जमात के गढ मेवात में हिंसा और उपद्रव

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Sanjay Tiwari

देश की राजधानी दिल्ली से हरियाणा का नूह 100 किलोमीटर भी नहीं है। गुरुग्राम पार करते ही नूंह जिला शुरु हो जाता है। लेकिन देश की राजधानी से इतना करीब होने के बाद भी वहां सोमवार को 2500 हिन्दुओं को अपनी जान बचाने के लिए एक मंदिर में शरण लेनी पड़ी। इतना ही नहीं, उनकी जान बचाने के लिए उन्हें वहां से एयरलिफ्ट तक करना पड़ा। यह सब तब हो रहा है जब देश दुनिया में यह शोर है कि केन्द्र में एक ऐसी कट्टरपंथी आरएसएसवादी सरकार है जिसका एक ही काम है कि ‘वह मुस्लिम समुदाय का दमन करे।’

संयोग से न केवल केन्द्र में ‘कट्टरपंथी’ मोदी की सरकार है बल्कि राज्य में भी भाजपा की ही सरकार है और मनोहरलाल खट्टर मुख्यमंत्री है। वह अनिल विज उस राज्य के गृहमंत्री हैं जिन्हें समय समय पर एक ‘कट्टरपंथी हिन्दू’ बताकर प्रचारित किया जाता है। इतने सारे ‘कट्टरपंथियों’ के सरकार में होने के बावजूद अगर उनकी नाक के नीचे ‘सुनियोजित’ तरीके से हिन्दुओं के खिलाफ दंगा भड़काया जाता है और वो दंगाइयों से अपनी जान बचाने के लिए किसी मंदिर में शरण लें तो फिर पीड़ित किस अल्पसंख्यक को कहा जाए और उपद्रवी किस बहुसंख्यक को ठहराया जाए?

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का बहुप्रचारित सिद्धांत असल मामले में कहीं लागू होता है तो वह मेवात रीजन का नूह जिला ही है। इस जिले की कुल जनसंख्या 11 लाख है जिसमें लगभग 80 प्रतिशत ‘मुस्लिम अल्पसंख्यक’ हैं। कश्मीर के बाहर नूह एकमात्र ऐसा जिला है जहां 80 प्रतिशत के आसपास मुस्लिम बसते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक इस जिले के पुन्हाना तहसील में सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या 87.38 प्रतिशत है। सेन्टर फॉर पॉलिसी स्टडीज द्वारा मेवात रीजन पर किये गये एक अध्ययन से पता चलता है कि 1981 से 2011 के बीच ही नूह जिले की जनसंख्या में बड़ा बदलाव आया है। 1981 में नूह जिले (तब मेवात) में मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिशत 66.33 था जो तीन दशक में ही 2011 में बढकर 79.20 हो गया।

जनसंख्या का ऐसा असंतुलन जब कहीं पैदा होता है तो वहां क्या होता है इसे जानने के लिए नूह को जानना जरूरी है। ऊपरी तौर पर ऐसे दंगे अनियोजित और परिस्थितिजन्य कारणों से उत्पन्न हुआ बताये जाते हैं लेकिन ऐसा नहीं है। वो पूरी तरह से सुनियोजित होते हैं। ऐसे दंगों के पीछे आमतौर पर जो बात ऊपरी तौर पर दिखती है वह गैर मुस्लिमों में भय पैदा करना होता है ताकि वो अपने जान माल की रखवाली करते हुए वहां से चले जाएं। हम बार बार लौटकर कश्मीर की ओर देखते हैं लेकिन ये प्रयोग तो यूपी, बिहार के कई इलाकों में बार बार दोहराया जा चुका है। नूह और सोहना में भी यही हुआ है। वहां से सैकड़ों परिवारों के पलायन की खबर सामने आने लगी है जो सुरक्षित ठिकानों की तलाश में अपना घर बार छोड़कर निकल गये हैं।

मुस्लिम समुदाय द्वारा ऐसा सुनियोजित दंगा न पहली बार किया गया है और न यह आखिरी है। जब तक समुदाय के मजहबी मौलवी मौलाना उसके दिमाग में दिन रात ‘काफिर, मुशरिक’ का भेद भरते रहेंगे और दूसरे समुदायों के प्रति उकसाते रहेंगे, ऐसे दंगे कभी रुकनेवाले नहीं हैं। फिर मेवात तो ऐसे भेद पैदा करनेवालों का गढ है। मेवाती या मेव मुसलमानों के बारे में कभी से कहा जाता था कि वो उतने ही मुस्लिम हैं जितने जाट हिन्दू। अर्थात कहने के लिए तो इन्होंने दबाव में इस्लाम स्वीकार कर लिया लेकिन अपनी हिन्दू जड़ों से जुड़े रहे।

