आंबेडकरी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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दिल्ली। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने ग्वालियर के एक कांग्रेसी वकील अनिल मिश्रा पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की है, क्योंकि उन्होंने बीएन राऊ को संविधान निर्माता माना। यह मांग अतिवादी और गैर-आंबेडकरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मूलभूत अधिकार है। कोई व्यक्ति बीएन राऊ को संविधान निर्माता माने, तो यह उसका वैचारिक अधिकार है, भले ही यह ऐतिहासिक रूप से गलत हो। सत्य स्पष्ट है कि बीएन राऊ संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, पर उनकी और एसएन मुखर्जी की कानूनी विशेषज्ञता को बाबा साहब आंबेडकर ने सराहा था। दोनों ने संविधान निर्माण में सहयोग किया, पर बाबा साहब ही इसके प्रमुख शिल्पी थे।

बीएन राऊ को संविधान निर्माता मानना तथ्यात्मक भूल हो सकती है, लेकिन इसे देशद्रोह कहना अतिशयोक्ति है। देशद्रोह का मुकदमा न केवल कानूनी रूप से कमजोर होगा, बल्कि यह समाज में अशांति भी फैला सकता है। क्या जबरन किसी महान व्यक्ति का सम्मान करवाना लोकतंत्र है? आम आदमी पार्टी पर दलित विरोधी होने का आरोप है, और दिल्ली में हार के बाद शायद यही कारण है कि वे बाबा साहब के प्रति अतिरिक्त भक्ति दिखा रहे हैं। यह कहावत कि “नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है” यहाँ चरितार्थ होती है।

बाबा साहब ने अपने जीवन में आलोचनाओं का जवाब तर्क और लेखन से दिया। उनकी किताबें, जैसे एनिहिलेशन ऑफ कास्ट, उनकी तर्कशक्ति का प्रमाण हैं। उन्होंने ग्रंथों की आलोचना की, लेकिन दयाभाग सिद्धांत का उपयोग कर महिलाओं के संपत्ति अधिकारों का समर्थन भी किया। बौद्ध धम्म और आंबेडकरी विचार में कोई भी व्यक्ति या विचार आलोचना से परे नहीं है, चाहे वह तथागत बुद्ध हों या बाबा साहब। 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में बाबा साहब ने कहा था कि किसी को देवता न बनाएं, क्योंकि इससे लोकतंत्र को खतरा है।

कांग्रेस को अनिल मिश्रा पर कार्रवाई करनी चाहिए, और यदि वे शांति भंग करते हैं, तो बीएनएस की धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। लेकिन देशद्रोह जैसे सख्त कानून का दुरुपयोग, जो नेहरू के पहले संविधान संशोधन से प्रचलित हुआ, संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। आंबेडकरी तरीका तर्क और संवाद है, न कि दमन।

आम आदमी पार्टी का जूता-कल्चर: लोकतंत्र पर थूकना और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटना

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आज के दौर में, जब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं, राजनीतिक दल अपनी सिद्धांतों को बाजार की तरह बेचने लगे हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) का मामला इससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक और पाखंडी है। एक तरफ यह पार्टी खुद को ‘आम आदमी’ का मसीहा बताती है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ती है और अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीटती है। दूसरी तरफ, वही पार्टी हिंसा, अपमान और दमन के प्रतीक ‘जूता फेंकने’ वालों को न सिर्फ संरक्षण देती है, बल्कि उन्हें राजनीतिक ऊंचाइयों पर बिठा भी देती है। और जब वही हिंसा किसी और पर होती है, तो सख्त कार्रवाई की मांग करती है। हाल ही में पंजाब की आप सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर सीजेआई ‘जूता कांड’ की आलोचना करने वालों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में एफआईआर दर्ज कराना इसी पाखंड की इंनाम है। यह न सिर्फ आप की दोहरी नैतिकता को उजागर करता है, बल्कि उनके लोकतंत्र को ठगने के अपराध को उजागर करता है।

