नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व अत्यंत विराट है : सौरभ मालवीय

6-2.jpeg

मीडिया गुरु के नाम से विख्यात डॉ. सौरभ मालवीय की नई पुस्तक ‘भारतीय राजनीति के महानायक : नरेन्द्र मोदी’ इन दिनों खूब चर्चा में है। इसे दिल्ली के मानसी पब्लिकेशन्स ने प्रकाशित किया है। इस चर्चा का एक कारण यह भी है कि यह ऐसे समय में आई है, जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। पूर्व की भांति यह चुनाव भी श्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा जाना तय है। इस पुस्तक में श्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ साथ उनके कृतित्व पर भी प्रकाश डाला गया है।

लेखक डॉ. सौरभ मालवीय का कहना है कि यह पुस्तक प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विराट व्यक्तित्व से परिचय करवाती है। उनके व्यक्तित्व की भांति उनके कार्य भी बहुत ही महान हैं। वह भारत की गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के संवाहक हैं। उनके कृतित्व में भारतीय संस्कृति के दर्शन होते हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत प्रशंसनीय एवं सराहनीय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ही देश की पौराणिक नगरी अयोध्या में भूमि पूजन कर चांदी की ईंट और चांदी के फावड़े से ‘श्री राम जन्मभूमि मंदिर’ निर्माण की आधारशिला रखी थी। जिस समय वह मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे थे उस समय देश के करोड़ों लोग अपने घरों में टेलीविजन पर उन्हें देख रहे थे। वे इस स्वर्णिम क्षणों के साक्षी बने थे। यह पुस्तक समकालीन भारत का एक ऐतिहासिक प्रमाण है, जो भविष्य में लोगों को उनके व्यक्तित्व एवं केंद्र सरकार की योजनाओं और श्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व से परिचित कराएगी।

इससे पूर्व भी डॉ. सौरभ मालवीय की पांच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी, विकास के पथ पर भारत, राष्ट्रवाद और मीडिया, भारत बोध तथा अंत्योदय को साकार करता उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं। वह देशभर के समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं के लिए लेखन करते हैं। वह खबरिया चैनलों पर भी समसामयिक व ज्वलंत विषयों में अपने विचार रखते हुए देखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त वह विभिन्न कार्यक्रमों एवं गोष्ठियों में वक्ता के में रूप में बोलते हुए दिखाई देते हैं।

डॉ. सौरभ मालवीय हिन्दी पत्रकारिता के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। वह राष्ट्रवादी विचारों के प्रहरी हैं। उनकी लेखनी धर्म, संस्कृति, समाज, पर्यावरण, राष्ट्रबोध एवं मानवदर्शन से ओतप्रोत है। वह ईश्वर में गहरी आस्था रखते हैं, इसलिए वह अपनी प्रत्येक पुस्तक इष्टदेव के चरणों में अर्पित करते हैं। उनका कहना है कि भारत भूमि देवताओं की भूमि है। इसके कण-कण में भक्ति है। फिर वह भक्तिभाव से अछूते कैसे रह सकते हैं।
वर्तमान में वह लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

डॉक्टर हेडगेवार जी ने राष्ट्र के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया – दत्तात्रेय होसबाले

6.jpeg

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि संघ की आधारशिला रखने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी एक समग्र राष्ट्रीय सोच वाले व्यक्ति थे। राष्ट्रभक्ति की भावना उनके अंदर जन्मजात थी। राष्ट्र के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आज की पीढ़ी उनकी देशभक्ति और राष्ट्रीय विचारों से प्रेरणा लेती है। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी संघ संस्थापक प्रथम सरसंघचालक डॉक्टर हेडगेवार जी की जीवनी ‘Man of the Millennia: Dr Hedgewar’ के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश के माननीय राज्यपाल न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) एस अब्दुल नजीर मुख्य अतिथि थे। सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के मूल मराठी लेखक नाना पालकर थे जिसका अंग्रेजी में अनुवाद स्वर्गीय डॉक्टर अनिल नैने ने किया है।

