10 जनवरी 1760 : अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण से राष्ट्ररक्षा करते हुये दत्ताजी शिन्दे बलिदान

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दिल्ली । भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष साधारण नहीं है । इसमें असंख्य बलिदान हुये हैं । और सबसे बड़ी त्रासदी यह कि बाह्य आक्रमणकारियों की सहायता अनेक स्वदेशी राजाओं और सेना नायकों ने की है । विदेशी आक्रांता यदि भारत में सफल हुये हैं तो स्थानीय लोगों की सहायता लेकर ही । कितने महानायक ऐसे हैं जिनका बलिदान स्थानीय और आत्मीय कहे जाने वाले विश्वासघातियों के रहते ही हुआ है। मराठा सेना नायक दत्ता जी शिन्दे के साथ भी ऐसा ही हुआ । भारत पर जब अहमदशाह अब्दाली का आक्रमण हुआ और मुगल बादशाह ने मानों समर्पण कर दिया। तब हमलावर ने लूट और हत्याओं का तांडव किया तब मराठों की फौज राष्ट्र रक्षा के लिये दिल्ली पहुँची । पहले रूहेलखंड का सूबेदार नजब खां तटस्थ रहा। मानों अहमदशाह अब्दाली को मार्ग दे रहा हो लेकिन दत्ता जी पहुँचते ही वह अहमदशाह अब्दाली से मिल गया और उसकी सेना खुलकर मराठों से मोर्चा लेने लगी ।

अहमदशाह अब्दाली विश्व प्रसिद्ध लुटेरे और हत्यारे नादिरशाह का वंशज था । यह वही नादिरशाह था जिसने दिल्ली में कत्ले-आम कराया था । अहमदशाह के भी भारत में कुल छै आक्रमण हुये । उसका हर आक्रमण हत्याकांड, स्त्रियों के अपहरण और लूट से भरा है । उसने कैसी लूट की होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों पंजाब से दिल्ली तक एक कहावत मशहूर हो गयी थी कि “जितना खा लो पी लो पहन लो वही अपना है, बाकी तो अहमदशाह ले जायेगा” । यह भारतीय इतिहास का वह काल-खंड है जब मुगल साम्राज्य विखर रहा था । उसे राज्य संचालन के लिये या तो मराठों की सहायता लगती थी या रुहेलों की । मराठा मुगल साम्राज्य की सहायता तो करते लेकिन इसके बदले में आर्थिक लाभ लेते और इसके साथ मंदिरों का जीर्णोद्धार भी करते । आज के उत्तर प्रदेश और पंजाब के अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार इसी काल में हुआ इसमें मथुरा और बनारस के मंदिर भी शामिल हैं । लेकिन रुहेलों को यह बात पसंद न थी इसलिये वे मराठों से ईर्ष्या रखने लगे थे । रुहेलों का मराठों से ईर्ष्या रखने का एक कारण और था । वह था पेशावर और लाहौर की जीत । वस्तुतः पेशावर और लाहौर पर अफगानों ने अधिकार कर लिया था । उनका अधिकार हटाने के लिये पेशवा ने अठारह हजार सैनिकों की सेना के साथ दत्ता जी को उत्तर भारत भेजा । मराठों ने जीत दर्ज की और पंजाब तथा सिंध में पुनः सनातनी राज्य की स्थापना की । यह परिवर्तन सात सौ साल बाद हुआ था । सिंधु सम्राट जयपाल का अंतिम वंशज त्रिलोचनपाल थे उनका बलिदान मेहमूद गजनवी के साथ युद्ध में 1020 ईस्वी में हो गया था तब से इस क्षेत्र में सत्ताएं बदलीं शासक भी बदले पर सनातनी सत्ता बहाल न हो सकी ।

