कुमार गंधर्व : शून्य शिखर पर अनहद बाजै

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हेमंत शर्मा

गायकी के गन्धर्व और संगीत के कबीर, कुमार गन्धर्व होते तो आज एक सौ एक साल पूरे करते. काल जब प्रतिभा को पूरी निर्ममता और क्रूरता के साथ मसलने की कोशिश करता है तो उस यातना से जन्‍मने वाली कला कालजयी होती है. इसलिए कुमार गन्धर्व कालजयी हैं. रेशम की तरह गुँथी उनकी आवाज़ नैसर्गिक थी. उनके लिए तानपुरा यंत्र नहीं जीवन था. कुमार जी संगीत की सभी स्थापनाओं और परिभाषाओं को पार कर गए थे. कुमार गन्धर्व मौन, संगति असंगत‍ि, प्रकृति, विचार, मनोभाव और रहस्‍य को गाते थे. वह चेतना के स्‍वर से हमारा संवाद थे. कुमार गन्धर्व अनहद नाद से हमारा पहला परिचय थे.

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को जैसे साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में स्थापित किया. वैसे ही कुमार गन्धर्व ने कबीर को शास्रीय संगीत के केन्द्र में स्थापित किया. पण्डित कुमार गन्धर्व का संगीत विद्रोह का संगीत है. उनका गायन कालातीत, सर्वकालिक है. बिल्कुल ताज़ा हवा की तरह. कुमार गन्धर्व को सुनने वाले जानते हैं कि वह शून्‍य से स्‍वर उठा लाते थे और फिर सुनने वालों को अपने संगीत लोक में ले जाते थे. यह सब इतना अनायास होता था कि … अवधूता गगन घटा घहरानी…….. उठते ही ताल, स्‍वर, नाद कानों से उतर कर चेतना के तंत्र हिला देता था. उन्‍हें सुनने वाले हर व्‍यक्‍ति ने यह तो कहा होगा कि कबीर अधूरे रह जाते यदि उन्‍हें कुमार जी न म‍िलते. लिंडा हेस ने अपनी किताब “सिंगिंग इम्‍पटीनेस: कुमार गन्धर्व परफ़ॉर्मस पोयट्री ऑफ़ कबीर” में लिखा भी है कि कबीर जिस रिक्‍तता के दर्शन को सुना गए, कुमार गन्धर्व ने उसे सुरों में साध कर अमर कर दिया.

वे नाद के ज़रिए अनहद खोजते थे. देवास के जिस माता की टेकरी पर कुमार जी रहते थे, उसका शिखर उनके न रहने से भले शून्य हो. पर उस शिखर पर उनके स्वर की ध्वजा आज भी फहरा रही है. जिस पर कुमार गन्धर्व का नाम लिखा है. कुमार जी का गायन उनका अपना था. उन्होंने किसी से सीखा नहीं था. ख़ुद गढ़ा था. इसलिए अपने ज़माने में वह सबसे अलग था. सूर, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों से कबीर की तुलना करते हुए कुमार जी कहा करते थे कि बाक़ी के सब परम्परा की कुलीगिरी करते हैं. यानी परम्परा को ढोते हैं. एक कबीर ही हैं जिन्हें दैन्य छू तक नहीं गया है. कबीर को गाते-गाते वे सामान्य जन को भी अपनी तानों के इहलोक से रहस्य लोक में पहुँचा देते. उन्होंने कबीर को गाया ही नहीं जिया भी. इसलिए वे परम्परा, सत्ता, व्यवस्था – सबको ठेंगे पर रखते थे.

जैसे बरसात से गीली ज़मीन में कभी-कभी समय से पहले अँखुआ फूटता है. वैसे ही सिर्फ़ छ साल की उम्र में सिद्धारमैया कोमकाली के गले से स्वर फूटे थे. और ग्यारह बरस की उम्र होते-होते सिद्धारमैया संगीत की अलौकिक साधना से कुमार गन्धर्व बन गए. यानी जिस उम्र में बच्चे तुतलाते हैं. उस उम्र में कुमार गन्धर्व गाने लगे थे. इसी विलक्षणता से कुमार गन्धर्व ने संगीत को और संगीत ने कुमार जी को पूरी तरह आत्मसात कर लिया. कुमार जी रागदारी की शुद्धता में कल्पनाशीलता का मोहक समावेश करते हैं. अपने प्रयोग से शास्त्रीयता में लोक और समकाल की छवि उकेरने वाले कुशल चितेरे बनते हैं. संगीत में चली आ रही धारा से अलग लीक बनाते हैं. निर्गुण को नयी प्रतिष्ठा देने वाले वे अद्भुत शिल्पी हैं. कुमार जी के लिए संगीत और संगीत के लिए कुमार जी कभी किसी दायरे में नहीं बंधे.

