पॉलिसी संवाद द्वारा जनजातीय कल्याण के लिए लोक नीति पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

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नई दिल्ली। भारत की पहली द्विभाषी लोक नीति पत्रिका पॉलिसी संवाद ने इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (IPPRDT) एवं महामना मदन मोहन मालवीय मेमोरियल ट्रस्ट के तत्वावधान में एक ज्ञानवर्धक कार्यशाला का आयोजन किया। “भविष्य का वित्तपोषण: जनजातीय कल्याण और समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक नीति और वित्त” विषयक यह कार्यक्रम मालवीय स्मृति भवन, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।

कार्यशाला का उद्घाटन पॉलिसी संवाद के संपादक और लोक नीति विश्लेषक गौरव कुमार द्वारा अतिथि सत्कार के साथ किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्री अंतर सिंह आर्य, अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, ने अपने संबोधन में लोक नीति के क्षेत्र में सकारात्मक संवाद और इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने में पॉलिसी संवाद की भूमिका की सराहना की। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने वर्तमान केंद्रीय बजट में जनजाति कल्याण के लिए किए गए विभिन्न प्रावधानों की सराहना करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने जनजातीय समुदायों के समावेशी विकास हेतु कई प्रभावी कदम उठाए हैं।

इसी क्रम में, विशिष्ट अतिथि श्री निरुपम चाकमा, सदस्य, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, ने अनुसूचित जनजातियों के समग्र और समावेशी विकास में लोक वित्त और उसके प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया। श्रीमती विजया भारती सयानी, पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष एवं सदस्य, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, ने भी कार्यशाला के विषय पर अपने बहुमूल्य विचार साझा किए। श्री हरिशंकर सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, महामना मालवीय मिशन, ने भी अपने संबोधन में जनजातीय कल्याण और नीति निर्माण की भूमिका पर प्रकाश डाला।

इसके अलावा, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संयुक्त सचिव अमित निर्मल ने अपने विशेष व्याख्यान में जनजातीय कल्याण और समावेशी विकास के लिए सार्वजनिक नीति और वित्त की भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

जनजातीय कल्याण की चुनौतियों और अवसरों की खोज करते हुए डोमेन विशेषज्ञों, नीति पेशेवरों और हितधारकों के बीच विचार-विमर्श हुआ। प्रख्यात विद्वानों और विशेषज्ञों के पैनल ने अनुसूचित जनजाति विकास के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर चर्चा को समृद्ध किया। प्रमुख वक्ताओं में डॉ. प्रकाश चंद कांडपाल (प्रोफेसर, जेएनयू), प्रो. पवनेश कुमार (इग्नू), श्री चक्षु रॉय (पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च), श्री बिनय कुमार सिंह (वरिष्ठ शोधकर्ता, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन), ए. के. चौबे (महासचिव, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ), श्री प्रकाश उईके (पूर्व न्यायाधीश), और डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव (असिस्टेंट प्रोफेसर, जेएनयू) शामिल रहे।

कार्यक्रम के दौरान ही पॉलिसी संवाद के दसवें अंक का विमोचन मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा किया गया। प्रतिष्ठित प्रोफेसरों और विश्लेषकों के एक संपादकीय बोर्ड द्वारा संपादित यह पत्रिका शासन, सामाजिक-आर्थिक विकास और नीति विश्लेषण पर अंतर्दृष्टि प्रदान करती रही है। पॉलिसी संवाद भारत के नीति परिदृश्य के भविष्य को आकार देने वाले विद्वानों के प्रभावशाली संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में काम कर रहा है।

कार्यक्रम का समापन डॉ. प्रवीण कुमार झा द्वारा दिए गए धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस अवसर पर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के लैंप फैलो, विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र, लोक नीति से जुड़े प्रशासनिक अधिकारी व शोधार्थी उपस्थित रहे।

प्रदेश में है अब विकास और उत्सव का काल

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के 8 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण हो चुका है। इन 8 वर्षों की सफलताओं और उपलब्धियों को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने मिशन 2027 की तैयारियां भी आरम्भ कर दी हैं। प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने 25 से 27 मार्च 2025 तक हर जिले में तीन दिवसीय विकास उत्सव मनाया जिसमें सरकार की उपलब्धियों का विस्तृत रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया गया तथा विभिन्न लाभार्थियों से संपर्क कर धरातल को भी परखा गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मानना है कि “प्रदेश वही है, तंत्र वही है बस सरकार बदलने से बदलाव हुआ है और प्रदेश बीमारू प्रदेश से देश का ग्रोथ इंजन बन रहा है, आज प्रदेश श्रम शक्ति से अर्थ शक्ति बने की ओर अग्रसर है।

