28 जुलाई 1891 : सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और समाजसेवी ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन

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भारतीय शिक्षण परंपरा और नारी सम्मान का अद्भुत अभियान चलाया

उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और समाज के मानसिक दमन के अभियान का समय था । गुरुकुल नष्ट कर दिये गये थे, चर्च और वायबिल आधारित शिक्षा आरंभ करदी थी । ऐसे किसी ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता थी । जो भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाकर अपने स्वत्व से जोड़ने का अभियान छेड़े। यही काम सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, समाजसेवी ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने किया ।

अंग्रेजों ने भारत की मूल संस्कृति, शिक्षा, समाज व्यवस्था और आर्थिक आत्मनिर्भरता को नष्ट करने में हीशअपनी सत्ता का सुरक्षित भविष्य समझा और इसकी तैयारी 1757 में प्लासी का युद्ध जीतने के साथ ही तैयारी आरंभ कर दी थी और 1773 के बाद चर्च ने भारत के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और मानसिक दमन के लिये बाकायदा सर्वे किया और 1806 में दिल्ली पर अधिकार करने के साथ तेजी से अमल करना भी आरंभ कर दिया था । यद्यपि कुछ सामाजिक और धार्मिक कार्यकर्ता समाज में जागरण का अभियान चला रहे थे पर फिर भी बदली परिस्थिति के अनुरूप सामंजस्य बिठाकर काम करने की आवश्यकता थी । इसी धारा पर सबसे प्रभावी कार्य किया था ईश्वरचंन्द्र विद्यासागर ने । उनका जन्म 26 सितम्बर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के अंतर्गत वीरसिंह गाँव में हुआ था । पिता का ठाकुरदास वन्द्योपाध्याय संस्कृत के अद्भुत विद्वान थे किंतु आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी । बचपन में संस्कृत शिक्षा उन्होने घर पर ही पिता से प्राप्त की । और फिर कलकत्ता के संस्कृत महाविद्यालय में प्रवेश लिया । वे बाल अवस्था से ही कलकत्ता में अपने भोजन का प्रबंध करके शिक्षा ले रहे थे । लेकिन हर कक्षा में प्रथम आते थे । अपनी शिक्षा पूरी कर 1841 मेंषफोर्ट विलियम महाविद्यालय में मुख्य पण्डित पद पर नियुक्ति मिल गई। वे अपने निर्धारित कार्य के लिये शास्त्रों के अध्ययन में भी रत रहते थे । यहीं उन्हें ‘विद्यासागर’ उपाधि से विभूषित किया गया । उन्हें यहाँ पचास रुपये मासिक मानदेय मिलता था । लेकिन वे अपने पास कुछ नहीं रखते थे । वे अपने निजी जीवन में बहुत मितव्यय थे । सारा पैसा निर्धन बच्चों की फीस और भोजन पर व्यय कर देते थे इससे लोग इन्हें ‘दानवीर विद्यासागर’ कहते थे । 1946 में इसी संस्थान में प्राचार्य पर पदोन्नत हुए । 1851 में काॅलेज में मुख्याध्यक्ष बने, 1855 में असिस्टेंट इंस्पेक्टर, और फिर स्पेशल इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। 1858 में त्यागपत्र देकर साहित्य एवं समाजसेवा में लग गये ।

वे जानते थे कि अंग्रेजों के समानान्तर कार्य नहीं कर सकते । इसलिए उन्होंने सामंजस्य का मार्ग निकाला और श्री बेथ्यून की सहायता से एक कन्या शाला की स्थापना की फिर मेट्रोपोलिस काॅलेज की स्थापना की। साथ ही समाज से सहायता प्राप्त करके अन्य स्थानों पर भी विद्यालय आरंभ किये । संस्कृत अध्ययन की सुगम प्रणाली निर्मित की । इसके साथ ही समाज की विसंगतियों के सुधार का भी अभियान चलाया । इसमें विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा आदि थे । उन्होंने न केवल विधवा विवाह का सामाजिक वातावरण बनाना आरंभ किया अपितु अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा स्त्री से ही किया। इसके अतिरिक्त योजनाबद्ध तरीके से सनातन समाज में फैलाये जा रहे भेदभाव को मिटाकर सबको समान नागरिक सम्मान का भी अभियान चलाया । यद्यपि उनकी मात्र भाषा बँगला थी । उन्होंने बंगला में ही साहित्य रचना की पर वे चाहते थे कि प्रत्येक बंगाली को संस्कृत आनी चाहिए। वे कहते थे कि संस्कृत भारत की पहचान है । उन्होंने कुल 52 पुस्तकों की रचना की, इनमें 17 संस्कृत की, थी, पाँच अँग्रेजी में, और तीस पुस्तकों की रचना बँगला भाषा में की । इनमें ‘वैताल पंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा ‘सीतावनवास’ बहुत प्रसिद्ध हुईं।

