यूपी में योगी सरकार बा

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गौतम अनिल सिंह

उत्तर प्रदेश में क्या है पूछने वाले अचानक चुनाव के समय बढे हैं तो इसका जवाब देने वाले भी उत्तर प्रदेश में उस अनुपात में कई गुना अधिक है, जो बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में क्या है? बुंदेली कवित्री अनामिका अंबर जैन के गीत ‘यूपी में बाबा हैं’ की इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इस लेख में भी उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के कार्यकाल में क्या—क्या हुआ। इसका एक संक्षिप्त लेखा जोखा प्रस्तुत है

1)यूपी के कोरोना प्रबंध की वैश्विक संस्थाओं ने की सराहना

हर तरफ कोरोना प्रबंधन को लेकर सरकार की वाह—वाह हो रही है। जितने बेहतर तरीके से योगी सरकार ने इस महामारी में उत्तर प्रदेश के लोगों का संभाल किया, उसके बाद ही यूपी वाले बोल रहे हैं। यूपी में योगी बा।

2) निवेशकों की पहली पसंद बना यूपी”
बदलते वातावरण का परिणाम है कि आज निवेशकों की पहली पसंद उत्तर प्रदेश है. चार साल के भीतर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की राष्ट्रीय रैंकिंग में 12 पायदान ऊपर उठकर नम्बर दो पर आना कोई सरल कार्य नहीं था पर योगी सरकार ने ये कर के दिखाया है।

3) उत्तर प्रदेश गोपालक योजना
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश गोपालक योजना का शुभारंभ किया गया है इस योजना के माध्यम से गोपालक को ₹200000 तक का ऋण मुहैया करवाया जाएगा। यह ऋण दो किस्तों में मुहैया करवाया जाएगा। जिसके माध्यम से लाभार्थी 10 से 12 गाय का पशुपालन कर सकता है। लाभार्थी गाय या भैंस में से किसी को भी पाल सकता है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए पशु दुधारू होना अनिवार्य है। इसके अलावा इस योजना के माध्यम से लाभार्थी अपनी खुद का डेरी फॉर्म भी खोल सकता है। यह योजना बेरोजगारी दर में घटाने में भी कारगर साबित है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी

4) अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस

सरकार की अपराध और अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति का परिणाम रहा है कि प्रदेश में डकैती, लूट, हत्या, बलवा और बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है। इससे निवेशकों की बढ़ोतरी हुई है , महिलाओं की सुरक्षा जो सबसे ज्यादा जरूरी है, तो इस योगी सरकार ने इसपे लगाम लगाके ये तो जरूर सिद्ध कर दिया है कि यूपी में योगी सरकार बा

5) अपहरण का उद्योग पर लगाम
सीएम योगी सरकार कि पिछले 4 सालों से यूपी में अगर आपसी रंजिश को छोड़ दें तो संगठित अपराध न्यूनतम स्तर पर है.यूपी की कानून व्यवस्था देश के अंदर बेहतर व्यवस्था में से एक है. यूपी की बेटियों सहित निवेशकों के अंदर विश्वास पैदा किया है, ये तो अख़बारों की सुर्खियां भी है और अगर आप ground reality का भी निरीक्षण करेंगे या यूं कहें पता लगाएंगे तो आपको ये जरूर पता लगेगा कि अपराध पर नियंत्रण जरूर है, इसलिए फिर कहता हूं यूपी में योगी सरकार बा

6) पेंशन योजना
निराश्रित महिला पेंशन योजना को विधवा पेंशन योजना भी कहते हैं। इस योजना का उद्देश्य उन महिलाओ की आर्थिक मदद करना है जिस महिलाओ की पति की मृत्यु हो जाती है इस योजना के तहत विधवा महिला को सरकार द्वारा पेंशन के रूप में कुछ राशि प्रदान की जाती है जिससे वह किसी अन्य पर निर्भर न रहे और अपनी जरूरत का सामान खरीद सके। इस योजना के अंतर्गत विधवा महिला को प्रति माह 500 रूपये तक की राशि प्रदान करती है, फिर से यूपी में योगी सरकार बा