भाजपा का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में, सबका साथ सबका विकास की नीति व अपराध पर जीरो टालरेंस की नीति को सफलता के साथ पूरा किया जा रहा है। अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करते हुए 222 दुर्दांत अपराधियों का एनकाउंटर किया गया और 930 से अधिक अपराधियों के खिलाफ एरनएसए की कार्यवाही हो चुकी है। मुख्यमंत्री योगी की बुलडोजर बाबा की छवि प्रदेश की जनता को पसंद है। अब तो अन्य राज्यों में भी लोग “मुख्यमंत्री हो तो योगी जैसा” की बात करने लगे हैं। प्रदेश के अपराधियों में भय का वातावरण उत्पन्न हुआ है क्योंकि अपराधी अगर अपराध करके दूसरे राज्यों में भागकर संरक्षण प्राप्त करने का प्रयास करता है तब भी वह बच नहीं पा रहा है । बेहतर होती कानून व्यवस्था के कारण प्रदेश के हर क्षेत्र में सर्वांगीण विकास में योगदान देने के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय निवेशक आकर्षित हो रहे हैं। प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे नहीं होते, जिससे हिंदू व मुसलमान दोनों ही सुरक्षित महसूस करते हैं। प्रदेश में लव जिहाद व धर्मांतरण जैसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानून बनाये गये हैं। प्रदेश में परीक्षाओं में होने वाली नकल को रोकने के लिए भी प्रभावी कानून बनाया गया है जिसका प्रभाव भी दिख रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में सनातन की पुनर्प्रतिष्ठा हो रही है। अयोध्या में प्रभु राम की जन्मस्थली पर दिव्य भव्य मंदिर का उदघाटन संपन्न होने, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण होने और अब प्रयागराज में महाकुंभ -2025 के सफल आयोजन से सनातन धर्मियों के बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता बढ़ी है। आस्था के केन्द्रों के विकास के कारण प्रदेश में तीर्थाटन के लिए आने वालों की संख्या में रिकार्ड वृद्धि हो रही है । अयोध्या, काशी, मथुरा सहित अन्य सभी धार्मिक स्थलों ने घरेलू पर्यटन के क्षेत्र में प्रदेश को बड़ी बढ़त दिलाई है। वर्ष 2024 में प्रदेश में 64.90 करोड़ पर्यटकों का आगमन हुआ जिसके अंतर्गत विदेशी पर्यटकों की संख्या में 6.67 लाख थी। प्रदेश में धार्मिक पर्यटन सहित पर्यटन की अन्य संभावनाओं का भी विकास किया जा रहा है।

एक जिला -एक उत्पाद योजना की ही तरह एक जिला एक पर्यटन स्थल का भी विकास किया जा रहा है। जैसे सीतापुर जिले में नैमिषारण्य, लखनऊ में चंद्रिका देवी मंदिर तथा पुराना हनुमान मंदिर, बाराबंकी में लोधेश्वर महादेव। मीरजापुर जिले में स्थित मां विन्ध्यवासिनी धाम में भी कारिडोर का निर्माण कार्य प्रगति पर है। अयोध्या व काशी के बाद मथुरा वृंदावन के वृहद स्तर पर विकास की बात मुख्यमंत्री जी सदा करते हैं। इस कार्य को सही रूप से पूर्ण करने के के लिए श्री अयोध्या जी तीर्थ विकास परिषद, श्री देवीपाटन तीर्थ विकास परिषद, उप्र ब्रज तीर्थ विकास परिषद, श्री विन्ध्य धाम तीर्थ विकास परिषद, चित्रकूट धाम तीर्थ विकास परिषद एवं नैमिषारण्य धाम तीर्थ विकास परिषद का गठन किया गया है ।