वे स्वदेशी भाषा, स्वदेशी दिनचर्या और स्वाभिमान के समर्थक थे । वे अपने निजी जीवन में सभी वस्तुएँ स्वदेशी ही प्रयोग करते थे । यहाँ तक कि कपड़े भी घर में बुने हुये पहनते थे । उन दिनों आजकल का बिहार और झारखंड भी बंगाल का अंग था । उन्होंने अपने काम का विस्तार किया और 1873 में जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में आ गये । यह क्षेत्र अब झारखण्ड में है । यहाँ आकर वे संथाल वनवासियों के बीच सक्रिय हो गये । उन दिनों इस क्षेत्र में चर्च और सरकार के अपने अपने दबाव थे । सरकार जहाँ वन संपदा पर अधिकार करके वनवासियों को भुखमरी की कगार पर ला दिया था तो चर्च उनकी सेवा सहायता करके मतान्तरण का अभियान चलाये हुये थे । ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी ने इस क्षेत्र में किसी से बिना कोई टकराव लिये संथाल वनवासियों के कल्याण के काम आरंभ किये यहाँ उन्होंने अपना घर भी बनाया जिसका नाम ‘नन्दन कानन’ रखा । कहने के लिये यह उनका घर था । पर वास्तव में यह एक कन्या विद्यालय था । जीवन के अंतिम लगभग अठारह वर्ष उन्होंने इसी क्षेत्र में बिताये और निरन्तर समाज की सेवा करते हुये उन्होंने 28 जुलाई 1891 को संसार से विदा ली ।

उनकी मृत्यु पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था- “लोग आश्चर्य करते हैं कि ईश्वर ने चालीस लाख बंगालियों में कैसे एक मनुष्य को पैदा किया!” उनकी मृत्यु के कूछ दिनों बाद उनके परिवार ने इस “नन्दन कानन” को कोलकाता के एक व्यापारी को बेच दिया था किन्तु बिहार के बंगाली संघ ने घर-घर से एक एक रूपया एकत्र कर 29 मार्च 1974 को उसे खरीद लिया और पुनः बालिका विद्यालय और एक चिकित्सा केन्द्र प्रारम्भ किया । जिसका नामकरण विद्यासागर जी के नाम पर किया । यह चिकित्सा केन्द्र स्थानीय जनता की निशुल्क सेवा कर रहा है।

महाश्वेता देवी की नजर में ‘पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है’

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प्रभात सुमन

महान साहित्यकार की आज आठवीं पुण्यतिथि है, उन्हें याद करते हुए 1084वें की मां पुस्तक मंगाई है

उस दिन महाश्वेता देवी भंडरिया के एक गांव में थीं। उन्होंने एक महिला से पूछा, ‘आज का खाया है’। इस पर महिला का जवाब था, ‘गेंठी आऊ सरई खईले ही मईंया’। ये दोनों चीजें महाश्वेता देवी के लिए नई थीं। साथ में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वरम भी थे। वह अपनी ‘दीदी’ (महाश्वेता देवी) को बताते हैं, ‘ये जंगली कंद-मूल है। पौधों की जड़ी, इस महिला ने इसे उबाल कर खाया है।’ इस पर दीदी बोल पड़ती हैं, ‘इतनी गरीबी…दर्दनाक।’