दो साल पहले जब कुमार जी की पुत्री कलापिनी कोमकली और पौत्र भुवनेश कोमकली कुमार जी की शताब्दी वर्ष की योजना लेकर आए. तो मैंने कहा कि यह शताब्दी वर्ष किसी एक जगह नहीं पूरे देश में मनाया जाना चाहिए. कुमार जी की जन्मस्थली, कर्मस्थली और देश में संगीत के सभी बड़े केन्द्रों पर उनकी याद में समारोह हो. क्योंकि कुमार जी देश-काल की सीमा से परे हैं. फिर योजना भी ऐसी ही बनी कि मुम्बई से शताब्दी समारोह का आग़ाज़ हुआ जो पुणे, उज्जैन, भोपाल, बंगलुरु, दिल्ली और बनारस तक होता देवास में सम्पन्न हुआ.

एक सौ एक साल पहले कर्नाटक के बेलगाम में सुलभावी गाँव के शिव मन्दिर के पास गायकों के परिवार में शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली का जन्म हुआ. जन्म के वक्त ही पास के मठ के स्वामी ने इस विलक्षण बालक को पहचाना और उसका नाम कुमार गन्धर्व दिया. बचपन से ही वह किसी भी तरह के संगीत को पूरी तरह याद और उसकी नक़ल कर सकते थे. 10 साल की उम्र में वह बी.आर. देवधर से मुम्बई (तब बम्बई) में संगीत की शिक्षा लेने लगे. जिन्होंने बम्बई के ओपेरा हाउस में म्यूज़िक स्कूल खोला था.

यह 1935 की बात है. उस साल बम्बई के जिन्ना हॉल में आयोजित संगीत परिषद के कार्यक्रम में कुमार गन्धर्व को भी बुलाया गया. सारा हॉल खचाखच भरा था. कहीं खड़े रहने की जगह नहीं थी. रसिकों की भारी भीड़ थी. ऐसी स्थिति में उम्र से बारह किन्तु दिखने में नौ वर्ष का बाल कुमार स्टेज पर आ बैठा और उसने सभा पर अपनी आवाज़ का ऐसा सम्मोहन अस्त्र चलाया कि सभा उसकी पकड़ में आ गई. हॉल में उनके स्वर के प्रत्येक हरक़त पर दाद दी जा रही थी. हर चेहरे पर विस्मय का भाव था. उपस्थित रसिक एवम् कलाकारों में इस लड़के की सराहना करने की होड़ मची. पुरस्कारों की झड़ी लग गई. उसकी प्रसिद्धि का ये आलम था कि उस नन्हे गायक का एक कार्टून दूसरे रोज़ 1 मार्च, 1936 को अख़बार में प्रमुखता से छपा.

बम्बई के 1936 के कार्यक्रम से पहले बालक कुमार इंदौर, इलाहाबाद, कलकत्ता, कानपुर और दिल्ली में कार्यक्रम कर चुके थे. अगले ही साल 1937 में एक फ़िल्म ‘नव-जवान’ में भी कुमार गन्धर्व की गायकी पर फ़िल्मांकन किया गया. बालक कुमार संगीत मंच पर अपनी अलग पहचान बना ही रहे थे कि उन्हें तपेदिक (ट्यूबरकुलोसिस) हो गया. यह साल 1947 के आख़िर की बात है. गवैये के फेफड़ों को बीमारी लग गयी. अब क्या होगा? उस वक्त टीबी साध्य रोग नहीं था. सिध्दारमैया कोमकली की गायकी पर रोक लग गयी. हिन्दुस्तानी संगीत के इस उदीयमान कलाकार को टीवी का ग्रहण लग गया. डॉक्‍टरों ने कहा कि अब वह कभी गा नहीं सकेंगे. उन्‍हें थोड़ी गर्म और सूखी जगह जाकर रहने को कहा गया क्‍योंकि बम्बई की नमी से टीबी के बढ़ने का ख़तरा था. यह भारत की आज़ादी का साल था जब कुमार जी के संगीत को रोग की नज़र लग गई. स्वर घुट गया. फेफड़े फूलने लगे. उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए जो रिकॉर्डिंग की, उसे लम्बे समय तक उनकी आख़िरी रिकॉर्डिंग माना जाता रहा.

