9th CNFF to begin on 25 October 2025

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Nava Thakuria

Guwahati: The annual Chalachitram National Film Festival, providing a dignified space for short features and documentaries with the central theme ‘Our Heritage, Our Pride’, will be organized on 25, 26 October at Jyoti Chitraban film studio premise in Kahilipara locality of the prehistoric city in northeast India. Organized by Chalachitram (www.chalachitram.in), a subsidiary of Vishwa Samvad Kendra Assam, the CNFF 2025 will comprise the entries in both competitive (confined to north-eastern film makers) and non-competitive categories. The two-day festival is initiated with an aim to foster nationalism through film-works and also pay homage to India’s thousands of years old civilization, culture and heritage.

The entries with various sub-themes including Indian heritage, indigenous society, heroes of freedom movement, epic & mythology, national integration & solidarity, arts & artisans, manuscripts & paintings, museums, wood carving, musicians, authors, indigenous festivals, ethnic groups, monuments & heritage sites, social reformation, traditional sports, women empowerment, tradition & family values, Yoga & Ayurveda, cultural nationalism, tea & oil, environment, agriculture, education, human rights, tourism potential of northeast India, etc will be accepted for the acclaimed festival.

The film works may be submitted through Filmfreeway with necessary documents. The entries should reach the Chalachitram office by 19 June (Early Bird section), till 19 July (with fees of Rs 500) and by 20 September (fees Rs 1,000). The duration of east entry should be limited to 25 minutes including credit titles. The awards include Best Short Feature, Best Documentary, Best Director, Best Screenplay, Best Cinematography and Best Editing under North-east category along with Best Short Feature and Best Documentary in the national category.

Meanwhile, a new executive committee for CNFF-25 was formed with senior journalist Nava Thakuria as its president, film personalities Prabal Khaund and Deepak Dutta as vice-presidents, actor-director Bhagwat Pritam Dutta as secretary, Riju Dutta as treasurer, Bobita Sharma as organizing secretary, Pranjit Deka and Dhrubajyoti Deka as assistant secretaries along with Amarjyoti Deka , Indrani Laskar, Sanjeev Parashar, Julan Krishna Mahanta, Pallavi Thakuria, Himanshu Baishya, Hiten Thakuria, Bibhu Dutta, Priya Chetri, Aparajita Pujari, Asimkrishna Barua, Buddha Boro as executive members, said a press statement issued by VSK Assam secretary Kishor Shivam.

साइकिल के बिना शहर: मोटर वाहनों की अंधी दौड़ में दम तोड़ती आगरा की सांस

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आगरा जब दुनिया भर में 3 जून को वर्ल्ड बाइसिकल डे मनाया गया, तो तमाम देशों में साइकिल रैलियों, जागरूकता अभियानों और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारों की गूंज सुनाई दी। वहीं, आगरा में यह दिन किसी सामान्य दिन की तरह चुपचाप गुजर गया — न कोई आयोजन, न कोई सार्वजनिक संदेश। शहर की सड़कों पर हावी कारें और धुएँ का गुबार साफ बताते हैं कि आगरा में साइकिल की कोई जगह नहीं बची।

एक समय था जब आगरा को सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट के लिए एक आदर्श माना जाता था। लेकिन अब साइकिल चलाना यहाँ एक जोखिम भरा काम बन चुका है। न कोई साइकिल लेन है, न ही कोई संरक्षित स्पेस। पर्यावरणविद् देवाशीष भट्टाचार्य का कहना है, “शहर की योजना पूरी तरह कारों और भारी वाहनों के लिए बनाई गई है। साइकिल सवारों और पैदल यात्रियों को योजना में कहीं जगह नहीं मिली।”

शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर ट्रैफिक इतना हावी है कि पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। साइकिल चलाना अब एक साहसिक खेल जैसा लगने लगा है। इसके बावजूद हजारों छात्र, किसान और मजदूर आज भी साइकिल पर निर्भर हैं — क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लेकिन इनकी सुरक्षा और सुविधा को लेकर प्रशासन उदासीन है।