आज महाश्वेता देवी की आठवीं पुण्यतिथि है। बांग्ला की इस महान लेखिका का पलामू से गहरा जुड़ाव था। यूं कहें कि पलामू उनका दूसरा घर था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महुआमिलान, मैक्लुस्कीगंज होते हुए वह पलामू आईं और डालटनगंज के एक चौपाल में कहा, ‘पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है’। उनकी कही हुई यह बात वर्षों तक क्रांति कुटीर के सामने शिवाजी मैदान की दीवार पर लिखी हुई थी।

एक बार महाश्वेता देवी रामेश्वरम जी के यहां आई हैं। मैं तुरंत वहां पहुंच गया। ‘चचा हमरा महाश्वेता जी से मिलेला बा’ मेरे यह कहते ही वह तुरंत मुझे भीतर के कमरे में ले गए और महाश्वेता जी से कहा, ‘ये प्रभात सुमन हैं, छात्र नेता रहे हैं, अभी पत्रकार हैं।’ इसके बाद महाश्वेता जी ने थोड़ी देर बातें की और कहा, ‘जब मौका मिले तब पलामू पर लिखना।’ आज जब भी पलामू पर कुछ लिखता हूं तो महाश्वेता जी और रामेश्वरम जी बहुत याद याते हैं।

प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा टाउनहॉल के एक कार्यक्रम में थे। लोग मंच पर महाश्वेता देवी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा था। जब प्रो. मिश्रा की बारी आई तो उन्होंने कहा, ‘मैं आपकी तारीफ नहीं कर रहा हूं। मैं आपके लेखन की तारीफ कर रहा हूं। आप साहित्य, सौम्यता और संघर्ष की संगम हैं। आपका लेखन समाज को नई दिशा दिखाता है, आपकी सौम्यता लोगों को आकर्षित करती है और आपका संघर्ष लोगों को जीने की प्रेरणा देता है।’

महाश्वेता देवी के साथ रामेश्वरम के बाद सबसे ज्यादा समय बिताने का मौका बलराम तिवारी जी को मिला है। पेशे से अधिवक्ता बलराम जी कहते हैं, ‘मैं कई गांवों नेऊरा, सेमरा, पनेरीबांध, भंडरिया व न जाने कितने और में दीदी के साथ रहा। वह टूटी-फूटी हिंदी बोलतीं थी। पलमूआ बोली भी समझ जाती थी। जहां नहीं समझ पातीं थी वहां रामेश्वरम जी को माने बताने के लिए कहतीं थी। एक बार एक वृद्ध महिला ने कहा-‘का कहूं दीदी उठे-बईठे में ना बनला, इसपर महाश्वेता ने कहा-लाठी रखा करो, उठने-बैठने में भी काम देगा और जानवर व लोगों को भगाने में भी काम देगा।’ बलराम जी के अनुसार, ‘दीदी, पलामू के लोगों को नई राह दिखा कर गई हैं। अगर वह कम समय के लिए पलामू आतीं तो रामेश्वरम जी शिवाजी मैदान में ही चौपाल लगा देते थे। इस चौपाल में मजदूर, ग्रामीण से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहते थे।’
रवींद्र त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने महाश्वेता देवी का साक्षात्कार तब लिया था जब वे जनसत्ता, दिल्ली में कार्यरत थे। त्रिपाठी जी बताते हैं, ‘महाश्वेता बेबाक और साफगोई से अपनी बात रखतीं थी। उन्होंने झांसी की रानी और भगवान बिरसा मुंडा को आधार बना कर कई रचनाएं लिखीं। इनमें महिला और आदिवासी समाज के संघर्ष की झलक साफ दिखती है। जब उन्हें पता चला कि मैं पलामू से हूं तो आत्मीयता और बढ़ गई। उन्होंने बंधुआ मुक्ति चौपाल से लेकर पलामू की कई घटनाओं का का जिक्र किया।’ रवींद्र त्रिपाठी जी ने इस महान लेखिका का इंटरव्यू दूरदर्शन के लिए भी लिया था।