7) अगले कुछ वर्षों में प्रदेश में चार एक्सप्रेस वे

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे बलिया लिंक एक्सप्रेसवे बनकर तैयार हो जाएगी। गंगा एक्सप्रेसवे को 2024 तक तैयार कर लेने की योजना है। 341 किलोमीटर लंबा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे गाजीपुर और लखनऊ की दूरी को महज चार घंटे में पूरी कर देगा।

8) भारत में शीर्ष 10 सबसे लंबे राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे
भारतीय सड़क नेटवर्क में लगभग 1324 किमी एक्सप्रेसवे हैं और 25 निर्माणाधीन हैं। नेशनल एक्सप्रेसवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने सात नए एक्सप्रेसवे को मंजूरी दी है, उनमें से कुछ 124 किमी लंबे कानपुर महानगर बायपास, 111 किमी बेंगलूरु मैसूर इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर, बीजू एक्सप्रेसवे, चेन्नई ओआरआर और उत्तर प्रदेश में 1047 किलोमीटर के निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेसवे के सबसे लंबे हैं।
ये सब सिर्फ कागज़ो की योजना नही है अगर आप ये जाके भी पता करेंगे तो आपको लगेगा कि योजना धरती पर है हवा में नही है।
अब मंदिर जय श्री राम पे समर्पण, श्री *कृष्ण भगवान का अनुसरण और उसपे हिंदुत्व की तिलक , तो कह सकते हैं *यूपी में योगी सरकार बा*

फिर अगर नए एयरपोर्ट की बात करें, तो जगजाहिर है कि उत्तर प्रदेश अब इसमें भी विकास की रफ़्तार तेजी ले चुकी है।

अगर आम आदमी की बात करें या नोएडा की बात करें तो अब लोग नोएडा में बसना चाह रहे हैं, इसका सबसे बड़ा कारण नोएडा में निवेश और अपराधों पे लगाम है।

यूपी में योगी सरकार बा

ये मेरे दोस्त जो यूपी में हैं जो ना नेता है,ना पॉलिटिकल विश्लेषक हैं, उनका कहना है और उनके ही शब्दों को मैंने इसमें लिखा है। जात की राजनीति और हिंदुत्व ,देखते हैं जीत किसको हांसिल होती है।

(लेखक पेशे से अधिवक्ता हैं)

अगर हम सभी गांवों को स्वावलंबी बना देंगे तो देश स्वावलंबी हो जायेगा : भरतजी राम

बिहार स्कैन

कार्यक्रम में बिहार गौरव पुरस्कार 2021 से सम्मानित संस्था के अध्यक्ष प्रवीण भारद्वाज, जनरल सेक्रेटरी श्री दीपेंद्र ठाकुर, उपाध्यक्ष अमन राज, संस्था सलाहकार शानू बजाज, संस्था सदस्य धीरज की गरिमामयी उपस्थिति रही। साथ में गांव की मुखिया माधुरी देवी, समाजसेवी संजीत पासवान और उतरौंध ग्राम में संस्था के प्रतिनिधि विनोद कुमार और नरेश कुमार (थाना चाकंद) भी उपस्थित थे

कार्यक्रम में बिहार गौरव पुरस्कार 2021 से सम्मानित संस्था के अध्यक्ष प्रवीण भारद्वाज, जनरल सेक्रेटरी श्री दीपेंद्र ठाकुर, उपाध्यक्ष अमन राज, संस्था सलाहकार शानू बजाज, संस्था सदस्य धीरज की गरिमामयी उपस्थिति रही। साथ में गांव की मुखिया माधुरी देवी, समाजसेवी संजीत पासवान और उतरौंध ग्राम में संस्था के प्रतिनिधि विनोद कुमार और नरेश कुमार (थाना चाकंद) भी उपस्थित थे

