले अथवा इन मूल्यों का विरोध करने वाले लोग भी, अपने आप को प्रजातंत्र, संविधान, कानून, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों के सबसे बड़े रखवाले बताकर, समाज को भ्रमित करने का कार्य करते चले आ रहे हैं। 25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनके ऐसे तरीकों को “अराजकता का व्याकरण”(Grammer of Anarchy) कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना व उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा”।

• इसी क्रम में वे आगे कहते हैं-“भारत की विविधता के मूल में स्थित शाश्वत एकता को तोड़ने का घृणित प्रयास हमारे तथाकथित अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों को झूठे सपने तथा कपोलकल्पित द्वेष की बातें बता कर चल रहा है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ऐसी घोषणाएँ देने वाले लोग इस षड्यंत्रकारी मंडली में शामिल हैं, नेतृत्व भी करते हैं। राजनीतिक स्वार्थ, कट्टरपन व अलगाव की भावना, भारत के प्रति शत्रुता तथा जागतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा, इनका एक अजीब सम्मिश्रण भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध काम कर रहा है। यह समझकर धैर्य से काम लेना होगा। भड़काने वालों के अधीन ना होते हुए, संविधान व कानून का पालन करते हुए, अहिंसक तरीके से व जोड़ने के ही एकमात्र उद्देश्य से हम सबको कार्यरत रहना पड़ेगा। एक दूसरे के प्रति व्यवहार में हम लोग संयमित, नियम कानून तथा नागरिक अनुशासन के दायरे में, सद्भावनापूर्ण व्यवहार करते हैं तो ही परस्पर विश्वास का वातावरण बनता है। ऐसे वातावरण में ही ठण्डे दिमाग से समन्वय से समस्या का हल निकलता है”।

• प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने विजयादशमी उत्सव (बुधवार दि. 05 अक्तूबर 2022) के अवसर पर दिए गएउद्बोधन में कहा कि “संविधान के कारण राजनीतिक तथा आर्थिक समता का पथ प्रशस्त हो गया, परन्तु सामाजिक समता को लाये बिना वास्तविक व टिकाऊ परिवर्तन नहीं आएगा, ऐसी चेतावनी पूज्य डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी ने हम सबको दी थी”।

आतंकवाद पर विकृत राजनीति करते कांग्रेस तथा अन्य विरोधी दल

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दिल्ली । राजधानी दिल्ली में 10 नवंबर 2025 को हुए लाल किला कार बम धमाके की जांच, अत्याधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से की जा रही है। जांच से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वह बहुत ही भयावह है। ये आतंकवादी डॉक्टर्स रॉकेट और ड्रोन जैसी चीज़ें बना रहे थे और राजधानी दिल्ली पर हमास की स्टाइल में हमले करने का षड्यंत्र रच रहे थे। इस आतंकवादी समूह ने 32 कार बम धमाके करने की योजना बनाई थी । ये लाखों हिन्दुओं को मारकर बाबरी विध्वंस का बदला लेना चाहते थे । दिल्ली लाल किले धमाके की जांच अभी चल रही है और हर दिन नए खूंखार और सफेदपोश अपराधी पकड़े जा रहे हैं।

जहाँ एक ओर सभी सुरक्षा एजेंसियां मिलकर अपराधियों की खोजबीन में लगी हैं वहीं विरोधी दल परोक्ष रूप से आतंकवादियों के बचाव में लगे हैं। धमाके के कुछ समय बाद ही विपक्षी पार्टियों ने सोशल मीडिया में यह प्रोपेगेंडा चला दिया कि बम धमाका बिहार चुनाव के मद्देनजर हुआ है। आतंकवाद के विरोध में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया बहुत ठंडी व सीमित रही। विरोधियों ने आतंकवादियों के स्थान पर अपनी सुरक्षा एजेंसियों को ही कठघरे में खड़ा किया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस कठम नहीं उठाया उनका एक बहुत लंबा चौड़ा डिजाइनर पोस्ट आता है जिसमें वह दो प्रकार के आतंकियों से देश को खतरा बताते हैं और परोक्ष रूप से हिन्दुओं को कोसते हैं। चिदंबरम वही पूर्व गृहमंत्री हैं जिन्होंने हिंदू आतंकवाद व भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़े थे, उनके कार्यकाल में ही इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन पनपे तब पी चिदम्बरम साहब ने उनको रोकने के लिए कुछ नहीं किया अपितु उनके कार्यकाल में हुए आतंकी धमाकों के अपराधियों के विरुद्ध कमज़ोर केस बनाए गए जिससे बाद में वो बरी हो जाएं।