एक बार डालटनगंज के टाउन हॉल में ‘जंगल के दावेदार’ नाटक का मंचन हो रहा था। यह महाश्वेता देवी की महान कृतियों में से एक है। इस नाटक का रुपांतरण और निर्देशन उपेंद्र मिश्र (वर्तमान में इप्टा के झारखंड महासचिव) ने किया था। उपेंद्र जी के शब्दों में, ‘महाश्वेता जी ने मिलने के बाद कहा कि अपनी कृति का नाट्य रुपांतरण विस्मित करने वाला है। मुझे नहीं लगता था कि इसका इस तरह से मंचन भी हो सकता है। नाटक देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं पूरी टीम को बधाई देती हूं।’
सैकत चटर्जी आज रंगमंच और फोटोग्राफी के चर्चित नाम हैं। उन्हें भी रामेश्वरम ने ही महाश्वेता देवी से यह कहते हुए मिलवाया था, ‘ई सैकत हव दीदी। फोटो खींच हव, नाटककार हव।’ सैकत कहते हैं, ‘इस मुलाकात में तो कुछ खास नहीं हुआ। किसी ने मेरे कैमरे से ही उनके साथ मेरी तस्वीर ली और मैं वहां से चला आया। अगले दिन मैं अपनी खींची तस्वीरें लेकर उनके पास पहुंचा। इन्हें देखकर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी वह मेरा उत्साह बढ़ाने वाली थीं। उन्होंने कहा था-तुम्हारे फोटो में तो पूरा पलामू दिखता है।’ सैकत ‘जंगल के दावेदार’ के मंचन के समय वहां मौजूद थे। वह कहते हैं, ‘महाश्वेता जी ने नाटक देखने के बाद कहा कि लिखे तो सोचा भी नहीं था कि पलामू के भाई लोग इसका मंचन करेंगे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि अन्याय हो रहा है, इसी पर बात की जानी चाहिए।’

शंभू चौरसिया पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह कहते हैं, ‘मैं पहली बार पनेरीबांध में आयोजित बंधुआ मुक्ति चौपाल के समय उनसे मिला था। मिलाने वाले रामेश्वरम जी ही थे। महाश्वेता जी मिलने के बाद लोगों का उत्साह बढ़ातीं थी। पलामू के प्रति उनका गहरा लगाव था जिसे यहां के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं।’

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के ढाका (अब बांग्लादेश) में हुआ था। 28 जुलाई 2016 को उन्होंने कोलकाता में आखिरी सांस ली। आदिवासी, दलित, वंचित समुदाय के लिए जीवन भर लिखने वाली और संघर्ष करने वाली इस महान लेखिका को सादर नमन।

(सभी लोगों से बातचीत दो साल पहले हुई थी)

दिल्ली: दुर्घटना, जाम और अनाधिकृत पार्किंग

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आजकल इतनी ऊंची—ऊंची कारें बाजार में आ गई हैं कि उसमें बैठने वालों को जमीन का पता ही नहीं चलता। या फिर उसमें बैठने के बाद उनमें इंसान को इंसान समझने की सलाहियत नहीं बचती।

दोपहर में आज हल्की हल्की बुंदा बांदी हो रही थी। रास्ते में देखा, मजनू के टीले (दिल्ली) के पास एक बाइक सवार एक गाड़ी के नीचे आ गया था। दस बारह दूसरे बाइक सवार अपनी मोटर सायकिल सड़क के किनारे लगाकर उसे बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे। इतनी ऊंची गाड़ी थी कि उसका पैर गाड़ी में फंस गया था। इस दुर्घटना स्थल से चार सौ मीटर पहले एक और गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त अवस्था में पड़ी हुई थी।

निश्चित तौर पर इन दोनों गाड़ियों को जल्दी रही होगी। दुर्घटना के बाद वह सारी जल्दी हवा हुई होगी। उसके बाद पुलिस की शिकायत, सिर पर एक दुर्घटना का बोझ और जिसकी दुर्घटना हुई है, उसका तो उसका पूरा जीवन ही आगे बैसाखियों के सहारे कटेगा।