73वें गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर श्री गणेश ठाकुर सोशियो एजुकेशनल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा ग्राम उतरौंध (चाकंद) को गोद लेने की घोषणा की। इस समारोह के मुख्य अतिथि भरतजी राम (सहायक निदेशक नियोजन, गया) द्वारा ध्वजारोहण किया गया। संस्था द्वारा स्वावलंबी ग्राम योजना के अंतर्गत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इस गांव का चयन किया गया है। गांव के सर्वांगीण विकास और युवाओं को बढ़ावा देने के लिए स्किल अप बिहार कार्यक्रम के अंतर्गत भी इस ग्राम को शामिल किया गया है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सहायक निदेशक ने कहा वास्तविक भारत गांव में ही निवास करता है। अगर हम सभी गांवों को स्वावलंबी बना देंगे तो देश स्वावलंबी हो जायेगा। उन्होंने यह भी कहा की हम ऐसी संस्थाओं का स्वागत करते हैं जो गांव के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं| प्रशासनिक अधिकारी के रूप में ऐसे कार्यक्रम को मार्गदर्शन देने में खुद को गौरान्वित महसूस करते हैं तथा कौशल विकास पर उन्होंने  कहा की एक आत्मविश्वासी युवा ही आत्मनिर्भर हो सकता है और बगैर आत्मनिर्भर युवा कोई भी देश एक विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता है।

कार्यक्रम में बिहार गौरव पुरस्कार 2021 से सम्मानित संस्था के अध्यक्ष प्रवीण भारद्वाज, जनरल सेक्रेटरी श्री दीपेंद्र ठाकुर, उपाध्यक्ष अमन राज, संस्था सलाहकार शानू बजाज, संस्था सदस्य धीरज की गरिमामयी उपस्थिति रही। साथ में गांव की मुखिया माधुरी देवी, समाजसेवी संजीत पासवान और उतरौंध ग्राम में संस्था के प्रतिनिधि विनोद कुमार और नरेश कुमार (थाना चाकंद) भी उपस्थित थे।

बिहार आईएएस के निदेशक विवेक चंद्र कुमार ने इस पावन अवसर पर ग्राम के युवा छात्र अंकित कुमार की सिविल सर्विसेज की तैयारी अपने संस्थान में निःशुल्क कराने की घोषणा की। कार्यक्रम के दौरान गांव के लोगों के बीच कंबल, पठन—पाठन सामग्री और मास्क का वितरण किया गया। इस दौरान मांझी टोला में सौर्य ऊर्जा संचालित लाइट एवं गांव के देवी स्थान मंदिर का पुनरुद्धार के साथ स्वावलंबी ग्राम के कार्यक्रमों को शुरू करने की घोषणा की गई|

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फसाद बिहार में और फायदा उत्तर प्रदेश 2022 चुनाव में

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बिहार स्कैन

देखिए ना संयोग या कहें प्रयोग? जब बिहार में चुनाव था, उप्र में हिंसा हुई। अब उप्र में चुनाव है तो बिहार से हिंसा की खबर आ गई। कांग्रेसी इको सिस्टम का एक खबरिया चैनल प्राइम टाइम में छात्रों को लगातार उकसाने का काम लंबे समय से कर ही रहा है। इस चैनल ने सीएए प्रदर्शन के दौरान कथित आंदोलनकर्मियों को हांगकांग में चल रहे प्रदर्शन पर कवरेज करके समझाया कि पुलिस की कार्रवाई पर जवाबी कार्रवाई के तरीके क्या हो सकते हैं? आज भी बात ‘इको सिस्टम’ की हो तो ‘वाम—कांग्रेसी इको सिस्टम’ का कोई जवाब नहीं

