चतुर्मास : व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण की अवधि

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भोपाल। भारतीय वाड्मय में चातुर्मास का विशेष महत्व है। यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होता है। जो इस वर्ष 25 जुलाई को पड़ रही है। इसका समापन कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को होगा जो इस वर्ष 20 नवम्बर को होगी। मान्यता है कि इन चार माह में भगवान नारायण पाताल लोक में विश्राम करते हैं इसलिये कोई शुभ काम नहीं होते।

चातुर्मास में देवशयन का संदर्भ एक पुराण कथा से है जिसमें एक घटनाक्रम का वर्णन है। उसके अनुसार राजा बलि ने एक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में भगवान नारायण स्वयं वामन रूप लेकर भिक्षा केलिये आये। उन्होंने तीन पग धरती माँगी। राजा बलि का अहंकार जागा, उसने हँसकर कहा जहाँ मन हो नाप लो। प्रभु ने दो पग में पूरी धरती नाप ली और पूछा तीसरा पग कहाँ रखूँ। तब राजा बलि को अपने अहंकार का आभास हुआ। बलि की पत्नि ने प्रभु को रक्षा का बंधन बाँधा और रक्षा का अनुनय किया। सब सामान्य हो गया। राजा बलि पाताल लोक चले गये और प्रभु ने उनकी रक्षा की। इस कथा में सबसे बड़ा संदेश नैतिकता और अहंकार से मुक्त अपने स्वभाव को विनम्र रखने का है। कथा के अनुसार इन चार माहों भगवान के शयन होता है।

 

इसलिये कोई शुभ कार्य नहीं होते लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि सनातन परंपरा के गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, संतान सप्तमी, करवा चौथ, हरियाली अमावस, पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि सभी बड़े त्यौहार इसी अवधि में ही आते हैं। इन आयोजनों के विश्लेषण में मिल जाता है। इन चार माहों में आयोजित त्यौहारों की विशेषता यह है वे सब व्यक्ति, परिवार, समाज राष्ट्र और लोक कल्याण के हैं। जिन आयोजनों को रोका गया है उनमें विवाह, नामकरण, यज्ञोपवीत, नये घर का निर्माण आदि हैं। ये उत्सव केवल व्यक्ति या परिवार हित तक ही सीमित होते हैं। इनमें व्यक्तिगत संतोष और सुख तो मिलता है लेकिन परिवार, समाज और राष्ट्र का आंतरिक उत्थान नहीं होता। जबकि इन चार माहों में जिन आयोजनों के प्रावधान किये गये हैं उनका ध्येय बहुत व्यापक है। चातुर्मास की पूरी अवधि की दिनचर्या और उत्सव आयोजन व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र के समृद्धिकरण के निमित्त हैं जो व्यक्ति को तन से, मन से, बुद्धि से और विवेक बल से समृद्ध होकर परिवार और समाज को सामूहिक बनाता है। चातुर्मास माह के त्यौहार व्यष्टि से समष्टि तक के एकाकार होने का माध्यम है। चतुर्मास की परंपरा में शरीर विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, वनस्पति विज्ञान ही नहीं अंतरिक्ष विज्ञान के निष्कर्ष भी समाहित दीखते है। जो बात आधुनिक विज्ञान ने आज कही है उसके निष्कर्ष का क्रियान्वयन भारतीय परंपराओ के प्रचलन अनादि काल से हो रहा है। आधुनिक विज्ञान ने अब जाना कि मनुष्य सहित चींटी से लेकर हाथी तक संसार के सभी प्राणीं एक दूसरे के पूरक हैं। और सृष्टि की नियामक शक्ति प्रकृति है। प्रकृति से समन्वय और संतुलन बनाकर ही धरती पर जीवन समृद्ध और दीर्घ जीवी होगा। इसे अनदेखा करके दुनियाँ ने विकास के नाम विनाश का मार्ग पकड़ लिया है। विज्ञान का दंभ भरने वाली दुनियाँ के सामने अब सत्य सामने आया है तो अब मार्ग बदलने की छटपटाहट है। लेकिन भारत ने यह सावधानी और प्रकृति से समन्वय के साथ जीवन के संचालन का प्रावधान सैकडों हजारों साल से कर रखा है। चतुर्मास में होने वाली उत्सव परंपरा में वे सभी सावधानियाँ हैं जिनमें व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र अपना विकास तो करे पर प्रकृति का संरक्षण भी साथ साथ चले। प्राणी को भोजन, पानी श्वांस और आरोग्य सब प्रकृति से मिलता है।

प्राणी और प्रकृति के बीच समन्वय

प्रकृति में जितने पदार्थ जिस अनुपात में हैं वे सब उसी अनुपात में मनुष्य देह के भीतर हैं। और यह सभी पदार्थ पाँच तत्वों से बने हैं। ये तत्व धरती, आकाश अग्नि जल और पवन हैं। यदि प्रकृति में इनके अनुपात में परिवर्तन होगा तो इसका प्रभाव प्राणी देह पर भी पड़ता है। इन चार महीने में इन पाँच तत्व के अनुपात में परिवर्तन आता है । यदि सावधानी से इस परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को सक्षम न किया तो यह अवधि मनुष्य को रोग ग्रस्त बना देगी। चतुर्मास में भारतीय उत्सवों में न केवल इस अवधि के परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को सक्षम बनाना है अपितु इतना समृद्ध बनाना है कि फिर वर्ष भर तक कोई परिवर्तन व्यथित न कर सकेगा। इन चार माहों की त्यौहार परंपरा का नियमन करने पर मनुष्य में शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से सक्षमता तो आती ही है इसके अतिरिक्त उसका दृष्टिकोण सकारात्मक और सद्भाव से भरा होगा।