हर साल आगरा की सड़कों पर सैकड़ों लोग साइकिल या पैदल यात्रा करते समय दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। बावजूद इसके, शहरी योजना केवल चौड़ी और तेज रफ्तार वाली सड़कों के इर्द-गिर्द घूमती है — जो निजी कारों और टूरिस्ट बसों के लिए आदर्श हैं, आम नागरिकों के लिए नहीं।

यह विरोधाभास खासतौर पर वर्ल्ड बाइसिकल डे पर खटकता है। जबकि विशेषज्ञ बताते हैं कि साइकिलिंग से हृदय रोग, तनाव, ट्रैफिक और प्रदूषण — चारों से राहत मिलती है, आगरा में इन सबकी भरमार है। यहाँ साइकिल सवारों को सड़क के कोने में धकेल दिया जाता है या फिर खुले नालों और गड्ढों से भरे रास्तों पर चलने को मजबूर किया जाता है।

कुछ साल पहले आगरा के पास उम्मीद की एक किरण दिखी थी — जब यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 207 किलोमीटर लंबा ग्रीन साइकिल कॉरिडोर (इटावा से आगरा) बनवाया था। इस पर 133 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जिसका मकसद था पर्यावरण को बचाना और एक स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना।

लेकिन आज उस साइकिल ट्रैक का नामो-निशान मिट गया है। गाँवों में वह रास्ता गोबर सुखाने, वाहन खड़े करने और रोज़मर्रा के घरेलू कामों के लिए इस्तेमाल होता है। वहीं शहर में, फतेहाबाद रोड पर एयरपोर्ट से ताजमहल तक की सड़क चौड़ी करने के लिए उस ग्रीन ट्रैक को ही मिटा दिया गया। जिस हरित मार्ग पर सस्टेनेबिलिटी की उम्मीद थी, वह कारों की स्पीड और पर्यटन की सुविधा की बलि चढ़ गया।

साइकिल, जो कभी आम आदमी की जान थी, अब एक ‘लाइफस्टाइल एक्सेसरी’ बन चुकी है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “साइकिल अब रोज़मर्रा का साधन नहीं रही। सिर्फ कुछ मध्यम आयु वर्ग के लोग फिटनेस के लिए पार्कों में चलाते हैं।” छात्र अब मोटरसाइकिलों और स्कूटरों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि किसान लोडिंग वाहनों की ओर बढ़े हैं।

एक ऐसे शहर में जहाँ प्रदूषण के चलते सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा — ताजमहल को बचाने के लिए — वहाँ पर्यावरण-मित्र साइकिल को हाशिये पर डाल देना समझ से परे है।

आगरा की शहरी योजना निजी वाहनों को प्राथमिकता देती है। प्रमुख सड़कों पर साइकिल लेन नहीं हैं, फुटपाथों पर अतिक्रमण है या वे गड्ढों से भरे हैं। ज़ेब्रा क्रॉसिंग और ट्रैफिक सिग्नलों की हालत भी दयनीय है। ऐसे में साइकिल सवारों और पैदल यात्रियों को अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ती है।
इस लापरवाही का नतीजा है – हर साल साइकिल चालकों और पैदल यात्रियों से जुड़ी दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी। लेकिन प्रशासन इन्हें “अलग-अलग घटनाएँ” मानता है, कोई बड़ी समस्या नहीं। रोड सेफ्टी अभियानों में हेलमेट की बात होती है, लेकिन समग्र इंफ्रास्ट्रक्चर की बात कोई नहीं करता।

यह कोई धन की कमी की कहानी नहीं है। अगर एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और पार्किंग प्रोजेक्ट्स पर खर्च होने वाले बजट का थोड़ा-सा हिस्सा साइकिल लेन, सुरक्षित फुटपाथ और बेहतर सिग्नेज पर लगाया जाए, तो आगरा फिर से एक मॉडल सिटी बन सकता है।
लेकिन दुर्भाग्य से, शहर अभी भी “पर्यटन केंद्रित विकास” के जाल में फँसा है। यहाँ स्थानीय नागरिकों की जरूरतें पीछे छूट गई हैं। 133 करोड़ की एक महत्वाकांक्षी परियोजना के बर्बाद हो जाने पर कोई चर्चा तक नहीं होती — यही बताता है कि शहर के नियोजकों की प्राथमिकताएँ कितनी विकृत हैं।