इसीलिए 1920 के दशक में जब स्वामी श्रद्धानंद ने शुद्धि आंदोलन चलाया तो इसी मेवात रीजन के कम से कम डेढ लाख मलकाने राजपूत पुन: हिन्दू धर्म में लौट आये। उस समय स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन बड़ा मुद्दा बना था। कांग्रेस ने स्वामी श्रद्धानंद की अगुवाई में एक बैठक भी करवाई थी। इस बैठक में स्वामी श्रद्धानंद ने प्रस्ताव किया कि अगर मुस्लिम धर्म प्रचारक धर्मांतरण का काम रोक दें तो वो भी शुद्धि अभियान को रोक देंगे। मुस्लिम मौलवी इसके लिए तैयार नहीं हुए। इसके उलट दिल्ली के निजामुद्दीन से सच्चे इस्लाम की शिक्षा देकर मेवाती नौजवानों को इस काम में लगाया गया कि वो धर्मांतरित हिन्दुओं को सच्चा मुसलमान बनाये।

1926 में सहारनपुर के कांधला कस्बे में पैदा होनेवाले इलियास कंधालवी ने सच्चा मुसलमान बनाने की मुहिम शुरु किया जिसके जरिए धर्मांतरित हिन्दुओं को सही इस्लाम की शिक्षा देनी थी। इस मसले पर मिल्ली गजट लिखता है “अब यह जरूरी हो गया था कि हर मुसलमान ईमान का पक्का हो। उसे इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों की समझ हो।” इस्लाम की इसी बुनियादी समझ को विकसित करनेवाले अभियान को तब्लीगी जमात कहा गया जो आज लगभग पूरे देश में काम कर रहा है। देओबंदी फिरके से जुड़ी तब्लीगी जमात द्वारा दी जानेवाली सच्चे इस्लाम की शिक्षाएं समाज में शांति और सद्भाव के लिए कितनी घातक हैं वह इससे समझा जा सकता है कि खुद सऊदी अरब ने तब्लीगी जमात पर बैन लगा रखा है। दिसंबर 2021 में बैन लगाते हुए सऊदी अरब ने तब्लीगी जमात को ‘आतंक का दरवाजा’ और ‘समाज के लिए खतरा’ बताया था।

लेकिन ऊंचे पाजामे और लंबे कुर्ते की यह ‘लोटा मुहिम’ नूह में ही नहीं आज देश के छोटे छोटे गांव कस्बों में भी सच्चा मुसलमान बनाने की गारंटी बन गया है। बीते लगभग सौ सालों से यह मुहिम मेवात से निकलकर पूरे देश में फैल गयी है जिसका सिर्फ एक काम है कि वह मुस्लिम समुदाय को हिन्दू मूर्तिपूजकों से अलग करे। हिन्दू या कोई भी मूर्तिपूजक इस्लाम के लिए नापाक हैं, उनसे दोस्ती करना या संबंध रखना इस्लाम की तौहीन करने तथा जहन्नुम की आग में जलने जैसा है। गैर मुस्लिमों का कन्वर्जन इस जमात का घोषित उद्देश्य है जिसे ये लोग ‘दावा’ कहते हैं।

इसलिए लोगों को यह समझना होगा कि नूंह का दंगा ये कोई तात्कालिक समस्या नहीं है। इस समस्या को पैदा करने और उसे बढाते जाने का काम एक सौ साल से अनवरत चल रहा है। जब तक उस सोच पर रोक नहीं लगायी जाएगी, समाज में स्थाई शांति कभी नहीं आ पायेगी। लेकिन जैसा कि बीते कई दशकों से हो रहा है, हम भारत की सांप्रदायिक समस्या की बुनियाद तक पहुंचने की बजाय उसका राजनीतिकरण करते हैं। लोग समस्या की जड़ तक न पहुंच सके इसके लिए देश में इन कट्टरपंथियों का एक बड़ा समर्थक नेता, बुद्धिजीवी और मीडिया वर्ग भी है। ऐसे दंगों और उपद्रव के बाद यह वर्ग सक्रिय हो जाता है और समस्या के मूल से ध्यान भटकाकर कहीं और ले जाता है तथा उपद्रवी को ही विक्टिम साबित करने में जुट जाता है।