कांग्रेस के एक पूर्व सांसद हुसैन दलवई ने दो हाथ आगे निकलते हुए कहा कि यह धमाका कश्मीर में हो रहे अन्याय का परिणाम भी हो सकता है और साथ ही उन्होंने इसमें राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ की भूमिका भी जांच की मांग कर डाली। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आतंकवाद की घटना में पकड़े जा रहे युवाओं को भटका हुआ युवा बता दिया। जम्मू कश्मीर में पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती तो सदा से ही आतंकवाद का समर्थन व सरंक्षण करने वाले बयान देती रहती हैं तो इस बार भी वही कर रही हैं यही हाल वहां के सत्तारूढ़ अब्दुला परिवार का है। समाजवादी नेता अबू आजमी को भी यह बात अच्छी नहीं लग रही कि दिल्ली बम धमाके में इतने सारे डाक्टर्स पकड़े जा रहे हैं।

कांग्रेस के नेतृत्व में मुस्लिम तुष्टिकरण में लगा संपूर्ण विपक्ष कही न कहीं, किसी न किसी रूप में आतंक की पैरवी करता नजर आ रहा है। यह वही विपक्ष है जिसके नेता सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगते फिरते हैं और आपरेशन सिंदूर के समय भारत सरकार का साथ देने की बजाए चीन और पाकिस्तान की भाषा बोलते नजर आ रहे थे। ये पाकिस्तान की मीडिया के नायक हैं । आज संपूर्ण विपक्ष आतंकवाद का प्रचारक बन गया है। यह दल और इनके नेता इस्लामिक आतंकवाद की निंदा नहीं करते अपितु जब आतंकवााद के खिलाफ कार्यवाही प्रारंभ हो जाती है तब ऐसी -ऐसी बयानबाजी करते हैं कि जांच की दिशा और दशा प्रभावित हो जाए। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सरीखे लोग मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ओसामा जी और साहब जैसे संबोधन प्रयोग करते हैं। इनका राष्ट्रीय विचार कुछ नहीं है सिर्फ अपने वोट बैंक को साधना है।

दिल्ली बम धमाके के बाद कांग्रेस के नेताओं के बयानों से यह सिद्ध हो गया है कि कांग्रेस कट्टरपंथी मुस्लिम तुष्टिकरण में किसी भी सीमा तक जा सकती है। उसके नेताओं के बयान यह आभास भी दे रहे हैं कि अगर इस समय गलती से भी उनके नेतृत्व वाली सरकार होती तो कार बम धमाके को महज सीएनजी धमाका कहकर छोड दिया जाता या फिर इसके पीछे षड्यंत्र करके एक बार फिर हिंदू आतंकवाद के एंगिल से जांच कर संघ को बदनाम किया जाता।

सौभाग्य से वर्तमान में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व मे एक मजबूत सरकार है। गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर चुके हैं कि हम आतंकियो को पाताल से भी खोजकर लाएंगे और कठोरतम दंड देंगे। सुरक्षा एजेंसियां अपराधियों को ढूँढने में लगी हैं। दिल्ली कार बम धमाके की जांच की तह तक पहुंचना सरकार का पहला लक्ष्य है। षड्यंत्र की सभी परतें खुलने और सभी प्रमाण हाथ में आ जाने के बाद ही सरकार आगे की कार्यवाही करेगी।

“बिग बॉस – भारत का राष्ट्रीय तमाशा, जहाँ झगड़ा देखने की भूख मिटती है और दिमाग की भूख मर जाती है”

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भारत में बिग बॉस कौन देखता है?बिग बॉस मुख्य रूप से भारत के निम्न-मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग का मनोरंजन है। 18-45 आयु वर्ग की महिलाएँ (खासकर गृहिणियाँ), छोटे शहरों-कस्बों के युवा, कॉलेज स्टूडेंट्स, और वो लोग जो दिन भर की थकान के बाद “कुछ मसालेदार” देखना चाहते हैं – यही इसका कोर ऑडियंस है। TRP डेटा बताता है कि B और C टियर शहरों में इसकी रीच सबसे ज्यादा है। अमीर तबका शायद ही देखता हो, और उच्च शिक्षित अर्बन एलीट तो इसे “कचरा” कहकर नाक सिकोड़ता है। यानी ये वही वर्ग है जो रोज़ सुबह सास-बहू सीरियल देखता है और रात में बिग बॉस देखकर सोता है – मनोरंजन का “जंक फूड”।बिग बॉस का 18 साल का सफर (2006-2025 तक)2006 में कलर्स चैनल ने नीदरलैंड्स के बिग ब्रदर फॉर्मेट को कॉपी करके बिग बॉस लॉन्च किया। पहला सीजन शिल्पा शेट्टी ने होस्ट किया था – वो सीजन अभी तक सबसे सभ्य और देखने लायक माना जाता है। फिर अर्शी खान, संगीता घोष, शिल्पा शिंदे जैसे कई होस्ट आए-गए, लेकिन 2010 से सलमान खान ने कुर्सी पर कब्ज़ा जमा लिया। सलमान के आते ही शो का DNA बदल गया – अब ये कम रियलिटी शो था, ज्यादा “सलमान खान का वीकेंड तमाशा” बन गया।
पिछले 18 सीजनों में हमने सब देख लिया:
  • राहुल रॉय से लेकर मुन्नवर फारूकी तक के विनर
  • राखी सावंत का “ईश्वर की दुआ” वाला ड्रामा
  • सिद्धार्थ शुक्ला का गुस्सा, आसिम रियाज़ का स्वैग
  • पूजा मिश्रा का “पलट-पलट” वाला पैन
  • अली क़ुली मिर्ज़ा का “बाहर जाकर मारूंगा” वाला डायलॉग
  • एल्विश यादव का “सिस्टम” वाला ज्ञान