प्रदेश में एक्सप्रेस -वे बन रहे हैं और फिर उसी गति से अंतर्जनपदीय सड़कों का भी निर्माण हो रहा है। 8 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय 46 हजार से बढ़कर 1लाख 24 हजार हो गयी है। अब प्रदेश में आयुध निर्माण भी होने लगा है। महिला, किसान, छात्र, युवा सभी वर्ग के लोग सरकारी योजनाओं से सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। प्रदेश में 8 वर्षे में पौधरोपण अभियान भी व्यापक पैमाने पर चल रहा है जिसके अंतर्गत अब तक 204 करोड़ पौधरोपण हो चुका है जिसका असर यह हुआ है कि 2 लाख एकड़ में हरीतिमा बढ़ी। प्रदेश सरकार सामाजिक सरोकारों में अग्रणी है जिसके अंतर्गत अनाथ परिवारों की सहायता की जा रही है। प्राकृतिक आपदाओं में भी सरकार भरपूर सहायता उपलब्ध करा रही है।

उत्तर प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बनने की और अग्रसर है जो जीरो पावर्टी स्टेट यानि गरीबी मुक्त प्रदेश होगा। प्रदेश में 15 करोड़ नागरिकों को निशुल्क राशन का वितरण किया जा रहा है।60 लाख माताओं को प्रधानमंत्री मातृ वंदना सहायता का लाभ मिल रहा है। 1 करोड़ परिवारों को घरौनी प्रमाणपत्र मिलने से गांवों में जमीन संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा हो रहा है।

युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध होने के कारण बेरोजगारी की दर मात्र 3 प्रतिशत रह गई है। केंद्र सरकार की कई जनकल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करने में प्रदेश नंबर बन चुका है, इनमें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना में सबसे अधिक आयुष्मान कार्ड बने हैं, प्रधामनंत्री आवास योजना के सर्वाधिक लाभर्थी उत्तर प्रदेश से हैं।स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत देश में सबसे अधिक 2.75 करेड से अधिक शौचालय बने। कौशल विकास नीति को लागू करनेवाला देश का प्रथम राज्य यूपी बना है।खाद्यान्न, दूध, आलू आंवला, आम, गन्ना, चीनी और एथेनाल उत्पादन में प्रदेश नंबर वन बन चुका है।400 लाख टन सब्जियों का उत्पादन कर यूपी देश में प्रथम स्थान पर है। एक जिला एक मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत प्रदेश के सभी 80 जिलों में मेडिकल कालेज का संचालन किया जा रहा है।

आज प्रदेश में सर्वाधिक एयरपोर्ट हैं । 2017 से पूर्व किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अयोध्या व श्रावस्ती में भी भव्य एयरपोर्ट बन सकता है किंतु अब एअरपोर्ट कार्य कर रहे है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अब प्रदेश बेहतर कानून व्यवस्था के बल पर सभी क्षेत्रों मे प्रगति के पथपर अग्रसर हो रहा है। यूपी देश की बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। प्रदेश में गुलामी के प्रतीकों का महिमामंडन नहीं होता अपितु प्रदेश की योजनाओं का नामकरण महापुरुषों के नाम पर किया जा रहा है।

महाकुंभ 2025 के सफल आयोजन के बाद तो यूपी सरकार की प्रतिष्ठा पुरे विश्व में बढ़ गई है। प्रदेश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गूंज सुनाई दे रही है और निस्संदेह इसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका अत्यंत मतवपूर्ण है। योगी जी के नेतृत्व में प्रदेश अभ्युदय काल देख रहा है।

