यूपी विधानसभा में उठा पत्रकारों से जुड़ा मुद्दा

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राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के अभिभाषण के बाद विपक्षी दलों ने उत्तर प्रदेश विधानमंडल के बजट सत्र में विधानसभा की पत्रकार दीर्घा में कवरेज के लिए मीडिया को नहीं बैठने देने का मुद्दा उठाया, जिसके जवाब में विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि कोरोना काल के कारण पत्रकारों के लिए अलग व्यवस्था की गई थी और इस बारे में जल्द ही कोई फैसला लिया जाएगा।

राज्यपाल के अभिभाषण के बाद नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने पूछा कि विधानसभा में पत्रकार दीर्घा से पत्रकारों को क्यों दूर रखा गया है और क्या कोविड-19 केवल पत्रकारों को ही प्रभावित करता है, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और नेता विपक्ष को नहीं?

बहुजन समाज पार्टी के विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा और कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता अराधना मिश्रा ने भी चौधरी की इस बात का समर्थन किया। इस पर विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि कोरोना काल में पत्रकारों की सहमति से यह निर्णय लिया गया था कि मीडिया के लिए बैठने की अलग व्यवस्था कर दी जाए और उसी हिसाब से अलग व्यवस्था की गई थी।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों ने कोई आपत्ति नहीं जताई है। लालजी वर्मा और अराधना मिश्रा ने इस पर कहा कि कुछ पत्रकारों को अनुमति दी जानी जाए, जिससे कि वे सदन की कार्यवाही सही ढंग से देखें और उसकी रिपोर्टिंग करें। विधानसभा अध्यक्ष ने इसके जवाब में कहा कि इस पर कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में विचार कर लिया जाएगा।

TV पर विज्ञापनों को लेकर TAM AdEx की रिपोर्ट

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टीवी पर नए एडवर्टाइजर्स की संख्या में पिछले साल जनवरी की तुलना में टैम एडेक्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल जनवरी महीने में कमी आई है। हालांकि, इस साल जनवरी में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले टीवी पर विज्ञापनों की संख्या में 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2020 के मुकाबले जनवरी 2021 में टीवी पर 1500 से अधिक नए विज्ञापनदाताओं ने विज्ञापन दिया है। जनवरी 2020 में कुल विज्ञापनदाताओं की संख्या 3000 से ज्यादा थी, वहीं नवंबर और दिसंबर में यह क्रमश: 2900 से ज्यादा और 2300 से ज्यादा थी। जबकि पिछले साल जनवरी की तुलना में इस साल जनवरी में 1900 से ज्यादा एक्सक्लूसिव विज्ञापनदाता गायब थे।   

‘Starcom MediaVest Group’ के मैनेजिंग डायरेक्टर (नॉर्थ) दीपक शर्मा का कहना है,’किसी भी एडवर्टाइजर अथवा इंडस्ट्री के लिए साल की दो तिमाही अप्रैल-मई-जून और अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर काफी महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि तकरीबन 60 प्रतिशत रेवेन्यू इन्ही तिमाहियों में आता है। अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर के मुकाबले जनवरी-फरवरी-मार्च का कम महत्व है, लेकिन यदि हम जनवरी-फरवरी-मार्च को तिमाही दर तिमाही देखें तो यह ज्यादा होगी, क्योंकि फाइनेंस सेक्टर, स्टूडेंट सेक्टर व अन्य के लिए मार्च काफी महत्वपूर्ण महीना है। इसके अलावा यह वित्तीय वर्ष का अंतिम महीना भी होता है।’

 व्हाइट हैट एजुकेशन टेक्नोलॉजी इस साल जनवरी में टॉप एडवर्टाइजर्स की लिस्ट में शामिल रहा। पिछले महीने टीवी पर दस नए एडवर्टाइजर्स की बात करें तो इनमें Dhani services, Airtel Payment Bank, International Cricket Council, Honda Cars India, Thangamayil Jewellery, Piccadily Agro Industries, Accenture Solutions, Ather Energy और Acko General Insurance आदि ब्रैंड्स ने अपनी जगह बनाई।  