हमें यह समझना होगा कि साइकिल कोई पुरानी चीज़ नहीं, बल्कि वर्तमान की जरूरत है — खासतौर पर शहरी गरीबों के लिए। यह जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे सरल समाधान है, एक स्वस्थ जीवन की दिशा है, और ट्रैफिक समस्या की सशक्त दवा भी।
आगरा को अगर साफ हवा, सुरक्षित सड़कें और खुशहाल नागरिक चाहिए, तो उसे साइकिल के लिए जगह बनानी ही होगी। जब तक साइकिल को मुख्यधारा में नहीं लाया जाता, तब तक यह शहर मशीनों का रहेगा — इंसानों का नहीं।

मोदी जी के ग्यारह वर्ष : समृद्ध और सशक्त भारत की ऊँची उड़ान

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प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बहुआयामी विकास की नई उड़ान भरी है। उनकी नीतियों और निर्णयों से आत्मनिर्भर भारत निर्माण को नई गति मिली है। समृद्धि, सशक्त के साथ वैश्विक सम्मान भी बढ़ा है। भारत ने विश्व की चौथी अर्थ व्यवस्था का स्थान अर्जित कर लिया है।
श्री नरेंद्र मोदी ने भारत के पन्द्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में 26 मई 2014 को पहली बार और 9 जून 2024 को अपनी तीसरी पारी केलिये प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुये उन्होंने ग्यारह वर्ष पूरे कर लिये हैं। वे देश पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनका जन्म स्वतंत्रता के बाद हुआ। मोदीजी अतिसामान्य परिवार की पृष्ठभूमि से आते हैं। राजनीति में उनका कोई “गाॅड फादर” भी नहीं था। एक सामान्य परिवार की पृष्ठभूमि से आने वाले किसी व्यक्ति केलिये ऐसी यात्रा दुर्लभ होती है। यह उनकी श्रम साधना, मिले हुये कार्य के प्रति समर्पण ही है कि अपने समय के भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता श्री लालकृष्ण आडवानी ने अपनी रथयात्रा केलिये सारथी के रूप में श्री नरेन्द्र मोदी को ही चुना। इसी यात्रा ने उनकी दिशा बदली और उन्हें एक ऐसी राह मिली जिससे वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और अब भारत के प्रधानमंत्री हैं। मोदीजी की इस सफलता के मूल में उनका पुरूषार्थ, परिश्रम, प्रतिभा और प्रज्ञा शक्ति है। बचपन से लेकर आजतक न तो उनकी संकल्पशीलता बदली और न जीवन शैली। आध्यात्म की ओर जैसा झुकाव बालवय में था। वैसा ही झुकाव आज भी है।