जैसे दिल्ली दंगे के समय सारा मलवा कपिल मिश्रा के सिर पर डालने की कोशिश की गयी। वैसा ही कुछ काम नूह में भी किया जा रहा है। मीडिया और बौद्धिक समूह का एक वर्ग यह बताने में जुट गया है कि कैसे बजरंग दल के मोनू मानेसर की वजह से दंगा भड़क गया। या फिर यह कि मेव मुस्लिम तो आधे हिन्दू होते हैं। वो भला हिन्दुओं के खिलाफ दंगा क्यों करेंगे? लेकिन ऐसा कहते समय बड़ी चालाकी से तब्लीगी जमात की कट्टरपंथी सोच और उसके प्रभाव को छिपा ले जाते हैं। इसमें जमात की ही साथी जमीयत ए उलमा ए हिन्द से लेकर कट्टरपंथी बुद्धिजीवी और तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नेता सब शामिल हैं।

स्वाभाविक है जो लोग ऐसे नैरेटिव गढते हैं वो दंगाइयों के बी टीम की तरह होते हैं जिनका काम एक ऐसा छद्म विक्टिम कार्ड खेलना होता है जिसमें पीड़ित को दंगाई और दंगाई को पीड़ित साबित किया जा सके। जैसे दंगाइयों की बी टीम जमीयत ए उलमा ए हिन्द तत्काल नूह में सक्रिय हो गयी है और दंगे का सारा दोष उन पर डाल रही है जो पीड़ित हैं।

शासन प्रशासन का रवैया अब दंगा को रोकने की बजाय दंगा हो जाने के बाद पीस कमेटी बनाने और तत्काल शांति कायम करनेवाला ही रहा है ताकि प्रतिक्रिया में हालात और अधिक न बिगड़ें। इससे आगे जाकर दंगाई मानसिकता पर प्रहार करने, उनका निशस्त्रीकरण करने का प्रयास स्वतंत्र भारत में कभी किया ही नहीं गया।

हाल फिलहाल में उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य बनकर उभरा है जिसने दंगाइयों को रोकने की बजाय उनकी दंगाई मानसिकता को कुछ हद तक सीमित करने का काम किया है। यूपी में दंगाई मानसिकता वाले लोगों के मन यह भय बैठा है कि अगर वो ऐसा करते हैं तो शासन प्रशासन उन्हें बर्बाद कर देगा। अगर हरियाणा सरकार नूह में दंगा शुरु करनेवाले दंगाइयों के खिलाफ ऐसी ही कठोर इच्छाशक्ति दिखाती है तभी दंगाइयों और उनके समर्थक वर्ग का मनोबल टूटेगा। यही समाज में स्थाई शांति की गारंटी भी होगी।

खेत की मिट्टी सफाई व फसल को बाहर निकालने वाली कृषि मशीन, जानें कीमत और विशेषताएं

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अगर आप खेत की मिट्टी के अंदर की गंदगी व फसलों दोनों को एक साथ निकालना चाहते हैं, तो आपके लिए यह कृषि उपकरण अच्छा साबित हो सकता है।

आप सब लोगों ने बहुत सी कृषि मशीनें देखी होगी। लेकिन आज हम आपके लिए एक ऐसा उपकरण लेकर आए हैं, जो खेत की फसल तो निकालती ही हैं और साथ ही यह खेत की मिट्टी की भी अच्छे से सफाई करती है। दरअसल, जिस मशीन की हम बात कर रहे है। उसका नाम वैसे तो DIGGER MACHINE बताया जा रहा है, लेकिन किसान इसे फसल निकालने वाली मशीन के नाम से अधिक जानते हैं।

मूंगफली छनाई की मशीन को चलाना किसान के लिए बेहद ही सरल है । क्योंकि इसे चलाने के लिए आपको अधिक मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए आपको बस इसे ट्रैक्टर के पीछे लगाना है और फिर इसे अपने खेत में चला देना है। जब आप इससे खेत में काम करेंगे, तो यह बहुत ही ज्यादा आवाज करती है और साथ ही बहुत ही अधिक मात्रा में मिट्टी को हवा में उड़ाती है।