अन्य देशों में रह रहे हिंदूओं के साथ खड़े रहने की आवश्यकता

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आज लगभग 4 करोड़ से अधिक भारतीय मूल के नागरिक विश्व के अन्य देशों में शांतिपूर्ण तरीके से रह रहे हैं एवं इन देशों की आर्थिक प्रगति में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। कई देशों में तो भारतीय मूल के नागरिक इन देशों के राजनैतिक पटल पर भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आदि विकसित देश इसके प्रमाण हैं। आस्ट्रेलिया में तो भारतीय मूल के नागरिकों को राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय करने के गम्भीर प्रयास स्थानीय स्तर पर किए जा रहे हैं, क्योंकि अन्य देशों में भारतीय मूल के नागरिकों की इस क्षेत्र में सराहनीय भूमिका सिद्ध हो चुकी है। राजनैतिक क्षेत्र के अतिरिक्त आर्थिक क्षेत्र में भी भारतीय मूल के नागरिकों ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की है जैसे अमेरिका के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में आज भारतीयों का ही बोलबाला है। अमेरिका में प्रतिवर्ष लगभग 85,000 एच वन-बी वीजा जारी किए जाते हैं, इसमें से लगभग 60,000 एच वन-बी वीजा भारतीय मूल के नागरिकों को जारी किए जाते हैं। इसी प्रकार अमेरिका की प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी भारतीय मूल के नागरिक बन रहे हैं। आज अमेरिका एवं ब्रिटेन में प्रत्येक 7 चिकित्सकों में 1 भारतीय मूल का नागरिक हैं। न केवल उक्त वर्णित विकसित देशों बल्कि खाड़ी के देशों यथा, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में भी भारतीय मूल के नागरिक भारी संख्या में शांतिपूर्ण तरीके से रह रहे हैं एवं इन देशों के आर्थिक विकास में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, कई देशों यथा सिंगापुर, गुयाना, पुर्तगाल, सूरीनाम, मारीशस, आयरलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका आदि के राष्ट्राध्यक्ष (प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति) भारतीय मूल के नागरिक रहे हैं एवं कुछ देशों में तो अभी भी इन पदों पर आसीन हैं। साथ ही, 42 देशों की सरकार अथवा विपक्ष में कम से कम एक भारतवंशी रहा है।

दूसरी ओर, भारत के पड़ौसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में भारतीय मूल के नागरिकों, विशेष रूप से हिंदुओं की जनसंख्या लगातार कम हो रही है। बांग्लादेश में तो वर्ष 1951 में कुल आबादी में हिंदुओं की आबादी 22 प्रतिशत थी वह आज घटकर 8 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। लगभग यही हाल पाकिस्तान का भी है। बांग्लादेश में तो हाल ही के समय में सत्ता पलट के पश्चात हिंदुओं सहित वहां के अल्पसंख्यक समुदायों पर कातिलाना हमले किए गए हैं। केवल बांग्लादेश ही क्यों बल्कि विश्व के किसी भी अन्य देश में हिंदुओं के साथ इस प्रकार की घटनाओं का कड़ा विरोध होना चाहिए। भारतीय मूल के नागरिक सनातन संस्कृति के संस्कारों के चलते बहुत ही शांतिपूर्वक तरीके से इन देशों के विकास में अपनी भागीदारी निभाते हैं। इसके बावजूद भी यदि भारतीयों पर इस प्रकार के आक्रमण किए जाते हैं तो इसकी निंदा तो की ही जानी चाहिए एवं विश्व समुदाय से इस संदर्भ में सहायता भी मांगी जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। बांग्लादेश में हिंदूओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हुए घातक हमलों की अमेरिका के राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प ने भी भर्त्सना की थी, इसी प्रकार के विचार अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी प्रकट किया थे। परंतु, आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय हिंदू समाज भी विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों के साथ खड़ा हो। इसी संदर्भ में, दिनांक 21 मार्च से 23 मार्च 2025 को बंगलूरू में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में बांग्लादेश के हिंदू समाज के साथ एकजुटता से खड़े रहने का आह्वान किया गया है एवं इस संदर्भ में निम्नलिखित एक विशेष प्रस्ताव भी पास किया गया है।

“अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्प संख्यक समुदायों पर इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों द्वारा लगातार हो रही सुनियोजित हिंसा, अन्याय और उत्पीड़न पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। यह स्पष्ट रूप से मानवाधिकार हनन का गम्भीर विषय है।

बांग्लादेश में वर्तमान सत्ता पलट के समय मठ मंदिरों, दुर्गा पूजा पंडालों और शिक्षण संस्थानों पर आक्रमण, मूर्तियों का अनादर, नृशंस हत्याएं, सम्पत्ति की लूट, महिलाओं के अपहरण और अत्याचार, बलात मतांतरण जैसी अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं। इन घटनाओं को केवल राजनीतिक बताकर इनके मजहबी पक्ष को नकारना सत्य से मुंह मोड़ने जैसा होगा, क्योंकि अधिकतर पीड़ित, हिंदू और अन्य अल्प संख्यक समुदायों से ही हैं।