प्रधानमंत्री रहते हुये भी वे वर्ष में एक बार एकांत साधना करते हैं। उनके आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति की अति दृढ़ता का आधार उनकी यही साधना है। संसार में वही व्यक्ति अपना विशिष्ट स्थान बनाता है जो लीग से अलग हटकर काम करता है। मोदीजी इसकी झलक ग्यारह वर्ष पहले ही दे दी थी। उन्होंने संसद भवन की सीढ़ियों को नमन करके प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पारी की शुरुआत की थी। संसद की सीढ़ियों को नमन् करने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। इस नमन् ने उन्हें भारत के सभी प्रधानमंत्रियों से अलग पहचान दी। उनकी यह अलग पहचान उनके हर निर्णय में भी झलकती है। पहली बार शपथ ग्रहण के साथ उन्होंने जो संकल्प व्यक्त किया था, अपनी भावी यात्रा के जो संकेत दिये थे। वे आज भी उस पर कायम हैं। इन ग्यारह वर्षों के कार्यकाल में कितने ही उतार चढ़ाव आये, कितने तनाव आये। उनपर व्यकितगत राजनैतिक हमले भी सतत रहे पर वे कभी विचलित नहीं हुये। अपनी नीति और निर्णय पर सदैव अडिग रहे। उन्होने सिद्धांत से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने कुछ निर्णय तो ऐसे लिये हैं जिनकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। उनके अभूतपूर्व निर्णयों में एक कश्मीर से धारा 370 को हटाना है। जब धारा 370 को हटने की बात चली तब कश्मीर के कितने ही नेताओं ने खून की नदिया बहने की चेतावनी दी थी। लेकिन मोदीजी बिल्कुल बिचलित नहीं हुये और धारा 370 से कश्मीर मुक्त हो गया। यह धारा कश्मीर को भारत की अभिन्नता से दूर कर रही थी। इसके हटने से कश्मीर से भारत का एकत्व प्रमाणित हुआ। मोदी जी का दूसरा बड़ा निर्णय शरणार्थी नागरिकता कानून CAA है। इसके अंतर्गत भारत के सभी पड़ौसी देश बंगलादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, चीन नेपाल आदि से आये ऐसे शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है जिन्हें धार्मिक आधार पर उन देशों में प्रताड़ित किया गया है। इस कानून का लाभ उन सिंध प्रांत के उन शरणार्थियों को भी मिला जो बँटवारे के समय भारत आये थे। मोदी के नेतृत्व में काम कर रही इस सरकार का एक बड़ा निर्णय मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने का है। इस कानून के माध्यम से सरकार ने धार्मिक परंरपरा में हस्तक्षेप किये बिना इसके दुरुपयोग पर रोक लगाई है। कुछ लोग इस प्रावधान का दुरुपयोग कर रहे थे और वाट्सअप, फोन अथवा टेलीफोन पर ही तीन बार तलाक कहकर महिलाओं को छोड़ रहे थे। इसका पीड़ित मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया। इसी श्रृंखला में सरकार ने बक्फ संशोधन विधेयक लाकर इसके भी दुरुपयोग पर रोक लगाई। पुराने बक्फ कानून की आड़ में भूमि पर कब्जा करने की शिकायतें आ रही थीं। इस बक्फ संशोधन विधेयक से अब बक्फ संपत्ति का मुस्लिम समाज के कल्याण में उपयोग हो सकेगा।

मोदीजी का दृढ़ता का परिचय दोनों सर्जिकल स्ट्राइक और एक एयर स्ट्राइक में मिला। बालाकोट के बाद हुये सिन्दूर स्ट्राइक ने भारत का मान पूरी दुनियाँ में बढ़ाया। भारत ने पाकिस्तान के नौ आतंकवादी ठिकानों को नष्ट किया और सौ से अधिक आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा। पहलगांव में आतंकवादियों ने जिस प्रकार महिलाओं को सामने खड़ा करके उनका सिन्दूर उजाड़कर मनोबल तोड़ने का प्रयास किया। इसीलिये इस अभियान का नाम “सिन्दूर आपरेशन” रखा और महिला सैन्य अधिकारियों को ही आगे किया। मोदीजी ने भारत राष्ट्र की स्वतंत्रता और संस्कृति रक्षा केलिये बलिदान होने वाले महानायकों के स्मरण का अभियान चलाया। तथा उनके जीवन परिचय को पाठ्यक्रम में जोड़ने की योजना लागू की।

यह मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का परिणाम है कि भारत अब दुनियाँ की चौथी बड़ी अर्थ व्यवस्था वाला देश बन गया है। मोदीजी ने वर्ष 2027 तक दुनियाँ की तीसरी बड़ी अर्थ शक्ति बनाने का संकल्प व्यक्त किया है और वर्ष 2047 तक दुनियाँ की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बनाने का संकल्प किया है। उन्होंने डिजीटलाइजेशन को बढ़ावा देकर कदाचार पर नियंत्रण का कदम उठाया है तो नोटबंदी करके नकली मुद्रा के प्रचलन पर एक बड़ा प्रहार किया था।