अभिधा-लक्षणा—व्यंजना जैसे शब्दों से जिनका पाला पहले नहीं पड़ा है, उन्हें हिन्दी साहित्य के किसी विद्यार्थी से मदद लेनी चाहिए। वामपंथी एक्टिविस्ट के पूरे एक्टिविज्म में आपको व्यंजना नजर आएगी। मतलब चुनाव बिहार में होगा तो मुद्दा नोएडा का अखलाक बनाया जाएगा। कथित तौर पर जिसके घर से गाय का मांस बरामद हुआ।
बात 2015 की है, बिहार में चुनाव का साल था। इस मामले में स्थानीय लोगों के विरोध और हाथापाई में दादरी के अखलाक की जान चली गई थी। इस पूरे मुद्दे को इस तरह ‘वामपंथोन्मुख कांग्रेसी इको सिस्टम मीडिया’ ने चलाया जैसे भारतीय जनता पार्टी ने बिहार का चुनाव हारने के लिए उत्तर प्रदेश में अखलाक पर पहले हमला करवाया हो। जिसमें उसकी जान चली गई और इस बात का नुकसान खुद बिहार चुनाव में पार्टी ने उठा लिया। इस तरह की चूक तो कल राजनीति में आई ‘आम आदमी पार्टी’ भी नहीं करेगी।

देखिए ना संयोग या कहें प्रयोग? जब बिहार में चुनाव था, उप्र में हिंसा हुई। अब उप्र में चुनाव है तो बिहार से हिंसा की खबर आ गई। कांग्रेसी इको सिस्टम का एक खबरिया चैनल प्राइम टाइम में छात्रों को लगातार उकसाने का काम लंबे समय से कर ही रहा है। इस चैनल ने सीएए प्रदर्शन के दौरान कथित आंदोलनकर्मियों को हांगकांग में चल रहे प्रदर्शन पर कवरेज करके समझाया कि पुलिस की कार्रवाई पर जवाबी कार्रवाई के तरीके क्या हो सकते हैं? आज भी बात ‘इको सिस्टम’ की हो तो ‘वाम—कांग्रेसी इको सिस्टम’ का कोई जवाब नहीं।

इस वक्त बिहार में जदयू—भाजपा की सरकार है लेकिन बिहार वाले खूब जानते हैं कि सरकार जदयू ही चला रही है। जिले से लेकर प्रखंड, पंचायत स्तर तक जदयू के नेताओं में जबर्दस्त ‘उछाल’ है। किसी भी प्रखंड, अंचल, अनुमंडल में आपको दो—चार जदयू नेता मिल ही जाएंगे। आप बिहार के किसी भी जिले के भाजपा जिलाध्यक्ष से बात करके इसकी पुष्टी कर सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी है कि बातचीत आफ द रिकॉर्ड हो।

छात्रों के आक्रोश भेंट चढ़ी ट्रेन

बिहार के विश्वविद्यालयों में जब आइसा के कार्यकर्ताओं की थोक में नियुक्तियां हुई। उसी वक्त मुझे संदेह था कि यह सब बिहार में भाजपा विरोधी इको सिस्टम तैयार करने के लिए किया जा रहा है। उन नियुक्तियों में जेएनयू, आइसा की वह पूर्व छात्रा भी शामिल है, जिसने देवी मां सरस्वती पर एक अश्लील तुकबंदी की थी। जिसे सदी की महान कविता बनाकर सोशल मीडिया पर वाम इकोसिस्टम ने खू्ब प्रचारित किया और उनकी तुकबंदियों पर पुरस्कार भी दिलवाया।