यह काम अब दत्ता जी के नेतृत्व में सन् 1758-59 के बीच लगातार युद्ध में मराठों की सेना ने किया था । मराठों के इस अभियान में अहमदशाह अब्दाली का पुत्र भी मारा गया था । दत्ता जी अपना अभियान पूरा करके ग्वालियर लौट आये । अहमद शाह ने पहले मराठों की सेना को लौटने की प्रतीक्षा की । इस प्रतीक्षा में वह चुप नहीं बैठा । उसने गजनी और आसपास के इलाकों में ऐलान कराया कि लूट के लिये चलना है । लूट और स्त्रियों के हरण का लालच देकर उसने साठ हजार की फौज एकत्र की । इधर रुहेलों को मजहब का वास्ता देकर तोड़ा । इतनी तैयारी करके अब्दाली ने हमला बोला । अब्दाली के इससे पहले जो हमले हुये उनमें रुहेलो और मराठों ने मिलकर ही मोर्चा लिया था और अब्दाली वापस लौटने पर विवश किया था । लेकिन इस हमले में यह बात न रही । नजब खां रुहेला भीतर से तो अब्दाली से मिल गया था लेकिन बाहर से उसने दत्ता जी को सहयोग का आश्वासन दिया । उसके आश्वासन पर दत्ता जी केवल ढाई हजार की सेना के साथ ग्वालियर से रवाना हुये । तब तक अब्दाली पंजाब में लूट मार करता हुआ दिल्ली आ धमका था । दत्ता जी यह तो जानते थे कि अब्दाली की सेना कयी गुना है लेकिन रुहेलों और मुगलों की सेना के सहयोग की उम्मीद थी । लेकिन नजब खाँ के माध्यम से अब्दाली ने बादशाह को तटस्थ कर लिया था । वह दत्ताजी से अपने पुत्र की मौत का बदला लेना चाहता था । सेना कम होने के बाबजूद दत्ता जी का वीरभाव तनिक भी विचलित न हुआ । वे छापामार युद्ध में भी पारंगत थे इसलिए दिल्ली की ओर तेजी से आगे बढ़े । उन्हें अपने पूर्वजों के वीरभाव और विजय परंपरा का अनुसरण करना था । वे राणों जी शिंदे के पुत्र थे । राणों जी पेशवा बाजी राव के बाल सखा थे । पेशवा बाजीराव ने ही तीन मराठा सरदारों होल्कर, पंवार और राणोजी सिंधिया को उत्तर भारत भेजा था ।

राणों जी ने पहले अपना केन्द्र उज्जैन बनाया था बाद में ग्वालियर और मथुरा । मराठों ने ही मुगल बादशाह को पराजित कर मालवा और राजस्थान में राजस्व वसूली अधिकार लिये थे । जो दत्ता जी के नेतृत्व में संचालित हो रहा था । मराठों ने अपना केन्द्र ग्वालियर बना लिया था पर उनकी सीमा मथुरा तक लगती थी । उनकी सीमा से लगा रूहेलखंड इलाका था । इतिहास में रूहेलखंड का वर्णन ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से मिलता है । सामान्य तया रूहेलखंड की सीमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से तक्षशिला तक फैली थी । यह कोई दस हजार वर्गमील क्षेत्र था । इसमें कुछ क्षेत्र राजस्थान और सिन्ध का हिस्सा भी शामिल था । यह माना जाता है एक समय मगध सम्राट चंद्रगुप्त ने इस क्षेत्र को सैन्य शक्ति के रूप में विकसित किया था । रुहेले का एक अर्थ योद्धा भी होता है । यह व्यवस्था सिकन्दर के आक्रमण के अनुभव के बाद आचार्य चाणक्य के परामर्श से लागू की गई थी । धीरे धीरे कुछ क्षेत्र टूटे और रूहेलखंड एक स्वतंत्र रियासत के रूप में अस्तित्व में आ गया । सल्तनत काल में दिल्ली के सुल्तानों को सबसे बड़ा प्रतिरोध इसी इलाके से झेलना पड़ा । फिर अलाउद्दीन खिलजी के समय दमन और धर्मांतरण का अभियान चला ।

लंबे समय तक दमन और धर्मान्तरण का अभियान चला । दिल्ली की सत्ता भले बदली हो पर रुहेलखंड का दमन न रुका । इसके साथ अफगानिस्तान से पठानों को भी लाकर बसाने का काम भी तेज हुआ । इन दोनों कामों से पूरे रूहेलखंड का रूपान्तरण हो गया । इस बदलाव के साथ रुहेले जो कभी दिल्ली की सत्ता के सिरदर्द हुआ करते थे अब दिल्ली सल्तनत के वफादार माने जाने लगे । जय हुई हो या पराजय लेकिन रुहेलों ने हर हमले में मुगलों के पक्ष में ही युद्ध किये थे उन्हे दरवार में भी एक सम्मान जनक स्थान भी प्राप्त था । दत्ता जी रुहेलों के इतिहास और मनोवृत्ति से अवगत थे । इसलिये उन्होंने रुहेलों के आश्वासन पर बिल्कुल संदेश न किया और तेजी से दिल्ली बढ़ आये ।