उनके निर्णयों में “राजनीति” नहीं होती, “राष्ट्रनीति” होती है। यही राष्ट्रनीति उनके नारों में भी है। इसे हम उनके पहले कार्यकाल में दिये गये नारे “विकास के साथ विरासत” से भी समझ सकते हैं। मोदीजी ने कहा था कि भले हम आकाश की ऊँचाइयों तक विकास कर लें लेकिन हमें अपनी विरासत को भी साथ लेकर चलना है। 2014 में अपनी पहली पारी में विरासत को सहेजने केलिये ही उन्होंने भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के विकास और पुनर्प्रतिठा का कार्य हाथ में लिया। इसे पर्यटन मंत्रालय से जोड़ा। और “तीर्थयात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक विरासत संवर्धन अभियान” आरंभ किया। इसके अंतर्गत 46 परियोजनाओं को हाथ में लिया। इसमें केवल सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण स्थल ही नहीं हैं। इसमें मुस्लिम और सिख स्थल भी शामिल हैं। इस योजना से जहाँ जन समान्य में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति आत्मविश्वास बढ़ा वहीं पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी। इसे हम प्रयागराज महाकुंभ में उमड़े जन सैलाव, वैष्णों देवी दक्षिण में रामेश्वरम अथवा उड़ीसा की जगन्नाथ रथ यात्रा से समझ सकते हैं। उनकी नमामि गंगे योजना के अंतर्गत एक ओर पवित्र नदियों के साथ पूरे देश की नदियों की सफाई का अभियान छेड़ा। अपने स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत मोदीजी स्वयं हाथ में झाड़ू लेकर दिल्ली के प्रगति मैदान पहुँचे। उन्होंने आव्हान पर पूरा देश सफाई अभियान में जुट गया। और बदले भारत को आज देखा जा सकता है। सुरक्षा मोदी जी की नीतियाँ किसी वर्ग, किसी वर्ण, किसी क्षेत्र अथवा किसी पंथ विशेष केलिये नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र और भारत के एक एक जन केलिये है। इसकी झलक मोदी जी नारे “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” में मिलती है। उनका चिंतन बहुत व्यापक और समावेशी है। उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार मुक्त और विकासोन्मुख प्रशासन की नींव रखी है। उनकी नीतियाँ अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति को समृद्ध और समुन्नत बनाने की हैं। सब स्वस्थ रहें सब सुखी रहें। इसी केलिये उन्होंने आयुष्मान भारत अभियान चलाया। सत्तर वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति को निशुल्क उपचार योजना लागू की। यह संसार की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है। महिलाओं को धुँये से मुक्ति केलिये उज्ज्वला योजना, हर घर जल और हर घर नल योजना है। देश के लगभग अस्सी करोड़ लोगों को निशुल्क अन्न दिया जा रहा है। इन ग्यारह वर्षों में लगभग 34 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से बाहर आये हैं। गरीबों को वित्तीय धारा से जोड़ने केलिये “जनधन योजना” लागू की। इस योजना में अब तक 51 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं।

मोदीजी ने अपने पहले कार्यकाल के साथ आत्मनिर्भर भारत का जो नारा दिया था। वे इस पर आज भी काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक भारत का प्रत्येक निवासी आत्मनिर्भर नहीं होगा, प्रत्येक समाज आत्मनिर्भर कैसे होगा। तब तक देश आत्म निर्भर नहीं हो सकता। व्यक्ति समाज और देश को आत्मनिर्भर बनने केलिये प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति होना आवश्यक है। इसके लिये भोजन और आवास जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होना आवश्यक है। मोदीजी ने इसके लिए हर सिर को छत, हर घर को जल और हर घर को गैस कनेक्शन जैसी योजनाएँ आरंभ कीं। मोदीजी के जिस दिन अपना पहला कार्यभार ग्रहण कर रहे थे तब भारत के अठारह हजार गांव ऐसे थे जिनमें बिजली नहीं थी। अब इन सभी गाँवों में बिजली जगमगा रही है। मोदी का मानना है कि जब तक एक भी भारतीय बेघर है तब तक विकास अधूरा है। हर बेघर को घर देने की अपनी योजना के अंतर्गत 2014 से 2024 के बीच 4.2 करोड़ से अधिक घरों को मंजूरी दी गई। जबकि अपने तीसरे कार्यकाल की सत्ता संभालने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में ही तीन करोड़ अतिरिक्त ग्रामीण और शहरी परिवारों को घर प्रदान करने की अनुमति दी गई। इसके साथ हर घर शौचालय योजना लागू की। मोदी जी के मन में प्रत्येक नागरिक के लिए गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने का चिंतन है। ये दोनों योजनाएँ उनके चिंतन के अनुरूप परिणाम दे रहीं हैं।