सरकार्यवाह जी ने कहा कि डॉक्टर साहब ने जिस विचारधारा से संघ खड़ा किया आज दुनिया के अनेक संस्थान उसका अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि संघ को समझने के लिए संघ को दूर से नहीं बल्कि नजदीक से देखिए, समझ में आए तो रहो वरना चले जाओ। संघ को समझने के लिए व्यक्ति को दिमाग के साथ दिल की भी जरूरत पड़ती है क्योंकि इसके कार्यकर्ता राष्ट्र सर्वोपरि की भावना के साथ कार्य करते हैं।

माननीय दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि यह पुस्तक डॉक्टर साहब के संपूर्ण जीवन और उनकी कार्यशैली को समझने के लिए बहुत मह्तवपूर्ण साबित होगी। उन्होंने कहा कि डॉक्टर साहब ने संघ में मैं नहीं हम की परंपरा का विकास किया और एक ऐसी टीम खड़ी की जिसकी पहली प्राथमिकता और कार्यशैली में समाज उत्थान, राष्ट्रीय स्वाभिमान और व्यक्ति निर्माण शामिल था। डॉक्टर साहब ने संघ की स्थापना के उपरांत कहा कि यदि मेरे अंदर कोई दोष दिखाई दे तो मेरे स्थान पर अन्य व्यक्ति का चुनाव आप कर सकते हैं। मैं उनके साथ भी इसी राष्ट्रीय भावना के साथ काम करूंगा। होसबाले जी ने कहा कि डॉक्टर हेडगेवार जी सयंमी, धैर्यवान, समर्पित, संवेदनशील और समाज के मनोविज्ञान को समझने वाले व्यक्तित्व के धनी थे।

मुख्य अतिथि आंध्र प्रदेश के राज्यपाल न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) एस अब्दुल नजीर ने कहा कि डॉक्टर हेडगेवार जी ने जिस संगठन की नींव रखी थी आज सारी दुनिया उसके कामों से प्ररेणा ले रही है।

भूगोल बांटता है और संस्कृति जोड़ती है – डॉ सच्चिदानंद जोशी

6-1.jpeg

डॉ तोमियो मिजोकामी जी के स्वागत में प्रवासी भवन में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी सांस्कृतिक कला केन्द्र के सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि डॉ तोमियो मिजोकामी जी के व्यक्तित्व से यह उक्ति चरितार्थ होती है कि भूगोल बांटता है और संस्कृति जोड़ती है।

दिनांक 27 फरवरी , 2024 को अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद और वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा प्रवासी भवन , दीनदयाल उपाध्याय मार्ग में डॉ तोमियो मिजोकामी के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया । संदर्भ था डॉ वेदप्रकाश सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘ डॉ तोमियो मिजोकामाी – व्यक्तित्व और कृतित्व ‘ । कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गाँधी कला केन्द्र के निदेशक डॉ सच्चिदानंद जोशी ने की । कार्यक्रम में वरिष्ठ विद्वान डॉ अशोक चक्रधर, डॉ रविंद्र कुमार, अनिल जोशी, नारायण कुमार, डॉ हरजेन्द्र चौधरी , पुस्तक के लेखक डॉ वेद प्रकाश सिंंह , सुश्री जया वर्मा , डॉ सुरेश ऋतुपर्ण ने भी अपने विचार व्य्क्त किए । कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कथाकार – कवियत्री अलका सिन्हा ने किया । कार्यक्रम का संयोजन वैश्विक हिंदी परिवार दिल्ली के संयोजक श्री विनयशील चतुर्वेदी द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में अपने विचार रखते हुए डॉ मिजोकामी ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण संस्मरण साझा किए । उन्होंने विशेष रूप से प्रसिद्द गायिका शुभा मुद्गल और जाापनी विद्यार्थियों से देश – विदेश में हिंंदी नाटक करवाने संबंधी अपने संस्मरण साझा किए । उनके संस्मरण रोचक , दिलचस्प और प्रेरक थे। पुस्तक के लेखक डॉ वेद प्रकाश सिंह ने पुस्तक के निर्माण की प्रक्रिया की जानकारी दी और उसमें भारतीय कोंसलावास से मिले सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ सच्दिानंद जोशी ने डॉ मिजोकामी को भारत और जापान के बीच सेतु बताया । डॉ अशोक चक्रधर ने हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विकास में उनके महत्व को रेखांकित किया । दिल्ली विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग के डॉ रविन्द्र ने उनकाी बहुभाषिकता और विभिन्न विधाओं पर अधिकार के संबंध में विशेष रूप से बताया । लेखक अनिल जोशी ने कहा कि वे इस समय हिदी के अंतरराष्ट्रीय शिखर व्यक्तित्व हैं। वे भाषा के प्रति प्रतिबद्ध ही नहीं है, वे भाषा को जीते हैं , इसलिए उनकी भाषा और जीवन में अंतर नहीं। वरिष्ठ लेखक डॉ हरजेन्द्र चौधरी ने इस अवसर पर उनके द्वारा लिखी कहानियों का विशेष उल्लेख किया। नारायण कुमार जी ने बताया कि डॉ तोमियो मिजोकामी जी की पुस्तक की भूमिका तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने की । सुश्री जया वर्मा ने डॉ मिजोकामी जी के वैश्विक योगदान की प्रशंसा की । कथाकार अलका सिन्हा ने उनकी मासूमियत का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें भारत की भाषा और परिधान बचपन से ही पसंद था। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी उन्हें सम्मानित कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। बरूण कुमार जी ने भारत और जापान के बीच के पारस्परिक संबंधों को सुदृढ़ करने में उनके योगदान की सराहना की । डॉ सुरेश ऋतुपर्ण ने इस अवसर पर जापान के अपने संस्मरण साझा किए।

कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय में जापानी भाषा की प्रमुख सुश्री उनीता सच्चिदानंद, जवाहर लाल विश्वविद्यालय में जापानी भाषा की सुश्री तनुश्री , गगनांचल के संपादक श्री रविशंकर , दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ शैलजा , डॉ दीपमाला, डॉ राजेश गौतम , डॉ राजकुमार , डॉ विवेक शर्मा , डॉ गुरप्रीत , शैलेन्द्र , व विभिन्न कालेजों के शोध विद्यार्थियों ने भाग ल

1 मार्च 1924 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा का बलिदान

9650dd68080b28ace29533ca6f4eccd0.jpg.webp

क्रूर और दुष्ट अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स ट्रेगार्ट को मौत के घाट उतारने का प्रयास

–रमेश शर्मा

पराधीनता के दिनों में कुछ अंग्रेज अधिकारी ऐसे थे जो अपने क्रूरतम मानसिकता के चलते भारतीय स्वाधीनता सेनानियों से अमानवीयता की सीमा भी पार जाते थे । बंगाल में पदस्थ ऐसा ही अधिकारी चार्ल्स ट्रेगार्ट था । जिसे मौत के घाट उतारने का निर्णय सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा ने लिया । समय पर हमला बोला वह बच गया लेकिन एक अन्य नागरिक मारा गया जिस आरोप में साहा को फाँसी दी गई ।

यह घटना 1924 की है । बंगाल ही नहीं देश के विभिन्न भागों में क्राँतिकारी चरम पर था । अंग्रेज सरकार ने क्राँतिकारी आँदोलन का पूरी तरह दमन करने की रणनीति अपनाई इसके लिये खुफिया तंत्र मजबूत किया तथा कुछ विश्वासघात तलाश किये । जिनके माध्यम से पकड़े गए क्राँतिकारियों के साथ क्रूरतम व्यवहार करके जानकारी प्राप्त करने का अभियान चलाया । इसी रणनीति के अंतर्गत चार्ल्स टेगार्ट को बंगाल खुफिया विभाग के प्रमूख के रूप में पदस्थापना हुई । इसने पकड़ धकड़ शुरु की । सूचना ही नहीं संदेह के आधार पर पकड़े गए लोगों के साथ भी अमानुषिक व्यवहार करके जानकारी उगलवाने का प्रयास करता । विशेषकर महिला क्राँतिकारियों के साथ तो ऐसा व्यवहार करता था जिसका वर्णन तक नहीं किया जा सकता । अततः क्राँतिकारियों की संस्था युगान्तर पार्टी ने इस अधिकारी को रास्ते से हटाने का निर्णय लिया और यह काम क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा को सौंपा।