दिल्ली में जल्दी से जल्दी कोई भी व्यक्ति जाम से निकल जाना चाहता है और कई बार जाम इसलिए लगा होता है क्योंकि सड़क की एक पूरी कतार अनाधिकृत पार्किंग की भेंट चढ़ी होती है। सालों से मजनू टिले पर ऐसी पार्किग होती आ रही है। जो इस रास्ते पर जाम की वजह है। इसी तरह प्रगति मैदान को जो अंडरपास इंडिया गेट से जोड़ता है। इंडिया गेट वाले छोड़ पर निकलते ही वहां 500—700 मीटर लंबी अनाधिकृत पार्किग की कतार होती है। जिसकी वजह से लंबा जाम लगता है लेकिन दिल्ली के प्राइम लोकेशन पर भी ट्रेफिक पुलिसवाले देख बुझ कर भी मानों सब इग्नोर करते हैं।

एक तो दिल्ली में क्षमता से अधिक गाड़ियां बीक चुकी हैं। इसलिए पार्किंग को लेकर झगड़ा यहां आम बात है। एक अनुमान के अनुसार आधी से अधिक आबादी दिल्ली में ऐसी है, जिसने गाड़ी खरीद ली है लेकिन उसके पास पार्किंग नहीं है। गाड़ी बेचने वाले इंडिया में किसी कस्टमर से पूछते भी नहीं कि इतनी बड़ी गाड़ी खरीद रहे हो, इसे लगाने के लिए अपनी पार्किंग है या इसे सड़क के किनारे ही खड़ा करना है?

दिल्ली में जाम की समस्या तब तक नहीं सुलझेगी, जब तक अनाधिकृत पार्किंग पर लगाम नहीं लगती और बिना पार्किग स्पेस दिखलाए गाड़ी बेचने पर प्रतिबंध नहीं लगता।

जाम में फंसी गाड़ियां जिस बेतरतीब तरीके से एक दूसरे का रास्ता काटती हैं, कई बार लगता है कि इसके लिए इन गाड़ियों का अलग से चालान होना चाहिए।

जब तक दिल्ली में ट्रेफिक नियम में सख्ती नहीं बरती जाएगी। गाड़ियों की स्पीड पर लगाम नहीं लगेगी। ओवर स्पीड गाड़ियों में बैठे किसी बड़ी पैरवी वाले बंदे की पैरवी का दबाव काम करना बंद नहीं होगा, तब तक ये दुर्घटनाएं कैसे रूकेंगी, समझ नहीं आता।

शिक्षा, संस्कार और स्वत्व चेतना के केंद्र हैं मंदिर

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मंदिर केवल पूजा, उपासना, प्रार्थना या आराधना के स्थल भर नहीं है॔। ये अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से प्रकृति और प्राणियों से समन्वय बिठाकर मानव जीवन के विकास का आधार, शिक्षा संस्कार, स्वत्व एवं साँस्कृतिक चेतना का केन्द्र होते हैं। भारत यदि विश्व गुरु और सोने की चिड़िया रहा है, तो इसमें मंदिरों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है ।