एक समृद्ध और सशक्त राष्ट्र निर्माण केलिये मोदीजी ने gyan का सम्मान एक मंत्र दिया है। इसमें गाँव-गरीब, युवा, किसान और महिला हैं। उनकी ये अधिकांश नीतिया इस समूह की समोन्नति के लिये है। विशेषकर स्टार्टअप से युवाओं में स्वरोजगार के प्रति जाग्रति आई है।

विरासत सहेजने और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की आधारभूत समस्याओं के समाधान कारक कदम उठाने के साथ उन्होंने विकास को नये आयाम देने केलिये भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान को भी नई उड़ान दी। इसके लिये उन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र संगठन इसरो के वैज्ञानिकों से मीटिंग की। उनके अनुसार बजट और अन्य सुविधाएँ बढ़ाने के आदेश दिये। यह इसी का परिणाम है कि आज भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान की तकनीकि में संसार को पीछे छोड़ दिया है। उपग्रहों के प्रक्षेपण और चंद्रयात्रा में हमारी तकनीकी सबसे किफायती है। इसकी प्रशंसा नासा ने भी की। यह मोदीजी के प्रोत्साहन का ही परिणाम है कि भारत अपने मंगल ऑर्बिटर मिशन के अंतर्गत मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना। भारत का अभियान अपने पहले ही प्रयास में सफल हुआ। यह भी दुनियाँ में एक कीर्तिमान बना। भारत के क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन, गगनयान मिशन के साथ वाणिज्यिक प्रक्षेपण में भी कदम बढ़ा लिये हैं। मोदीजी ने वैज्ञानिकों को स्वदेशी तकनीक विकसित करने का आव्हान किया। यह इसी का कारण है कि हमारी लागत विशव के लगभग सभी देशों से कम है ।इसके चलते पूरी दुनियाँभारत की ओर आकर्षित हुई और इसरो ने 300 से अधिक विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित किये। इनमें ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल हैं। अपने मंगल ऑर्बिटर मिशन के अंतर्गत भारत मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना और पहले ही प्रयास ऐसी सफलता प्राप्त करने वाला दुनियाँ का पहला देश। उनके प्रोत्साहन से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो को एक नयी ऊर्जा मिली। जिससे इसरो ने 15 फरवरी 2017 को एक ही बार में 104 सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर नया विश्व इतिहास रचा। इससे पहले यह रिकॉर्ड रूस के नाम था। 2019 में भारत ने अपने स्वदेशी लॉन्चर GSLV MKIII का उपयोग करके अपना चंद्रयान-2 लॉन्च किया। क्रायोजेनिक तकनीक में अपनी क्षमता और पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ भारत आने वाले वर्षों में चंद्रमा पर मानवयुक्त मिशन के लिए काम कर रहा है। इसरो ने अब 2028 तक तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना बनाई है। यह नये भारत की विकास यात्रा है।
मोदीजी ने “लोकल फाॅर वोकल और ग्लोबल” का आव्हान भी किया। उनका उद्देश्य केवल अर्थ व्यवस्था में सुधार करना भर नहीं हैं। मोदी जी ने एक ऐसे भारत की कल्पना की है जो न केवल अपनी आवश्यकता का स्वयं उत्पादन करे अपितु निर्यातक भी बने। एक समय था जब भारत बंदूक ही नहीं बंदूक की गोलियाँ भी आयात करता था। भारत के सभी रक्षा उपकरण आयात करना होते थे। किन्तु अब निर्यातक देश बन गया है। जिस ब्रह्मोस मिसाइल ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया वह भारत का स्वदेशी उत्पाद है।

