दिल्ली। श्रीनिवासन जैन 30 साल तक NDTV के स्टूडियो में बैठकर जिस पत्रकारिता को सच बताते रहे, वो सच कभी था ही नहीं। वो एक नैरेटिव था – एक सोचा-समझा एजेंडा, जिसमें हिंदू समाज की हर चिंता को “फिक्शन” बता देना ही पत्रकारिता बन गया।
उनकी किताब लव जिहाद एंड अदर फिक्शन इसी एजेंडे का डॉक्यूमेंट है।
जैन कहते हैं लव जिहाद होता ही नहीं। तो फिर केरल हाई कोर्ट ने इस शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? NIA ने सैकड़ों मामलों में धर्मांतरण और शोषण के पैटर्न की जांच क्यों की? यूपी, केरल, कर्नाटक में रोज़ जो लड़कियां कैमरे पर आकर कहती हैं कि नाम बदलकर फंसाया गया, फिर धर्म बदलने का दबाव बनाया गया, वो सब फिक्शन है? जमीनी हकीकत को डेटा के खेल से झुठलाना ही तो इनकी फैक्ट-चेकिंग है।
पॉपुलेशन जिहाद पर वो फर्टिलिटी रेट का गणित पढ़ाते हैं। गणित सही हो सकता है, लेकिन सवाल गणित का नहीं, मंशा का है। जब बंगाल और असम के बॉर्डर जिलों में डेमोग्राफी 20 साल में पलट जाती है, तो वो किस फिक्शन से होती है? आंकड़ों की आड़ में आंखों देखी सच्चाई को नकारना ही इनकी सेक्युलरिज्म है।
जबरन धर्मांतरण को भी वो फिक्शन बताते हैं। तो फिर छत्तीसगढ़, झारखंड के आदिवासी इलाकों में प्रलोभन और सेवा के नाम पर चलने वाले कन्वर्जन रैकेट पर FCRA क्यों रद्द होते हैं? कानून क्यों बनते हैं?
और तुष्टिकरण? जैन पूछते हैं कि ईद पर ज्यादा बिजली मिलती है इसका सबूत कहां है। अरे सबूत बिजली का नहीं, मानसिकता का है। हज सब्सिडी 2018 तक इस देश में थी या नहीं? मदरसों को सरकारी फंड मिलता था या नहीं? चार शादी की इजाजत कानून में थी या नहीं? सवाल बिजली का नहीं, बराबरी का है।
असली विवाद ये है कि श्रीनिवासन जैन पत्रकार कम, नैरेटिव मैनेजर ज्यादा हैं। इशरत जहां जो नरेंद्र मोदी को मारने आई थी, उसके लिए “छोटा-मोटा ब्लास्ट” शब्द इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति आपको बताएगा कि खतरा फिक्शन है। को वैक्सीन जैसी स्वदेशी वैक्सीन पर फेक खबर चलाकर माफी मांगने वाला व्यक्ति आपको सिखाएगा कि सच क्या है।
जैन की पूरी पत्रकारिता एक ही फॉर्मूले पर चलती है – हिंदू डरे तो उसे अफवाह बताओ, और जब हिंदू पर वार हो तो उसे छोटा-मोटा बताओ।
जैन जैसे लोग जिहादियों से भी खतरनाक हैं क्योंकि वे पत्रकार का मुखौटा लगाए हमारे आपके बीच में हैं।
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श्रीनिवासन जैन (Sreenivasan Jain) को लेकर मुख्य रूप से 10 बाते जिसको जानना जरूरी है ::
1.जैन की अब तक की कोई भी रिपोर्टिंग और डिबेट्स देख ले, उनमें अक्सर एक खास वैचारिक झुकाव होता है, जहाँ वे वामपंथी या उदारवादी एजेंडे को बढ़ावा देते हैं और बहुसंख्यक समाज या हिंदू संगठनों से जुड़े मुद्दों पर नकारात्मक दृष्टिकोण पेश करते हैं।
2.जैन हमेशा हिंदू त्योहारों और परंपराओं पर पूर्वाग्रह भरा रुख अपनाते है।अपनी पत्रकारिता में जैन हिंदू धार्मिक जुलूसों, त्योहारों या शोभायात्राओं के दौरान होने वाली घटनाओं की कवरेज में हमेशा एकतरफा रुख अपनाते हैं, जिससे हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला होता है।