बांग्लादेश में हिंदू समाज, विशेष रूप से अनुसूचित जाति तथा जनजाति समाज का इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों द्वारा उत्पीड़न कोई नई बात नहीं है। बांग्लादेश में हिंदुओं की निरंतर घटती जनसंख्या (1951 में 22 प्रतिशत से वर्तमान में 7.95 प्रतिशत) दर्शाती है कि उनके सामने अस्तित्व का संकट है। विशेषकर, पिछले वर्ष की हिंसा और घृणा को जिस तरह सरकारी और संस्थागत समर्थन मिला, वह गम्भीर चिंता का विषय है। साथ ही, बांग्लादेश से लगातार हो रहे भारत विरोधी वक्तव्य दोनों देशों के सम्बन्धों को गहरी हानि पहुंचा सकते हैं।

कुछ अंतरराष्ट्रीय शक्तियां जान बूझकर भारत के पड़ौसी क्षेत्रों में अविश्वास और टकराव का वातावरण बनाते हुए एक देश को दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर अस्थिरता फैलाने का प्रयास कर रही हैं। प्रतिनिधि सभा, चिन्तनशील वर्गों और अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े विशेषज्ञों से अनुरोध करती हैं कि वे भारत विरोधी वातावरण, पाकिस्तान तथा डीप स्टेट की सक्रियता पर दृष्टि रखें और इन्हें उजागर करें। प्रतिनिधि सभा इस तथ्य को रेखांकित करना चाहती है कि इस सारे क्षेत्र की एक सांझी संस्कृति, इतिहास एवं सामाजिक सम्बंध हैं जिसके चलते एक जगह हुई कोई भी उथल पुथल सारे क्षेत्र में अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। प्रतिनिधि सभा का मानना है कि सभी जागरूक लोग भारत और पड़ौसी देशों की इस सांझी विरासत को दृढ़ता देने की दिशा में प्रयास करें।

यह उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश के हिंदू समाज ने इन अत्याचारों का शांतिपूर्ण, संगठित और लोकतांत्रिक पद्धति से साहसपूर्वक विरोध किया है। यह भी प्रशंसनीय है कि भारत और विश्वभर के हिंदू समाज ने उन्हें नैतिक और भावनात्मक समर्थन दिया है। भारत सहित शेष विश्व के अनेक हिंदू संगठनों ने इस हिंसा के विरुद्ध आंदोलन एवं प्रदर्शन किए हैं और बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा व सम्मान की मांग की है। इसके साथ ही विश्व भर के अनेक नेताओं ने भी इस विषय को अपने स्तर उठाया है।

भारत सरकार ने बांग्लादेश के हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ खड़े रहने और उनकी सुरक्षा की आवश्यकता को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताई है। उसने यह विषय बांग्लादेश की आंतरिक सरकार के साथ साथ कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाया है। प्रतिनिधि सभा भारत सरकार से अनुरोध करती है कि वह बांग्लादेश के हिंदू समाज की सुरक्षा, गरिमा और सहज स्थिति सुनिश्चित करने के लिए वहां की सरकार से निरंतर संवाद बनाए रखने के साथ साथ हर सम्भव प्रयास जारी रखे।

प्रतिनिधि सभा का मत है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों व वैश्विक समुदाय को बांग्लादेश में हिंदू तथा अन्य अल्प संख्यक समुदायों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार का गम्भीरता से संज्ञान लेना चाहिए और बांग्लादेश सरकार पर इन हिंसक गतिविधियों को रोकने का दबाव बनाना चाहिए। प्रतिनिधि सभा हिंदू समुदाय एवं अन्यान्य देशों के नेताओं से तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आह्वान करती है कि बांग्लादेशी हिंदू तथा अन्य अल्पसंख्यक समाज के समर्थन में एकजुट होकर अपनी आवाज उठाएं।”

यह प्रथम बार नहीं है कि भारत के किसी सांस्कृतिक संगठन ने विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों के हित में आवाज उठाई है। बल्कि, पूर्व में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बांग्लादेश में हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हो रहे अत्याचार की बात विभिन्न मंचों पर करता रहा है। क्योंकि, यह पूरे विश्व के हित में है कि हिंदू सनातन संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाया जाय ताकि पूरे विश्व में ही शांति स्थापित हो सके। इसके साथ ही, वैश्विक पटल पर भी संघ का कार्य द्रुत गति पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्व के अन्य देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ कार्य कर रहा है। आज विश्व के 53 देशों में 1,604 शाखाएं एवं 60 साप्ताहिक मिलन कार्यरत हैं। पिछले वर्ष 19 देशों में 64 संघ शिक्षा वर्ग लगाए गए। विश्व के 62 विभिन्न स्थानों पर संस्कार केंद्र भी कार्यरत हैं। जर्मनी से इस वर्ष 13 विस्तारक भी निकले हैं। इस प्रकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उक्त प्रयासों की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है।