गोपीनाथ साहा का जन्म पश्चिम बंगाल में हुगली जिला अंतर्गत ग्राम सरामपुर में 16 दिसम्बर 1901 को हुआ था । पिता विजय कृष्ण साहा का परिवार क्षेत्र में प्रतिष्ठित था । घर में भारतीय संस्कार और स्वाभिमान संपन्न जीवन का वातावरण था । बालक गोपीनाथ को आधुनिक शिक्षा के लिये विद्यालय भेजा । पर किशोर व्यय से ही सामाजिक जागरण की गतिविधियों से जुड़ गये । परिवार से संबंधित थे । उनका झुकाव क्राँतिकारी आँदोलन के प्रति था । उनका संपर्क भी बढ़ा। तभी1921 में असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। युवा गोपीनाथ इससे जुड़ गए। लेकिन चौरी चौरा काँड के बाद गाँधी जी ने आँदोलन वापस ले लिया । इससे गोपीनाथ सहित युवाओं की पूरी टोली निराश हुई । और गोपीनाथ अपने पुराने मित्र देवेन डे, हरिनारायण और ज्योशि घोष के माध्यम से ‘युगान्तर दल’ में सक्रिय हो गए। उन्हीं दिनों कलकत्ता पुलिस की गुप्तचर शाखा प्रमुख के रूप में चार्ल्स टेगार्ट की पदस्थापना हुई । उसने क्रान्तिकारी आन्दोलन को सख्ती से दमन करने का अभियान चलाया और देशभक्तों पर बहुत ज़ुल्म ढाने लगा उसकी कार्यवाही पर न कोई अपील होती न कोई दलील । उसने संदेह के आधार पर भी अनेक लोगों को फाँसी पर चढ़ा दिया । इसके अतिरिक्त जिन लोगों का क्रान्तिकारियों से जुड़े होने का संदेह होता तो उनके परिवारों की महिलाओं के साथ भी नीचता की सीमा तक अमानुषिक व्यवहार करता था । तब ‘युगान्तर दल’ ने टेगार्ट का काम तमाम करने का निर्णय लिया और यह काम गोपीनाथ साहा को सौंपा।

गोपीनाथ साहा ने ट्रेगार्ट की गतिविधियों का अध्ययन किया और 12 जनवरी 1924 को चौरंगी रोड पर टेगार्ट को निशाना बनाने की योजना बनाई । वे इस मार्ग पर घात लगाकर बैठै और एक अंग्रेज को ट्रेगार्ट समझकर फायर किया । दुर्योग से ट्रेगार्ट ने एन बक्त पर अपना कार्यक्रम बदल लिया था और ट्रेगार्ट के स्थान पर उसका सहयोगी अर्नेस्ट डे आया । क्राँतिकारी गोपीनाथ ने उसे ट्रेगार्ट समझकर फायर कर दिया । अर्नेस्टम मारा गया । गोपीनाथ साहा ने भागने का प्रयत्न किया लेकिन पुलिस ने पीछा पकड़ लिया । उन पर मुक़द्दमा चला । 21 जनवरी 1924 को कोर्ट में पेश हुये उन्होंने बड़ी बहादुरी से अपना कृत्य स्वीकार किया और हिम्मत के साथ दो टूक शब्दों इस बात पर अफसोस जताया कि उनके हाथ से ट्रेगार्ट बच गया । लेकिन यह भी कहा कि मुझे विश्वास है कि कोई न कोई क्रान्तिकारी मेरी इच्छा अवश्य पूरी करेगा। अदालत ने उनके इस बयान पर 16 फरवरी को उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। सजा सुनकर वे वे खिलखिलाकर हँसे और बोले मैं फाँसी की सज़ा का स्वागत करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूंद भारत के प्रत्येक घर में आज़ादी के बीज बोए। एक दिन आएगा जब ब्रिटिश हुक़ूमत को अपने अत्याचारी रवैये का फल भुगतना ही पड़ेगा। और 1 मार्च 1924 को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। तब उनकी आयु केवल 23 वर्ष की थी ।

स्वतंत्रता के क्राँतिकारी संघर्ष में अपना बलिदान देने के एक दिन पूर्व उन्होंने अपनी माँ को एक पत्र लिखा; तुम मेरी माँ हो यही तुम्हारी शान है। काश! भगवान हर व्यक्ति को ऐसी माँ दे जो ऐसे साहसी सपूत को जन्म दे। गोपीनाथ साहा ने जितने साहस और संकल्प से अपना बलिदान दिया इतिहास में उनका उल्लेख उतना ही कम है ।
शत शत नमन् ऐसे वीर क्राँतिकारी को

scroll to top