वे रुहेलों की नियत में खोट को समझ ही न पाये । इतिहासकारों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि दत्ताजी के पास चालीस हजार की फौज थी फिर भी वे केवल ढाई हजार सैनिकों के साथ रवाना हो गये । वे दिल्ली के पास बुराड़ी घाट नामक स्थान पर पहुंचे और वहाँ घिर गये । उन्हें वहाँ घेरने की रणनीति रुहेलों ने ही बनाई थी । वे अपनी पगड़ी में कन्हैया जी को रखते थे । उन्हे हालात समझते देर न लगी । उन्होंने पगड़ी से कन्हैयाजी को निकाला और अपने भाई माधवराव को देकर निकल जाने को कहा । उनके साथ जितने सैनिक आये थे सबने जी तोड़ युद्ध किया । उनके सामने बीस हजार पठानों की सेना और आठ हजार रुहेलों की सामने थी । किसी सैनिक ने पीठ न दिखाई सबने सीने पर वार झेले और बलिदान हुये । दत्ताजी भी बुरी तरह घायल होकर भूमि पर गिर पड़े । तभी नजब खां आया और उसने घायल दत्ताजी का शीश काटकर अहमदशाह अब्दाली को जाकर दिया । यह 10 जनवरी 1760 का दिन था ।

इस तरह अपने जीवन की अंतिम श्वांस तक मराठों ने भारत भूमि को आक्रमणकारी से बचाने की कोशिश की । इनके बलिदान के बाद ही अब्दाली ने लूट शूरू की । इस घटना से बादशाह इतना भयभीत हो गया था कि उसने न केवल नगर बल्कि महल में भी लूट की अनुमति दे दी ।
हमलावरों ने दिल्ली में जमकर लूट की स्त्रियों का हरण किया । इतिहासकार लिखते हैं कि मुगल खानदान की भी कोई स्त्री ऐसी न बची जिसके साथ अनाचार न हुआ हो ।

अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां तीसरे विश्व युद्ध की नींव रख रही हैं

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ग्वालियर : अब तो अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने खुले तौर पर घोषणा कर दी है कि ब्रिक्स संगठन के सक्रिय सदस्य देशों – भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन – एवं कुछ अन्य देशों पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर करते हुए इसे अमेरिकी संसद में पारित कराने हेतु भेज दिया है। दरअसल अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं लम्बित हैं जिनमें डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले उत्पादों के आयात पर लागू किए गए टैरिफ को चुनौती दी गई है। संभवत: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपना निर्णय दिनांक 9 जनवरी 2025 को दिया जा सकता है। यदि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ट्रम्प के खिलाफ आता है तो ट्रम्प अपने पास टैरिफ को लागू करने सम्बंधी अधिकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं इसीलिए उन्होंने 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाए जाने सम्बंधी प्रस्ताव अमेरिकी संसद में पेश किया है। घोषित तौर पर तो ट्रम्प द्वारा भारत और चीन द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर टैरिफ इसलिए लगाया जा रहा है क्योंकि यह दोनों देश रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं और इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा दी जा रही चेतावनियों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। परंतु, वास्तव में ट्रम्प ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों, विशेष रूप से भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन से बहुत परेशान है, क्योंकि यह देश अमेरिकी डॉलर को चुनौती देते हुए नजर आ रहे हैं। साथ ही, यह देश अपने विदेशी व्यापार के भुगतान को अमेरिकी डॉलर के स्थान पर अपनी अपनी मुद्राओं में करने को प्रोत्साहन दे रहे हैं। ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों के बीच होने वाले व्यापार के भुगतान का निपटान करने हेतु ब्रिक्स मुद्रा को लाने का प्रयास भी इन देशों द्वारा किया जा रहा है। इससे निश्चित ही वैश्विक स्तर पर डीडोलराईजेशन की प्रक्रिया तेज होगी। इससे अमेरिका की चौधराहट पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अतः ट्रम्प उक्त चारों देशों से बहुत अधिक नाराज है एवं इन चारों देशों को सबक सिखाना चाहते है।