जूता फेंकना लोकतंत्र का अपमान है-चाहे वह किसी पर हो । सबसे पहले, 2009 का वह कुख्यात जूता-कांड याद करें। पत्रकार जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था। कारण था 1984 के सिख विरोधी दंगों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट देना। यह घटना अपमानजनक थी, और जरनैल सिंह को गिरफ्तार भी किया गया। लेकिन क्या हुआ आगे? चिदंबरम ने शिकायत नहीं की, लेकिन कानून ने अपना काम किया। फिर आया आप का ‘स्वागत समारोह’। 2013 में आप ने जरनैल सिंह को दिल्ली विधानसभा चुनाव में टिकट दिया, और वे राजौरी गार्डन से विधायक बने। 2014 में लोकसभा चुनाव में पश्चिम दिल्ली से उम्मीदवार बने, भले ही हार गए। 2015 में फिर विधायक बने। आप ने इस ‘जूते वाले नायक’ को न सिर्फ सम्मान दिया, बल्कि पार्टी का चेहरा बनाया। अरविंद केजरीवाल ने खुद जरनैल को ‘सिख अधिकारों का योद्धा’ कहा। लेकिन सवाल यह है: क्या जूता फेंकना लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है? नहीं। यह हिंसा है, अपमान है। आप ने इसे पुरस्कृत करके हिंसा को वैध ठहराया। जरनैल सिंह का 2021 में निधन हो गया, लेकिन आप का यह ‘जूता-मॉडल’ आज भी जिंदा है—एक ऐसा मॉडल जो कहता है: ‘ जूता फेंककर अपमान करो, हम तुम्हें टिकट देंगे।’

अब गुजरात का मामला लें, जो आप की इस नीति का और साफ आईना है। मार्च 2017 में, गुजरात के युवा कार्यकर्ता गोपाल इटालिया ने गृह राज्यमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा पर जूता फेंका। आरोप था गुजरात में भ्रष्टाचार का। इटालिया को तत्काल गिरफ्तार किया गया, सरकारी नौकरी से निलंबित कर दिया गया। लेकिन आप ने क्या किया? 2020 में उन्हें गुजरात इकाई का उपाध्यक्ष बनाया। 2022 में विधानसभा चुनाव लड़ा, हारा लेकिन पार्टी का चेहरा बना। फिर 2025 के विशावदार उपचुनाव में जीतकर विधायक बने। आप ने इटालिया को न सिर्फ माफ किया, बल्कि प्रमोट किया। केजरीवाल ने कहा, ‘गोपाल जैसे युवा ही बदलाव लाएंगे।’ लेकिन बदलाव का मतलब हिंसा को बढ़ावा देना? जूता फेंकना विरोध नहीं, अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (चोट पहुंचाना) और 504 (अपमान) के तहत यह दंडनीय है। आप ने इसे ‘क्रांति’ का नाम देकर लोकतंत्र को चोट पहुंचाई। अगर आप भ्रष्टाचार के खिलाफ है, तो बहस करो, अदालत जाओ—जूता क्यों?

ये दो उदाहरण ही काफी हैं आप के ‘जूता-संरक्षण’ को साबित करने के लिए। पार्टी ने ऐसे लोगों को टिकट देकर संदेश दिया: ‘हिंसा करो, हम तुम्हें सत्ता का स्वाद चखाएंगे।’ लेकिन अब देखिए उल्टा खेल। अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के एक टिप्पणी को ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताकर, जूता फेंकने की कोशिश की। । यह घटना शर्मनाक थी-न्यायपालिका पर हमला। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने किशोर को निलंबित कर दिया, पुलिस ने पूछताछ की। लेकिन आप का रुख? केजरीवाल ने तुरंत कहा, ‘यह पूर्वनियोजित साजिश है। ऐसी कार्रवाई हो कि कोई आगे हिम्मत न करे।’ उन्होंने इसे ‘न्यायपालिका पर हमला’ और ‘दलितों को दबाने की कोशिश’ कहा। सही है, लेकिन पाखंड क्यों? जब जरनैल या गोपाल ने जूता फेंका, तो आप ने कहा ‘योद्धा’। अब सीजेआई पर जूता, तो ‘सख्त सजा’। यह दोहरा मापदंड नहीं तो क्या?