चतुर्मास की अवधि में उत्सव परंपरा को समझने के लिये तीन विषयों पर ध्यान देना होगा। एक मनुष्य की संरचना का रहस्य, दूसरा प्राणियों एवं वनस्पति का जीवन में उपयोगिता और तीसरा पुराणों में वर्णित कथाओं का संदेश । यदि कथाओं के रहस्य को समझेंगे तो पायेंगे कि उनमें प्रथम दोनों विन्दुओं के निष्कर्ष का समाधान है । इसके लिये हम मनुष्य को समझें । मनुष्य का व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है । एक जो दिखाई देता है और दूसरा जो दिखाई नहीं देता। जैसे चेहरा हाथ पैर त्वचा, माँस हड्डियाँ हृदय, लीवर किडनी आदि सब देख सकते हैं पर मन, भाव विचार वृत्ति, विवेक, ज्ञान, मेधा, प्राण शक्ति आदि दिखाई नहीं देते। जैसे शरीर के रोग होते हैं वेसे ही मन, प्राण चित्त वृत्ति भाव आदि भी रोग ग्रस्त होते हैं। जिस प्रकार शरीर की व्याधियाँ और रोग मनुष्य के मन, वचन विवेक विचार वृत्ति सबको प्रभावित करतीं हैं उसी प्रकार मन, भाव विचारों की व्याधियाँ भी शरीर को प्रभावित करते हैं और इन सबका प्रभाव मनुष्य के जीवन ही नहीं वरन् पूरे वातावरण पर प्रभाव डालता है परिवार पर पड़ताहै समाज पर पड़ता है और देश भर भी पड़ता है ।

 

व्यक्ति के स्वास्थ्य का प्रभाव उसकी प्रगति, उसके कार्य और कार्य की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है । इसलिये भारतीय वाड्मय में शरीर के साथ मन बुद्धि ज्ञान विवेक के स्वास्थ्य और आत्म शुद्धि पर भी ध्यान दिया गया है । मनुष्य देह में मुख्यतया पाँच आयाम होते हैं। एक शरीर जो भोजन अर्थात अन्न से आकार पाता है इसे “अन्नमय कोष” जिसे शरीर कहते हैं । दूसरी चेतना जिससे शरीर सक्रिय रहता है इसे “प्राण मय कोष” कहते हैं। तीसरा मन जिसके संकेत पर प्राण शक्ति सक्रिय होकर शरीर को संचालित करती है इसे “मनोमय कोष” कहते हैं । चौथा ज्ञान जिससे उत्पन्न विवेक मन की इच्छाओं को संतुलित करता है इसे “ज्ञानमय कोष” कहते हैं। और अंत में आत्मा आत्मा जिसका संबंध परमात्मा (यूनीवर्स की इनर्जी) से होता है, इसे आत्ममय कोष कहते हैं । चतुर्मास के इन चार माहीनों में मनुष्य को चींटी से हाथी तक सभी प्राणियों, वनस्पति में नन्ही दूव से लेकर विशाल वट और पीपल वृक्ष तक और अंतरिक्ष के सभी गृहों के साथ समन्वय करके जीवन को समृद्घ बनाने का रहस्य छुपा हुआ है । ये चतुर्मास प्राणी के प्रकृति से एकाकार होने की महत्वपूर्ण अवधि है । यदि मनुष्य इस महत्वपूर्ण कालखंड में व्यक्तिगत उत्सव और कार्यों तक सीमित रहेगा तो कैसे स्वयं समुन्नत करेगा, इसलिए देव शयन की अवधारणा स्थापित कर मनुष्य को व्यक्तिगत प्रसन्नता के आयोजन से ऊपर उठकर, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान और साधना से जोड़ा गया है। यदि इन चार महीनों में पड़ने वाले तीज त्यौहार और परंपरा पर दृष्टि डालें तो गुरु पूर्णिमा व्यक्तित्व निर्माण, रक्षाबंधन परिवार समन्वय, भुजरियाँ कुटुम्ब समन्वय और सामाजिक समरसता, कावड़ यात्रा संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का संकल्प, जन्माष्टमी विषमताओं के बीच जीवन की रक्षा, गणेशोत्सव नेतृत्व क्षमता का विकास, नवरात्र आत्मशक्ति को जाग्रत करना, विजयदशमीं शक्ति संपन्न होना, धनवन्तरि जयंति आरोग्य रहना, दीपावली आर्थिक समृद्धि, गोबर्धन पूजा पर्यावरण संरक्षण और भाई दूज परिवार समन्वय का अद्भुत संदेश है।

आधुनिक विज्ञान भी अनुसंधान के बाद भारत की इस परंपरा के प्रावधान से आश्चर्यचकित है कि यदि इन चार माह में निर्देशित चर्या के अनुकूल जीवन जिया जाय तो प्राणी पूरे वर्ष भर निरोग रहेगा, सशक्त रहेगा और आत्म विश्वास से भरा रहेगा । उसमें अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी, परिवार, समाज और राष्ट्र एक सूत्र में बंधा रहेगा ।

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रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

श्री शर्मा का पत्रकारिता अनुभव लगभग 52 वर्षों का है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों में उन्होंने काम किया है। दैनिक जागरण भोपाल, राष्ट्रीय सहारा दिल्ली सहारा न्यूज चैनल एवं वाँच न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ प्रभारी रहे। वर्तमान में समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहे हैं।

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