कृषि क्षेत्र में करवट बदलता भारत

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भारत में लगभग 60 प्रतिशत आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। जबकि, कृषि क्षेत्र का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 18 प्रतिशत के आस पास बना हुआ है। इस प्रकार, भारत में यदि गरीबी को जड़ मूल से नष्ट करना है तो कृषि के क्षेत्र में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लागू करना ही होगा। भारत ने हालांकि आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएं अर्जित की हैं और भारत आज विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है तथा शीघ्र ही अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। साथ ही, भारत आज विश्व में सबसे अधिक तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बन गया है। परंतु, इसके आगे की राह अब कठिन है, क्योंकि केवल सेवा क्षेत्र एवं उद्योग क्षेत्र के बल पर और अधिक तेज गति से आगे नहीं बढ़ा जा सकता है और कृषि क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर को बढ़ाना होगा।

भारत में हालांकि कृषि क्षेत्र में कई सुधार कार्यक्रम लागू किए गए हैं और भारत आज कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गया है। परंतु, अभी भी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। किसानों के पास पूंजी का अभाव रहता था और वे बहुत ऊंची ब्याज दरों पर महाजनों से ऋण लेते थे और उनके जाल में जीवन भर के लिए फंस जाते थे, परंतु, आज इस समस्या को बहुत बड़ी हद्द तक हल किया जा सका है और किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किसान को आसान नियमों के अंतर्गत बैकों से पर्याप्त ऋण की सुविधा उपलब्ध है और इस सुविधा का लाभ आज देश के करोड़ों किसान उठा रहे हैं। दूसरे, इसी संदर्भ में किसान सम्मान निधि योजना भी किसानों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हो रही है और इस योजना का लाभ भी करोड़ों किसानों को मिल रहा है। इससे किसानों की कृषि सम्बंधी बुनियादी समस्याओं को दूर करने के सफलता मिली है।

भारतीय कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है। देश के ग्रामीण इलाकों में सिंचाई सुविधाओं का अभाव है। इस समस्या को हल करने के उद्देश्य से भारत सरकार प्रति बूंद अधिक फसल की रणनीति पर काम कर रही है एवं सूक्ष्म सिंचाई पर बल दिया जा रहा है ताकि कृषि के क्षेत्र में पानी के उपयोग को कम किया जा सके तथा जल संरक्षण के साथ सिंचाई की लागत भी कम हो सके।

देश में कृषि जोत हेतु पर्याप्त भूमि का अभाव है और देश में सीमांत एवं छोटे किसानों की संख्या करोड़ों की संख्या में हो गई है। जिससे यह किसान किसी तरह अपना और परिवार का भरण पोषण कर पा रहे हैं इनके लिए कृषि लाभ का माध्यम नहीं रह गया है। इन तरह की समस्याओं के हल हेतु अब केंद्र सरकार विभिन्न उत्पादों के लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य में, मुद्रा स्फीति को ध्यान में रखकर, वृद्धि करती रहती है, इससे किसानों को अत्यधिक लाभ हो रहा है। भंडारण सुविधाओं (गोदामों एवं कोल्ड स्टोरेज का निर्माण) में पर्याप्त वृद्धि दर्ज हुई है एवं साथ ही परिवहन सुविधाओं में सुधार के चलते किसान कृषि उत्पादों को लाभ की दर पर बेचने में सफल हो रहे है अन्यथा इन सुविधाओं में कमी के चलते किसान अपने कृषि उत्पादों को बाजार में बहुत सस्ते दामों पर बेचने पर मजबूर हुआ करता था। खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना भारी मात्रा में की जा रही है इससे कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिल रहा है एवं कृषि उत्पादों की बर्बादी को रोकने में सफलता मिल रही है।