पंजाब की आप सरकार का सोशल मीडिया दमन, सबसे ताजा घाव है। अक्टूबर 2025 के ‘जूता कांड’ (संभवतः सीजेआई घटना या कोई स्थानीय घटना से जुड़ा) पर सोशल मीडिया पर आलोचना करने वाले आम लोगों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं (आईपीसी 153A, 505—सांप्रदायिकता भड़काना और लोक शांति भंग) में एफआईआर दर्ज। पंजाब पुलिस ने कई यूजर्स को नोटिस भेजे, फोन टैपिंग शुरू की। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा, ‘फेक न्यूज फैलाने वालों को बख्शेंगे नहीं।’ लेकिन सवाल: आलोचना फेक न्यूज कैसे? जूता फेंकना गलत है, इस पर बहस करना अभिव्यक्ति की आजादी है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत यह मौलिक अधिकार है। आप ने इसे कुचलकर दिखा दिया कि सत्ता मिलते ही ‘आम आदमी’ दुश्मन बन जाता है। कल को ये वही लोग ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का रोना रोएंगे—जैसे केजरीवाल ने दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ किया। लेकिन शर्म? बिल्कुल नहीं। पंजाब में पहले भी आप ने विपक्षी नेताओं पर ऐसे ही केस लगाए—2024 में किसान आंदोलन की आलोचना पर। यह तानाशाही नहीं तो क्या?

आप की यह राजनीति लोकतंत्र के लिए जहर है। शुरू में 2011-12 में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उभरी, लेकिन सत्ता की भूख ने इसे ‘जूता-व्यापारी’ बना दिया। दिल्ली में 49 दिन की सरकार, फिर पंजाब-गुजरात में विस्तार-हर जगह वादे टूटे। शिक्षा-स्वास्थ्य के नाम पर प्रचार, लेकिन जूता फेंकने वालों को टिकट? यह युवाओं को गलत संदेश देता है: हिंसा से सफलता मिलेगी। 2025 तक आप के पास 100 से ज्यादा विधायक हैं, लेकिन कितने ‘जूते’ वाले? जरनैल, गोपाल-और कितने छिपे? केजरीवाल खुद कहते हैं ‘सिस्टम चेंज’, लेकिन सिस्टम को जूते से कैसे बदलोगे? अदालतें, बहस, वोट-ये हथियार हैं। जूता नहीं।

इस पाखंड से आप को बाहर आना चाहिए। पार्टी के अंदर जो जूता फेंककर नेता बने हैं, उनको पार्टी से बाहर करो। जिन पत्रकारों ने इस मुद्दे पर चर्चा की, अपनी बात कही है। उन पर एफआईआर वापस लो, वरना देश से ‘आम आदमी – राज ‘ और ‘जूता-राज’ का फर्क मिट जाएगा। लोकतंत्र मजबूत हो, हिंसा कम हो—यह पंजाब की आप सरकार का कर्तव्य है। लेकिन लगता है, सत्ता की मस्ती में भूल गए। केजरीवालजी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सम्मान करो। फर्जी मुकदमें वापस लो। वरना इतिहास तुम्हें ‘जूता-पार्टी’ ही लिखेगा।

इस्माइल दरबार के बयान पर विवाद: गौहर खान के अभिनय पर आपत्ति, फेमिनिस्टों की चुप्पी पर सवाल

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सोनाली मिश्रा

मुंबई: मशहूर संगीतकार इस्माइल दरबार ने अपनी बहू, अभिनेत्री गौहर खान के फिल्मों में अभिनय करने पर आपत्ति जताई है। विकी लालवानी को दिए साक्षात्कार में दरबार ने कहा कि उन्हें गौहर का शादी और मां बनने के बाद अभिनय करना पसंद नहीं है। उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी आयशा का उदाहरण देते हुए कहा कि आयशा ने अपने बच्चे की खातिर काम छोड़ दिया, भले ही वह महीने में 5 लाख रुपये कमा रही थीं। दरबार ने यह भी कहा कि वह गौहर के किसी भी अभिनय दृश्य को नहीं देखते, क्योंकि इससे उन्हें असहजता होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि गौहर के पति, उनके बेटे जैद ही उन्हें सलाह दे सकते हैं।

