विचारधारा में जब विचारक इम्पोर्ट होने लगें, तो चिंता स्वाभाविक है

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दिल्ली। विचारधारा कोई किताब, मंच या एक बार का भाषण नहीं होती। वह जीवनभर के आचरण, निष्ठा और समर्पण से बनती है। जब अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग अचानक किसी विचारधारा के विचारक बनकर प्रस्तुत होने लगें और उनका स्वागत भी हो, तब सवाल उठना लाजमी है।

हाल ही में कांग्रेस के पूर्व स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रो. वेद प्रकाश शर्मा द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा पर आधारित पुस्तक ‘संघ से राष्ट्रबोधः शताब्दी यात्रा के विभिन्न पड़ाव’ का लोकार्पण जयपुर के पाथेय भवन में राज्यपाल की उपस्थिति में हुआ। कल तक कांग्रेस की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति आज संघ के विचारों पर लिख रहे हैं और विचार परिवार के लोग उनका स्वागत कर रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में विचार करने योग्य है।

किसी व्यक्ति का अध्ययन करना या विचार बदलना अपने आप में गलत नहीं। परंतु विचारधारा केवल लिखने-पढ़ने या मंच साझा करने तक सीमित नहीं रह सकती। एक तरफ वे कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने वर्षों शाखाओं में समय दिया, विपरीत परिस्थितियों में भी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाए रखी और बिना पद या प्रचार की अपेक्षा के संगठन का निर्माण किया। दूसरी तरफ जब अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए लोग संघ के विचारों पर पुस्तक लिखते और बोलते दिखाई देते हैं, तो वर्षों से समर्पित कार्यकर्ताओं की भूमिका और योगदान किस नजरिए से देखा जाएगा?

संगठन पुस्तकों, समारोहों और भाषणों से नहीं बनते। वे उन कार्यकर्ताओं की तपस्या से बनते हैं, जो चुपचाप अपने विचार के लिए खड़े रहते हैं। जब विचारधाराओं के बीच की सीमाएँ इतनी आसानी से धुंधली पड़ने लगें, तो उन समर्पित लोगों का क्या होगा, जिन्होंने पूरी जिंदगी एक विचार के लिए खपा दी? यह सवाल केवल व्यक्तिगत नहीं, संगठनात्मक भी है। समय बदला है, परंतु निष्ठा और समर्पण की कीमत अभी भी वही है।

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