रोग से लड़ने के लिए कुमार जी को आबोहवा बदलनी पड़ी. उन्होंने प्रकृति के क़रीब देवास के माता की टेकरी पर अपना ठिकाना बनाया. यहाँ गायन तो सम्भव नहीं था, पर संगीत के लिए जिस मनन-चिन्तन की अपेक्षा होती है. उसके लिए कुमार जी के पास देवास में ख़ूब समय था. टीबी ने उनके फेफड़ों के फैलाने और फुलाने की ताक़त को सिकोड़ दिया. गायकी के लिए यह लाचारी थी. पर कुमार जी ने इस लाचारी को अपनी ताक़त बनाया. वे गायकी में छोटी तान ही ले पाते. यही उनकी विशिष्टता बनी. तपेदिक से ख़राब हुए फेफड़ों ने कुमार जी के संगीत को अलबेला स्‍वर दिया. बीमारी के छह साल के बाद जब उन्‍होंने दोबारा गाना शुरू किया तो वह और दिव्‍य हो गया. संगीत के समीक्षक मानते हैं कुमार जी के उस लम्बे गानहीन मौन ने उन्हें जो स्‍वर की गमक और नाद की मूर्धन्‍यता दी, वह देवधर स्‍कूल वाले शिक्षक से नितान्त अलग थी. अब कुमार गन्धर्व संगीत के गायक नहीं दार्शनिक हो गए थे. और उनका गायन समय की सीमा को पार कर चेतना से संवाद करने करने लगा था.

मालवा ने कुमार गन्धर्व को नया जीवन दिया. नई साँस दी. बिल्कुल अनल पाखी (फ़ीनिक्स) का तरह. कुमार गन्धर्व के स्वर राख से फिर जिन्दा हो गए. उन्होंने मालवा को उसके ही शब्दों और सुरों में पिरोकर कई अमर गीत दिए. कुमार मालवा के और मालवा कुमार का हो गया. 1952 में स्वस्थ होकर वह फिर से गाने लायक हुए. कुमार गन्धर्व की संगीत-यात्रा की इस दूसरी पारी में और भी गुरुत्व आ गया. कुमार गन्धर्व ने उन्हीं बंदिशों को सुर में बांधा, जो श्रोता आसानी से सुने और समझे.

देवास ने कुमार जी को गढ़ा. उस यंत्रणा ने जिसने उनका स्‍वर छीन लिया था वह स्‍वर की मौन साधना में बदल गई. कुमार जी अब लोक के स्‍वर सुन रहे थे. प्रकृति का हर स्‍वर साध रहे थे. मौन में संगीत सुन रहे थे, बुन रहे थे. देवास में ग्रामीण संगीत घुमक्कड़ संन्यासियों की तान और लोक गायकों के स्‍वर कुमार गन्धर्व को स्‍वस्‍थ कर रहे थे. संगीत अब उनकी शिक्षा ही नहीं, अंतर की ध्‍वनि बन गया था. लिंडा हेस जैसी उनकी संस्‍मरणकार लिखती हैं कि कुमार चिड़‍ियों के स्‍वर को टेप में रिक]र्ड करते थे. वे प्रकृति की अनसुनी ध्‍वन‍ियों और नाद को स्‍मृति में बिठाते थे. यहाँ से कुमार गन्धर्व निर्गुण के हो गए. कबीर में रम गए. उनकी पुत्री कलापिनी कोमकली कहती हैं कि देवास आकर कुमार गन्धर्व संगीतकार से चिन्तक और दार्शन‍िक में बदल गए. उन्‍होंने संगीत से उन रहस्‍यों को तलाशने की साधना प्रारम्भ कर दी जो कबीर अपने निर्गुण से करते थे. संगीत मर्मज्ञ वामनराव देशपांडे की कुमार जी पर एक किताब है- बिटवीन द टू तानपूरास, जिसमें वे कहते हैं कि ऐसा संभवत: इसलिए था कि देवधर स्‍कूल के शिक्षक के तौर पर कुमार जी किराना और आगरा घराने की रवायत सिखाते थे, लेक‍िन संगीत में उन्‍होंने सारी बंदिशें तोड़ दीं. लोक और शास्‍त्रीयता को पूरी शुद्धता के साथ गूँथकर उन्‍होंने संगीत की नई सृष्‍ट‍ि की थी.