दरबार ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, “मैं एक रूढ़िवादी परिवार से आता हूं। अंतरंग दृश्य देखकर हम इधर-उधर चले जाते थे, और यह आज भी जारी है। गौहर अब हमारे परिवार का हिस्सा है, और उसकी इज्जत की जिम्मेदारी हमारी है।” उन्होंने खुलकर कहा कि वह ऐसे दृश्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे और जरूरत पड़ी तो इसका विरोध भी करेंगे।

इस बयान ने सोशल मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में बहस छेड़ दी है। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, फेमिनिस्ट और सामाजिक आंदोलनकारी इस मामले पर खामोश हैं। अगर यही बात किसी हिंदू परिवार से जुड़े व्यक्ति ने कही होती, तो शायद अब तक फेमिनिस्ट संगठन और साहित्यकार पितृसत्ता और मनुवाद के खिलाफ लेख और कविताएं लिख चुके होते। सोशल मीडिया पर तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की यह चुप्पी सवाल उठाती है कि क्या उनकी आलोचना धर्म-विशेष तक सीमित है?

यह दोहरा रवैया तब और स्पष्ट होता है, जब मुस्लिम परिवारों से जुड़े पितृसत्तात्मक बयानों पर फेमिनिस्ट समूह चुप्पी साध लेते हैं। गौहर खान, जो एक स्वतंत्र और सफल अभिनेत्री हैं, के बारे में इस तरह की टिप्पणी न केवल उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका पर भी बहस छेड़ती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि फेमिनिस्ट आवाजें तब ही उठती हैं, जब मुद्दा उनकी विचारधारा के अनुकूल हो।

सोनम वांगचुक का संदिग्धता का सफर और भारत के खिलाफ खड़ी होने की कहानी

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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, जो दशकों पुरानी मांग का समाधान था। यह कदम लद्दाख की आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रतीक था, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की गतिविधियों ने धीरे-धीरे संदेह के घेरे में आना शुरू कर दिया। 2019 से 2025 तक की घटनाओं का विश्लेषण दर्शाता है कि वांगचुक की कार्रवाइयां शांतिपूर्ण मांगों से आगे बढ़कर राजनीतिक महत्वाकांक्षा, विदेशी संपर्कों और हिंसा भड़काने की दिशा में मुड़ गईं।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद, आभार से असंतोष तक

अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद, 5 अगस्त 2019 को लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला आया। वांगचुक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हुए ट्वीट किया: “लद्दाख का लंबे समय से चला आ रहा सपना पूरा हुआ। 30 साल पहले 1989 में लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश की मांग की थी।” यह बयान उनकी प्रारंभिक समर्थन को दर्शाता है। लेकिन जल्द ही असंतोष उभरा। वांगचुक ने छठी अनुसूची (आदिवासी क्षेत्रों के लिए संवैधानिक सुरक्षा) की मांग उठाई, जो पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है। यह मांग वैध लगती थी, लेकिन वांगचुक ने इसे राजनीतिक हथियार बनाया।

2020-2023 के बीच, वांगचुक ने शांतिपूर्ण आंदोलन चलाए, लेकिन 2024 में उनके बयान संदिग्ध हो गए। मार्च 2024 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “यदि मांगें पूरी न हुईं तो लद्दाखी चीनी आक्रमण का प्रतिरोध नहीं करेंगे।” यह बयान न्यूजचेकर और अल जजीरा जैसी रिपोर्टों में उद्धृत है, जहां वांगचुक ने एक स्थानीय कॉमेडियन का हवाला देते हुए कहा कि लद्दाखी “चीन को रास्ता दिखा देंगे।” हालांकि उन्होंने इसे हास्य बताया, लेकिन सीमा क्षेत्र में यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था। यह बयान चीनी आक्रामकता के संदर्भ में भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है।