भारतीय बाजार में इस मशीन की कीमत लगभग 1 लाख रुपए से भी अधिक हैं। अलग-अलग राज्यों में इसकी कीमत में आपको थोड़ा बहुत परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

भारत कृषि रसायनों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश

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डब्ल्यूटीओ द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत 2022 में 5.5 अरब डॉलर के निर्यात के साथ दुनिया में कृषि रसायनों के दूसरे सबसे बड़े निर्यातक के रूप में उभरा है, जो 5.4 अरब डॉलर के निर्यात के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका से आगे निकल गया है। चीन 11.1 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात के साथ कृषि रसायनों के निर्यात में सबसे आगे है।

 

पद देश मूल्य ($ Bn)
1 चीन $11.1 अरब
2 भारत $5.5 अरब
3 अमेरीका $5.4 अरब
4 फ्रांस $4.1 बीएन
5 जर्मनी $3.9 अरब

भारतीय कृषि रसायन उद्योग ने वित्त वर्ष 2022-23 में 28,908 करोड़ रुपये का मूल्यवान व्यापार अधिशेष प्राप्त किया। निर्यात बाजार में यह प्रदर्शन घरेलू और वैश्विक दोनों बाजारों में प्रतिस्पर्धी कीमतों पर पोस्ट-पेटेंट उत्पादों को जल्द से जल्द पेश करने की भारतीय उद्योग की तकनीकी क्षमता के कारण है।

यूएसए भारतीय कृषि रसायनों का सबसे बड़ा खरीदार है, उसके बाद ब्राजील और जापान हैं। भारत में बने कृषि रसायनों का उपयोग दुनिया भर के 140 से अधिक देशों में किया जाता है।

वैश्विक स्तर पर एग्रोकेमिकल्स बाजार $78 बिलियन का होने का अनुमान है और इसमें से लगभग 75% बाज़ार पोस्ट-पेटेंट उत्पादों का है। भारत पेटेंट के बाद कृषि रसायनों की सोर्सिंग के लिए एक पसंदीदा वैश्विक केंद्र के रूप में तेजी से उभर रहा है।

नाम में बहुत कुछ रखा है

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आशीष कुमार ‘अंशु’

फिल्म अभिनेता मनोज वाजपेयी ने एक बार अपने ब्लॉग में लिखा था कि नाम में क्या रखा है। उन्होंने लिखा कि मेरा नाम गधा होता तो लोग कहते कि गधे ने सत्या में अच्छा काम किया है। सैद्धांतिक तौर पर बात सही भी लगती है। पिछले कुछ दिनों से ‘इंडिया’ शब्द के साथ साथ ईस्ट इंडिया कंपनी, पोपुलर फ्रंट आफ इंडिया और इंडियन मुजाद्दीन का नाम गूगल पर सर्च किया जा रहा है। किसी राजनीतिक दल का नाम ‘इंडिया’ रख लेने से समाज के बीच क्या वह इतनी प्रतिष्ठा पा सकेगा जितनी ‘मदर इंडिया’ की है? यह बहस कुछ समय से सोशल मीडिया से लेकर मुख्य धारा की मीडिया में चल रही है?

सिर्फ कांग्रेस की जरूरत थी INDIA

इंडिया शब्द की चर्चा अचानक इतनी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि बेंगलुरु में एकत्र हुए 26 दलों के गठबंधन ने अपनी सामूहिक एकता को आइएनडीआइए यानी इंडिया नाम दिया है। इंडिया का अर्थ है, इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस। बेगलुरु की बैठक में कांग्रेस ने विपक्ष का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया। इससे पहले तक यह लग रहा था कि विपक्ष में नीतीश कुमार की अहम भूमिका रहेगी। जदयू—राजद का हश्र देखने के बाद क्षेत्रीय पार्टियां अपनी ताकत को लेकर चौकन्नी हैं। अपने बलिदान की कीमत पर कोई कांग्रेस को आगे बढ़ने देने के पक्ष में नहीं है। यह बात भी किसी क्षेत्रीय दल से छुपी हुई नहीं है कि आईएनडीआईए जैसा एक नाम ‘कांग्रेस’ की जरूरत थी। इस नए नाम का लाभ अन्य 25 दलों को कम और कांग्रेस को सबसे अधिक होने वाला है। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए के शासनकाल को देश के अंदर घोटालों और भ्रष्टाचार के शासनकाल के रूप में ही देखा जाता है। कांग्रेस मोदी सरकार के 09 साल बीत जाने के बाद भी अपने ऊपर लगे अनगिनत घोटालों के दाग को धो नहीं पाई है।