3.जैन की सबसे बड़ी कीर्ति या यश लव जिहाद को झूठ बता इसको क्लीन चीट देंना था।’उनके दऔर उनकी टीम द्वारा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों (जैसे जनसांख्यिकीय बदलाव या कथित ‘लव जिहाद’) पर किए गए शोध और किताब फैक्ट को छुपा कर समाज में भ्रम फैलाने और वास्तविक धरातलीय सच्चाइयों को छिपाने का प्रयास हैं लेकिन सोशल मीडिया की सक्रियता से यह असफल हुआ।
4. जैन जो भी बोलते है या लिखते है उनकी रिपोर्टिंग का इस्तेमाल अक्सर पश्चिमी और विदेशी मीडिया संस्थानों द्वारा भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और ‘बढ़ती असहिष्णुता’ का नैरेटिव गढ़ने के लिए किया जाता है। इनके वक्ताब्यो पर ही भारत की थ्रू थ्रू होती है।
5. एनडीटीवी (NDTV) के दौर की संपादकीय शैली उनका जलवा गजब का रहा।जब वे यह सक्रिय थे तो वो रवीश+बरखा+राजदीप की तरह एक तरफा बैटिंग करते थे, उन पर हमेशा से एक विशेष राजनीतिक दल और विचारधारा के प्रति वैचारिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का आरोप लगाया जाता रहा है।मुस्लिम वोट बैंक को थामे रहना,उसका बचाव करना उनकी पत्रकारिता की शैली रही।
6. जैन की कोई कार्यक्रम देख ले, वे देश में हिंदू राष्ट्रवाद या बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को हमेशा ‘असहष्णुता’ या ‘लोकतंत्र के पतन’ के रूप में चित्रित करते हैं, जबकि अन्य किसी वैचारिक धड़ों की तुष्टिकरण की राजनीति पर मौन साध लेते हैं।यह नैरेटिव उनकी विशेष शैली रही।
7.जैन किसी भी न्यूज को डेटा और तथ्यात्मक बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में माहिर रहे।उनके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले आंकड़े अक्सर अकादमिक रूप से सतही होते हैं, जिनका उद्देश्य सरकार और राष्ट्रवादी संगठनों की छवि को नुकसान पहुंचाना होता है।
8.जैन हमेशा ऐसी रिपोर्टिंग करते कि भारत के संस्थाओं और न्यायपालिका पर दबाव बनाने वाले नैरेटिव खड़ा हो।जैन जैसे पत्रकार तब्लीगी जमात या पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे सभी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को समर्थन देते हैं जो देश की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर वैचारिक दबाव बनाने का काम करते हैं।
9.जैन हमेशा भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं और राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान को आधुनिकता या प्रगतिशीलता के विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं।उनकी रिपोर्ट में हिंदू धर्म के प्रति भय या वैमनस्य स्पष्टतः दिखता है।
10 जैन वास्तव में पत्रकारिता की आड़ में सक्रियता (Activism as Journalism)breaking india movement वाला अपना जाना माना एजेंडा चलाते है।वे निष्पक्ष पत्रकार की भूमिका निभाने के बजाय एक ‘वैचारिक एक्टिविस्ट’ की तरह व्यवहार करते हैं, जो एक तय एजेंडे के तहत समाज को विभाजित करने वाली बहसों को हवा देते हैं।
(भारत में वे लिबरल+लेफ्ट+एंटी हिंदू+सेकुलर लेखक जमात की सूची का ईकोसिस्टम में टॉप के 15 लोगों में शामिल है.बीबीसी, अल्जाजजिरा, CNN,trt, DW news इनके प्रमुखता से कवर कर भारत की लानत मानत करता है)