परंतु, अब ट्रम्प को वैश्विक स्तर पर हो रहे विभिन्न घटनाक्रमों को गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है। भारत, रूस, ब्राजील एवं चीन आज विश्व के शक्तिशाली देशों की सूची में शामिल हैं। यह देश वेनेजुएला जैसे छोटे देश नहीं हैं जिन पर ट्रम्प अपना अधिकार एवं अपनी चौधराहट जता पाए। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित ट्रम्प की सेना द्वारा रात्रि को सोते समय गिरफ्तार कर अमेरिका में ले जाया गया है। इसके बाद से ट्रम्प द्वारा यह बयान दिया जा रहा है कि वेनेजुएला स्थित तेल के कुओं से कच्चे तेल के भंडार को अब अमेरिकी कम्पनियों द्वारा निकाला जाएगा एवं इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाएगा और इस व्यवहार से होने वाले लाभ पर अमेरिका एवं वेनेजुएला का अधिकार होगा। यह तो संप्रुभता सम्पन्न राष्ट्र के अधिकारों का सीधा सीधा हनन है। वास्तव में अमेरिका की वेनेजुएला में कच्चे तेल एवं मूल्यवान खनिज पदार्थों के भंडार पर नजर है एवं इन्हें वह अपने कब्जे में लेना चाहता है इसीलिए वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका में लाया गया है और उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। इसी प्रकार, अब ग्रीनलैंड नामक द्वीप जिस पर इस समय डेनमार्क का अधिकार है, को भी अमेरिका अपने कब्जे में लेना चाहता है। अमेरिका के पास पहिले से ही ग्रीनलैंड में एक सैन्य अड्डा “पिटुफिक स्पेस बेस” है। परंतु, ट्रम्प यह पूरा द्वीप ही अमेरिकी कब्जे में लाना चाहते हैं क्योंकि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इस द्वीप की उन्हें जरूरत है। वेनेजुएला को हथियाने के तुरंत बाद ट्रम्प ने वेनेजुएला के पश्चिमी पड़ौसी देश कोलम्बिया जहां तेल के विशाल भंडार है तथा सोना, चांदी, पन्ना प्लेटिनम और कोयले की भारी मात्रा में खदाने हैं, को भी चेतावनी दे दी है कि सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर इतनी सख्ती नहीं की जानी चाहिए कि प्रदर्शन करने वाले नागरिकों की मौत ही हो जाए। अन्यथा, अमेरिका को इस स्थिति से निपटने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। ईरान भी इस समय बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सामना कर रहा है और ट्रम्प ने ईरान को भी चेतावनी दे डाली है कि ईरान में अगर और अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत हुई तो अमेरिका को कठोर जवाब देना होगा।

मेक्सिको पर भी अमेरिका की टेड़ी दृष्टि पड़ रही है और अमेरिका का सोचना है कि मेक्सिको से अमरीका में ड्रग्स एवं अवैध अप्रवासियों का आना जारी है। अमेरिका का कहना है कि इसे यदि मेक्सिको प्रशासन द्वारा रोका नहीं गया तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। ज्ञातव्य हो कि वर्ष 2025 में अपने दूसरे कार्यकाल के पहिले दिन ही ट्रम्प ने “गल्फ आफ मेक्सिको” का नाम बदलकर “गल्फ आफ अमेरिका” करने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। वर्ष 2016 में अपने पहिले कार्यकाल के दौरान भी ट्रम्प ने मेक्सिको के साथ दक्षिणी सीमा पर एक दीवार बनाने का बयान दिया था।

क्यूबा के वेनेजुएला के साथ घनिष्ठ सम्बंध रहे हैं। वेनेजुएला द्वारा कथित तौर पर क्यूबा को लगभग 30 प्रतिशत तेल की आपूर्ति की जाती रही है, इसके बदले में क्यूबा, वेनेजुएला को डॉक्टर एवं चिकित्साकर्मी उपलब्ध कराता रहा है। क्यूबा, फ्लोरिडा (अमेरिका) से केवल 90 मील दक्षिण स्थित द्वीप है और 1960 के दशक की शुरुआत से ही अमेरिकी प्रतिबंधों को झेल रहा है। परंतु, अब क्यूबा, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के पश्चात, तेल की आपूर्ति ठप्प होने के चलते मुश्किलों से घिर गया है और इसे अब अमेरिका पर निर्भर रहना ही होगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां लम्बे समय से चली आ रही है एवं अमेरिका अभी तक के अपने इतिहास में अन्य देशों पर हस्तक्षेप जैसे सैकड़ों मामलों में शामिल रहा है। वर्ष 1776 से वर्ष 2026 के बीच अमेरिका लगभग 400 हस्तक्षेपों में शामिल रहा है। इसमें से लगभग 200 हस्तक्षेप वर्ष 1950 के बाद के खंडकाल में हुए हैं। वर्तमान समय में भी अमेरिका 5 अलग अलग युद्धों में सार्वजनिक रूप से ज्ञात सैन्य अभियानों में शामिल है। सोमालिया, सीरिया और यमन में हो रहे युद्धों में अमेरिका अपने आप को, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल होना बताता है और वेनेजुएला में मादक पदार्थों के खिलाफ युद्ध में शामिल होना बताता है। इसी प्रकार अमेरिका रूस यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध, इजराईल हम्मास के बीच चल रहे युद्ध एवं कम्बोडिया थाईलैंड के बीच हुए युद्ध में भी अपनी चौधराहट दिखाता रहता है। अमेरिका द्वारा अन्य देशों के मामलों में हस्तक्षेप किया जाना सामान्य सी बात है। अभी हाल ही में नेपाल, बांग्लादेश एवं श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन कराने में भी अमेरिका का हाथ बताया जाता है। अमेरिका द्वारा इन हस्तक्षेपों को जिन कारणों से उचित ठहराया जाता है, उनमें शामिल हैं – आतंकवाद विरोधी अभियान, शासन परिवर्तन, क्षेत्रीय विस्तार, अमेरिकी नागरिकों और राजनयिकों की सुरक्षा, आर्थिक अवसर, राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा देना, लोकतंत्र को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करना, आदि है। अमेरिका की विदेश नीति की हस्तक्षेपवाद मुख्य विचारधारा रही है। इसी नीति के तहत अमेरिका की नजर वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, कोलम्बिया, ईरान, क्यूबा, मेक्सिको एवं नाईजेरिया में भी हस्तक्षेप करने की नजर आती है।