प्रधानमंत्री मोदी जिस अंदाज में कांग्रेस की मनमोहन सरकार पर हमला करते रहे हैं, उसे देखकर ममता, केजरीवाल, ठाकरे, पवार जैसे नेताओं का 2024 के चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ आना कठीन था। अब इंडिया नाम के साथ सारी पार्टियां सहज हैं। कांग्रेस के एक नेता की दलील थी कि हमारे गठबंधन का नाम इंडिया होगा तो भाजपा कभी हमें ‘एंटी इंडिया’ नहीं कह पाएगी। इंडिया नाम का विरोध भाजपा भी नहीं कर पाएगी। उन्हें अपने गठबंधन के लिए एक एक व्यक्ति तलाशना मुश्किल हो जाएगा। वर्तमान में कांग्रेस गठबंधन के 26 दलों के मुकाबले भाजपा को 38 दलों का सहयोग हासिल है। दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से यह भी कहा जा रहा है कि एंटी इंडिया होना एक प्रवृत्ति है, उसका नाम से बहुत कुछ लेना देना नहीं होता। ऐसा होता तो ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के अंदर सबसे बड़ी लूटेरी कंपनी ना होती। स्टुडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए इतना बड़ा खतरा ना बनता। पोपुलर फ्रंट आफ इंडिया और इंडियन मुजाहिद्दीन के नामों में इंडिया ना होता।

नीतीश कुमार हुए इस्तेमाल

कथित विपक्षी एकता की बैठक के समय इंडिया नाम का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विरोध किया था। संविधान में लिखा है, India that is Bharat. अब अलायंस का नाम इंडिया कैसे रख सकते हैं? नीतीश कुमार की वहां किसी ने नहीं सुनी। उनके सुझाव को बेंगलुरु बैठक में कोई महत्व नहीं मिला। पटना की बैठक में नीतीश कुमार जिस हैसियत में नजर आ रहे हैं, कर्नाटक की बैठक में उनकी वह पोजिशन नहीं थी। वे हासिए पर डाल दिए गए थे

अब नीतीश कुमार समझ गए कि कांग्रेस ने किस खुबसूरती के साथ उनका इस्तेमाल किया। ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता बिना नीतीश कुमार के प्रयास के कांग्रेस से संवाद के लिए कभी तैयार नहीं होते। नीतीश ने सबको जोड़कर एक जगह इकट्ठा किया और फिर कांग्रेस ने उन्हें सेन्टर स्टेज से हटाकर कमान अपने हाथों में ले ली। पटना में हुई पहली बैठक में नीतीश कुमार की केन्द्रीय भूमिका थी। कर्नाटक में हुई दूसरी बैठक तक आते आते ऐसा लगता है कि उनकी अब कोई भूमिका नहीं बची। स्थिति ऐसी बन गई है कि उन्हें कोई सुनने तक को तैयार नहीं है।

कांग्रेस की भूमिका पर सवाल

राहुल गांधी और ‘जन सुराज’ के संयोजक प्रशांत किशोर एक ही समय में यात्रा कर रहे थे। दोनों की यात्रा में अंतर बस इतना था कि पांच महीने में राहुल गांधी ने पूरे देश की यात्रा की और प्रशांत किशोर ने छह महीना लगाया और बिहार के सिर्फ पांच जिलों की यात्रा कर पाए। इससे राहुल की यात्रा की गति का अनुमान लगाया जा सकता है और ऐसा भी लगता है कि कांग्रेस की योजनाओं में जो लोग रणनीतिकार के तौर पर सामने से दिखाई दे रहे हैं, उनके अलावा भी कई अदृश्य शक्तियां हैं। जो देश और विदेश में कांग्रेस की हर एक कोशिश के साथ खड़ी हैं। आईएनडीआईए की अगली बैठक मुम्बई में होने वाली है, वहां कई समितियों की घोषणा होनी है, जो कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले विपक्ष के लिए रणनीति और जन आंदोलन के मुद्दे तय करेगी। पिछले दिनों कथित किसान आंदोलन, सीएए के खिलाफ चली मुहिम, एनआरसी के मुद्दे पर चल रहे विरोध में हमने इन बाहरी शक्तियों की भूमिका को खूब देखा और समझा। हाल में ही अपनी विदेश यात्रा के दौरान राहुल गांधी जिस सुनीता विश्वनाथ से मिलकर आएं हैं, उसका भारत विरोधी चेहरा कोई छुपा हुआ नहीं है। उन्होंने स्टीफन शॉ से शादी की है और हिन्दू फॉर ह्यूमन राइट नाम की एक संस्था चलाती हैं। जिसे चलाने के लिए जॉर्ज सोरोस पैसा देता है। जॉर्ज सोरोस को बैंक ऑफ इंग्लैंड को तोड़ने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, पिछले कुछ समय से वह भारत को तोड़नें की कोशिश में लगा है।