विदेशी संपर्क और पाकिस्तान यात्रा

2025 में वांगचुक की गतिविधियां और संदिग्ध हो गईं। फरवरी 2025 में वे इस्लामाबाद (पाकिस्तान) गए, जहां ‘ब्रीद पाकिस्तान’ जलवायु सम्मेलन में भाग लिया। यह सम्मेलन डॉन मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित था, जो पाकिस्तान का प्रमुख मीडिया हाउस है और अक्सर भारत-विरोधी कंटेंट प्रकाशित करता है। वांगचुक ने ‘ग्लेशियर मेल्ट’ पर पैनल चर्चा में भाग लिया, जहां उन्होंने पीएम मोदी की ‘मिशन लाइफ’ पहल की सराहना की, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया को ‘पर्यावरण चैंपियन’ बताया। द वायर और बूम लाइव की रिपोर्टों के अनुसार, यह यात्रा संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से हुई, लेकिन लद्दाख डीजीपी एस.डी. सिंह जमवाल ने सितंबर 2025 में कहा कि वांगचुक का एक पाकिस्तानी पीआईओ (इंटेलिजेंस अधिकारी) से संपर्क था।

इसके तुरंत बाद, मार्च 2025 में पुणे में रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। ओपइंडिया और द कम्यून की रिपोर्टों में कहा गया कि यह विरोध विकास परियोजनाओं को बाधित करने का प्रयास था। ये घटनाएं संयोग नहीं लगतीं। राष्ट्रीय एजेंसियों ने वांगचुक को एफसीआरए उल्लंघन के लिए चिह्नित किया। सितंबर 2025 में, गृह मंत्रालय ने वांगचुक की एनजीओ The Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया। सीबीआई जांच में पाया गया कि 2021-22 में ₹3.35 लाख की अनियमित डिपॉजिट और ₹54,600 लोकल फंड्स एफसीआरए अकाउंट में डाले गए। The Himalayan Institute of Alternatives Ladakh (HIAL) पर भी ₹1.63 करोड़ विदेशी फंड्स के बिना रजिस्ट्रेशन के आरोप लगे।

अनिश्चितकालीन अनशन और हिंसा का राजनीतिक उद्देश्य

सितंबर 2025 में वांगचुक ने अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया, भले ही गृह मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को वार्ता की घोषणा की हो। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के साथ बातचीत चल रही थी, जिसमें 45% से 84% तक आदिवासी आरक्षण, महिलाओं के लिए 33% कोटा और भोटी-पुर्गी भाषाओं की मान्यता जैसे लाभ मिल चुके थे। फिर भी, वांगचुक ने अनशन जारी रखा।

24 सितंबर 2025 को प्रदर्शन हिंसक हो गया। बीजेपी कार्यालय जला दिया गया, सीआरपीएफ वाहन फूंके गए, और 4 लद्दाखी युवाओं की मौत हो गई। 105 सुरक्षाकर्मी घायल हुए। गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार, वांगचुक के ‘उत्तेजक बयानों’ ने भीड़ को भड़काया। उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश और अरब स्प्रिंग का हवाला दिया, जो ‘जन जेड क्रांति’ की तरह परिवर्तन ला सकता है। वांगचुक ने कहा कि वे हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं, लेकिन वीडियो साक्ष्य दिखाते हैं कि उनके भाषणों ने युवाओं को उकसाया। कांग्रेस नेताओं की सोशल मीडिया अपीलों ने हिंसा को बढ़ावा दिया; बीजेपी आईटी हेड अमित मालवीय ने कांग्रेस काउंसलर फुंट्सोग स्टैंजिन त्सेपाग को भीड़ भड़काते वीडियो शेयर किया।

वांगचुक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में शामिल होना चाहते थे, लेकिन अस्वीकृति के बाद कांग्रेस के करीब आ गए। उनकी पत्नी गितांजली अंगमो ने बीजेपी पर ‘भावनात्मक कथानक गढ़ने’ का आरोप लगाया, लेकिन हिंसा के दौरान वांगचुक का पीछे हटना, युवाओं से पहचान छुपाने की अपील और विदेशी आंदोलनों का संदर्भ संदेह पैदा करता है। वांगचुक ने शांति की अपील की, लेकिन देर से।