हर सीजन में एक फॉर्मूला दोहराया जाता है: 4-5 कंटेस्टेंट को पहले से “कैरेक्टर” दे दो – एक गुस्सैल, एक रोने वाला, एक फ्लर्ट, एक “सच्चा इंसान”, एक विलेन। फिर उन्हें एक घर में बंद कर दो, कैमरे लगा दो, टास्क दो, झगड़ा करवाओ, वोटिंग करवाओ। जनता वोट करती है, विज्ञापनदाता पैसा कमाते हैं, चैनल TRP बटोरता है। बस।सलमान खान का जादू और कीमतअब बिग बॉस का मतलब सलमान खान ही है, ठीक वैसे ही जैसे KBC का मतलब अमिताभ बच्चन। सलमान आते ही रेटिंग 30-40% बढ़ जाती है। उनका “ये क्या कर रहे हो यार”, “भाई लोग”, “ओ तेरी” जैसे डायलॉग मीम बन जाते हैं। लेकिन यही सलमान शो की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी हैं – वो अपने फेवरेट कंटेस्टेंट को बचाते हैं, दूसरों को डांटते हैं, नैरेटिव कंट्रोल करते हैं। शो “रियलिटी” से “स्क्रिप्टेड ड्रामा” बन चुका है।आलोचना – जो सबको पता है पर कोई बोलता नहीं

  1. मानसिक स्वास्थ्य की धज्जियाँ – कंटेस्टेंट को 3 महीने तक नींद से, प्राइवेसी से, बाहर की दुनिया से काट दो, फिर अपमान करो, भड़काओ, ट्रिगर करो। डिप्रेशन, एंग्जायटी, सुसाइडल विचार – ये सब हो चुके हैं।
  2. जहरीली भाषा और हिंसा को ग्लैमराइज़ करना – गाली-गलौच, बॉडी शेमिंग, कैरेक्टर असैसिनेशन को मनोरंजन” बेचा जाता है।
  3. फेक रिलेशनशिप और ब्रेकअप – शो के अंदर बने “रोमांस” बाहर आते ही टूट जाते हैं, लेकिन उससे पहले जनता को बेवकूफ बनाया जाता है।
  4. जाति-धर्म-क्षेत्रवाद को भड़काना – वोट बैंक के लिए कंटेस्टेंट को उनके बैकग्राउंड से जज किया जाता है।

फिर भी लोग क्यों देखते हैं?क्योंकि भारत में “दूसरों का झगड़ा” देखना सबसे सस्ता और मीठा नशा है। यही कारण है कि 18 साल बाद भी ये चल रहा है।इसे बेहतर बनाने के सुझाव

  1. साइकोलॉजिस्ट की टीम 24×7 रखो, न कि सिर्फ नाम के लिए।
  2. गाली-गलौच और हिंसा पर सख्त सजा – सीधे बाहर निकालो।
  3. स्क्रिप्टेड टास्क कम करो, असली रियलिटी दिखाओ।
  4. सलमान को वीकेंड पर सिर्फ होस्ट बनाओ, जज बनने से रोक दो।
  5. कंटेस्टेंट की मेंटल हेल्थ हिस्ट्री चेक करो, ट्रिगर करने वाले लोगों को मत डालो।
  6. कॉमन मैन को सचमुच मौका दो, हर बार सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर क्यों?