शर्मा के अनुसार, महामारी के दौरान ऑटो, हॉस्पिटैलिटी, और ट्रैवल जैसे सेक्टर काफी प्रभावित हुए। ये सेक्टर विज्ञापनों पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले हैं, लेकिन पिछले साल इनके खर्च में गिरावट देखी गई और इसलिए विज्ञापन प्रभावित हुआ।

एक विशेषज्ञ के अनुसार , ‘सर्विस प्रोवाइडर्स, ऑनलाइन एजुकेशन, एजुटेक और ई-कॉमर्स जैसी कुछ कैटेगरी हैं, जिनमें इस साल उछाल आने की उम्मीद है। इसके अलावा लोन सर्विसेज और सर्विस सेक्टर जो नीचे खिसक गया है, वह आने वाले महीनों में ऊपर आ सकता है। भले ही नए विज्ञापनदाताओं की संख्या कम हो, लेकिन अन्य विज्ञापनदाताओं द्वारा खर्च में कटौती नहीं की गई। पिछले साल इन कैटेगरी में तमाम एडवर्टाइजर्स मौजूद थे, जिन्हें अभी रिकवर करना है। हालांकि, अब खर्च बंद नहीं किया गया है, एडवर्टाइजर्स सिर्फ टीवी पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं।’

डाटा के अनुसार, जनवरी 2020 के मुकाबले जनवरी 2021 में दस टॉप नए एडवर्टाइजर्स में से चार सर्विस सेक्टर से जबकि दो ऑटो सेक्टर से थे।

‘पिच मैडिसन एडवर्टाइजिंग रिपोर्ट’ 2021 के अनुसार, पहली तीन तिमाहियों में वर्ष 2019 के मुकाबले 31 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, वर्ष 2020 की चौथी तिमाही (Q4’20) में तीसरी तिमाही (Q3 2020) के मुकाबले 66 प्रतिशत का इजाफा हुआ। वर्ष 2019 की चौथी तिमाही (Q4 2019) के मुकाबले इसमें 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, कैटेगरीज की बात करें तो कोविड-19 वर्ष में सबसे बड़ी वृद्धि अनुमानित रूप से ई-कॉमर्स कैटेगरी से आई है, जिसमें वर्ष 2019 के मुकाबले 95 प्रतिशत की ग्रोथ दर्ज की गई है। ई-कॉमर्स में ऑनलाइन शॉपिंग, मोबाइल वॉलेट्स और मीडिया/एंटरटेनमेंट/सोशल मीडिया/ओओटी प्रमुख कैटेगरी थीं। इसके बाद अगली बड़ी ग्रोथ एजुकेशन सेक्टर से देखने को मिली है।

इफको ने अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण के लिए 2.51 करोड़ का दिया दान

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अयोध्या में चल रहे निर्माण कार्य हेतु विश्व की अग्रणी सहकारी संस्था इफको ने 2.51 लाख भेट किये। श्रद्धा से साथ सम्पूर्ण इफको परिवार की ओर से इस पूण्य कार्य के लिए योगदान है। इफको के अध्यक्ष श्री बलविंदर सिंह नकई जी के साथ इफको के उपद्यक्ष श्री दिलीपभाई संघणी, प्रबंध निदेशक श्री उदय शंकर अवस्थी, सं० प्रबंध निदेशक श्री राकेश कपूर, निदेशक (मानव संसाधन एवं विधि) श्री आर पी सिंह तथा विपणन निदेशक श्री योगेन्द्र कुमार ने मिलकर इफको निदेशक मंडल की ओर से श्री राम जनमभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से सप्रेम 2.51 करोड़ का चेक भेट किया। ये चेक विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख श्री आलोक कुमार और टीम को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की उपस्थिति में सौंपा।