यूरोप के 7 देशों (फ्रान्स, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन एवं डेनमार्क) ने अमेरिका को गम्भीर चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनलैंड पर अमेरिका द्वारा कोई सैनिक कार्यवाही की गई तो इसके गम्भीर परिणाम अमेरिका को भुगतने होंगे और बहुत सम्भव है कि इस कार्यवाही के बाद यूरोपीय देशों एवं अमेरिका का संयुक्त नाटो संगठन ही बिखर जाए। नाटो संगठन के सदस्य देशों के बीच यह समझौता है कि इस संगठन के किसी भी एक सदस्य पर यदि सैन्य हमला होता है तो यह सैन्य हमला समस्त सदस्य देशों पर माना जाएगा और समस्त सदस्य देश मिलकर इस सैन्य हमले का जवाब देंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने दिनांक 7 जनवरी 2026 को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करने की जानकारी प्रदान की है। इसमें 35 गैर संयुक्त राष्ट्र संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं। ट्रम्प का सोचना है कि इन संगठनों की सदस्यता के चलते अमेरिकी हितों के अनदेखी हो रही है और इससे अमेरिकी पैसे की बर्बादी हो रही है। अमेरिका का यह कदम “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा माना जा रहा है और वैश्विक संस्थाओं से अमेरिका को दूर ले जाने का प्रयास है।

वैश्विक स्तर पर अब आर्थिक सत्ता का केंद्र पश्चिम से निकलकर पूर्व की ओर स्थानांतरित होता हुआ दिखाई दे रहा है और ट्रम्प अपने क्रियाकलापों से इसे गति देते हुए दिखाई दे रहे हैं। आज ब्रिक्स के सदस्य देशों में 325 करोड़ नागरिक निवास करते हैं और यह विश्व की कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत है। साथ ही, इन देशों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 39 प्रतिशत की भागीदारी है, जबकि जी-7 देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान लगभग 29 प्रतिशत ही है। अतः आज विश्व के किसी भी शक्तिशाली देश के लिए ब्रिक्स के सदस्य देशों की अनदेखी करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के समान है। अमेरिका केवल अपने दम पर कितने दिन चल सकता है, वह आज भी कई उत्पादों के लिए अन्य देशों पर पूर्णत: निर्भर है। आज की वैश्विक व्यवस्था में जब विभिन्न देश विभिन्न कारणों से एक दूसरे पर निर्भर हैं, ऐसे में अमेरिका द्वारा विश्व के कई शक्तिशाली देशों के साथ अपने सम्बन्धों को खराब करना, अमेरिका के हितों के विपरीत तो है ही, साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी विपरीत रूप से प्रभावित कर सकता है। अमेरिकी एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए इसे अमेरिकी नागरिकों को तो समझना ही होगा।

कोई सुनता क्यों नहीं ट्रंप चचे की!!

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दिल्ली । क्यों ठंडा पड़ गया वो जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उसके पास दूसरे साल में अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है?