किसी को भी नौकरी मिलना स्वागत योग्य कदम है। सरकारों को बिल्कुल विचारधारा की जगह योग्यता देखकर नियुक्ति देनी चाहिए लेकिन जिस तरह एक खास विचारधारा के लोगों की नियुक्ति बिहार के कॉलेजों में हुई। इसलिए इस तरफ ध्यान गया। अब लाल सलाम के गढ़ रहे गया में छात्रों द्वारा हिंसा हुई तो ऐसा लगा कि संदेह की पुष्टी हो रही है। एक बार जांच कर रही टीम को पूरे मामले को इस तरह भी देखना चाहिए। एनएसयूआई का नाम जरूर सामने आ रहा है इस मामले में लेकिन उनका मार्गदर्शन कौन कर रहा था? वे छात्र हिंसा में कटपुतली थे तो उनकी डोर किन लोगों ने पकड़ रखी थी। यह सामने आना बेहद जरूरी है।

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कब तक इस्तेमाल होती रहेगी इस बेगुनाह की तस्वीर

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आशीष कुमार ‘अंशु’

केरल के तिरुची में सीपीएम के मंच से एक किताब के लोकार्पण के दौरान अशोक कुमार भगवान भाई परमार का परिचय दंगाई के रूप में दिया गया था। उनकी ‘दंगाई’ के तौर पर फ्रेम किए जाने लायक तस्वीर पत्र-पत्रिकाओं में भी छपती रही है। शायद इसे एक समुदाय का जिसका मीडिया पर आधिपत्य है पूर्वाग्रह समझा जा सकता है लेकिन इस जाल में अब अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ भी आ गया। कॉमरेड शंकर राय ने लेखक रामचन्द्र गुहा को ध्यान कराया कि आपके लेख के साथ गलत तस्वीर इस्तेमाल हुई है। इस पर रामचन्द्र गुहा का जवाब था-”धन्यवाद। तस्वीर का चयन मेरे द्वारा नहीं बल्कि टेलीग्राफ द्वारा किया गया है। आपके मेल की सूचना उन तक पहुंचा दूंगा।”

वास्तव में अशोक का कसूर सिर्फ इतना था कि वह एक बड़े फोटो पत्रकार सब्सटीन डिसूजा को पोज देने को तैयार हो गया था और उसे इसका खामियाजा बार-बार लगातार भुगतना पड़ा। अभी हाल में कुतबुद्दीन पर आई किताब के लोकार्पण के बाद अखबारों में छपी प्रेस रिलीज से तैयार खबरों में भी। इन ख़बरों में उन्हें अशोक मोची बताया गया। किस मानसिकता के चलते तमाम अखबार और पत्रिकाएं अशोक भाई को अशोक मोची लिखती रहीं यह बताने की जरूरत नहीं है।

केरल के त्रिची में हुए किताब लोकार्पण की खबर कुछ इस तरह से लिखी गई मानो यहां से अशोक और कुतुबुद्दीन की मित्रता की कहानी लिखी जा रही हो। जबकि दोनों एक दूसरे से परिचित थे और एक दूसरे से दुश्मनी की दोनों के पास ही कोई वजह नहीं थी।

गोधरा कांड के बाद मीडिया में हाथ जोड़े और आंखों में आंसू लिए जिंदगी की भीख मांगते हुए व्यक्ति की जो तस्वीर जारी की गई थी वह कुतुबद्दीन की थी। यह भ्रम फैलाने की कोशिश भी की गई कि अशोक ने गुजरात 2002 में कोई बड़ा अपराध किया था जिसके लिए उन्हें पछतावा है। सबसे पहले अखबारवालों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या अशोक ने यह स्वीकार किया है कि वह गुजरात 2002 का अपराधी है और वह आगजनी और हत्या में शामिल था। यदि वह इन बातों को स्वीकार नहीं कर रहा है तो फि र वह माँफी किसलिए मांग रहा है। क्या वह गुजरात के साम्प्रदायिक हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करता है, क्या वह गुजरात सरकार में किसी महत्वपूर्ण पद पर है।