ज्ञात हो कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 05 अगस्त, 2020 को अयोध्या में प्रभु श्री राम के जन्म स्थल पर मंदिर निर्माण कार्य के लिए भूमि पूजन किया था। इफको सहकारिया, किसानों व लोक मानस की भलाई हेतु अलग-अलग कार्य करती रहती है। पिछले वर्ष इफको ने कोविड महामारी से लड़ने के लिए प्रधानमंत्री केयर फड़ में 25 करोड़ का योगदान दिया था। इसके साथ-साथ इफको ने कोविड महामारी के दौरान देश भर में ‘इफको फाइट करोना – ब्रेक दी चैन’ की एक विशेष अभियान पूरे भारतवर्ष में चलाया था। साथ ही देश भर में ठंड के दौरान गरीबों में कंबल का वितरण करवाया गया था।

इफको पूरे भारत में किसानों को शिक्षित करने और उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने हेतु कई शैक्षिक कार्यक्रमों और गतिविधियों का आयोजन करता आ रहा है । इन कार्यक्रमों में संतुलित प्रजनन, गाँव को गोद लेना, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के लिए किसानों का दौरा, किसानों की बैठकें, फसल सेमिनार, स्टेटिक / मोबाइल मृदा परीक्षण प्रयोगशाला आदि शामिल हैं। इफको किसानों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के हेतु विभिन्न गतिविधियाँ करता है जैसे : सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में चारा की आपूर्ति, पशु चिकित्सा जांच और दवाइयों का वितरण, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छ पेयजल सुविधा, वाटरशेड विकास और किसानों के बच्चों की स्कूली शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता। इफको ने ग्रामीण समुदायों की कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान देता आ रहा है।

दि ग्रेट टूल किट और पर्यावरण के जयकारे

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राजीव रंजन प्रसाद

ग्रेटा थनबर्ग का टूलकिट चर्चा में है लेकिन इसी के दृष्टिगत “वैश्विक नक्सलतंत्र” की नहीं पर्यावरण की चर्चा करनी आवश्यक है। भारत के भीतर होने वाली किसी भी अलगाववादी गतिविधि और उसके संचालन का मैकेनिज्म समझना है तो यही टूलकिट आजमायें, उदाहरण के लिये साझा किये गये दस्तावेज में किसान आंदोलन शब्द को काट कर नक्सलवाद जोड दें आपको देश-विदेश मेंउसके समर्थन में होने वाले कार्यक्रमों, अभियानों और गतिविधियों से कडियाँ जोडने मे मिनट नहीं लगेगा। बहरहाल टूलकिट और इसके भारतीय वामपंथी कलमखोरों की बात फिर कभी, ग्रेटा थनबर्ग से उसका ही प्रश्न पूछने की इच्छा है “हाउ डेयर यू?” 

ग्रेटा थनबर्ग के एन्वायरन्मेंटल एक्टिविज्म को एक सत्यकथा के आलोक में आपके सामने रखता हूँ। बात लगभग दस वर्ष पुरानी है। उन दिनों पर्यावरण के विषय “नेशनल एंवायरंवमेंट अपीलेट अथारिटी” के सम्मुख रखे जाते थे। अपने कार्य के सिलसिले में पर्यावरण कोर्ट निरंतर जाना होता था। वहीं उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी। [ व्यक्ति का नाम इसलिये नहीं ले रहा हूँ क्योकि मैं एक लेखक हूँ मेरा काम घटना का विश्लेषण करना है उसे समाचार की तरह प्रस्तुत करना नहीं है।] शरीर पर कुर्ता, जिसमे पीछे की ओर पैबन्द लगा था। धोती मैली थी। उन्होने जो चश्मा पहना हुआ था वह एक हिस्से से फूटा हुआ था। मैं आदर से नतमस्तक हो गया। मुझे लगा कितना महान व्यक्ति है जिसे अपनी कोई परवाह नहीं; समाज के लिये जी रहा है। तकनीकी विषय पर उन्हे जिरह करने की अनुमति मिली थी और हल्के से झुकी कमर और दयनीय आवाज में “जन-जंगल-जमीन” पर एसी एसी दलीलें उन्होंने दीं कि यकीन मानिये दिल से मैं उनका भक्त हो गया था। वे कोर्ट आते थे तो साथ कुछ धोती-खादी वाले तथा कुछ ग्रामीण होते थे।