जनवरी 2026 की सुबह में, दुनिया का स्कोरबोर्ड कुछ और ही कहानी सुना रहा है। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल टी-20 की पारी जैसा शुरू हुआ, चौके-छक्के, तालियाँ, विरोधियों में खलबली। 2025 की शुरुआत में ट्रंप ऐसे उभरे जैसे हर झगड़े के मसीहा हों। भारत-पाक तनाव, पश्चिम एशिया, थाईलैंड-कंबोडिया सीमा, यहाँ तक कि यूक्रेन-रूस, हर जगह शांति का श्रेय उन्होंने खुद ले लिया। पैग़ाम साफ़ था, सिर्फ़ मैं ही ठीक कर सकता हूँ।
वो हर टकराव में कूद पड़े, कूटनीति की तहज़ीब को किनारे किया, दोस्तों को डाँटा, दुश्मनों को गले लगाया, और खुद को सबसे बड़ा सौदेबाज़ बताया। नर्मी गई, नज़ाकत गई। यह थी सीधी-सादी, लेन-देन वाली राजनीति, नए अमीर की तरह, हर हाथ मिलाने पर दाम चिपका हुआ। “अमेरिका फ़र्स्ट” नारा नहीं, चेतावनी बन गया।

2025 टैरिफ़ के तमाशों का साल बना। ट्रंप ने टैक्स ऐसे लगाए जैसे चालान, दोस्त, दुश्मन, पड़ोसी, सब बराबर। नाम लिए गए, दिल दुखे, रिश्ते बिगड़े। जे.डी. वेंस जैसे वफ़ादार, ट्रंप के साथ ” डॉन किहोते” (Don Quixote) बनकर काल्पनिक पवनचक्कियों पर टूट पड़े, जबकि असली आग कहीं और लगी थी। बयानबाज़ी बढ़ी, ज़ुबान फिसली, और ग़लतियाँ जमा होती गईं। तब तक ट्रंप बेपरवाह रहे, जब तक रन बनना बंद नहीं हो गया।
2025 के आख़िरी महीनों में फुसफुसाहट तेज़ हुई। क्या ट्रंप ठीक हैं? ग़ाज़ा जल रहा है, यूक्रेन खून बहा रहा है, और ट्रंप वेनेज़ुएला पर तंज कस रहे हैं, ये कैसी राजनीति है? नोबेल शांति पुरस्कार का सपना कहाँ गया? जो बल्लेबाज़ कभी हर गेंद को सीमा के पार भेजता था, अब वही क्रीज़ पर अटका, डरा-डरा सा खेल रहा है।

रणनीतिक जानकार कहते हैं कि ट्रंप की उथल-पुथल ने अमेरिका को मज़बूत नहीं, कमज़ोर किया। भरोसा घटा, असर कम हुआ। एकध्रुवीय दुनिया बहुध्रुवीय बन गई। वादा की गई शांति प्रेस नोट बनी रही, नीति नहीं। यूक्रेन सुलगता रहा। ग़ाज़ा रोता रहा। और ट्रंप की सबसे बड़ी भूल? भारत।
कभी नरेंद्र मोदी के साथ दोस्ती पर फ़ख़्र करने वाले ट्रंप ने भारत को बुरी तरह ग़लत पढ़ा। भारतीय डायस्पोरा, जो अमेरिका-भारत रिश्तों की मज़बूत कड़ी है, नाराज़ हो गया, गुस्से में है, समय का इंतेज़ार कर रहा है। वीज़ा की बातें हों या व्यापार की धमकियाँ, सद्भावना उड़ गई। यहाँ तक कि अमेरिकी कंजरवेटिव तबक़ा भी व्हाइट हाउस के किरायेदार की संजीदगी पर सवाल उठाने लगा है। ताक़त के साथ तमीज़ भी चाहिए।

यह सब नया नहीं था। ट्रंप की विदेश नीति का पैटर्न पुराना है, शोरदार एंट्री, चमकदार तस्वीरें, और फिर सन्नाटा। उत्तर कोरिया याद है? किम जोंग उन के साथ ऐतिहासिक मुलाक़ातें, बड़े वादे, और नतीजा? मिसाइल परीक्षण। ईरान? परमाणु समझौता तोड़कर बिना विकल्प के “अधिकतम दबाव”, जिससे हालात और बिगड़े।

चीन के साथ व्यापार युद्ध से उद्योग लौटाने का दावा था। हक़ीक़त में महँगाई बढ़ी, सप्लाई चेन टूटी, नौकरियाँ कम ही बढ़ीं। अफ़ग़ानिस्तान? तालिबान से कमज़ोर सौदे ने उग्रवाद को ताक़त दी। सीरिया? अचानक सेना हटाने से कुर्द साथी असहाय हुए। नाटो को धमकियाँ दी गईं, सुधार नहीं हुए। वेनेज़ुएला में सत्ता बदलने का ख़्वाब टूट गया।

दूसरे कार्यकाल में भी कहानी वही रही। यूक्रेन में शांति वार्ता अटकी रही। ग़ाज़ा में युद्धविराम लागू न हो सका। यमन में हमले हुए, लेकिन समुद्री रास्ते नहीं खुले। ईरान से बातचीत आगे नहीं बढ़ी। पाकिस्तान के फ़ौजी सरदार से खनिज सौदों की नज़दीकी, आम लोगों को दरकिनार कर, अमेरिका के लोकतंत्र उपदेश खोखले हो गए हैं।