अंत में एक कड़वा सच: बिग बॉस को बेहतर बनाने की ज़रूरत नहीं है। ये जितना घटिया, जितना जहरीला, जितना फेक है – उतना ही चलता है। ये शो नहीं, समाज का आईना है। हम जैसा समाज हैं, वैसा ही हमारा “राष्ट्रीय तमाशा” है।
तो फिर मिलते हैं – वही झगड़ा, वही ड्रामा, वही “भाईजान की डांट”। क्योंकि भारत में यही चाहिए।
बाकी अच्छे कन्टेंट के लिए ओटीटी के खजाने में कोई कमी नहीं है। पर जिसे सस्ते नशे का शौक हो, उसे अच्छा कन्टेंट चाहिए नहीं। मतलब बिग बॉस में ‘भाई जान का जलवा’ है। जो सालों से कायम है। उनके एटीट्यूड के भी यहां लाखों दीवाने हैं।

RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat Addresses Dignitaries; Emphasises Social Harmony, Civilisational Unity, and Manipur’s Long-term Peace

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Imphal | Rashtriya Swayamsevak Sangh(RSS) Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat addressed a distinguished gathering of dignitaries in Imphal today during the first day of his three-day visit to Manipur.
In his address, Dr. Bhagwat reflected on the Sangh’scivilisational role, national responsibilities, and the ongoing efforts for a peaceful and resilient Manipur.
Dr. Bhagwat stated that the RSS continues to be a subject of daily discussion across the country, often shaped by perceptions and propaganda.
While stating that the Sangh’s work is unparallel, he said, “There is no organisation comparable to the RSS, just as the sea, the sky, and the ocean have no comparison. The growth of RSS is organic and the methodology was resolved after 14 years of its foundation. To understand one has to visit Shakha. The objective of RSS is to organise the whole Hindu society including those who oppose the Sangh, not creating a power centre within the society.”
He highlighted that misinformation campaigns against the RSS began as early as 1932–33, including from sources outside Bharat that lacked an understanding of Bharat and its civilisational ethos. The Sarsanghchalak stressed the need for understanding of the organisation based on truth rather than perception-driven narratives.
Recalling the life of RSS founder Dr. K.B. Hedgewar, Dr.Bhagwat underlined his academic excellence, born patriotic activities, and involvement in all streams of then freedom struggle.
He noted that Dr. Hedgewar’s realisation of the need for a united and qualitatively improved society led to the creation of the RSS. “The Sangh is a man-making methodology,” he said, urging people to understand the organisation through its shakhasystem on ground.
He noted that the term “Hindu” in this context is a cultural and civilisational descriptor rather than a religious identity. It (Hindu) is not a noun but an adjective. For a strong Rashtra he emphasized the need for “quality and unity”. The progress of a Rashtra not only depends on leaders alone but on a strong and united society.
He praised the inclusive nature of Hindu thought, citing, “EkamSat Vipra Bahudha Vadanti.” Truth, compassion, purity, and austerity form the essence of Dharma, he said, adding that these values are core of our Hindu civilisation.
“Vividhata (diversity) is not a myth. Diversity is the manifestation of inherent unity within the society.”

Speaking on Bharat’s ancient nationhood, he said the our Rashtra emerged not through western state mechanisms but through the “tapasya” of great ancient seers for the welfare of humanity. Principles like Vasudhaiva Kutumbakam reflect the universal vision of Hindutva.

Emphasising the need for expanding apanatva (sense of belonging), Dr. Bhagwat remarked, “As our societal strength increases, the world listens to us. Nobody listens to the weak. The mission of the Sangh is to nurture capable individuals for a strong and harmonious Hindu Samaj.”

He added that the RSS does not work for its own glory. “Teravaibhav amar rahe Maa Ham Din Chaar Rahe Na Rahe. Such dedicated individuals are the Nayaks envisioned by our Gurus,” he said.

During his address, Dr. Bhagwat outlined the Panch Parivartaninitiatives being undertaken during the centenary year of the RSS: Samajik Samarasata (Social Harmony), KutumbPrabodhan (Family awakening), Paryavaran Sanrakshan(Environment protection), Swabodh (understanding our own identity and promoting swadeshi thoughts and products) and Nagarik Kartavya (Civic responsibility).

Dr Bhagwat commended Manipur’s strong cultural traditions, including the wearing of traditional attire during special occasions and use of native languages, and encouraged strengthening these further.

On the current situation in Manipur, Dr. Bhagwat stated that efforts are underway both at community and societal level to restore stability. “Destruction takes minutes, but construction requires years, especially when done inclusively and without harming anyone. Peace-building requires patience, collective effort, and social discipline,” he observed.

Awareness of general public is the main factor. Everything should not be expected from the government, the responsibility of the society is very much required. We must be self-reliant as a society for a Swavalambi Bharat. RSS always emphasises on a strong social capital.

He also emphasised the need for skill development for an economically empowered society.

He concluded by reiterating the Sangh’s long-standing ideal: “Sampoorna Samaj ka Sangathan by Sajjan Shakti.”

The Sarsanghchalak also interacted with the participants on issues like skill development.

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