जज ने दलील सुनने के वाद विवादित स्थल को देखने की इच्छा जाहिर की। मेरा सौभाग्य कि कमीटी में मैं भी था और हम घटनास्थल पर पहुँचे। पास ही उन एक्टिविस्ट का मकान था। वहाँ पहुँच कर जैसे ही उन्हें मैने देखा मेरे बिम्ब धरे रह गये। पैंट-शर्ट पहनना कोई बुरी बात नहीं, नये फ्रेम का चश्मा भी पहना जा सकता है कोई बुराई नहीं। उनका मकान नदी के किनारे किसी रिसोर्ट की तरह था उसमें भी कोई बुराई नहीं।……लेकिन लेखक क्या करे उसे तो विषय कुरेदता है, इसलिये अपनी आदत के अनुसार शाम को जब पूरी कमेटी गेस्ट हाउस में थी मैं एक चौपाल में लगी मजलिश के बीच बैठ कर बात करने लगा। पता लगा कि जहाँ वह रिसोर्ट-नुमा मकान बना है वह जमीन एक विधवा की थी जिसे अपनी दबंगई तथा कानून की जानकारी के कारण उस एक्टिविस्ट ने अपने नाम करा लिया। विधवा और उसके बच्चे इतना सामर्थ तथा ज्ञान नहीं रखते थे कि कानून समझें या कानूनी लड़ाई लड़ सकें। सालों जमीन उसके कब्जे में रही फिर ‘एक्स-पार्टी निर्णय’ एक्टिविस्ट के पक्ष में हो गया तथा अब एक बढ़िया सा मकान नदी के किनारे….। अंत में बहुत मामूली “मुआवजा” दे कर विधवा से पिंड भी छुडा लिया था भाई साहब ने।…..। यहाँ आ कर मैने समझा कि एक्टिविज्म शब्द सुनते ही अभिभूत नहीं हो जाना चाहिये। हर इंकलाब-जिन्दाबाद चीखने वाले चेहरे के पीछे सही जुनून और सही मक्सद हो, कोई आवश्यक नहीं। इन दिनो बहुतायत के पीछे “हिडन एजेंडा” होते हैं। ये एजेंडा व्यक्ति को पूरा नाटकबाज बना देते हैं।

फूटा चश्मा, मैली धोती या पबंद लगा कुर्ता अगर आपको फैसिनेट करता है तो बुराई कुछ नहीं लेकिन सवाल इस वेषभूषा से उपर की चीज है। सवाल जब व्यक्ति से आगे निकलेंगे तभी जवाब मिलेंगे नहीं तो आपका जिन्दाबाद वैसा ही है जैसे निरमल बाबा के दरबार में जय-जय का घोष। इसी बात को एक अन्य उदाहरण से भी सामने रखता हूँ कि एक एक्टिविस्ट जो बहुधा घुटने तक खादी धोती और उपर भी आधी बाह का खादी कुर्ता पहना करते हैं तकनीकी विंदुओं पर एक पर्यावरण अदालत के  समक्ष बात रख रहे थे। विषय विशेषज्ञ ने बात बात दलील दी, साक्ष्य रखे, सिद्धांत बताये लेकिन मजाल है कि हॉर्न बजाने से पगुराती भैंस सडक से हट जाये? बाद में अदालत परिसर के बाहर मैंने एक्टिविस्ट महोदय का शैक्षणिक बैकग्राउंड पूछा तो जानकारी मिली हिंदी ऑनर्स ग्रेजुएट। ठीक है पर्यावरण ऐसा विषय है जिसमें नत्थू-खैरा भी विशेषज्ञ बन कर राय दे सकता है और ठस्स अपने ही तर्क पर खडा रह सकता है। यह विषय आसान लोकप्रियता की गायरंटी देता है।….इसीलिये मैं तो ग्रेटा थनबर्ग की निर्भीकता पर लहालोट था कि कोई साहस कर सकता है गंभीर पर्यावरण विषयों को वैशविक बना दे अब उसकी निर्लज्जता देख कर हतप्रभ हूँ। पर्यावरण अब एक टूल है किसी के लिये कोई संवेदनशील मसला नहीं। 

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