कांग्रेस के पीछे है किन शक्तियों का हाथ

राहुल से मिलने जुलने वाले लोगों में एक से बढ़कर एक नायाब चेहरे शामिल हैं, 04 जून को राहुल गांधी की न्यू यार्क में हुई मीटिंग जिस तंजीम अंसारी के नाम से बुक है। वह तंजीम इस्लामिक सर्कल आफॅ नार्थ अमेरिका से जुड़ा है। यूएस कांग्रेस के अनुसार इस्लामिक सर्कल आफॅ नार्थ अमेरिका, जमात ए इस्लामी से जुड़ा है। जमात भारत में प्रतिबंधित संगठन है। एनआईए लगातार जमात से जुड़े ठीकानों पर छापेमारी कर रही है। पिछले दिनों कश्मीर घाटी के बारामुला में जमात से जुड़े ग्यारह और जम्मू के किश्तवार में पांच ठीकानों पर एनआईए ने छापेमारी की। एनआईए के अनुसार, जमात के सदस्य दान के माध्यम से घरेलू और विदेश से जकात, मोवदा और बैत-उल-माल के रूप में धन एकत्र कर रहे थे। इन पैसों को धर्म के प्रचार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च किया जाना था। जिसे छोड़कर इसका इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में हिंसक और अलगाववादी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। इकट्ठा किए गए पैसे को जमात कैडरों के सुसंगठित नेटवर्क के माध्यम से प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-ताइबा और अन्य तक भेजा जा रहा था। उल्लेखनीय है कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ सलील सेट्टी की भी तस्वीर खूब वायरल हुई थी। सलील, जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसायटी फाउंडेशन का ग्लोबल वाइस प्रेसिडेंट है।

INDIA’ का नहीं है कोई विरोध

स्किल इंडिया (28 अंगस्त 2014), इंडिया मेड (28 सितम्बर 2014), स्टार्ट अप इंडिया (16 जनवरी 2022), स्टैंड अप इंडिया (05 अप्रैल 2016) जैसी योजनाएं मोदी सरकार में चल रहीं हैं। जिससे स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष ‘इंडिया’ शब्द के विरोध में नहीं है। दूसरी तरफ यह बताना आवश्यकता है कि भारत सहित विश्व में ऐसे लोगों, समूहों, संगठनों की बड़ी संख्या है, जो हर हाल में 2024 में मोदी सरकार को हटाना चाहते हैं। भारत जब आत्मनिर्भरता की सीढ़ियां धीरे धीरे चढ़ रहा है, एक मजबूत अर्थव्यवस्था की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है। ऐसे में बाहरी शक्तियां देश को अस्थिर करने का प्रयास करेंगी। ऐसे में विपक्ष के सामने बड़ी चुनौती है कि उन्हें बाहरी शक्तियों के हाथों कठपुतली नहीं बनना है। उन्हीं बाहरी शक्तियों से लड़ने के नाम पर कांग्रेस से एक समय शरद पवार और ममता बनर्जी अलग हुए थे। विदेशी शक्तियों की पहुंच और पावर को हमने पहले भी शाहीन बाग से लेकर कृषि कानून विरोधी आंदोलन में देखा है। जहां मोदी, भाजपा तथा संघ विरोधी दुष्प्रचार अभियान चरम पर था।

बहरहाल विपक्ष को समाज के बीच मेहनत करनी है, जमीन पर पसीना बहाना है। उसी के दम पर 2024 का मुकाबला दिलचस्प होगा।

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