मालवा के गाँव वालों और घुमक्कड़ संन्यासियों या सूफ़ी गायकों के गीत हमेशा उनकी ज़िन्दगी में पार्श्व संगीत की तरह नेपथ्य में बजते रहे. उन्होंने लोकसंगीत के तत्वों को राग में तब्दील किया, बिना उनकी शुद्धता से कोई समझौता किए. कुमार गन्धर्व नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू चलता रहेगा, टूटे दिल की पीर को ये जादू हरता रहेगा, आनन्द का सुख देता रहेगा. ये वो आवाज़ है जिसके सामने सरहदें बेमानी हैं. ये वो आवाज़ है जो हर बन्धन को तोड़कर वहाँ पहुँचती है जहाँ लोग सन्नाटे के शोर में लीन हो जाते हैं. हमें गर्व है कि जब हम रहे तो कुमार गन्धर्व गाते थे.

(सोशल मीडिया से साभार)

हिन्दुओं के धार्मिक आयोजनों पर भी रोक लगी

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भोपाल। लगभग सभी विदेशी सत्ताओं ने भारतीय संस्कृति को नष्ट कर अपने रंग में रूपांतरित करने का अभियान छेड़ा । सबका अपना अपना तरीका रहा। अंग्रेजीकाल में भ्रम फैलाकर तो सल्तनतकाल में ताकत और तलवार के जोर पर। मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपनी सत्ता और शक्ति से पूरे भारत से सनातन धर्म को समाप्त करने का अभियान चलाया और भारत के सभी मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। यह आदेश 9 अप्रैल 1669 को निकाला गया था।

भारत के इतिहास में औरंगजेब की गणना सबसे क्रूर शासकों में होती है । उसकी क्रूरता का अनुमान इसी से है कि उसने अपने पिता को कैद में डाला और भाइयों की हत्या करके गद्दी पर अधिकार किया था । वह केवल क्रूर ही नहीं था। उसकी क्रूरता यहीं तक नहीं रूकी थी। औरंगजेब का सबसे बड़ा भाई दारा शिकोह पिता के लिये अति प्रिय था। औरंगजेब ने दारा शिकोह का सिर काटकर पिता को तोहफे में भेजा था। उसने अपने एक बेटी को जेल में डाल दिया था और एक बेटे की मौत का फरमान जारी किया था। औरंगजेब केवल क्रूर ही नहीं बहुत चालक और कूटनीतिक भी था । उसने अपनी क्रूरता और चालाकी को ढंकने केलिये कुछ धर्माचार्यों और लेखकों की एक टोली जमा कर रखी थी । भला कौनसा पंथ पिता को कैद में डालने और भाइयों की हत्या करने वाले को अच्छा कहेगा । लेकिन औरंगजेब की इस चाटुकार टोली ने उसके हर क्रूर कामों पर पर्दा डाला । दुनियाँ के सभी पंथ मानवता की बात करते हैं। अपनी विशेषताओं से समाज को प्रभावित करके अपनी राह में शामिल करते हैं। किन्तु औरंगजेब का अभियान इंसानियत पर नहीं, तलवार के जोर पर था। उसने पूरे भारत को रूपांतरित करने का अभियान चलाया । औरंगजेब ने न केवल मतान्तरण न करने वाले हिन्दुओं पर जजिया बढ़ाया और सख्ती से बसूली के आदेश दिये अपितु अपने साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले सभी 21 सूबों में मंदिरों को तोड़ने का आदेश भी जारी किया । हिन्दुओं को सार्वजनिक तौर पर सभी तीज त्यौहार मनाने पर रोक लगा दी । 9 अप्रैल 1669 को जारी हुये इस आदेश का उल्लेख औरंगजेब की जीवनी पर आधारित पुस्तक ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में है। इस पुस्तक के लेखक औरंगजेब के दरबारी साकी मुस्ताइद खान हैं । इसके अतिरिक्त इस आदेश का उल्लेख वाराणसी गजेटियर के पेज नंबर- 57 पर भी है । यह गजेटियर 1967 में प्रकाशित हुआ था ।