जहां तक बात पहली बार मिलने की है तो उनकी पहली मुलाकात तिरुची में नहीं हुई थी। पहली बार दोनों की मुलाकात राकेश शर्मा की फिल्म ‘फाइनल  सॉल्यूशन’ के सेट पर हुई थी। उसके बाद एक-दो बार कुतुबुद्दीन अशोक की दुकान पर आए भी हैं। लेकिन किताब के लोकार्पण पर कुछ इस तरह से उन्हें पेश किया गया मानो वे पहली बार मिल रहे हों। अखबारों ने धड़ल्ले से अशोक को बजरंग दल का सदस्य बताया। जबकि सच्चाई यह है कि अशोक बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का अनुयायी है और उनके स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों पर उसका गहरा यकीन है। पिछले दिनों जब मैं अहमदाबाद गया तो मेरी मुलाकात अशोक से हुई। अशोक पिछले 20 सालों से शाहपुर रोड पर जूते सिलने और पॉलिश करने का काम कर रहे हैं। वे चाल में रहते हैं, मोबाइल नहीं रखते। भाई से रिश्ता बिगड़ा तो पुश्तैनी मकान छोड़कर सड़क पर आ गए। चाहते तो भाई से जायदाद के लिए लड़ सकते थे लेकिन उन्हें यह ठीक नहीं लगा।

दंगों के साल 2002 में अशोक सड़क पर अपनी दुकान से कुछ दूर एक चादर बिछाकर सोते थे और होटल में खाना खाते थे। जीवन में एक बार प्रेम हुआ था। प्रेम सफल नहीं रहा तो उसके बाद शादी का विचार त्याग दिया। शादी नहीं करने की एक वजह आर्थिक स्थिति भी है। यदि किसी लड़की को घर में लाएंगे तो उसके सपने भी साथ-साथ घर में दाखिल होंगे। यदि सपने पूरे करने की हैसियत नहीं हो तो शादी करके किसी की जिंदगी क्यों नरक बनाना। शाहपुर रोड के आसपास स्थित मुस्लिम मोहल्लों के लोग अशोक को जानते थे। वे आज भी अशोक के ग्राहक हैं। लेकिन मीडिया के लिए अशोक मानो बजरंग दल के एक बड़े नेता थे। तस्वीर की वजह से वे लोग भी अशोक से नफरत करने लगे, जो उन्हें जानते तक नहीं थे। दंगों के दो-तीन महीने बाद ही उन पर अज्ञात हमलावरों ने जानलेवा हमला किया। उन पर गोली चली। अशोक ने हमलावरों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं किया। बकौल अशोक, हमलावर मुझे गुजरात दंगों में मुसलमानों का कातिल समझ रहे हैं। मैं जानता हूं कि जब उन्हें सच्चाई पता चलेगी तब उन्हें अपने किए पर पछतावा होगा।

परमार कहते हैं, ‘मुझे न तो बजरंग दल से मतलब है और ना भाजपा से और ना ही कभी था। मेरा एक भी दोस्त या रिश्तेदार बजरंग दल या भाजपा में नहीं है। दंगों के दौरान जब मुझे लगा कि मेरे मुसलमान पड़ोसी खतरे में हैं तो मैंने उनकी मदद की। मैंने पांच परिवारों को उनके रिश्तेदारों के घर पहुंचाने में मदद की जहां वे ज्यादा सुरक्षित थे।’

अशोक से मैंने जानना चाहा कि उनकी आक्रामक तस्वीर आई कैसे। गोधरा कांड के अगले दिन गुजरात में आक्रोश चरम पर था। अहमदाबाद में भी उसका असर दिख रहा था। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि तोड़-फोड़ इतने भयानक साम्प्रदायिक दंगों में बदल जाएगी। जिस दिन अशोक की तस्वीर ली गई थी उसके एक दिन पहले गोधरा कांड हुआ था। अगले दिन विश्व हिन्दू परिषद् ने बंद का आह्वान किया था। अशोक ने अखबार में पढ़ा था सो उसने अपनी दुकान बंद कर दी थी। वे अपने पड़ोस में नजीर भाई के गैराज में बैठे थे। दस-साढ़े दस बजे हो-हल्ला शुरू हो गया। दुकानें तोड़ी जाने लगीं। अशोक चूंकि नजीर भाई की दुकान में बैठे थे सो वे घेर लिए गए।