वार्ता से पीछे हटना और कांग्रेस का समन्वय

6 अक्टूबर 2025 को तय वार्ता से Leh Apex Body (LAB) और The Kargil Democratic Alliance (KDA) ने पीछे हटने की घोषणा की। यह वांगचुक की गिरफ्तारी और न्यायिक जांच की मांग पर आधारित था। लेकिन कांग्रेस का रोल स्पष्ट है। वांगचुक का परिवारिक कनेक्शन कांग्रेस से मजबूत है-उनके पिता सोनम वांगयाल जम्मू-कश्मीर सरकार में कांग्रेस मंत्री थे। 2025 में समन्वित बयान और आंदोलनों का तालमेल दिखाता है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। LAHDC लेह चुनाव से पहले यह राजनीतिकरण स्पष्ट है।

कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से लद्दाख की उपेक्षा की। 1989 की गोलीबारी में तीन लद्दाखियों की मौत हुई, लेकिन वांगचुक की चुप्पी बीजेपी पर हमलों तक सीमित रही। कांग्रेस नेताओं की अपीलों ने बीजेपी कार्यालयों पर हमले भड़काए। BJP ने शांति बनाए रखी, जबकि कांग्रेस और वांगचुक ने अराजकता फैलाई।

दावों पर सवाल: श्रेय हड़पना और संसाधनों का दुरुपयोग

वांगचुक के दावे भी संदिग्ध हैं। आइस स्तूपा का श्रेय वे लेते हैं, लेकिन मूल आविष्कारक चेन्जे अंगचुक को मान्यता नहीं दी। HIAL इंस्टीट्यूट बिना UGC/AICTE रजिस्ट्रेशन के संचालित था, और ₹37 करोड़ का प्रीमियम बकाया था। आरोप है कि भूमि का दुरुपयोग हुआ, और ‘बाहरी लोग लद्दाख का शोषण कर रहे हैं’ दावा बिना प्रमाण के भावनाओं को भटकाने का प्रयास था।

सरकार का विकास कार्यक्रम

इसके विपरीत, बीजेपी सरकार ने लद्दाख को मजबूत बनाया। 2019 से ₹32,143.16 करोड़ का निवेश हुआ, जिसमें ₹10,371.98 करोड़ जनजातीय कल्याण पर। IBEF और द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टों के अनुसार, 1,670 किमी सड़कें, शिंकुन ला सुरंग (₹1,681 करोड़), 136 मोबाइल टावर, हनले डार्क स्काई रिजर्व जैसे पर्यटन केंद्र बने। 85% नौकरियों में स्थानीय आरक्षण, सीमा गांवों के लिए 4% अतिरिक्त, महिलाओं के लिए 33% कोटा। 3,800+ गैर-राजपत्रित और 200+ राजपत्रित पद भरे। 96% इंटरनेट कवरेज, सार्वभौमिक विद्युतीकरण, भोटी-पुर्गी भाषाओं की मान्यता। 1989 के शहीदों को सम्मानित किया।

फिर भी, बीजेपी कार्यालयों को निशाना बनाया गया। हिंसा में 105 सुरक्षाकर्मी घायल हुए, लेकिन BJP ने शांति चुनी। आगामी भूमि सुरक्षा निर्णयों से प्रभावित होने के डर से कांग्रेस और वांगचुक ने अशांति भड़काई, जो पर्यटन और आजीविका को खतरे में डालता है।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा जनकल्याण से ऊपर

वांगचुक का अनशन और आंदोलन छठी अनुसूची की मांग को हाईजैक करने का हिस्सा थे, खुद को ‘नायक’ बनाने के लिए। पूर्व राजनीतिक असफलताओं के बावजूद, 24 सितंबर की हिंसा उनकी महत्वाकांक्षा को उजागर करती है। उनकी गतिविधियां भारत के खिलाफ खड़ी हो गईं-विदेशी संपर्क, उत्तेजक बयान, हिंसा के लिए उकसावा । बीजेपी ने वार्ता और विकास चुना, जबकि वांगचुक ने अराजकता। लद्दाख की शांति राजनीतिक लाभ के लिए दांव पर नहीं लगनी चाहिए। तथ्य साफ कहते हैं: वांगचुक की संदिग्धता अब सिद्ध है।

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