भारत में मंदिर निर्माण की परंपरा असाधारण है । यह सभ्यता के विकास के साथ आरंभ हुई । अतीत में जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ आत्म चेतना जागृति स्थल के रूप में मंदिरों का संदर्भ मिलता है । लेकिन इसे समझने के लिये हमें सभ्यता विकास क्रम पर पश्चिमी अवधारणा से परे होकर सोचना होगा । पश्चिमी दर्शन में मानव विकास क्रम केवल पांच हजार वर्ष के भीतर मानी जाती है। जबकि भारत में मंदिर और मूर्तियों के प्रमाण इस कालावधि से बहुत पहले आठ और दस हजार वर्ष पूर्व भी मिलते हैं। उस काल-खंड में मंदिरों की वास्तु उत्कर्ष्ट रही है । यह दो प्रकार की थी । एक ऋषि परंपरा में दूसरी नगर एवं ग्राम्य परंपरा के समाज जीवन में। ऋषि आश्रम वनों में हुआ करते थे । जो शिक्षा, चिकित्सा और अनुसंधान और आध्यात्मिक साधना स्थल थे । वहाँ यज्ञ, तप, और साधना समाधि परम् ब्रह्म की उपासना होती थी । कुछ ऋषि आश्रमों में ध्यान और एकाग्रता के लिये प्रतीक की स्थापना भी होती थी । जैसी पार्वती जी ने वन में जाकर पार्थिव शिवलिंग स्थापित किया और अपनी आत्म चेतनासे शिवजी का आव्हान किया ।जबकि नगर और ग्राम का जीवन सांसारिक होता है । भौतिक आवश्यकता का आधिक्य होता है । इसलिये सीधे साधना कठिन होती है । इसे दो आयामों में बाँटा गया । साधना के पहले चार आयाम “यम” “नियम” “संयम” “आहार” और “प्रणायाम” घर में भी हो सकते हैं लेकिन “धारणा” “ध्यान” और “समाधि” केलिये मंदिर होते हैं । रामायण काल में दोनों उदाहरण मिलते हैं। रावण ने एकांत वन में जाकर शिवजी के प्रतीक की स्थापना करके आव्हान किया जबकि सीताजी ने मंदिर में जाकर पूजन करके आव्हान किया । महाभारत काल में अर्जुन और सुभद्रा का मिलन भी मंदिर में होता है । ये मंदिर साधारण भवन निर्माण भर नहीं होता । इनकी निर्माण कला अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा के केन्द्रीकरण का अद्भुत विज्ञान है । महाभारत काल ईसा से तीन हजार दो वर्ष पूर्व माना जाता है । यह निर्धारण कुरुक्षेत्र की खुदाई और द्वारिका के समुद्रतल से मिले चिन्हों के आधार पर किया गया है । इसका अर्थ है कि पश्चिमी जगत में जब सभ्यता का अंकुरण हो रहा था, तब भारत की सभ्यता इतने उन्नत स्वरूप में थी कि उसे आत्मशक्ति एकाग्र करके और अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से साक्षात्कार करने की क्षमता अर्जित कर ली थी ।

मंदिरों की निर्माण कला में यह ज्ञान स्पष्ट झलकता है । जिसे भूखंड विशेष के चयन, दिशाओं की गणना करके ऊर्जा केन्द्र केन्द्र का निर्धारण, आकाश की ऊर्जा का संवाहन करने की तकनीक होती है । इस उन्नत स्वरूप की झलक “मंदिर” नाम और इनके निर्माण की वास्तु में मिलती है ।

“मंदिर” शब्द से संबोधन और निर्माण का विज्ञान

“मंदिर” शब्द साधारण नहीं है और न इसका आशय केवल पूजा, उपासना या आराधना केलिये बनाई गई किसी भवन आकृति के संबोधन तक सीमित है । “मंदिर” शब्द रचना में ही अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा का आव्हान करके व्यक्ति परिवार, समाज के संवर्धन और प्रकृति के संरक्षण का संदेश स्पष्ट हो जाता है । “मंदिर” शब्द संस्कृत की दो धातुओं से बनता है । एक धातु “मन् ” और दूसरी “दर्” । जब मन् धातु में दर् धातु की “इकार” अर्थात (छोटी इ की मात्रा) के साथ प्रत्यय के रूप में संधि की जाती है तब शब्द बनता है “मंदिर” । मन, मनन, मन्नत, मान और मनुष्य जैसे शब्द मन् धातु से बनते हैं । जबकि दृश्य, दृष्टि, द्रव्य, दर्शन जैसे शब्द दर् धातु से बनते हैं। दोनों धातुओं की संधि में इकार का प्रयोग “शक्ति” रूप में होता है । तब मंदिर शब्द का अर्थ हुआ “मन और मनन को शक्तिमय दृष्टि देने वाला”। मन की सकारात्मक दृष्टि, मनन की सृजनात्मक दिशा से ही जीवन उत्कृष्ट बनता है । मन बहुत शक्तिशाली होता है और सदैव गतिमान रहता है। मन की गतिशीलता यदि संकल्पशील और सृजनात्मक न हो तो मन की समस्त ऊर्जा नकारात्मक परिणाम देती है। मन को एकाग्र करके विशिष्ट दिशा में गमन करने की प्रेरणा देने का स्थल मंदिर होते हैं ।