क्या ट्रंप ने कुछ सीखा? या उनके पास अब नए ख़याल ही नहीं बचे हैं?
आलोचक कहते हैं, ऊर्जा घट गई है, बुढ़ाय गए हैं, सोच कुंठित है। मगर यह सिर्फ़ ट्रंप की नाकामी नहीं, अमेरिका की थकान भी है। इराक़ के झूठे हथियार, लीबिया की अधूरी जंग, अफ़ग़ानिस्तान से अव्यवस्थित वापसी, पेरिस समझौते से दूरी, कोविड का कुप्रबंधन, 2008 की मंदी, ग्वांतानामो का दाग़, इन सबने भरोसा खोखला किया।

हर ग़लती ने साख कम की। हर विरोधाभास ने असर घटाया। ट्रंप ने गिरावट शुरू नहीं की, उसे तेज़ कर दिया।

अफ़सोस यह कि इससे अमेरिका को भी फ़ायदा नहीं हुआ। एकतरफ़ा फैसलों ने उसे अलग-थलग किया। अस्थिरता ने उसे बेनक़ाब किया। पाखंड ने उसे शर्मिंदा किया। दोस्त संभल गए, विरोधी इंतज़ार करने लगे, और दुनिया आगे बढ़ गई।

ट्रंप की दूसरी पारी अब घमंड का सबक लगती है, आतिशबाज़ी बहुत, दिशा कम। शुरुआत का शोर अब बचाव में बदल गया है। 2026 के साथ एक सवाल हवा में तैर रहा है: क्या डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया बदली है या दुनिया ही उनसे आगे निकल चुकी है?

भारत की धीमी रफ्तार में छिपा सुकून का राज़

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जयपुर । पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आँखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपने sunset years में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापिस खींच लिया।

“बच्चे अपने-अपने शहरों में सेटल हैं। पत्नी का इंतक़ाल हो चुका है। अमेरिका के उस बड़े, सलीकेदार, महलनुमा घर में न कोई बात करने वाला था, न हाल पूछने वाला। सुविधाएँ थीं, लेकिन अपनापन नहीं। हेल्थ इंश्योरेंस था, पर हेल्थ नहीं। अकेलापन हर कमरे में पसरा रहता था। आख़िरकार मैने तय किया, ज़िंदगी लंबी नहीं, जीने लायक होनी चाहिए। और भारत लौट आया,” भाटिया जी ने बताया।

भाटिया जी कोई अपवाद नहीं हैं। पश्चिमी दुनिया में बसे हज़ारों भारतवंशी, तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद भीतर से खाली हैं। जानकर लोग बताते हैं कि वहाँ सिस्टम है, अनुशासन है, सुरक्षा है, पर रिश्तों की गर्माहट नहीं। और जब उम्र बढ़ती है, तो एहसास होता है कि बैंक बैलेंस से ज़्यादा ज़रूरी है, कोई हाल पूछने वाला।

हम तरक़्क़ी को अक्सर पश्चिमी पैकेज में देखते हैं, स्टील और ग्लास के टावर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, और हर वक़्त की थकान। मगर भारत में अब भी रफ्तार मध्यम है। हौले-हौले चलती ज़िंदगी। यही असल में पर्यावरण-फ्रेंडली, किफ़ायती और टिकाऊ जीवनशैली है। यहाँ सुकून कोई शो-पीस नहीं, रोज़मर्रा की आदत है। और कई बार यही ख़ामोश ऐश, सबसे बड़ी अमीरी बन जाती है।

दिल्ली की धुँधली सुबह में सड़क किनारे चाय की चुस्कियाँ, बेंगलुरु में ऑफिस से पहले खिचड़ी और हँसी, मुंबई की लोकल में साझा जगह, आगरा की नुक्कड़ पर हलवाई का खोमचा, भटियारे की तवा-गपशप, इन सबमें एक आराम का रिदम छिपा है। कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस बहाव है। ज़िंदगी दौड़ नहीं, साथ चलना है।

विदेश में ज़िंदगी अक्सर काम और बिलों के बीच पिसती है। यहाँ एक समोसे पर भी UPI से मुस्कुराता हुआ “पेमेंट साउंड” आता है। टेक्नोलॉजी यहाँ दबाव नहीं बनाती, बस मदद करती है। ऑटो वाला डिजिटल है, लेकिन अब भी इंसान है, रास्ता भी बताएगा और हाल भी पूछ लेगा।