औरंगजेब के इस आदेश के बाद पूरे भारत में मंदिरों को तोड़ने का अभियान चला । कुल कितने मंदिर तोड़े गये इसकी संख्या कहीं नहीं मिलती । सेना जिस बड़े और प्रसिद्ध मंदिर को ध्वस्त करती तो उसकी सूचना दरबार में भेजी जाती। इन सूचनाओं का उल्लेख औरंगजेब की जीवनी में मिलता है । औरंगजेब के शासन में उन स्थानों को भी धूल धूसरित किया गया जो पहले किसी शासक ने तोड़े तो थे । लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं ने इन खंडहरों को थोड़ा सुधार कर भजन पूजन आरंभ कर दी थी । इनमें अयोध्या, मथुरा, काशी और सोमनाथ मंदिर भी थे। औरंगजेब के प्रपितामह अकबर ने अयोध्या में चबूतरा बनाकर भजन पूजन की अनुमति दे दी थी लेकिन औरंगजेब ने उस चबूतरे को भी ध्वस्त करके मस्जिद परिसर में शामिल करने का आदेश दिया। सोमनाथ मंदिर का विध्वंश 1025 में मेहमूद गजनवी ने किया था । मथुरा आदि अन्य स्थानों में भी पूर्व आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त मंदिर स्थलों में थोड़ा-बहुत सुधार करके भजन प्रार्थना आदि होने लगे थे। लेकिन औरंगजेब की सेना ने सनातन के इन सब खंडहर को भी दोबारा तोप से उड़ाया। वहाँ जितने श्रद्धालु मिले वे या तो मार डाले गये अथवा मतान्तरण करने की शर्त पर ही जीवित छोड़े गये ।

औरंगजेब के इस आदेश से जिन मंदिरों को पुनः तोड़ा गया उनमें सोमनाथ के अतिरिक्त काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा में केशवदेव मंदिर, अयोध्या में रामलला मंदिर, अहमदाबाद का चिंतामणि मंदिर, बीजापुर का मंदिर, वड़नगर के हथेश्वर मंदिर, उदयपुर में झीलों के किनारे बने 3 मंदिर, विदिशा का बीजामंडल, उज्जैन के सभी मंदिर, सवाई माधोपुर में मलारना मंदिर आदि थे । औरंगजेब के इस आदेश से आदेश से मथुरा का वह गोविन्द देव मंदिर भी तोड़ दिया गया जो 1590 में राजा मानसिंह द्वारा बादशाह अकबर की अनुमति से बनवाया था। औरंगजेब के आदेश से मंदिरों का विध्वंस करने के साथ वे सभी विद्यालय भी नष्ट कर दिये गये जिनमें भारतीय पद्धति से शिक्षा दी जाती थी। ग्रंथालय जला दिये गये और शिलालेख तोड़ दिये गये थे । ताकि भारत की आने वाली पीढ़ियाँ अपने गौरवमयी इतिहास और परंपराओं से अवगत ही न हो सकें।

औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त किये गये अधिकांश मंदिर स्थलों पर मस्जिदों का निर्माण कराया । अयोध्या में जन्मस्थान पर बनी मस्जिद के विस्तार के साथ हनुमान गढ़ी पर भी एक मस्जिद का निर्माण कराया गया । इसके अतिरिक्त स्वर्गद्वीर मंदिर और ठाकुर मंदिर स्थल पर मस्जिद निर्माण के आदेश दे दिये गये ।

यद्यपि अकबर के शासन काल में भी मंदिरों का विध्वंस हुआ था किंतु कहीं कहीं पूर्व में विध्वंस किये गये मंदिरों के खंडहरों में पूजन पाठ की अनुमति दे दी गई थी । लेकिन औरंगजेब ने सार्वजनिक स्थलों पर सनातन परंपराओं के पूजन पाठ पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।

औरंगजेब के पूरे शासन काल में इस आदेश का पूरी सख्ती से पालन किया गया । बाद के शासनकाल में आदेश तो यथावत रहा पर इसके क्रियान्वयन में कुछ शिथिलता रही।

औरंगजेब ने भारत पर लगभग उन्नचास वर्ष तक शासन किया। उसका पूरा शासनकाल विध्वंस और क्रूरता से भरा रहा। वह जिस स्थान पर गया वहाँ उसने क्रूरता का कैसा कहर बरपाया इसका विवरण स्वयं उसकी जीवनी में है। जिसका अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में भी अनुवाद उपलब्ध है।