आज भारत में उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के उपयोग पर ध्यान दिया जा रहा है ताकि उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता कम हो एवं कृषि उत्पादकता बढ़े। इस संदर्भ में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भी किसानों की मदद कर रही है इससे किसान कृषि भूमि पर मिट्टी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कृषि उत्पाद कर रहे हैं। राष्ट्रीय कृषि बाजार को स्थापित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि किसान सीधे ही उपभोक्ता को उचित दामों पर अपनी फसल को बेच सके। साथ ही, कृषि फसल बीमा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि देश में सूखे, अधिक वर्षा, चक्रवात, अतिवृष्टि, अग्नि आदि जैसी प्रकृतिक आपदाओं के चलते प्रभावित हुई फसल के नुक्सान से किसानों को बचाया जा सके। आज करोड़ों की संख्या में किसान फसल बीमा योजना का लाभ उठा रहे हैं।

देश में खेती किसानी का काम पूरे वर्ष भर तो रहता नहीं है अतः किसानों के लिए अतिरिक्त आय के साधन निर्मित करने के उद्देश्य से डेयरी, पशुपालन, मधु मक्खी पालन, पोल्ट्री, मत्स्य पालन आदि कृषि सहायक क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसानों को अतिरिक्त आय की सुविधा मिल सके।

विश्व के विभिन्न देशों ने अपनी आर्थिक प्रगति के प्रारम्भिक चरण में कृषि क्षेत्र का ही सहारा लिया है। औद्योगिक क्रांति तो बहुत बाद में आती है इसके पूर्व कृषि क्षेत्र को विकसित अवस्था में पहुंचाना होता है। भारत में भी आज कृषि क्षेत्र, देश की अर्थव्यवस्था का आधार है, जो न केवल खाद्य सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि करोड़ों नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर भी निर्मित करता है। साथ ही, औद्योगिक इकाईयों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराता है। वैश्विक स्तर पर कृषि क्षेत्र की महत्ता आगे आने वाले समय में भी इसी प्रकार बनी रहेगी क्योंकि इस क्षेत्र से पूरी दुनिया के नागरिकों के लिए भोजन, उद्योग के लिए कच्चा माल एवं रोजगार के अवसर कृषि क्षेत्र से ही निकलते रहेंगे। हां, कृषि क्षेत्र में आज हो रही प्रौद्योगिकी में प्रगति के चलते किसानों को कम भूमि पर, मशीनों का उपयोग करते हुए, कम पानी की आवश्यकता के साथ भी अधिक उत्पादन करना सम्भव हो रहा है। इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि के साथ कृषि उत्पाद की लागत कम हो रही है और किसानों के लिए खेती एक उद्योग के रूप में पनपता हुआ दिखाई दे रहा है और अब यह लाभ का व्यवसाय बनता हुआ दिखाई देने लगा है।

केला, आम, अमरूद, पपीता, नींबू जैसे कई ताजे फलों एवं चना, भिंडी जैसी सब्जियों, मिर्च, अदरक जैसे प्रमुख मसालों, जूट जैसी रेशेदार फसलों, बाजरा एवं अरंडी के बीज जैसे प्रमुख खाद्य पदार्थों एवं दूध के उत्पादन में भारत पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ गया है। दुनिया के प्रमुख खाद्य पदार्थों यथा गेहूं एवं चावल का भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत वर्तमान में कई सूखे मेवे, कृषि आधारित कपड़े, कच्चे माल, जड़ और कांड फसलों, दालों, मछली पालन, अंडे, नारियल, गन्ना एवं कई सब्जियों का पूरे विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत 80 प्रतिशत से अधिक कृषि उपज फसलों (काफी एवं कपास जैसी नकदी फसलों सहित) के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया था। साथ ही, भारत सबसे तेज विकास दर के साथ पशुधन एवं मुर्गी मांस के क्षेत्र में दुनिया के पांच सबसे बड़े उत्पादक देशों में शामिल हो गया है।

कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी भी दृष्टि से कृषि क्षेत्र के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता है क्योंकि उद्योग एवं सेवा क्षेत्र का विकास भी कृषि क्षेत्र के विकास पर ही निर्भर करता है। अधिकतम उपभोक्ता तो आज भी ग्रामीण इलाकों में ही निवास कर रहे हैं एवं उद्योग क्षेत्र में निर्मित उत्पादों की मांग भी ग्रामीण इलाकों से ही निकल रही है। अतः देश में कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना ही होगा।

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