आज की सबसे बड़ी लग्ज़री वक़्त है, और भारत में वह अब भी बचा है। मदद यहाँ अमीरों की ऐय्याशी नहीं, हर घर की हक़ीक़त है। सुबह दरवाज़े की घंटी से ज़िंदगी जागती है, कुक, वॉशर, दूधवाला, डिलीवरी बॉय, सब आपकी आदतों से वाक़िफ़ हैं, बिना कोई डेटा प्राइवेसी पॉलिसी पढ़े। वर्क-लाइफ़ बैलेंस यहाँ किसी पॉडकास्ट से नहीं, इन्हीं लोगों से आता है।

इलाज की बात करें तो हाँ, अस्पतालों में भीड़ है, अव्यवस्था है, लेकिन काम होता है। आज डॉक्टर ने देखा, तो शाम तक रिपोर्ट। बुख़ार बढ़े, इससे पहले दवा घर पहुँच जाती है। कई देशों में अपॉइंटमेंट के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता है; यहाँ ज़्यादा से ज़्यादा लिफ़्ट का।

भारत की “राम भरोसे” व्यवस्था चिल्लाती नहीं, मगर चलती रहती है। “यह एक अजीब-सी दक्षता है, अराजक दिखने वाला अनुशासन, जो किसी तरह काम कर ही जाता है,” कहते हैं बुजुर्ग डॉ प्रधान।

और समाज, यहाँ अब भी रिश्ते हैं। रेस्तराँ में पानी मुफ़्त आता है, और कभी-कभी मुस्कान भी। मोहल्लों में दरवाज़े अब भी चेहरे पहचानते हैं। यहाँ इंसान, अब भी इंसान से जुड़ा है, किसी ऐप से नहीं।

रिटायर्ड बैंकर प्रेम भाई कहते हैं, “यह कम्फ़र्ट सिर्फ़ रईसों के लिए नहीं। भारत में मिडिल क्लास भी आराम से रह सकता है, अगर उसे दिखावा न चाहिए। विदेशी तनख़्वाह के साथ तो यह जगह सचमुच स्वर्ग ही समझो।”

पश्चिमी दुनिया के विशेषज्ञ प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, “वेस्ट में मिडिल क्लास हमेशा बीमा, टैक्स, किराए और पढ़ाई के बोझ तले दबी रहती है। भारत में वही पैसा घर, मदद, आराम और इज़्ज़त खरीद लेता है। ड्राइवर, कुक, डिलीवरी, जो वहाँ लग्ज़री हैं, यहाँ ज़िंदगी का हिस्सा हैं। यही असली बराबरी है।”

फिर संस्कृति, भारत में त्योहार रुकते नहीं, साल भर चलते हैं। दीवाली हो या क्रिसमस, घर बोलते हैं, लोग नाचते हैं। कोई अपॉइंटमेंट नहीं चाहिए, बस दरवाज़ा चाहिए। पश्चिम अपने अकेलेपन से थेरेपी में लड़ता है, भारत उसे चाय में घोल देता है, या नाचते गाते कीर्तन में उड़ा देता है।

रूहानियत यहाँ हॉबी नहीं, हवा में घुली है। वाराणसी के घाट, ऋषिकेश की सुबह, हिमालय की ख़ामोशी, इनके लिए पासवर्ड नहीं चाहिए, बस दिल चाहिए। जहाँ पश्चिम माइंडफुलनेस बेचता है, भारत उसे जीता है, अनजाने में ही। कश्मीर की हसीन वादियों में एक सप्ताह बिताकर लौटे जगन मुक्ता दंपत्ति कहते हैं, “मजा आ गया, वाकई जन्नत है, कितनी वैरायटी और आकर्षण हैं अपने देश में!”

यह सच है कि भारत में असमानताएँ हैं। सड़कें टूटी हैं, सिस्टम अधूरा है। लेकिन रिश्ते अब भी जुड़े हुए हैं। और शायद यही सबसे बड़ी बात है। जब ज़िंदगी इतनी मानवीय ढंग से, इतनी आसानी से चल सकती है, तो उसे किसी चमकदार छत और ऊँची तनख़्वाह के नीचे क्यों ख़रीदा जाए?
भारत अब भी वह जगह है, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी अपने आप में लग्ज़री बन जाती है। और अगर आपके पास थोड़ा-सा विदेशी पैसा है, तो माफ़ कीजिए, आप राजा हैं। क्योंकि यहाँ सच्ची ऐश वो नहीं जो दिखती है, बल्कि वो है जिसकी फिक्र आपको करनी ही नहीं पड़ती।

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