भाषा विज्ञान के अनुसार “मंदिर” शब्द रचना हुई और उस विशिष्टता के अनुरूप ऊर्जा संपन्न बनाने केलिये मंदिर निर्माण की वास्तु कला का विकास हुआ । जिस प्रकार आरंभिक “यम” से “समाधि” तक भक्ति के नौ आयाम होते हैं उसी प्रकार मंदिर निर्माण कला के भी कुल नौ आयाम होते हैं। मंदिर वास्तु के इन नौ आयामों सबसे प्रथम है “अधिष्ठान” इसे हम नींव भी कह सकते हैं । यह सम्पूर्ण भवन का आधार होता है। दूसरा आयाम है मसूरक। यह नींव और दीवार का मध्यभाग होता है । तीसरा जगती, यह वह धरातल होता है जिसपर गर्भ गृह का निर्माण होता है । चौथा दीवार । पाँचवा कपोत, यह दीवारों में द्वार, वातायन अथवा अन्य उपलंबों का भाग कहलाता है । छटवां आयाम शिखर है, यह मंदिर का वह शीर्ष है जो गर्भगृह के मध्य में ठीक ऊपर होता है । सातवाँ भाग आमलक है, शिखर के आरंभ और कलश के मध्य का वर्तुलाकार भाग होता है । आठवाँ कलश है, जो शिखर का शीर्ष होता है । और नौवां उत्तुंग जो कलश के ऊपर एक बारीक सूत्र नुमा होता है । इन सभी भागों में परस्पर लम्बाई चौड़ाई और ऊँचाई का एक निश्चित अनुपात होता है । अंतरिक्ष से केवल बिजली ही क्ड़क कर धरती पर नहीं आती। सदैव अदृश्य अनंत ऊर्जा बरसती है जो धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु को चैतन्य रखती है ताकि प्रकृति जीवन्त रहे और प्राणी सक्रिय रहें। मंदिर का यह उत्तुंग विशिष्ट धातु का बनता है और मंदिर शिखर के शीर्ष पर स्थापित किया जाता है । यह उत्तुंग जहाँ विद्युत प्रवाह को खींचकर सीधा भूमि में पहुँचा देता है वहीं सकारात्मक ऊर्जा का संचार पूरे परिसर में व्याप्त करता है जिससे उस परिसर में पहुँचने वालों का मन शांत होता है और चित्त में एकाग्रता आती है । जो उसकी दिनचर्या के कार्यों में गति आती है । मध्यकाल के पूर्व ऐसे स्थान खोजकर मंदिर निर्माण हुये जो ऊर्जा के केन्द्र रहे ।

प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित किये जाने दीपक में बाती रखने का हर मंदिर का अपना विधान होता है । जिसका निर्धारण उस स्थान की ऊर्जा की दिशा के अनुरूप होता है जो शंख-घंटियों की ध्वनि एवं वाले मंत्रोच्चार से एक ब्रह्मांडीय नाद बनता है जिससे मन एकाग्र होता है और मस्तिष्क शाँत । जो ध्यान केलिये आवश्यक है। इसके अलावा मंदिरों में तांबे के एक पात्र में तुलसी और कपूर-मिश्रित जल भरा होता है जिसका सेवन करने से जहां रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है वहीं इससे ब्रह्म-रन्ध्र में शांति मिलती है। इस प्रकार मंदिर में जाने वाले कई अवचेतन शक्ति जागरुक करती है जिससे वहाँ की गई प्रार्थना के पूर्ण होती है ।

समाज के सशक्तीकरण और संस्कारों केलिये मंदिर के विविध आयाम

जिस प्रकार समाज जीवन की सामान्य दिनचर्या में अपने कर्म कर्त्तव्य का पालन करते हुये आध्यात्मिक चेतना जागृत करने के समापन आयाम तक भक्ति के नौ आयाम होते हैं, मंदिर निर्माण कला में अधिष्ठान से लेकर शीर्षतुंग तक नौ आयाम होते हैं उसी प्रकार मंदिर में संचालित विधाओं के भी कुल नौ आयाम होते हैं। जो व्यक्ति के जीवन में व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्कृति, स्वत्व के साथ संपूर्ण प्रकृति और प्राणियों से समन्वय की चेतना जागृत करते हैं।