उन्होंने बड़ी मिन्नतें की और मुश्किल से समझा पाए कि वे एक हिन्दू हैं। अशोक को पूरे दिन सड़क पर रहना था। अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी की वजह से वे मुसलमान लग रहे थे। उस वक्त गर्दन बचाने के लिए उन्हें सिर पर भगवा कपड़ा बांधना बेहतर विकल्प लगा। ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक अहमदाबाद की सड़कों पर भीड़ उग्र हो गई। तब उन्होंने चाल की तरफ भागना बेहतर समझा।

भीड़ से निकलते हुए एएफपी के प्रसिद्ध फोटो पत्रकार सब्सटीन डिसूजा की नजर अशोक पर गई। सब्सटीन बाद में ‘मुंबई मिरर’ में काम करने लगे और उन्होंने अजमल कसाब की चर्चित फोटो भी ली थी। डिसूजा ने अशोक से पूछा-‘गोधरा में जो हुआ उस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है।’ अशोक ने उन्हें जवाब दिया-‘गोधरा में जो हुआ वह गलत है लेकिन अब जो पब्लिक कर रही है वह भी सही नहीं है।’ अशोक ने यह भी कहा कि गोधरा में जो मुसलमानों ने किया वह इस्लाम की सीख नहीं है और अहमदाबाद में जो हिन्दू कर रहे हैं वह हिन्दू धर्म नहीं सिखलाता।

डिसूजा शायद गोधरा के प्रति हिन्दुओं के गुस्से को प्रदर्शित करना चाहते थे। परमार बताते हैं, ‘वे दूर से मेरी तस्वीर लेना चाहते थे। मैंने उनसे कहा की वे नजदीक से मेरी फोटो लें। मैं अपना गुस्सा अपने चेहरे पर प्रदर्शित करूंगा।’ और इस तरह उनकी वह फोटो ले ली गई, जिसमें वे माथे पर भगवा कपड़ा बांधे हुए हैं और उनके हाथों में एक डंडा है जिसे उन्होंने सड़क से उठाया था। भगवा साफा आत्मरक्षा के लिए था। परंतु दुनिया के लिए वे बदला लेने को आतुर खून के प्यासे व्यक्ति के प्रतीक बन गए।

अशोक कहते हैं, ‘मैं इंसान हूं। किसी की जान जाते हुए देखकर मेरा दिल भी रोता है। आज मुझे पूरी दुनिया में एक खलनायक बना दिया गया है। मेरे सिर वह गुनाह लिख दिया गया जो मैंने किया ही नहीं।’ वे कहते हैं, ‘मुझ पर यकीन करने की जरूरत नहीं है। आप आसपास के मुस्लिम मोहल्ले में जाकर बात कीजिए। आपको इस बात की जानकारी हो जाएगी।’ अशोक ने कहा कि यदि उन्हें पता होता कि दंगे इतने फैल जाएंगे तो वे अपनी तस्वीर नहीं देते। 22 फरवरी की सुबह तक हालात इतने नहीं बिगड़े थे और ना तस्वीर देते समय उन्हें अंदाजा था कि इतना खून-खराबा होगा।

बहरहाल, अशोक तो पिछले 20 सालों से उस गुनाह की सजा भुगत रहे हैं, जिसके लिए उन्हें किसी न्यायालय ने दोषी नहीं ठहराया। अब समय आ गया है कि गुजरात 2002 के दंगों के हिन्दुत्ववादी चेहरे का सच दुनिया जाने। टेलीग्राफ भी अपनी इस गलती के लिए क्षमा मांगे।

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