मोदीजी ने स्वयं को प्रधानमंत्री के रूप में नहीं अपितु प्रधान सेवक के रूप में प्रस्तुत किया। उनके कार्यकाल के ये ग्यारह वर्ष सशक्त और समृद्ध भारत के निर्माण की नींव है। मोदीजी के विकास के जिस मार्ग पर भारत चल पड़ा है इसकी मंजिल वही है जहाँ पूरी दुनियाँ में भारत की पहचान विश्व गुरु और सोने की चिड़िया के रूप में होगी।

बेतिया के एमजेके कॉलेज में चाय पर चर्चा

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सुनील तिवारी

बेतिया: सात जून की संध्या 6 बजे महारानी जानकी कुंवर महाविद्यालय में चाय पर चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया।इस परिचर्चा का बिंदु था चंपारण के विकास के क्या रास्ते हो सकते है तथा बिहार के विकास में इस जिले की क्या भूमिका हो सकती हैं।

इस परिचर्चा में चंपारण के प्रबुद्ध जनों ने अपने सुझाव दिए।इस अवसर पर इस कॉलेज के प्राचार्य प्रो (डॉ)आर के चौधरी सर,प्रो अविनाश कुमार,प्रो राजेश कुमार चंदेल ,डॉ विजय कुमार, प्रसिद्ध शिक्षाविद् गणेश उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक राजेश वर्मा,पर्यावरणविद् डॉ दुर्गादत पाठक, उच्च माध्यमिक विद्यालय कुंडलपुर के प्रधानाध्यापक अमित मिश्रा,गणेश उच्च माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक नवीन कुमार मनीष,उच्च माध्यमिक विद्यालय लौरिया में कार्यरत शिक्षक आनंद कुमार, हिंदुस्तान दैनिक के पत्रकार श्री शंभु प्रसाद , अधिवक्ता अनिल कुमार राव तथा नई दिल्ली से आए मीडिया कर्मी आशीष कुमार अंशु तथा अन्य सम्मानित गण उपस्थित थे।

पश्चिम चंपारण में मुख्यतौर पर लोग कृषि आधारित जीवन यापन करते हैं l फिर भी यहाँ कृषि के अलावे औद्योगीकरण और पर्यटन के क्षेत्र में विकास की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं।

यहां कृषि-आधारित उद्योगों के विकास के साथ-साथ पर्यटन के क्षेत्र मे भी कई अवसर मौजूद हैं l इस जिले में कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें चावल, गेहूं, गन्ना, और कई प्रकार के फल शामिल हैं, साथ ही इस जिले में कुछ चीनी मिलें, चावल मिलें और अन्य छोटे उद्योग जैसे खादी वस्त्र स्थापित हैं, जो स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक और कृषि उत्पादों पर आधारित हैं, जैसे कि गुड़, टोकरी, रस्सी, और चटाई बुनाई इत्यादि l इस जिले में कृषि-आधारित उद्योगों का विकास हो सकता है, जो स्थानीय उत्पादों को मूल्यवान बनाने और किसानों की आय को बढ़ाने में मदद करेगा l

अगर सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल की बात की जाय तो पश्चिम चंपारण में कई ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल हैं, जो पर्यटन के लिए आकर्षक हैं। उदाहरण के लिए, भितिहरवा आश्रम जो कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्याग्रह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान रहा था, जो आज भी लोगों को आकर्षित करती है, उसी तरह से बाल्मीकि नगर भी महर्षि बाल्मीकि की तपोभूमि रही थी जो कि एक दर्शनीय स्थल मे से एक है, लौरिया का बौद्ध स्तूप, नंदनगढ, बेतिया का एतिहासिक काली मंदिर, जोड़ा शिवालय मंदिर, दुर्गाबाग मंदिर, सागर पोखर मंदिर, बेतिया का राजदेवढी, बाल्मीकि नगर देवी मंदिर इत्यादि शामिल है l

प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से जिले में कुछ प्राकृतिक स्थल भी हैं, जैसे कि बेतिया में जंगल और विभिन्न प्रकार के वनस्पति और जीव-जंतु, जो प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आकर्षक गंतव्य हो सकते हैं l

पश्चिम चंपारण में पर्यटन के विकास के लिए एक योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, ताकि क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक सुंदरता का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके l

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