8 अप्रैल 1857 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी मंगल पाण्डेय का बलिदान

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 की क्रान्ति को सब जानते हैं। यह एक ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जो पूरे देश में एक साथ हुआ । इसमें सैनिकों और स्वाभिमान सम्पन्न रियासतों ने हिस्सा लिया । असंख्य प्राणों की आहूतियाँ हुईं थी । इस संघर्ष का सूत्रपात करने वाले स्वाभिमानी सिपाही मंगल पाण्डेय थे । अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिये न केवल गाय की चर्बी वाले कारतूस लेने से इंकार किया अपितु दो अंग्रेज सैन्य अघिकारियों को गोली भी मार दी ।

ऐसे इतिहास प्रसिद्ध क्राँतिकारी मंगल पाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के अंतर्गत नगवा नामक गांव में 19 जुलाई 1827 को हुआ था। इनके पिता दिवाकर पांडे था भारतीय परंपराओ से जुड़े थे । घर में पूजा पाठ का वातावरण था । मंगल पाण्डेय की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई । वे स्वस्थ कद काठी थे । वे 1849 में 22 वर्ष की आयु में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना मे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की 34 वीं बटालियन मे भर्ती हो गए । और प्रशिक्षण के बाद बंगाल भेज दिये गये । इस बंगाल नेटिव इन्फ्रेन्ट्री अंग्रेजों के विरुद्ध होने वाले विद्रोह को दबाने में लगाया गया था । इस बीच उन्हें असम और बिहार के वनवासी क्षेत्रों में भेजा गया । अपनी विभिन्न पदस्थापना में उन्होने अंग्रेज अफसरों का भारतीयों के प्रति शोषण और अपमान जनक व्यवहार को देखा था इससे उनके मन में अंग्रेजों के प्रति एक गुस्सा बढ़ता जा रहा था । उनकी इन्फ्रेन्ट्री का केन्द्र बंगाल का बैरकपुर था । बीच बीच में बैरकपुर आते थे । तभी नये कारतूसों को लेकर चर्चा चली । यह बात प्रचारित हुई कि इन कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी है । यह एनफ़ील्ड बंदूक थी जो 1853 में सिपाहियों के लिये आई थी । लेकिन दो तीन साल स्टोर में पड़ी रही और 1856 में सिपाहियों को दी गई। यह ०.557 कैलीबर की इंफील्ड बंदूक थी । इससे पहले ब्राउन बैस बंदूक सिपाहियों के पास थी जो बहुत पुरानी हो चुकी थी । इसे बदलकर नयी बंदूक दी गई थी जो मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली प्रिकशन कैप का प्रयोग किया जाता था । परन्तु इस नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था।

कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी। इस बात को लेकर सिपाहियों में असंतोष उभरने लगा । तथा इन कारतूस का उपयोग न करने का वातावरण बनने लगा । सिपाहियों ने अपनी समस्या से अंग्रेज अधिकारियों को अवगत कराया पर अधिकारियों ने इसका समस्या का समाधान निकालने के बजाय उन सैनिकों पर कार्रवाई करने का निर्णय लिया जो इन कारतूसों के प्रति वातावरण बना रहे थे । इसमें मंगल पाण्डेय का नाम सबसे ऊपर पाया गया । उन्होने इन कारतूसों को लेने इंकार कर दिया । इसलिये अधिकारियों ने मंगल पांडेय को दण्ड देकर रास्ते पर लाने का निर्णय लिया । मंगल पाण्डेय को पहले एक बैरक में बंद करके बेंत मारने की सजा दी गई। मंगल पाण्डेय ने मन ही मन कुछ निर्णय किया और कारतूस लेने की सहमति दे दी तब उन्हें पुनः काम पर बहाल करने का निर्णय हुआ । तब 29 मार्च 1857 को बैरकपुर परेड मैदान में परेड का आयोजन हुआ । इसमें वे दो अंग्रेज अधिकारी भी भाग लेने वाले थे जो इन कारतूसों के उपयोग पर जोर दे रहे थे । इनमें लेफ़्टीनेण्ट बाउ भी था । परेड करते हुये जैसे ही बाग सामने आया क्राँतिकारी मंगल पाण्डेय ने बाउ पर गोली चला दी। बाउ घायल होकर गिर पड़ा । जनरल जान ह्यूसन ने जमादार ईश्वरी प्रसाद को मंगल पांडेय को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया पर जमादार ने मना कर दिया। सारी पलटन सार झुकाकर खड़ी रही । मंगल पाण्डेय को गिरफ़्तार करने कोई सिपाही आगे न आया । जनरल ने अनेक धमकियाँ दीं और लालच भी दिये तब शेख पलटु नामक एक सिपाही आगे आया । तब मंगल पाण्डेय ने पल्टन से विद्रोह करने का आव्हान किया पर इसके लिये किसी सिपाही का साहस न हुआ । परिस्थिति देखकर मंगल पाण्डेय ने स्वयं अपनी बंदूक से अपना बलिदान करने का विचार बनाया किन्तु वे घायल भर हुये । यहाँ इतिहास अलग-अलग पुस्तकों में अलग-अलग विवरण हैं। कुछ पुस्तकों में उनके घायल होने का कारण शेख पलटू द्वारा चलाई गई गोली थी जबकि कुछ ने स्वयं मंगल पाण्डेय द्वारा आत्म बलिदान करने का प्रयास लिखा है । जो हो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । 6 अप्रैल 1857 को कोर्ट मार्शल हुआ । उन्हे मृत्युदंड मिला । इसके लिये 18 अप्रैल 1857 की तिथि निर्धारित की गई। किन्तु इससे दस दिन पहले 8 अप्रैल 1857 को ही उन्हें फाँसी दे दी गई।

सिपाही मंगल पाण्डेय द्वारा बंगाल की बैरकपुर छावनी में जिस क्रांति का उद्घोष किया था वही आगे चलकर पूरे देश में एक विशाल दावानल बनी । क्राँतिकारी मंगल पाण्डेय के बलिदान के एक महीने बाद ही 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में कोतवाल धनसिंह गुर्जर ने क्रांति का उद्घोष किया और दिल्ली को अंग्रेजों से मुक्त कराया । यह विप्लव था जिससे अंग्रेजों को यह संदेश बहुत स्पष्ट मिल गया था कि भारत पर राज्य करना उतना सरल नहीं है जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद ही उन्होंने भारत में कानूनों का दबाव बनाया और समाज को बाँटकर राज्य करने का षड्यंत्र तेज किया । पर मंगल पाण्डेय भारतीय इतिहास में अमर हो गये ।

Two-Day International Seminar on Heroine Archetypes Begins at IIAS Shimla

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Shimla : The Indian Institute of Advanced Study (IIAS), Shimla inaugurated a two-day international seminar today on the theme “Heroine Archetypes in Indian Theatre: Modern Perspectives on Feminist Discourse.” The seminar commenced with the ceremonial lighting of the lamp.

In the start Shri Mehar Chand Negi, Secretary, IIAS delivered the inaugural address and welcomed all the participants. Dr. Shaminaj Khan, Fellow at IIAS and the convener of the seminar, introduced the theme by highlighting the relevance of Nāyikā Bheda—classical classifications of heroines in Indian dramaturgy—as a vital point of inquiry in contemporary feminist discourse. She emphasized the need to examine how traditional heroine archetypes are being redefined in today’s cultural and theatrical landscapes.

Delivering the keynote address online, eminent Sanskrit scholar Professor Radhavallabha Tripathi (Former Vice Chancellor, Rashtriya Sanskrit Sansthan) underlined how the Nāyikā framework is not only a dramatic device but also a cultural construct reflecting women’s roles across time. He elaborated on how classical figures are being reimagined through feminist lenses in modern performances.

The session was moderated by Shri Akhilesh Pathak, SPRO, IIAS, and the vote of thanks was presented by Shri Prem Chand, Consultant (Library).

The first day continued with three academic sessions chaired by Professor O. P. Sharma, Professor Uma Anantani, and Professor R.C. Shinha respectively. Scholars presented papers addressing the reinterpretation of Nayikas from classical Sanskrit plays, contemporary feminist theory, regional literature, and performative adaptations. Participants joined both in person and virtually from across India.

The seminar will conclude on 9 April with a valedictory session presided over by Professor Sachidananda Mohanty and other distinguished scholars.

Akhilesh Pathak
SPRO, IIAS Shimla

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