मंदिर के विभिन्न प्रकल्पों का उद्देश्य समाज में शिक्षा, चिकित्सा, अनुसंधान, साधना, भक्ति, सत्संग, समन्वय का संचार होता है । इसके लिये मंदिर के साथ विद्यालय, आरोग्य केन्द्र, प्रवचन कक्ष, साधना कक्ष, यज्ञ शाला, अन्नक्षेत्र, संत निवास, गौशाला और यात्री निवास, कुल नौ आयाम होते हैं । इन सभी प्रकल्पों के लिये मंदिरों मेंस्थाई निर्माण होते हैं । यह नवरूप निर्माण ऋषि आश्रम में भी होते थे । वैदिक काल में महर्षि भृगु और महर्षि वशिष्ठ सहित सभी ऋषि आश्रमों में ऐसे प्रकल्पों का विवरण मिलता है । ठीक इसी प्रकार का विवरण सोमनाथ मंदिर पर गजनवी के आक्रमण के समय और अलाउद्दीन खिलजी के अयोध्या काशी मथुरा आदि के विध्वंस के समय भी मिलता है । लेकिन मध्यकाल में आक्रमण और विध्वंस के दौर में बहुत सी परंपराएँ टूटी लेकिन उनके मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया । यह ठीक है कि समाज जीवन में चेतना जगाने के लिये चौराहों पर या किसी पेड़ के नीचे प्रतिमा स्थापित कर पूजन अर्चन आरंभ हुआ । संभवतः यह समय की गति थी । मध्यकाल के समय समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने केलिये यह आवश्यक भी था । लेकिन जहाँ संत और समाज दोनों के समन्वय से मंदिर निर्माण हो रहे हैं उनमें यह नौ आयाम देखने को मिलते हैं।

इन स्थायी आयामों के अतिरिक्त प्रतिदिन प्रभु विग्रह के सम्मुख सुबह शाम आरती में समाज का एकत्रीकरण, आरती के बाद संकीर्तन आदि में समाज की सहभागिता होती है । जो पूरे क्षेत्र को सामूहिकता में जोड़ने का एक सूत्र है । विवाह का आरंभ मंदिर में माता पूजन से ही आरंभ होता है । यह परंपरा भी समाज और परिवार को सामूहिक सूत्र में बाँधने के लिये आवश्यक है ।

जन कल्याण का संदेश मंदिरों से

मंदिर जहाँ विविध सामाजिक आयाम का केन्द्र होते हैं। वही यह मानसिक वातावरण भी था कि मंदिर के पुजारी से लेकर सभी सेवादार मंदिर से केवल अपनी न्यूनतम आवश्यकतानुसार ही साधन सामग्री लेंगे और स्वयं कोई व्यक्तिगत संपत्ति सृजित नहीं करेंगे । दान या दक्षिणा के रूप में जो भी धन आयेगा उसे संचित करके सुरक्षित रखा जायेगा जो जन कल्याणकारी कार्यों में ही व्यय होगा । मंदिर तीन श्रेणियों के रहे हैं। एक वे मुख्य मंदिर जो ऊर्जा और अंतरिक्ष की अलौकिक शक्ति का केन्द्र होते हैं। इस श्रेणी में हम सभी ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ और सोमनाथ, बालाजी, मथुरा, काशी, अयोध्या, पुष्कर, नेमिषारण्य आदि मान सकते हैं। दूसरे स्थानीय मंदिर जो स्थानीय देवताओं के होते हैं और तीसरे कुल देवी या देवता के मंदिर । आपात समय आने पर सभी मंदिर अपने अंतर्गत आने वाले समाज क्षेत्र की सहायता केलिये अपना निधि कोष खोल दिया करते थे । ऐसे उदाहरण भी हैं जब समय आने पर मंदिरों के कोष से राज कोष को भी सहायता की गई।

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